बचपना / Bachapana । कविता । कुमार सरोज ।

                बचपना

                        कुमार सरोज 


कुछ का बचपन मोबाईल और टीवी में व्यस्त रहने लगा है,
तो कुछ का जीने के लिए दो जून की रोटी के जुगाड में,
शायद तभी आज हर बच्चा बचपना भूलते जा रहा है। 






कुछ के माता पिता घर में रहते तो हैं फुर्सत में, 
मगर उनके पास अपने औलाद के लिए वक्त नहीं है, 
शायद तभी आज हर बच्चा बचपना भूलते जा रहा है। 


कुछ के माता पिता को कमाने खाने से ही फुर्सत नहीं,
अपने बच्चों पर भी लोभ में काम का बोझ डाल देते हैं,
शायद तभी आज हर बच्चा बचपना भूलते जा रहा है। 


कुछ बच्चा अपने माता पिता के बेरुखी से एकांकी हो जाता है,
तो कुछ काम के बोझ तले दबकर जल्द जवां हो जाता है,
शायद तभी आज हर बच्चा बचपना भूलते जा रहा है। 


बचपन आज मोबाईल और वीडियो गेम के अधीन हो गया है,
इसकी वजह आज बिखरते रिश्ते और टूटते परिवार का है,
शायद तभी आज हर बच्चा बचपना भूलते जा रहा है।


                      कुमार सरोज

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