बैड गर्ल / Bad Girl । कहानी । कुमार सरोज ।

                बैड गर्ल

                            कुमार सरोज


            
                शाम का समय था। मुंबई महानगर में एक इलाका है नालासोपारा। नालासोपारा में ही यशवंत नगर सबसे पॉश एरिया था। शाम होने के कारण अभी सड़क पर ज्यादा भीड़ थी। ऑफिस वाले छुट्टी के बाद जल्दी जल्दी घर पहुंचने के चक्कर में अपनी गाड़ी को तेजी से सड़क पर भगा रहे थे। 
           शशांक भी अपनी कार को तेजी से चलाता हुआ अपने सोसायटी के मैन गेट से अन्दर प्रवेश करता है। वह अपनी कार एक किनारे खड़ा करके अपने फ्लैट की ओर चल देता है। उस समय सोसायटी के लॉन में बहुत सारे बच्चे खेल रहे थे। 






               शशांक यशवंत नगर के मॉडर्न सोसायटी में रहता था। इस सोसायटी में दो बेड रूम का उसका अपना फ्लैट था। जिसे उसके पिता मनोहर राणा ने 5 साल पहले उसे रहने के लिए खरीदे थे। शशांक का पैतृक घर पुना के पास एक गांव में था। उसके पिता पुना में ही एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे। रिटायर्ड होने के बाद शशांक के पिता ने उसके लिए नालासोपरा में एक फ्लैट ले दिए थे। यहां फ्लैट लेने के पीछे भी एक कारण था क्योंकि उस समय शशांक को मुम्बई के ही एक प्राइवेट बैंक में मैनेजर की नौकरी लग गई था, वह अभी भी उसी बैंक में नौकरी करता था। किराए के घर में उसे परेशानी नहीं हो इसीलिए उसके पिता ने अपने रिटायमेंट के पैसे, अपनी जिन्दगी की कुल जमा पूंजी, एवं गांव में कुछ जमीन जो पुरखों का था उसे बेचकर ही यह फ्लैट खरीदा था। 
             मुंबई आते ही शशांक अपने ही पसंद की लड़की रागिनी से शादी कर लेता है। उस समय वह किराए के फ्लैट में ही रहता था। 
              अब शशांक के शादी के 7 साल हो गए थे। उसका 6 साल का एक बेटा भी था यश। यश अभी पास के ही एक कॉवेंट स्कूल में क्लास 1 में पढ़ता था। 
              फ्लैट खरीदने के कुछ ही महीनों के बाद शशांक अपने माता पिता भी साथ रहने के लिए गांव से बुला लिया था। अभी एक साल पहले ही उसके पिता का देहांत हो गया था।
             अब शशांक के साथ उसकी पत्नी रागिनी, 6 साल का बेटा यश और विधवा मां भारती रहती थी। 
              शशांक अपनी कार से उतर कर धीरे धीरे अपने फ्लैट की ओर चल देता है। शशांक का फ्लैट दूसरे भी फ्लोर पर था, इसीलिए वह ज्यादा सीढ़ी से ही आता जाता था। आज भी वह सीढ़ी से चढ़कर जैसे ही अपने फ्लैट का कॉलबेल बजाता है उसकी पत्नी रागीनी झट दरवाजा खोलती है। शशांक चेहरे पर मुस्कान लिए उसे देखता है। मगर रागिनी अपने पति को सामने देखते ही उस पर बरस पड़ती है। शायद वह पहले से ही बोलने के लिए तैयार बैठी थी। इसीलिए आज दरवाजा वह तुरंत खोली थी। 

 " देखो, अब मुझसे तुम्हारी मां की सेवा नहीं होगा। वह हमेशा तो बीमार ही रहती है। उसकी देखभाल करते करते मैं थक गई हूं। तुमको एक महीना से बोल रही हूं कि तुम उसे किसी वृद्धाश्रम में ले जाकर छोड़ आओ। मगर तुम सुनोगे कहां से। सरला को देखो उसने एक बार अपने पति को बोली और उसका पति अगले ही दिन अपनी मां को वृद्धाश्रम छोड़ आया। ममता, सैलजा और बहुत सारे सोसाइटी के लोग ऐसा बहुत पहले ही कर चुके हैं। तुम कोई पहले इंसान नहीं हो। वैसे भी वृद्धाश्रम में मात्र 8 हजार महीना लेते हैं। उससे ज्यादा तो उसके ऊपर यहां खर्च है। ऊपर से एक कमरा में रहती है। उसके नहीं रहने से उस कमरा से 10 हजार किराया आयेगा। ऊपर से मेरी परेशानी भी कम हो जायेगी। सरकारी वृद्धाश्रम में तो विधवा औरतों को फ्री में ही रखा जाता है। आज तुम फैसला कर लो। वरना मैं इस घर में नहीं रहूंगी ........... ।    " 

              शशांक अभी दरवाजे से अन्दर कदम रखा ही था, कि रागिनी उसे अपने मन की भड़ास सुनाने लगी थी। वह आज कुछ ज्यादा ही गुस्से में दिख रही थी। 
              इधर रागिनी अपने पति पर गरज रही थी और उधर ठीक तभी शशांक की विधवा मां लालती अपने पोते यश के साथ बाहर से घर आ जाती है। वह यश को नीचे लॉन में खेलने के लिए ले गई थी। लालती अपनी बहू के जोर जोर से बोलने की आवाज सुनकर यश के साथ दरवाजे के बाहर ही खड़ी होकर सारी बाते सुनने लगती है। ललिता पहली बार अपने कानों से बहू के ऐसे बोल सुन रही थी। भले उसका व्यवहार उसके प्रति अच्छा नहीं था, मगर उसके प्रति इतने  बुरे ख्याल होंगे वह कभी सोची भी नहीं थी। 
             यश था तो अभी बच्चा मगर अपनी मां की बातों को सुनकर एवं दादी के चेहरे के बदले भाव को देखकर इतना तो समझ जाता है, कि उसकी मां कुछ ठीक नहीं बोल रही है।
         फ्लैट का मैन गेट अभी तक खुला हुआ ही था। इधर रागिनी अपने धुन में अभी भी अपनी मन की भड़ास निकाले जा रही थी। बीच बीच में शशांक कुछ बोलना भी चाहता था तो उसे रागिनी डांटकर चुप करा दे रही थी। बेचारा शशांक चुप होकर नहीं चाहते हुए भी अपनी पत्नी की बाते सुनने को विवश हो जा रहा था। 
               आजकल की मॉडर्न बहुएं आखिर यह क्यों नहीं समझने को तैयार थी कि वह भी तो कभी बूढ़ी होगी, वह भी कभी सास बनेगी। आज रागिनी को जैसे उसकी बूढ़ी सास बोझ लग रही थी, वह भी तो एक दिन अपनी बहू के लिए बोझ बनेगी। काश ! एक औरत दुसरी औरत के दर्द को  समझ पाती। आज एक औरत ही खुद की सबसे बड़ी दुश्मन बनते जा रही थी। 
              जब बहुत देर तक रागिनी का ज्ञान वाणी बंद नहीं होता है तो यश से रहा नहीं जाता है। वह बाहर बरामदे में ही जोर जोर से गाते हुए नाचने लगता है।
                  यश की आवाज सुनकर रागिनी तुरंत चुप हो जाती है। वह बहुत चालाक औरत थी। यश की आवाज सुनते ही समझ गई थी कि उसकी सास भी साथ होगी। 
               अपनी मां को चुप होते ही यश गाना एवं नाचना बंद कर देता है।  वह कुछ देर के बाद ही अपनी दादी को लेकर घर के अंदर आ जाता है। 
             यश घर पर ज्यादा समय अपनी दादी के साथ ही रहता था। नहीं तो उसकी मां के पास अपनी सहेलियों से गप्पे लड़ाने, उनके साथ टी पार्टी करने एवं शॉपिंग से फुर्सत ही कहां थी। इन सब से समय बचता भी था तो मोबाइल में लग जाती। 
          यश रात में भी अपनी दादी के साथ ही सोता था। पहले दादा जिंदा थे तो उनके साथ रहता था, और उन्हीं के साथ सोता भी था। मगर उनके मर जाने के बाद अब पिछले एक साल से उसके लिए दादी ही दादा बन गई थी। 
              रोज की भांति उस रात भी सभी खाना खाकर सो जाते हैं। शाम के बाद किसी ने फिर उस टॉपिक पर बात नहीं किया था। 
             सुबह यश को स्कूल बस में चढ़ाकर जो की सोसायटी के गेट पर आती थी, जैसे ही शशांक घर वापस आता है कि अपनी मां को हाथ में एक थैला लिए कहीं जाने को तैयार देख चौंक जाता है। 

  " मां सुबह सुबह तुम कहां जा रही हो ? 

      शशांक मां को देखते ही पुछ बैठता है। 

            तब तक रागिनी भी अपने कमरे में से निकलकर हॉल में आ जाती है। 

 " बेटा, मैं तुम्हें परेशानी में नहीं देख सकती हूं। तुम्हारी खुशी ही हमारी खुशी है। हम या तुम्हारे पापा शुरु से ही अपनी सारी इच्छाओं को दबाकर सिर्फ तुम्हारी इच्छा पूर्ति करते आ रहे हैं, ताकि तुम्हें कोई दुःख या तकलीफ नहीं हो। एक एक पैसा जमा करके पढा लिखा कर तुम्हें नौकरी के लायक बनाएं। ख़ुद जिन्दगी भर किराए के घर में या गांव के पुराने घर में ही रहें, मगर तुम्हें कोई तकलीफ नहीं हो इसीलिए नया फ्लैट खरीदकर दिए। इतना करने के बाबजूद भी अगर आज हमारी वजह से तुम्हें परेशानी हो रही है तो इसमें शायद मेरी ही कोई गलती होगी। मुझे अफसोस तो इस बात की है कि मैं अपने पति की अरमानों पर खरी नहीं उतरी, तभी तो तुम्हें आज खुश नहीं रख सकी। तुम अपने परिवार के साथ खुश रहो, इसीलिए मैं खुद ही यह घर छोड़कर जा रही हूं। शायद ऐसा करके मैं अपने मरे हुए पति के आत्मा को खुशी प्रदान कर सकूंगी। " 

   कहती हुई लालती बिना एक पल गवाएं हॉल से बाहर चली जाती है। शशांक लाख मना करने की कोशिश करता है मगर वह नहीं रुकती है। 
                 अपनी सास को यूं जाते देख रागिनी मन ही मन खुशी से नाचने लगती है। 
             अपनी मां को जाने के बाद शशांक हॉल में ही सोफे पर उदास बैठ जाता है। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह अब क्या करे। 
             अपनी सास को जाते ही रागिनी झट अपने मोबाइल से किराए पर रूम लगाने वाले एक ब्रोकर दयाल को फोन करके बताती है कि उसे एक कमरा किराए पर देना है। वह बहुत खुश थी। वह शशांक के पास आकर बैठ जाती है। 

  " मैंने ब्रोकर को बोल दिया है, वह अपना मां जी वाला कमरा किराए पर लगा देगा। 10 हजार मैने रेंट बोला है। इतना में मेरा सारा काम हो जायेगा। अब तुमसे पैसे के लिए बक बक भी नहीं करना पड़ेगा। बस तुम यश का स्कूल फीस, बिजली बिल, और घर का राशन के लिए पैसे दे देना। " 

            लालती बोलती तो है मगर शशांक पास होकर भी उसकी बात को नहीं सुन पाता है। उसके दिमाग में तो अभी भी सिर्फ मां के कहे एक एक शब्द गूंज रहे थे। वह मन ही मन अपनी पत्नी पर गुस्सा तो बहुत कर रहा था, मगर वह कुछ करने या बोलने की अंदर से हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। 
           इधर लालती घर से किसके पास जायेगी, कहां जायेगी ये सब बिना कुछ सोचे ही बस मन में आया अब घर में नहीं रहना है तो निकल गई थी। मगर उसे अपने भगवान और खुद के कर्म पर विश्वास था। वह अभी फ्लैट से निकलकर सोसाइटी के मुख्य दरवाजे की ओर जा ही रही थी कि एक तरफ से मेहरा जी अपनी पत्नी के साथ आ जाते हैं। वो भी लालती के पति के साथ ही पहले काम करते थे। रिटायरमेंट के बाद वो भी मॉडर्न सोसाइटी में ही एक फ्लैट खरीदे थे। उनके घर में बस दोनों पति पत्नी ही थे। बेटा दिल्ली में नौकरी करता था और वही अपने परिवार संग सैटल हो गया था। मेहरा जी ही अभी इस सोसाइटी के सेक्रेटी थे। दोनों परिवारों में पहले भी बहुत जमती थी, और आज भी अच्छे संबंध थे। 
लालती को सुबह सुबह अकेले बाहर की ओर जाते देख मेहरा जी पूछ बैठते हैं - 

 " भाभी जी इतना सुबह सुबह अकेली कहां जा रही हैं । शशांक घर पर नहीं है क्या ?

" भाई साहब शशांक घर पर ही है। उसे बैंक आज जल्दी जाना था इसीलिए मैं उसे नहीं बोली। बस मन्दिर से होकर आ रही हूं। " 

    लालती पुरी तरह सफेद झूठ बोलती है।  

  " दीदी, वैसे भी आज कल के संतानों के पास अपने बुजुर्ग माता पिता के लिए समय कहां है। " 

   मेहरा जी की पत्नी झट बोल पड़ती है। 

" ठीक है भाई साहब मैं चलती हूं। " 

          कहती हुई भारती बाहर की ओर चल पड़ती है। 

         मेहरा जी भी अपनी पत्नी के साथ अपने फ्लैट की ओर जो की तीसरे फ्लोर पर था चल पड़ते हैं। 

              उस दिन शशांक बिना कुछ खाए पिए ही अपनी मां के जाने के कुछ ही देर के बाद बैंक चला जाता है। 
             पति के जाने के बाद रागिनी दिन में ही फ्रीज से बीयर निकाल कर पीती हुई तेज म्यूजिक बजा कर खुशी के मारे डांस करने लगती है। 
        
               क्या सच में आज एक बहू रूपी स्त्री की इंसानियत इतनी गिर गई थी कि वह अपनी सास को घर से जाने को विवश करके इतनी खुश थी। क्या उसे अपनी बुढ़ापे का जरा भी ख्याल नहीं आया। उसे अपनी जवानी और रूप का इतना गुरुर था ? वह सच जानकर भी उससे दूर भाग रही थी ! सबको एक दिन बुजुर्ग होना ही होना है। फिर एक नारी के द्वारा ही एक दुसरी बुजुर्ग नारी को दुःख देकर उसे इतनी खुशी क्यों हो रही थी ?  
 
             रागिनी नहा धोकर अभी मेकअप ही कर रही थी कि यश उस दिन भी नियत समय पर स्कूल से घर आ जाता है। वह दोपहर 1 बजे तक प्रतिदिन घर आ जाता था।
             घर में दादी को नहीं देख वह अपनी मां से उसके बारे में पुछ बैठता है - 

  " मां, दादी घर में नहीं है। वो कहां गई है ? " 

" मुझे नहीं पता। डैडी आयेंगे तो उन्हीं से पूछ लेना। उन्हें पता है। तुम जल्दी से फ्रेस हो जाओ, मैं खाना निकालती हूं। " 

             यश आगे कुछ पुछता इससे पहले ही रागिनी बोलती हुई किचेन की ओर चली जाती है। 
              यश दादी के कमरे जिसे ही वह अपना कमरा भी मानता था चला जाता है। 
             रागिनी अभी यश को खाना खाने के लिए देती ही है कि तभी डोरबेल बज उठता है। 
                पता नहीं क्यों डोरबेल की आवाज सुनते ही रागिनी के चेहरे पर मुस्कान खिल उठती है। वह झट घर का दरवाजा खोलती है। सामने जींस टीशर्ट पहने एक खुबसूरत जवान लड़की खड़ी थी। उसके चेहरे पर बहुत ही प्यारी मुस्कान थी। 

  " मुझे दयाल ब्रोकर ने आपका एड्रेस दिया था। शायद आपके यहां कोई रूम खाली है। मुझे रेंट पर चाहिए था । " 

        रागिनी को देखते ही वह लड़की बोल पड़ी। 

 " हां , उसने मुझे तुम्हारे बारे में अभी कुछ देर पहले ही कॉल करके बताया था। तुम अन्दर आ जाओ। " 

             रागिनी के साथ वह लड़की जिसका नाम मेधा था घर के अन्दर आ जाती है। 
          यश उस समय तक खाना खा लिया था। वह भी दोनों के पास आकर खड़ा हो जाता है। 

 " तुम्हारा नाम मेधा है न ? " 

" हां.. । " 

  " चलो मैं तुमको कमरा दिखा दूं। " 

  कहती हुई रागिनी मेधा को लेकर कमरे की ओर चल देती है।।

           रागिनी मेधा को अपनी सास वाला कमरा दिखाती है। उस कमरे से ही एक बाथरूम भी अटैच था। मेधा को कमरा पसन्द आ जाता है। 

" मेरा डांस ग्रुप है, और मैं अपने ग्रुप की हेड हूं। इससे आपको कोई प्रॉब्लम तो नहीं है न ? " 

" नहीं प्रॉब्लम तो नहीं है, बट मैंने दयाल को रेंट 15 हजार बोली थी। " 

 " मैं वो देने के लिए रेडी हूं। " 

" तब मुझे कोई आपत्ती नहीं है। तुम आराम से रहो। " 
    
               पास में खड़ा यश दोनों की बात सुनकर इतना तो समझ गया था कि मां दादी के रूम को रेंट पर लगा रही है। मगर वह मेधा के कारण कुछ बोल नहीं पा रहा था। 
           
               मेधा पुरे एक साल का रेंट एडवांस में रागिनी को देकर एवं आज ही शाम तक रूम में शिफ्ट करने को बोलकर वहां से चली जाती है। 
              मेधा के जाते ही यश अपनी मां से पूछ बैठता है - 
  
 " मां, तुम दादी का रूम रेंट पर क्यों लगा रही हो। दादी कहां रहेंगी ? " 

 " तुम ज्यादा सवाल मुझसे मत करो। जो भी पूछना है पापा से पूछ लेना। अभी तुम जाकर अपना सारा सामान मेरे रूम में रख लो। गार्ड अंकल को बोले हैं वो आकर उस कमरे की सफाई करेगा। "

             यश अपनी मां से कुछ और पुछना तो चाहता था लेकिन उसे गुस्से में देख मार खाने के डर से वह चुप चाप वहां से चला जाता है। आज तो उसे मार खाने से बचाने वाली उसकी प्यारी दादी भी नहीं थी। एसिलिए वह चुप ही रहना उचित समझा। 
  
           उधर शशांक उस दिन बैंक से लंच के बाद ही छुट्टी ले लेता है। वह भले उस समय अपनी पत्नी के गुस्से के कारण मां को नहीं रोक पाया था, मगर अब वह अपनी मां को वापस घर ले जाने की हिम्मत जुटा लिया था। इसीलिए मां की तलाश में वह बैंक से निकलकर उन सभी वृद्धाश्रम में जाकर पता लगाता है जिसे वह जानता था। मगर उसकी मां कहीं नहीं मिलती है।  
 
      ' अगर वह किसी वृद्धाश्रम में नहीं गई थी तो फिर वह गई तो गई कहां ? '  यही सवाल शशांक के मन में बार बार उठ रहे थे। 

         शशांक दोपहर से रात 10 बजे तक अपनी मां को इस वृद्धाश्रम से उस वृद्धाश्रम तक पता लगाने में ही गुजार देता है। मगर कुछ पता नहीं चलता है। थक हार कर अंत में वह अपना घर वापस आ जाता है। 

             शशांक जब घर आता है तो उस समय रागिनी टीवी देख रही थी और यश मोबाइल में गेम खेल रहा था। 
                 मेधा कमरे में शाम में ही अपना सामान रख कर तुरंत कहीं चली गई थी। जो अभी तक नहीं आई थी। वह जाते समय रागिनी से मैन गेट का डुप्लीकेट चाबी अपने साथ लेकर गई थी ताकि ज्यादा देर होने पर दरवाजा स्वयं ही खोलकर अन्दर आ जाए। 
                यश अपने पापा को घर आया देख तुरंत दादी के बारे में एवं उनके रूम जो अब रेंट पर लग गया था उसके बारे में पूछ बैठता है। मगर शशांक बिना कुछ बोले चुपचाप बेड रुम में चला जाता है। 
              रागिनी अभी भी टीवी पर अपना मनपसंद सीरियल देख रही थी। 
          यश पीछे पीछे अपने पिता के बेड रुम में भी आ जाता है। वह बार बार सिर्फ दादी के बारे में ही पुछते रहता है। 

 " बेटा, दादी अपने भईया के घर गई है, 2 - 3  दिन में वापस आ जायेगी। मैं फ्रेस होकर आता हूं फिर डिनर पर बात करते हैं। " 

 " ओके पापा। " 

                बेचारा यश अपने पापा के कहे बात को सच मानकर बेडरूम से बाहर चला जाता है।
           दादी के बिना यश को कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। वह बेडरूम से निकलकर दादी के कमरे की ओर चल पड़ता है, मगर कमरा में ताला लगा देख उसे याद आता है कि इस कमरा को तो मां ने रेंट पर लगा दिया है। वह बुझे मन हॉल की ओर चल देता है। डाइनिंग टेबल हॉल में ही था।
            
            अगले दिन रविवार था, छुट्टी का दिन। फिर भी शशांक सुबह उठते ही दोस्त से मिलने जाने को बोलकर घर से चला जाता है। जबकि वह अपनी मां के बारे में पता लगाने जा रहा था। पता नहीं क्यों वह एक बार मां से मिलकर उसे घर लाने का फिर से प्रयास करना चाहता था। 
            यश भी उठकर सोसाइटी के लॉन में अपने दोस्तों के साथ खेलने आ जाता है। 
        रागिनी भी उठकर मार्निंग वॉक पर चली जाती है। मॉर्निंग वॉक तो सिर्फ़ उसका एक बहाना था, नहीं तो वहां सिर्फ वह अपनी सहेली सरला, पुष्पा, कामिनी, नेहा एवं ममता के साथ सोसाइटी के स्त्री पुरुष के चाल चलन एवं उसके बायोडाटा पर चर्चा सिर्फ करती थी।
           रागिनी जैसे ही उस दिन सभी को बताती है कि उसकी सास घर छोड़कर चली गई , और उसने अपना रूम भी रेंट पर लगा दिया तो सभी सुनकर बहुत खुश होती है, और सभी रागिनी से पार्टी मांगती है। रागिनी सभी को आज शाम घर पर टी पार्टी और कल बीयर बार में ले जाकर पार्टी देने का वादा करती है। 
            रागिनी के लिए तो दो दो खुशी थी। एक सास का घर छोड़कर जाना, और दुसरी रूम का ज्यादा रेंट मिलना। वह मेधा के मजबूरी का फायदा उठाकर उससे 10 हजार के बदले 15 हजार रेंट ले रही थी।
              रागिनी की सभी सहेलियां उसके दिमाग की बहुत तारीफ कर रही थी। आखिर करती भी क्यों नहीं। कितने दिनों के बाद वह सभी को बीयर बार में ले जाकर पार्टी देने वाली जो थी। 
                उधर यश लॉन में अपने दोस्तों के साथ खेलने आ तो जाता है, मगर यहां भी उसे उसकी दादी की यादें कचोटने लगती है। वह रहती थी तो उसे कैसे खेलना चाहिए, कैसे दौड़ना चाहिए और भी बहुत सारी बाते बताती थी। तभी तो वह अपने दोस्तों से हमेशा खेल में जीतता था।
             जब यश को दादी की बहुत याद सताने लगती है तो वह उसी जगह पर ठीक वैसे ही जाकर बैठ जाता है जैसे उसकी दादी अकसर बैठा करती थी। ऐसा करने से यश के दिल को कुछ सकून मिलता है। इसीलिए वह चुपचाप उस दिन बहुत देर तक वैसे ही बैठा रहता है।
            तभी मेधा भी अपने कमरे में से लॉन में आ जाती है। वह रात देर से आई थी, इसीलिए आज अभी सो कर उठी ही थी। मन भारी भारी लग रहा था इसीलिए वह भी नीचे लॉन में आ गई थी। 
               मेधा लॉन में एक किनारे सीमेंट के बने बेंच पर यश को उदास बैठा देख वह भी उसी के पास आ जाती है। 

 " गुड मॉर्निंग यश। कैसे हो ? " 

    यश सिर्फ नजरें उठाकर मेधा की ओर देखता है मगर जवाब में कुछ नहीं बोलता है। 

  " क्या हुआ, उदास क्यों हो ? जाओ फ्रेंड के साथ खेलो । " 

 मेधा यश के बगल में बैठती हुई बोली। 

 " आप मेरी दादी के रूम में क्यों रहने आई हो। यू आर अ बैड गर्ल। " 

 " मेरे गुड बॉय, आपके ममा को पैसा चाहिए था तो उन्होंने आप के दादी के रूम को रेंट पर मुझे दे दिया। और मुझे रहने के लिए रूम चाहिए था तो मैं रहने आ गई। बस इतनी सी बात है। " 

" मेरी दादी तो कुछ ही दिन में घर वापस आ जाएगी, फिर आप कहां जाओगे। " 

 " आपकी दादी कुछ ही दिन में घर वापस आ जाएगी, ये बात आपको किसने कहा ? " 

" पापा ने । " 

         मेधा यश के जवाब को सुनकर थोड़ी देर के लिए सोच में पड़ गई। फिर कुछ देर के बाद बोली - 

" आपकी दादी जब घर आ जायेंगी तो मैं चली जाऊंगी। अब खुश हो जाओ। चलो आज मैं भी तुम्हारे साथ खेलती हूं। " 

        कहती हुई मेधा यश के हाथ को पकड़कर उस ओर चल देती है जिधर बहुत से बच्चे खेल रहे थे। 

               शशांक घर से निकलने के बाद उस दिन भी बहुत सारे वृद्धाश्रम एवं उन सभी जगहों पर जाकर पता लगाता है जहां उसे अपनी मां को जाने का शक था। मगर वो कहीं नहीं मिलती है। 
         दोपहर में मेधा भी घर से बाहर चली जाती है। यश अब थोड़ा बहुत उससे घुल मिल गया था। 
              यश हॉल में सोफा पर बैठा मोबाइल में गेम खेल रहा था। जबकि उसकी मां रागिनी को आज शाम बार में पार्टी करने जाना तो अभी से ही तैयार होने में लगी थी। 

            रागिनी की सहेली सरला के पास खुद का कार था, वह खुद ही ड्राइव भी करती थी। इसीलिए शाम को सभी सहेलियां सरला के कार में ही बैठकर बीयर बार जाने के लिए निकल पड़ती है। 
         उस समय तक भी शशांक घर नहीं आया था। अभी यश अकेला ही घर पर था। रागिनी जाते समय यश को साथ चलने के लिए पुछती तक नहीं है। यश भी अपनी मां को जाते समय कुछ नहीं बोलता है। 
         रागिनी नालासोपारा के ही सबसे अच्छे बीयर बार में अपनी सहेलियों को ले जाती है। सभी जम कर वहां इंजॉय करती है। 
               मगर सभी की खुशी उस समय फुर्र हो जाती है, जब सभी मेधा को बार में नाचते देखती है। रागिनी तो जानती थी इसीलिए उसे उतना कोई आश्चर्य नहीं होता है, मगर उसकी सहेलियों का तो नशा ही उतर जाता है। आखिर एक बार में नाचने वाली उसकी सोसायटी में रहती थी ! 
            अगले ही दिन पुरे मॉडर्न सोसायटी में यह बात फैल जाती है कि शशांक के यहां रहने वाली लड़की बीयर बार में नचाती है। यह सब कारनामा रागिनी की सहेली ही करती है। मगर कोई यह बताने को तैयार नहीं होती है कि उसे बार में नाचते देखा तो किसने देखा ? मेधा को लेकर पुरे सोसायटी में कानाफूंसी होने लगती है। 
                रोज की भांति मेधा जब अगले दिन सुबह लॉन में आती है तो उससे कोई बात नहीं करता है। आज बच्चों का स्कूल था इसीलिए लॉन में कोई बच्चा नहीं था। 
               मेधा पर कोई खास असर नहीं पड़ता है। वह कुछ देर लॉन में बैठकर फिर अपने कमरे में आ जाती है। 
            शशांक को भी जब मेधा के बारे में पता चलता है तो वह सुनकर भी अनसुना कर देता है, क्योंकि उसे पता था कि रागिनी ने सिर्फ पैसे के लोभ में उसे कमरा किराए पर दिया था। 
           दोपहर में जब मेधा कमरे से निकल कर अपने काम पर जाने के लिए जैसे ही अपनी स्कूटी के पास आती है कि उसे स्कूटी के सीट पर एक पेपर चिपका हुआ दिखता है, जिस पर लिखा था -  बैड गर्ल ..... । 

             देख मेधा को जरा भी दुख नहीं होता है। वह सोसायटी में इस तरह के विरोधों को झेलते झेलते अब उसकी आदि हो गई थी। मुम्बई जैसे महानगर में भी एक बार में नाचने वाली को सभी बहुत ही गंदी एवं नीच नजरों से देखते थे। आज तक मेधा को भी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर ऐसा लोगों की सोच क्यों थी ? 
                मेधा उस पेपर को उखाड़ कर अपने जींस के पॉकेट में रख लेती है, और मुस्कुराती हुई स्कूटी स्टार्ट करके बाहर की ओर चल पड़ती है।
             उस समय भी कुछ लोग मेधा को दूर से ही देख कर आपस में बातें कर रहे थे। ऐसा लग रहा था मानों अनलोगों का बस चलता तो उसे अभी जान से मार देते।
               मेधा को गए अभी कुछ ही देर हुआ था कि सोसायटी के सेक्रेट्री मेहरा जी शशांक के फ्लैट में आ जाते हैं। उस समय वह घर पर नहीं था। रागिनी अकेली थी। यश भी स्कूल गया हुआ था। 
 
" अंकल आप, आइए बैठिए। कैसे आना हुआ ? अभी शशांक तो ऑफिस गये हुए हैं। " 

           रागिनी जब दरवाजा खोलती है तो सामने मेहरा जी को देखते ही बोल पड़ी। 

 " शशांक नहीं है तो कोई बात नहीं बहू तुमसे भी बात हो जाएगी। " 

  मेहरा जी जो की रागिनी के ससुर जी के साथ ही नौकरी करते थे और दोनों बहुत अच्छे दोस्त भी थे, बोलते हुए हॉल में ही सोफा पर आकर बैठ जाते हैं। 

 " क्या बात है बोलिए न ? " 

  रागिनी झट पुछ बैठती है। 

" बहू तुम तो जानती ही हो तुम्हारी जो किरायेदार लड़की है, उसके बारे में तरह तरह की बातें सोसायटी में हो रही है। हमारा सोसायटी सभ्य लोगों का है। ऐसे में उसे यहां रखना लोगों पर गलत मैसेज जाएगा। " 

" अंकल, नाचना एक कला है, इसमें खराबी या कोई बदनामी वाली बात कहां से आ गई। " 

" वो सही है बहू। मगर बीयर बार में नाचती है वो । " 

  मेधा को लेकर बहुत देर तक रागिनी और मेहरा जी में बातें होती रहती है। रागिनी तो ज्यादा पैसा मेधा से ले ही रही थी। इसीलिए वह किसी भी हालत में मेधा को जाने नहीं देना चाहती थी। मेहरा जी को भी मजबूरी यह थी कि वह उसके दोस्त का फ्लैट था, जिसके कारण वो ज्यादा रागिनी पर जोर भी नहीं दे सकते थे। वैसे रागिनी का तर्क भी गलत नहीं था, भले वह पैसे के लोभ में ही मेहरा जी को तर्क पे तर्क दे रही थी। 
             अंत में मेहरा जी रागिनी से एडवांस में जितने महीना का पैसा लिया हुआ था उतने महीना तक ही रखने का वादा लेकर वापस अपने फ्लैट में आ जाते हैं।
           सोसायटी में रागिनी के ग्रुप की औरतों का एक विरोधी ग्रुप भी था।  जैसे ही उस ग्रुप की हेड शैलजा को इस बात की भनक लगती है कि रागिनी की किरायेदार सोसाइटी से बाहर नहीं जा रही है तो वह कुछ औरतों को भड़काकर उसके साथ अगले ही दिन सुबह में सोसायटी के मैन गेट के पास विरोध में धरना पर बैठ जाती है। 
             पुरे सोसायटी में तुरंत यह बात फैल जाती है। लोग वहां जमा होने लगते हैं। रागिनी , शशांक, यश, मेहरा जी , रागिनी की सभी सहेलियां सहित बहुत सारे सोसाइटी के स्त्री पुरुष वहां आ जाते हैं। 
              मेधा को जब इस बात की खबर होती है तो वह भी वहां आ जाती है। 
           मेधा को देखते ही कुछ औरतें उसे भला बुरा कहने लगती है। एक बैड गर्ल उन लोगों के मॉडर्न सोसाइटी को बर्बाद करने के लिए आई थी। 
           जब मेधा से औरतों की बातों का सहने की सीमा बर्दास्त से बाहर हो जाती है तो वह सभी पर बरस पड़ती है। 
   
  " क्या आप लोग बैड गर्ल... बैड गर्ल.. का रट लगाए हुए हैं। कोई बार में, पार्टी में, या इवेंट में नाचने से बुरी नहीं हो जाती है। बुरी कोई भी औरत कर्म से होती है। चाहे वह आप जैसे सभ्य सोसाइटी में रहे या हमारे जैसे गंदी बस्ती में। आपको पता भी है मैं कौन हूं ? आप लोग सिर्फ यही जानती है कि मैं नाचने गाने वाली बैड गर्ल हूं। मगर यह कोई नहीं जानता है मैं ऐसा क्यों करती हूं। मैं ऐसा सिर्फ आप लोग जैसे बड़े सोसाइटी में रहने वाले मॉडर्न फैशनेबल लोगों की गंदी सोच को बदलने के लिए करती हूं। " 

     मेधा बोलते जा रही थी, और अब लोग चुप चाप सुनते जा रहे थे। 

 " मैं इन गंदे कामों को कर कर के ही एक संस्था चलाती हूं। पहले भले मैं अकेली थी। मगर अब मेरे साथ बहुत सारे लड़के लड़कियों की ग्रुप है, जो पुरे मुंबई शहर में ऐसे ही बड़े बड़े सोसाइटी में आज रह रहे हैं। हम सब वैसे बुजुर्गों का पता लगाते हैं जो अपने बेटों या बहू के लिए आज बोझ हो गए हैं। भले घर के बुजुर्ग मां बाप को जलील करके घर से निकालने, उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ने या मरने को मजबूर करने में शर्म आप जैसे बड़े सोसाइटी में रहने वाले लोगो को नहीं आती है, मगर हम अनाथ को बहुत आती है। जिसने अपनी पुरी कमाई, अपने सारे अरमान यह सोचकर आप पर कुर्बान कर दिए कि आप उनके बुढ़ापे का सहारा बनेंगे, मगर जब उन्हें सहारे की जरुरत होती है तो आप लोग उसे उसके ही घर से बेघर कर देते हैं। " 

     मेधा की बातों ने सभी के जुबान पर ताला लगा दिया था। बस लोग चुप चाप सुन रहे थे। 

 " ये शैलजा मैडम जो आज बहुत अच्छी बनने की ढोंग कर रही है, पता है इसके ससुर बीमारी से नहीं मरे थे, इसने खाने में थोड़ा थोड़ा जहर मिलाकर मारा था। और ये सरला, रागिनी, ममता और नेहा जो खुद तो बीयर बार में जाकर शराब पीती है, और नचाती है, मगर इन्हें हम जैसी लड़कियां जो नाच कर इज्जत से दो पैसे कमाती है वो बैड गर्ल लगती है। इन सभी के सास किसी रिश्तेदार या किसी तीर्थ स्थल घूमने के लिए नहीं गई हैं, बल्कि सबने सभी को घर से जलील करके निकाल दिया है या खुद ही निकल कर जाने को मजबूर किया है। आप सभी को पता है वैसी ही बुजुर्ग स्त्री पुरुष को मैं और मेरे सभी दोस्त नाच गाकर अपने खर्चें से पालते हैं। इस सोसाइटी के सभी बुजुर्ग जिन्हें घर से आप लोगों ने निकाला था वो सभी भी अब मेरे पास हैं। " 

             मेधा की बातें सुनकर ढींगे हांकने वाली सभी औरतों की नजरें शर्म से खुद ही झुक जाती है। 

        मेधा थी भले नाचने गाने वाली गरीब अनाथ लड़की मगर आज उसके पास बुजुर्गों का आशीर्वाद था। आज उसके एक माता पिता नहीं बल्कि दर्जनों थे।
             मेधा उस सभ्य सोसाइटी के वैसे सभी लोगों को सोचने पर विवश कर देती है जो अपने बुजुर्ग माता पिता को आज भी बोझ समझते थे।

              अभी कुछ देर पहले जहां सभी मेधा को बहुत ही गंदी निगाहों से देख रहे थे, वही अब सभी उसे सम्मान की नजरों से देखने लगे थे। रागिनी, शैलजा, सरला जैसी औरतों की हकीकत आज सबके सामने आ गई थी। 
             तभी यश भीड़ से निकलकर मेधा के पास आता है।

   " दीदी, मेरी दादी भी आपके पास है ? " 

 " हां...  " 

                यह सुन यश खुशी के मारे मेधा से लिपट जाता है।
         यश के जुबान से सिर्फ एक ही वाक्य निकलता है - 

  " दीदी, यू आर नॉट अ बैड गर्ल, यू आर अ गुड गर्ल। माय ममा एंड अदर वूमेन लाइक हर आर वेरी बैड। " 

             सुन मेधा यश को गले लगा लेती है। 
             वहां खड़े लोग अब तालियां बजाने लगते हैं। 


                     कुमार सरोज  

टिप्पणियाँ

  1. लाजवाब कहानी, सच में हमें घर के बुजुर्गों का हमेशा सम्मान करना ही चाहिए

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

आपके बहुमूल्य टिप्पणी एवं सुझाव का स्वागत है 🙏

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अधूरी यात्रा /। Adhoori Yaatra । हिमांशु कुमार शंकर ।

उसकी मां / Usaki Maa । कहानी । कुमार सरोज ।

लव डे / Love Day । गजल । कुमार सरोज ।