आज की होलिका / Aaj Ki Holika । कहानी । कुमार सरोज ।

        आज की होलिका

                     

                            कुमार सरोज 



        " बुआ, अभी आप तैयार भी नहीं हुई, मैं स्कूल जाने के लिए कब से आपका इंतजार कर रहा हूं। क्या हुआ ? " 


 हर्ष अपनी बुआ के कमरे में प्रवेश करते हुए बोला। 

           हर्ष अभी स्कूल ड्रेस पहने हुए था। वह अपना स्कूल बैग भी पीठ पर टांगे था।


  " मैं ठीक हूं। बस मेरा मूड अच्छा नहीं लग रहा है। " 

       हर्ष की बुआ श्वेता पलंग पर से उठती हुई बोली। वह अपने कमरे में अभी पलंग पर लेटी थी।









             हर्ष श्वेता के बड़े भाई मोहित का बेटा था। सभी गया जिला के टिकारी शहर के पास के एक गांव पानापुर में रहते थे। हर्ष टिकारी के ही एक निजी विद्यालय में कक्षा प्रथम में पढ़ता था। श्वेता भी टिकारी के ही हाई स्कूल में कक्षा दस में पढ़ती थी। दोनों का स्कूल पास में ही था। इसीलिए श्वेता ही प्रतिदिन हर्ष को साईकिल से स्कूल लाती ले जाती थी। मोहित श्वेता के बड़े भईया थे। पिता के मरने के बाद मोहित के उपर ही परिवार की पुरी जिम्मेदारी आ गई थी। अब वही गांव में खेती का काम संभालते थे। घर में मोहित की पत्नी सुनंदा भी थी। चार लोगों का बहुत ही खुशहाल परिवार था मोहित का। श्वेता ही हर्ष की पुरी जिम्मेदारी संभालती थी। वह उसे स्कूल तो ले जाती और लाती ही थी, घर पर भी वही उसका सारा होम वर्क करवाती थी। घर पर दोनों का अधिकांश समय एक दूसरे के साथ ही बीतता था। 


 " मैं जानता हूं, आपको क्या हुआ है। आप उन बदमाश लड़कों के डर से स्कूल नहीं जा रही हैं न। " 


" ऐसा नहीं है हर्ष। बस ऐसे ही । " 


 " बुआ आपने मुझे मना कर दिया है, नहीं तो मैं पापा को उन लड़कों की सारी करतूत बता देता। आप मेरे साथ चलिए। आपको आज किसी ने कुछ कहा न तो मैं उसका सिर फोड़ दूंगा।  " 


" तुम किसी को कुछ बताना भी नहीं। मैं अभी तैयार होकर स्कूल चलती हूं। वैसे भी आज के बाद ही स्कूल में होली की छुट्टी हो जायेगी। " 


  श्वेता स्कूल जाने के लिए तैयार होती हुई बोली।


 " बुआ तभी तो आज मेरा स्कूल जाना बहुत जरूरी है। आज मेरे स्कूल में होली की छुट्टी का होम वर्क मिलेगा। " 


               कुछ ही देर के बाद श्वेता हर्ष को साईकिल पर बैठाकर टिकारी की ओर चल देती है। 


              टिकारी पानापुर से करीब 4 किलोमीटर दूर था। रास्ते में बहबलपुर गांव भी पड़ता था। 


           श्वेता को बहाबलपुर का कुछ लड़का स्कूल आते जाते रास्ते में छेड़ता था। उसमें से एक लड़का नेहाल तो उसी के कक्षा में पढ़ता भी था। उन लोगों के कारण ही श्वेता आजकल बहुत परेशान रहती थी। उन लड़कों की हरकतें हद से ज्यादा बढ़ गया था। नेहाल ने कुछ दिन पहले ही उसके साथ रेप करने की कोशिश भी किया था। मगर किसी तरह वह उस दिन बचकर भाग गई थी। श्वेता ने नेहाल की स्कूल के प्रधानाध्यापक से एक बार शिकायत भी की थी। मगर स्कूल वालों ने उल्टी उसे ही लड़कों से दूर रहने की सलाह देकर अपना पल्ला झाड़ लिया था। इसीलिए श्वेता अब और ज्यादा डरी सहमी रहती थी। वह घर पर भी अपने भाई को सच्चाई नहीं बता सकती थी। क्योंकि नेहाल और उसके दोस्तों ने घर वालों को बताने पर उसके भतीजा हर्ष को जान से मारने की धमकी दिया था। 


           होली के कारण उस दिन छुट्टी के बाद हर्ष और श्वेता के स्कूल में सभी बच्चे एक दूसरों को आपस में अबीर गुलाल लगाते हैं। 

               छुट्टी के बाद श्वेता हर्ष के लिए टिकारी बाजार से ही रंग अबीर और पिचकारी खरीदती है। जिसके कारण उसे बाजार से निकलते निकलते थोड़ी देर हो जाती है।

             हर्ष के लिए होली का सारा सामान खरीदकर  श्वेता अपनी साईकिल पर सवार होकर तेजी से अपने गांव की ओर चल पड़ती है। आज ही होलिका दहन था। इसीलिए वह जल्दी से जल्दी घर पहुंचना चाहती थी। 

          उस दिन हर्ष बहुत खुश था, क्योंकि स्कूल में उसे इस बार होली की छुट्टी में होम वर्क नहीं मिला था। 

             श्वेता अभी हर्ष के साथ बहबलपुर गांव से जैसे ही पार करके अपने गांव की ओर बढ़ती है कि अचानक एक मोड़ पर नेहाल सामने आ जाता है। वह अपने दोस्तों के साथ मिलकर पहले से ही वही पर चना को खाने के लिए पेड़ सहित आग में  ( होरहा ) पक्का रहा था। उस समय तक शाम हो गई थी। 

             नेहाल श्वेता को पकड़कर पास के ही एक खेत की ओर जबरदस्ती ले जाने लगता है। यह देख हर्ष गुस्से में नेहाल पर चिल्लाता हुआ उससे लिपट जाता है। 

                 इधर तब तक नेहाल का तीनों दोस्त भी पास आ जाता है। एक के हाथ में उस समय जलता हुआ एक लकड़ी था। वह हर्ष को आग से जलाने के लिए उसके सामने जलता हुआ लकड़ी कर देता है। बेचारी श्वेता उसे बचाने के लिए नेहाल के आगे बिलख उठती है। 

                नेहाल और उसके सभी दोस्त हर्ष को ढाल बनाकर पास के ही खेत में बारी बारी से श्वेता के साथ रेप का घिनौना खेल खेलते हैं। बेचारी वह अबला अपने भतीजे के जान की रक्षा के लिए सभी के आगे हार मानकर अपने जिस्म को उन दरिंदों को नोच खाने देती है। सभी तब तक उसे नोचते रहते हैं जब तक उसकी सांसे चलते रहती है। 

            अंत में बेचारी आज के इन जालिम दरिंदों के हवस के आगे विवश होकर अपनी प्राण त्याग देती है। इसके बाबजूद भी उन बहसी दरिदों का जी नहीं भरता है तो सभी उसे उसी खेत में आग से जला देते हैं। 

                   अबोध हर्ष को यह सब देख कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसे तो मानों सांप सूंघ गया था। 

            तभी पास के गांव में होलिका दहन के भी आग की लपटें दिखाई देने लगती है। एक उधर होलिका दहन हो रहा था, और एक इधर।

                एक वो होलिका थी जिसे अपने दुराचारी भाई के ही हठ के आगे अपने भतीजे के प्राण की रक्षा के लिए अपने आप को आग के हवाले करना पड़ा था, और आज उसी होलिका के जैसी ही एक असहाय अबला यह थी जिसे अपने भजीते के प्राणों की रक्षा के लिए अपने जिस्म को आज के दुराचारी दरिदों के आगे सौंपने के बाबजूद भी उसे आग के हवाले होना पड़ा था। 

           उस समय तो होलिका के दुराचारी भाई जैसे राक्षस का नाश करने के लिए भगवान ने अवतार लिया था, तो क्या आज नेहाल जैसे समाज में न जाने कितने हवसी दरिंदे हैं उसका नाश करने के लिए कोई भगवान अवतार नहीं लेंगे ?

             आखिर कब तक समाज में औरतों और मासूम अबलाओं का दहन होता रहेगा ?


                           कुमार सरोज    

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