बिंदिया और बबलू / Bindiya Aur Babalu । भाग -5 । कहानी । कुमार सरोज ।

         बिंदिया और बबलू 
          
               ( भाग - 5 )

                             कुमार सरोज 



   अभी तक आपने पढ़ा ....... 


                 रंजीत बबलू को ही पढ़ाने के लिए शिक्षक बनाने की योजना बनाता है, मगर वह फेल हो जाता है। वह फिर से बबलू के अनपढ़ होने की पोल खोलने के लिए नई योजना अपने दोस्तों के साथ मिलकर बनाने में लग जाता है। 




     अब पढ़िए आगे ......... 



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         फंस गया बबलू बेचारा 



                  योगेश सुबह उठते ही सबसे पहले पंडित के बताए अनुसार पूजा करने के लिए गांव के देवी मंदिर की ओर चल देता है। देवी मंदिर बबलू के घर के ठीक बगल में ही था। 
         योगेश को पता नहीं ऐसा क्यों लग रहा था कि उसे मंदिर में पूजा करते समय आज बिंदिया भाभी से मुलाकात जरुर होगी। बिंदिया भी प्रतिदिन सुबह मंदिर में पूजा करने आती थी। 

              मंदिर से अभी योगेश दूर ही था मगर मंदिर के लाउडस्पीकर पर बज रहे देवी माता की आरती सुनकर वह ऐसे थिरकने लगा था मानों वह बाराती के डीजे पर नाच रहा हो। 
             वह अपने लिए एक सुंदर सुशील लड़की को पाने की कल्पना मात्र से ही इतना खुश था कि उसे देवी माता का भजन भी आज उसे उसका मनपसंद फिल्मी गीत लग रहा था। 

                 देवी माता के मन्दिर के बगल में ही एक बड़ा सा कुआं भी था। गांव के लोग उस कुआं पर नहाते भी थे। योगेश भी मजे से फिल्मी गाना गुनगुनाता हुआ कुआं पर नहाकर सिर्फ शरीर में एक गमछा लपेटकर मंदिर में पूजा करने चला जाता है। वह बाकि का अपना सभी कपड़ा कुआं के पास ही छोड़ देता है। गांव के अधिकांश मर्द ऐसा ही करते थे। वे पूजा करके फिर अपना पहले वाला खोलकर रखा हुआ कपड़ा पहनकर घर आ जाते थे। 
                 योगेश अपने साथ लाए पीतल के लोटा में पानी और मन्दिर के पास के अड़हुल के पेड़ से तोड़े फूल से देवी माता को बारी बारी से स्नान कराने लगता है।  

              योगेश जैसे ही पूजा करके मंदिर से बाहर निकलता है कि ठीक तभी बिंदिया भी पूजा करने के लिए अपने घर से निकलकर मन्दिर के आगे आ जाती है। बिंदिया को देख योगेश के दिल में खुशी के मारे तूफान उमड़ने लगता है। वह पहनी बार बिंदिया भाभी को इतने करीब से देख रहा था। उसकी पूजा सफल होते अभी से ही दिख रही थी। 
             योगेश बिंदिया को अचानक सामने देख अभी खुशी के भंवर में गोता ही लगा रहा था कि बिंदिया उसे मंदिर में देख बोल उठती है - 

  " योगेश भईया आप और मंदिर में। आजकल आपका काम धंधा मंदा चल रहा है क्या ? " 

      बिंदिया की प्यारी आवाज सुनकर योगेश तो और भाव विभोर होकर खयालों में खो जाता है। वह कुछ बोल नहीं पाता है। 

 " क्या हुआ योगेश भईया। कहां खोए हैं ? " 
  
  " भाभी, हम आपको का बताएं कि हम आज केतना खुश हैं। आपको देखने के लिए हम का का न जतन किए हैं। फिर भी बढ़िया से इतना नजदीक से कभी नहीं देखे थे। आज मेरा पूजा सफल हो गया। " 

" आप मेरे घर आ जाते।  " 

 " भाभी इस पागल को आप घर बुला रही हैं। कल ही यह लड़की के चक्कर में मार खाया है। " 

         योगेश कुछ बोल पाता उससे पहले ही बोलते हुए अपने घर की ओर से महेश वहां आ जाता है। 

     " भाभी ये झूठ बोल रहा था। खुद तो निक्कमा है इसीलिए हमसे जलता है। " 

                 महेश आगे कुछ बोलता तभी उसे चुप रहने को बोलकर बिंदिया पूजा करने मंदिर के अंदर चली जाती है। 
              पीछे से महेश भी योगेश को घूरता हुआ मंदिर के अंदर चला जाता है। 
               योगेश सारी बातें भुलाकर बिंदिया भाभी से मिलने की खुशी में ही इठलाता हुआ अपना रखा कपड़ा पहनने के लिए कुआं की ओर चल देता है। 
               तभी एक तरफ से हांफता हुआ सुजीत वहां आ जाता है। 

 " अरे तुम यहां मंदिर में घंटी डोला रहे हो और हम तुमको कहां कहां ढूंढ़ रहे थे। " 

" सुबह सुबह ऐसा हमसे का काम आन पड़ा की इतना परेशान हो ? " 

 " बात ही इतनी खुशी की है कि का बताएं। पहले तुम यह बोलो कि तुम शाम में बबलू भईया जो मीटिंग बुलाए थे उसमें तुम काहे नहीं आया था। कहां शाम से ही तुम गायब हो ?  " 

   सुजीत कुआं के पास ही बैठता हुआ बोलता है। 

 " तुमको तो हम बोले थे कि पंडित जी से मिलने जाना है। हम पण्डित जी से ही मिलने गए थे। घर आते आते शाम हो गया। मेरा मिजाज भी थका हुआ था इसीलिए घर जाकर तुरंत सो गए थे। अब बोलो तुम इतना परेशान क्यों है ? " 

 " बिंदिया भाभी गांव के सभी अनपढ़ों को पढ़ाएंगी। तुम भी तो अनपढ़ हो ही पढ़ लेना। यही तुमको बताने के लिए मरे जा रहे थे। पढ़ने का मन तो मेरा भी था, मगर हम अनपढ़ नहीं हैं, हम मैट्रिक फेल हैं। " 

               सुन योगेश खुशी के मारे सुजीत को अपने बाहों में उठाकर नाचने लगता है। वह इतना मग्न होकर नाचता है कि नाचते नाचते कपड़े के नाम पर पहना हुआ एक मात्र गमछा भी खुल जाता है। वह एकदम नंगा हो जाता है। वह तो शुक्र था कि अभी आस पास कोई तीसरा आदमी नहीं था। 
            सुजीत के कहने पर वह झट से गमछा लपेटकर अपना रखा बाकि का सभी कपड़ा पहनने लगता है। 
             वह जैसे ही अपना फुलपैंट पहनता है कि उसके अंदर घूंसा हुआ चींटी उसे जोरों से काट लेता है। वह चींटी निकालता उससे पहले ही मंदिर से बिंदिया महेश के साथ निकलती उसे दिख जाती है।
           योगेश झट वैसे ही एक तरफ भाग खड़ा होता है। सुजीत भी उसके पीछे ही तेजी से चल देता है। 
                     






             इधर बिंदिया जैसे ही पूजा करके महेश के साथ अपने घर के आगे पहुंचती है कि वहां बबलू के साथ रंजित को बैठा देख चौंक जाती है। मगर वह तुरंत सामान्य हो जाती है। 
                कल बबलू रंजीत को चाय पीने के लिए बुलाया था, जिसके कारण ही आज रंजीत सुबह सुबह ही चाय पीने आ गया था। 

 " बिंदिया, ये मेरा बचपन का लंगोटिया यार और गांव के सबसे बड़े किसान हरिहर सिंह का इकलौता बेटा रंजीत है। कल तुम्हारे हाथ का चाय पीने का जिद्द किया तो मैंने इसे आज चाय पर बुला लिया। " 
 
  " अच्छा किए। इसी बहाने कम से कम आपके गांव के दोस्तों से जान पहचान भी हो जायेगी। " 

            रंजीत तो यह सोचकर अन्दर ही अन्दर खुश हो रहा था कि आज बिंदिया अपने सामने अचानक मुझे देखकर जरूर चौकेगी। और बबलू को उसके बारे में पता चल जायेगा। मगर यहां तो एकदम उल्टा हो रहा था। बिंदिया एकदम उससे अनभिज जैसा व्यवहार कर रही थी। उसके चेहरे पर किसी तरह का कोई बदलाब या चिंता की लकीरें भी नहीं दिख रही थी। 

 "  बिंदिया हम तो सोच रहे हैं, गांव के सभी दोस्तों को एक ही दिन टी पार्टी दे देते हैं। कितना का रोज मजाक सुनेंगे। " 

 " यही अच्छा रहेगा। आप लोग तब तक बातें कीजिए मैं चाय बनाकर लाती हूं । " 

     कहती हुई बिंदिया घर के अंदर चली जाती है।
             पीछे से रंजीत को खा जाने वाली निगाहों से घूरता हुआ धीरज भी चल देता है। 

  " बबलू भाई मेहरारू तो एकदम झकास खोजे हो। पढ़ी लिखी उपर से शहरी। कहां से फंसा लिया यार ?  " 

 " यह सबके बस की बात नहीं है। पैसा और डिगरी रहने से ही सबकुछ नहीं मिल जाता है। उसके लिए दिमाग लगाना पड़ता है। " 

 " हमको भी अब विश्वास हो गया कि तुमसे ज्यादा तेज इस गांव में कोई और नहीं है। " 

            दोनों अभी बातें ही कर रहे थे कि तभी वहां पर हाथ में चिठ्ठी लिए तेतरी चाची आ जाती है। यह भी रंजीत का ही एक योजना था। 

 " बबूल बेटा, देखो न संजू के ससुराल वाले एक चिठ्ठी भेजे हैं। जरा पढ़कर बताओ तो कि इसमें क्या लिखा है। " 

   तेतरी चाची आते ही अपने हाथ का लिफाफा बबलू को देती हुई बोली।

           बबलू रंजीत का प्लान तुरंत समझ जाता है। वह किसी के चेहरे क्या उसके मन को भी पढ़ने में महारत हासिल की हुए था। 

 " चाची इसमें इतना परेशान होने की क्या जरुरत है, मैं अभी पढ़ कर सुना देता हूं। वैसे यह चिठ्ठी तो कोई भी पढ़कर सुना देता। " 

 " शादी की बात है बेटा। गांव में सब पर विश्वास नहीं कर सकते हैं। मगर तुम पर हमको पुरा विश्वास है। " 

  " तेतरी चाची ठीक कह रही है, बबलू। पढ़ दो बेचारी की चिठ्ठी । " 

           बबलू लिफाफा में रखा चिठ्ठी निकालकर पढ़ने लगता है।
             रंजीत को जरा भी विश्वास ही नहीं हो रहा था कि आखिर बबलू इतना धाराप्रवाह पढ़ कैसे रहा था। जबकि उसके भाई दिनेश के अनुसार तो वह अंगूठा छाप था। 
          तेतरी भी मन ही मन अब रंजीत को कोस रही थी। वह उसी के कहने पर तो उसी का लिखा हुआ चिठ्ठी लेकर आई थी। 
             वास्तव में यह सब कारनामा बबलू ने अपने मोबाइल और ब्लूटूथ वाला वायरलेस हेडफोन से किया था। बबलू हमेशा अपने हाथ में फोन और कान में वायरलेस हेडफोन लगाए रहता था। वह रंजीत को बातों में उलझाकर चिठ्ठी का फोटो बिंदिया को भेज दिया था, और उस चिठ्ठी को बिंदिया ही पढ़कर बबलू को घर के अंदर से फोन पर सुना रही थी। यह सब बबलू इतनी सफाई से किया था कि रंजीत जैसा धूर्त इंसान के पकड़ में भी नहीं आ सका। यही तो बबलू की कलाकारी थी। तभी तो बिंदिया जैसी पढ़ी लिखी शहरी लड़की भी उसकी असलीयत नहीं पकड़ पाई थी। 
               तेतरी चाची अंत में चिठ्ठी लेकर चली जाती है। इधर तेतरी चाची जाती है और उधर घर के अन्दर से चाय लिए बिंदिया वहां आ जाती है। 
               रंजीत का चेहरा अब पहले जैसा खिला हुआ नहीं था।
              बिंदिया दोनों को चाय देकर घर के अन्दर चली जाती है।  
             रंजीत भी जल्दी जल्दी चाय पीकर वहां से चल देता है। 
           बिंदिया अभी अपने कमरे में आकर बैठती ही है कि बाहर से बबलू भी कमरे में आ जाता है। अभी पता नहीं क्यों बिंदिया के चेहरे पर सोच की लकीरें उभरी हुई थी। 

 " क्या हुआ, तुम कुछ परेशान दिख रही हो। " 

  बबलू बिंदिया के उदास चेहरे को देखते ही पुछ बैठा।

 " मैं आपको एक बात बताना चाह रही थी। उसी बात को लेकर मैं थोड़ी परेशान हूं। "

 " रंजीत को तुम पहले से जानती थी। यही बताना चाहती हो न। " 

 " आपको कैसे पता ? " 

 " बिंदिया जी, मैं बबलू हूं। जो किसी का सिर्फ चेहरा देख कर उसके दिल की बात समझ जाता है। तुम्हें परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है। रंजीत जैसे लोग हमें या तुम्हें कुछ नहीं बिगाड सकते हैं। बैसाखी के सहारे चलने वाला इंसान कभी दौड़ते हुए इन्सान का मुकाबला नहीं कर सकता है। "

  " मगर आपको कैसे पता चला। मैंने तो कभी कुछ बताया ही नहीं ?  " 

 "  जिस दिन तुम गांव में कदम रखी थी, और तुम पहली बार रंजीत को देखी थी तो कुछ देर के लिए तुम्हारे चेहरे का रंग फीका पड़ गया था। मैं तभी समझ गया था कि कुछ न कुछ बात है। बाद में जब रंजीत से उसके कॉलेज के बारे में पुछा तो वह भी अपना कॉलेज का नाम तुम्हारे कॉलेज का ही बताया। फिर मैं सारा माजरा समझ गया। " 

 " आप सच में बहुत जीनियस हैं। " 

  कहती हुई बिंदिया खुशी के मारे बबलू से लिपट जाती है।  

  " बिंदिया तुम साथ हो तो हम अंगूठा छाप बबलू पुरी दुनिया भी जीत सकते हैं। " 

     कहते हुए बबलू भी बिंदिया को बाहों में भर लेता है। 

             उधर बबलू के घर से रंजीत उदास बुझे मन हारे हुए खिलाड़ी की तरह अभी अपने घर की ओर जा ही रहा था कि सामने से सरपंच साहब हाथ में एक कागज लिए आ जाते हैं। 

 " अरे बेटा रंजीत जरा यह डीएम साहब का चिठ्ठी पढ़ कर सुनाओ तो। अधिकारी लोग भी न एकदम बकलोले होते हैं, अंगरेजी में लिख कर चिठ्ठी भेजते हैं। " 

            सरपंच साहब की बात सुनते ही रंजीत का उदासी तुरंत छूमंतर हो जाता है। 

 "  सरपंच चाचा आपको तो पता है, अंग्रेजी मेरा भी खराब ही है। आप बबलू से पढ़ा लीजिए न। अभी हम उसी के यहां से आ रहे हैं। वह घर पर ही है। "

            सरपंच साहब कुछ बोल पाते की तभी दूर से बबलू इसी ओर आता दिख जाता है। 

" लो, बबलू तो इधर ही आ रहा है। " 

             बबलू को आता देख रंजीत का तो खुशी का ठिकाना ही नहीं रहता है। इस बार बबलू का पक्का पोल खुलने वाला था। 
 
 " पता है सरपंच चाचा बबलू के गांव में आने से गांव की रौनक बढ़ गई।  "

 " तुम एकदम सही बोला। " 

             तब तक बबलू भी पास आ जाता है।

 " रंजीत क्या सही बोला चाचा ? " 

  " तुम्हारे बारे में ही बोल रहा था। बबलू जरा यह डीएम साहब का चिठ्ठी पढ़ कर सुनाओ तो । लगता है कोई नया स्कीम आया है सरकारी ।  " 

            चिठ्ठी पढ़ने की बात सुनते ही बबलू का दिल अन्दर ही अन्दर जोर जोर से धड़कने लगता है।  बिंदिया तो बबलू के सामने ही नहाने के लिए बाथरूम में चली गई थी। फिर अब वह चिठ्ठी पढ़ेगा कैसे ? वह भी अंग्रेजी में लिखा हुआ।  

  " लाइए चाचा। मैं पढ़कर समझा देता हूं। रंजीत नहीं पढ़ा क्या ? " 

 बबलू सरपंच साहब से चिठ्ठी लेते हुए बोला। 

" रंजीत सिर्फ नाम का पटना कॉलेज में पढ़ा है। ठीक से हिन्दी भी नहीं पढ़ने लिखने आता है। और यह चिठ्ठी तो अंग्रेजी में है। " 
  
           बबलू 5 दिन पहले ही डीएम साहब का प्रेस कांफ्रेंस का वीडियो मोबाइल पर देखा था। वह जानता था कि यह कागज पक्का सरकार की नई योजना जल जीवन हरियाली के बारे में ही होगा। फिर क्या था वह हाथ में चिठ्ठी लेकर पढ़ने का नाटक करते हुए डीएम साहब का बोला हुआ एक एक शब्द सरपंच साहब को भी बता देता है। उसे पता था कि रंजीत को तो अंग्रेजी खुद नहीं आती है इसीलिए वह उसे नहीं पकड़ सकता था। 

            बबलू सरपंच साहब को सरकारी योजना जल जीवन हरियाली जिसमें प्रत्येक गांव में सूखे तालाब एवं कुआं को फिर से उसका साफ सफाई एवं मरम्मत करवाकर उपयोग में लाने के लायक बनाना था के बारे में विस्तार से बताता है। 
               बबलू के गांव मंझार में भी एक पुराना तालाब था, जो अब विलुप्त के कगार पर आ गया था। 
               बबलू की पुरी बात सुनकर सरपंच साहब बहुत खुश होते हैं।
             जबकि रंजीत के दिमाग का फ्यूज फिर से उड़ जाता है। उसे अभी तक समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर बबलू पढ़ कैसे रहा था ! 

               उसी दिन शाम में बिंदिया बबलू द्वारा गांव में शुरु किए गए रात्रि पाठशाला में गांव के सभी अनपढ़ स्त्री पुरुष एवं सभी स्कूली बच्चों को पढ़ाती है। 
             योगेश एवं महेश के अलावा और भी बहुत से बुजुर्ग स्त्री पुरुष पढ़ने आते हैं।
           सुजीत तो पढ़ा लिखा था इसीलिए वह बिंदिया के साथ मिलकर सभी को पढ़ाने का काम करता है। उसके साथ ही गांव के कुछ और लड़के पढ़ा रहे थे। 
            सुजीत बार बार महेश को ही पढ़ाई के बहाने डांटते रहता है। जबकि योगेश बार बार किसी न किसी बहाने बिंदिया के पास ही आते रहता है। 
                   अगले दिन सुबह रंजीत फिर से अपने दोस्तों के साथ मिलकर बबलू के अनपढ़ होने की पोल खोलने की नई योजना बनाने में लग जाता है। अब वह साम दाम दंड भेद रूपी सभी अस्त्र का उपयोग करने का मन बनाता है। 




                क्रमशः आगे ..... 



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 नोट :- 
         
    क्या रंजीत अपने मंसूबा में सफल हो पायेगा ?

  क्या चालाक बबलू की चालाकी पकड़ी जायेगी ? 

    क्या योगेश की पूजा सफल होगी ? 

        ऐसे ही बहुत सारे सवालों का जवाब जानने के लिए पढ़ते रहिए कहानी 
       बिंदिया और बबलू .... 


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                               कुमार सरोज


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