अपना आसमां / Apana Aasman । कहानी । निधी नितिमा ।

        अपना आसमां 

                       निधि नितिमा



                 आज फिर खाने की प्लेट फेंक दी थी निशांत ने। निष्ठा फर्श पर फैले खाना को समेटने में लगी थी। बच्चों के स्कूल से आने से पहले कमरे को साफ करना चाहती थी ताकि उन्हें कुछ आभास नहीं हो। 







          पर बड़ी बेटी ईशा के नजरों से बचा नहीं रह सका।

  " आज फिर तमाशा किया पापा ने। आप क्यों सहन करती हो मम्मी। " 

  देखते ही ईशा गुस्से में बोली। 

" चल तू कपड़े बदल। मैं खाना लगाती हूं। " 

  निष्ठा अपनी बेटी की बात को अनसुनी करती हुई बोली। 

 " बात को बदलो मत। आप किस बात में कम हो कि सहन करती हो। " 

 " मैंने कहा न कुछ नहीं हुआ। वो थाली हाथ से छूट गई, इसीलिए खाना फर्श पर बिखर गया था। " 

 " बस मम्मी रहने दो। मैं बचपन से देखते आ रही हूं। पापा का गुस्सा कब तक और कितना सहन करोगी। " 

 " चल अब तू खाना खा। " 

     कहती हुई निष्ठा अपनी बेटी के लिए खाना लगाने लगी। 

      खाना लगाते लगाते निष्ठा पता नहीं क्यों आज अपने जीवन के धुंधली हो चुकी अतीत के खयालों में खोती चली गई। 

  " क्लास 10वीं में इस साल का सर्वश्रेष्ठ छात्रा का पुरस्कार दिया जाता है निष्ठा शर्मा को। " 

              तालियों की गड़गड़ाहट के बीच निष्ठा को बेस्ट गर्ल की ट्रॉफी मिलती है। उस दिन कितनी खुश थी वो, सभी शिक्षिकाओं, प्रिंसिपल की चहेती अपने कक्षा में सर्वप्रथम रहने वाली निष्ठा शर्मा। बोर्ड परीक्षा में भी स्कूल टॉप की। 
                  वह घर में भी सभी की प्यारी थी। अपने दादा दादी की दुलारी निष्ठा हर काम में भी अव्वल थी। उसकी दादी हमेशा कहते रहती थी -  ' मेरी पोती जिस घर में जायेगी राज करेगी। ' 
                समय बीतता गया। निष्ठा स्कूल से कॉलेज आ गई। यहां भी वह हमेशा सभी परीक्षा में अव्वल आती थी। पढ़ाई के अलावा खेल कूद प्रतियोगिता, भाषण, एवं और दूसरे क्रिया कलापों में भी वही हमेशा टॉप करती थी। 
                एक दिन वह एक शादी समारोह में गई हुई थी, निशांत के मम्मी पापा ने वही देख कर अपनी बहू के रुप में उसे पसन्द कर लिया। और तुरंत चट मंगनी पट व्याह हो गया। 
                पर शादी के बाद तो निष्ठा की तकदीर ही बदल गई। उसके ससुराल वालों को तो सिर्फ उसके शादी में मिले मंहगे तोहफों से ही मतलब था। निशांत भी प्यार के बदले सिर्फ लेन देन और महंगी चीजों की मांग ही करता। बात बात पर ताने देना, एवं निष्ठा को जली कटी सुनाना उसका रोज का काम हो गया था। 
बेचारी निष्ठा चुपचाप सब कुछ सह रही थी। वह अपने घरवालों को भी कुछ नहीं बता सकती थी। उसे डर बैठा रहता था कि कहीं उसकी बातें सुनकर उसके पापा की तबियत और खराब न हो जाए। 
            धीरे धीरे समय बिताता रहा। फिर एक दिन खुशियों का भी आगाज हुआ। निष्ठा गर्ववती हो गई। पर उसके ससुराल वालों को बेटा ही चाहिए था। इसीलिए निष्ठा के गर्व को उसके इच्छाओं के विरुद्ध जबरदस्ती परीक्षण करवा कर उस नन्हीं सी जान को सिर्फ इसीलिए कि वो एक कन्या है उसे जन्म ही नहीं लेने दिया। 
                निष्ठा पुरी तरह टूट चुकी थी। अगली बार जब वह गर्ववती हुई तो उसने अपने गर्व का परीक्षण करवाने से साफ मना कर दिया। जिसका नतीजा हुआ की कुछ ही समय बाद उसके आंगन में एक नन्हीं परी का आगमन हुआ। जिसका बड़े ही प्यार से नाम रखा - ईशा। 
               समय के साथ निष्ठा ने एक और बेटी दिशा और एक बेटा अर्णव को जन्म दी। 
             अब निष्ठा की जिंदगी सिर्फ पति और बच्चों में ही सिमट कर रह गई थी। कभी कभी वह सोचती थी कि उसने क्या क्या ख्वाब देखे थे, जो शायद अब नामुमकिन थे। 
                 समय यू ही गुजरता रहा। बच्चे भी बड़े हो गए। अब तक निष्ठा को भी अपनी सास की जली कटी बातें सुनने एवं पति के गुस्सा को  सहने की आदत सी हो गई थी। बस जब कभी मन उदास होता तो वह मन के भाव को डायरी के पन्नों में लिख डालती। 
            एक दिन निष्ठा की दूर की ननद रौशनी जो उसकी सहेली जैसी थी उससे मिलने आई। अकस्मात रौशनी की नजर निष्ठा की लिखी हुई डायरी पर पड़ गई और वह पुरी डायरी तुरंत पढ़ ली। 
         पढ़कर रौशनी चौंक जाती है। निष्ठा बहुत अच्छी लिखती थी। 

" भाभी आप तो सच में बहुत अच्छा लिखती हैं। आप अपनी पहचान बनाओ। एक किताब लिखो। " 
 
                 निष्ठा की ननद जब इस बारे में अपने भाई निशांत से बात करती है तो वह उल्टे निष्ठा का मजाक उड़ाने  लगता है।

 " तुम अपनी भाभी को बोलो वो सिर्फ़ घर संभाले। यह उसके बस की बात नहीं है। " 

               निशांत की बात निष्ठा को तीर की तरह चुभ जाती है। आखिर उसका यह कैसा हमसफर था, जो उसकी भावनाओं को नहीं समझ सकता था। 
             वह ठान लेती है कि वह अब जरुर लिखेगी।
              कुछ ही दिनों के बाद जब निष्ठा की लिखी पहली पुस्तक प्रकाशित होती है तो सभी उसकी लोकप्रियता को देख आश्चर्य चकित रह जाते हैं। 
           निष्ठा का आत्मविश्वास और बढ़ जाता है। वह तय कर लेती है कि चाहे अब जो भी हो रुकेगी नहीं। उसे आगे बढ़ना है, उसे तय करना है रास्ता अपने मंजिल तक। उसे छू लेना है अपना आसमां। 



                      निधि नितिमा 

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