डियर होली / Dear Holi । कविता । कुमार सरोज ।
पहले मैं पुरे गांव के हरेक घर में ,
बड़े और छोटे सबको ,
रंग अबीर लगाता था ,
बड़ों से आशीर्वाद लेता ,
छोटे को आशीष देता था ।
मगर अब ऐसा नहीं है ,
पुरे गांव की क्या कहे ,
अपने मुहल्ले के लोग भी ,
अब दूर रहने लगे हैं,
रंग कैसे लगाऊँ ,
वो दूर से ही देख ,
अपना चेहरा छिपाने लगे हैं ।
पहले दो तीन ड्रम रंग ,
भी कम पड़ जाता था ,
अब एक पिचकारी रंग भी ,
मुझसे खत्म नहीं होती ।
ठंढई और भांग का वो नशा ,
चाचा, दादा और संग भतीजा ,
न कोई बड़ा न कोई छोटा ,
बस सब लगते थे हमउम्र दीवाना ।
मगर न ही अब वो रिश्ते रहे ,
और न ही वो रिश्तों की मिठास ,
अब फीकी फीकी लगती है होली,
और उमस भरी सारी गलियां ।
बस अब बंद कमरे में बैठे ,
तुम्हारे साथ बिताए कल के ,
वो सारे रंगबिरंगी नजारे ,
याद कर कर के तुझे ,
बहुत मिस करता हूं ।
डियर होली .....
अब तो बता दो ,
तुम बदली हो या मैं ,
या मेरा आधुनिक समाज ,
बट डियर होली ........
आई मिस यू ऑलवेज ।
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