तुम मुझे पुकारो / Tum Mujhe Pukaro ।। कविता ।। चंद्रबिंद सिंह ।।

        तुम मुझे पुकारो
 
                         चंद्रबिंद सिंह 


'तुम' मुझे पुकारो
कि अनायास ही
मेरे भीतर
बजने लगे
सदियों पुरानी बंसी की एक धुन।




'तुम' मुझे पुकारो
कि अनायास ही
मेरे भीतर
नाचने लगे
कई मौसम एक साथ
और
झरने लगे
ढेर सारे मौलसिरी के फूल।

'तुम' मुझे पुकारो
कि अनायास ही
मेरे भीतर
फूट पड़े
कुएं का एक अजस्र स्रोत
और
निकल पड़े
एक बावली नदी
इठलाती हुई 
अपने अनंत गंतव्य की ओर।

'तुम' मुझे पुकारो
कि अनायास ही
मेरे भीतर
दौड़ने लगे उनचासो पवन
और गूंज उठे
पवित्र आरती की एक मधुर झंकार।

तुम मुझे पुकारो
कि अनायास ही
मेरे भीतर
खिल उठे 
बादलों के रंग बिरंगे फूल
और 
पकने लगे कुछ
जाड़े की धूप में
पक रही फसलों की तरह।


                      चंद्रबिंद सिंह

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