बिंदिया और बबलू / Bindiya Aur Babalu । भाग - 4 । कहानी । कुमार सरोज ।

     बिंदिया और बबलू 
         ( भाग - 4 )

                        कुमार सरोज 



  बिंदिया बन गई मस्टरनी मैडम


                   अभी तक आपने पढ़ा था कि बिंदिया शादी के बाद अपने पति बबलू के साथ पटना से ससुराल मंझार गांव में आ जाती है। गांव वाले दोनों की बैंड बाजे के साथ स्वागत करते हैं। बबलू के गांव में ही बिंदिया के कॉलेज का एक आशिक रंजीत भी रहता है। रंजीत को अपने मोसेरे भाई दिनेश से मालूम होता है कि बबलू अनपढ़ है, जिसे गांव वाले बहुत पढा लिखा जानते थे। रंजीत दुबारा से बिंदिया को पाने के मन में ख्याल  पाले , बबलू को गांव वालों के सामने अनपढ़ साबित करने में अपने दोस्तों के साथ लग जाता है। 


     अब पढ़िए उससे आगे 





                   महेश की मां जानकी अपने घर के आंगन में चूल्हे पर खाना बना रही है। तभी बाहर से वहां महेश खुशी से झूमता एवं गाना गाता हुआ आ जाता है। मगर अपनी मां को अभी सब्जी काटते देख उसका सारा खुशी उड़नछू हो जाता है।

  " अरे मां अभी सब्जी ही काट रही हो। फिर तुम खाना कब बनाओगी। हमें अभी बिंदिया भाभी को खेत घुमाने के लिए ले जाना था। अब हम भूखे कैसे जाए ? " 

   महेश अपनी मां पर गुस्सा प्रकट करते हुए बोल पड़ता है। 

 " मेरे पास ज्यादा बिंदिया भाभी ...  बिंदिया भाभी मत करो। जब दो चार दिन बाद वह चली जायेगी, तब सारा प्यार उतर जायेगा। " 

   " बिंदिया भाभी अब कहीं नहीं जाने वाली हैं। बबलू भईया अब सदा के लिए गांव में ही रहेंगे। " 

 " यह बात तुमको कौन बोला ? " 

 " आज सुबह ही बबलू भईया और पिता जी आपस में बात कर रहे थे। "

                   अपने बेटे की बात सुन जानकी उदास हो जाती है। अभी तक वह बबलू के खेत का पुरा अनाज अकेले ही रखते आ रही थी, मगर अब बबलू को भी आधा देना पड़ता। यही सोच वह उदास हो गई थी। 

" मां, बबलू भईया गांव में रहेंगे तो बहुत अच्छा होगा। मैं भी उनसे दिमाग लेकर कुछ ना कुछ अच्छा काम करने लगूंगा। " 

 " ज्यादा इतराओ मत। जाओ बबलू को बोल दो, आज दोनों पति पत्नी का खाना हम बना रहे हैं। खाना अपने यहां ही खा लेगा। " 

 सुन महेश बहुत खुश हो जाता है। 

 " मां तुम उतनी खराब नहीं हो, जितना हम कभी कभी सोचते हैं। " 

               कहते हुए महेश तेजी से बिंदिया के घर की ओर जो की सिर्फ एक दीवार के अंतर पर था चल देता है। 

              बिंदिया अपने घर के आंगन में रस्सी पर धुले हुए कपड़े सूखने के लिए डाल रही थी, कि तभी महेश खुशी से झूमता हुआ अपने घर की ओर से आ जाता है। 

 " क्या बात है देवर जी, आज बहुत खुश दिखाई दे रहे हैं। " 

 " भाभी आज आपको हमारे घर खाना खाना है। इस लिए आप अभी खाना नहीं बनायेंगी। आप अभी ही मेरे साथ खेत देखने चलेंगी। " 

" यह तो बहुत अच्छी बात है। मां जी को बोल दीजियेगा, रात में सबके लिए हम खाना बनाएंगे। " 

 " बोल देंगे, मगर आप पहले मेरे साथ चलिए। " 

          महेश बिंदिया को लेकर घर से बाहर की ओर चल देता है। 

                उधर योगेश अपने गुमटी पर बैठा बिंदिया के बारे में ही सुजीत से बाते कर रहा है। महेश द्वारा घर से भगा देने के कारण वह बहुत गुस्से में है। 

 " सुजीत अब चाहे जो भी हो, हम भी अपने लिए पत्नी गांव की सबसे सुन्दर लड़की खोजेंगे। हम कल ही पाई बिगहा के पारस पंडित जी से मिलकर उनसे कोई उपाय पूछते हैं। वे जरुर मेरा हाथ देखकर कुछ न कुछ उपाय बताएंगे। " 

  " सुंदर लड़की पाने के लिए सुंदर थोपड़ा भी होना चाहिए डेकोरेटर बाबू, जो तुम्हारे पास नहीं है। " 

   " तुम तो चुप ही रहो। तुम तो हमसे जलते हो। इसीलिए तो अभी तक तुम्हारा भी शादी नहीं हुआ है। बड़ा आया हीरो बनने झोला छाप डॉक्टर। " 
 
                दोनों डींगे हांकते हुए गप्पे लड़ाते ही रहता है। 

             उधर महेश बिंदिया को लेकर जैसे ही गांव से निकलता है कि सामने से रंजीत अपने दोस्तों के साथ आता बिंदिया को दिख जाता है। मगर उसके चेहरे पर किसी तरह की कोई बदलाव नहीं होता है। वह महेश के साथ अभी भी हंसी मजाक करती हुई जा रही थी। 
                    रंजीत अपने दोस्तों के साथ नदी किनारे से अपने घर आ रहा था। बिंदिया को गांव की ओर से आते देख उसके चेहरे पर मुस्कान खिल उठती है। पहली बार गांव में बिंदिया से रंजीत का आमना सामना होने वाला था। इसीलिए मन ही मन रंजीत बहुत उत्साहित हो जाता है। वह बिंदिया के चेहरे की प्रतिक्रिया को देखने के लिए उतावला हो जाता है। 

  "  दिनेश देखना बिंदिया मुझे देखकर कैसे चौंकेगी। वह तो कभी सोची भी नहीं होगी कि मुझसे उसकी मुलाकात इस गांव में होगी। " 

  " उसका उखड़ा चेहरा देखने में मजा आयेगा। "

               इधर तब तक बिंदिया भी महेश के साथ बातें करती हुई रंजीत के पास आ जाती है। मगर उसके चेहरे पर रंजीत को देखकर भी किसी तरह का कोई बदलाव नहीं आता है। वह पहले से जैसे महेश से हंस हंसकर बाते करते आ रही थी अब भी वैसे ही बाते करती हुई रंजीत को घूरती आगे बढ़ती चली जाती है। 
 
             बिंदिया का इस तरह रंजीत को नजरअंदाज करके महेश के साथ हंसते बाते करते बगल से जाते देख सभी चौंक जाते हैं।  बिंदिया को देखकर तो सभी को ऐसा लग रहा था जैसे वह रंजीत को पहचानती ही नहीं। 

  " रंजीत बिंदिया के चेहरे पर तुमको देखकर तो कोई प्रतिक्रिया ही नहीं हुआ। यह कोई दुसरी हमशक्ल लड़की तो नहीं है। "

" नहीं, ये वही बिंदिया है। यह भी उसकी कोई चाल है। बहुत नौटंकी बाज है ये। फिर भी कोई बात नहीं। मैं सच्चाई सामने ला कर रहूंगा। " 
      
      रंजीत अपने दोस्तों के साथ बाते करते हुए घर की ओर चल देता है। 

               उधर बिंदिया रंजीत को दूर से ही देख लेती है। वह तो रंजीत को कल उस समय भी देख ली थी जब वह नदी के किनारे से रिक्शा पर बैठी बबलू के साथ आ रही थी। रंजीत को इस गांव में देखकर वह कल चौंकी थी और उसके चेहरे पर भी शिकन भी आई थी, मगर वह तुरंत अपने आप को संभाल ली थी। इसीलिए शायद उस समय किसी ने बिंदिया के चेहरे की बदली हुई रंगत को नहीं देख पाया था। घर आते ही वह रंजीत से सामना के लिए अपने आप को हमेशा के लिए तैयार कर लेती है। क्योंकि वह जानती थी कि अब उसे हमेशा के लिए इसी गांव में रहना था। इसीलिए अभी रंजीत को देखने के बाद भी उसके चेहरे पर किसी तरह का कोई बदलाव नहीं आया था।  

              उधर रंजीत अपने दोस्तों के साथ जैसे ही अपने घर के पास पहुंचता है कि सामने से बबलू आ जाता है। 
              रंजीत बबलू को देखते ही तुरंत बोल पड़ता है  - 
 
   " बबलू भईया, आप चुपके चुपके शादी भी कर लिए, और अभी तक पार्टी भी नहीं दिए। कम से कम शहर वाली भाभी के हाथ का बना चाय तो पिला दीजिए। " 

  " पार्टी भी मिलेगा, और चाय भी पिलाएंगे। कल सुबह घर आ जाना। बबलू आज तक कभी किसी को ना बोला है। " 
 
  " ठीक है, हम कल सुबह बिंदिया भाभी के हाथ का बना चाय पीने आपके यहां पक्का आयेंगे। " 

             कहते हुए रंजीत अपने घर के अंदर चला जाता है।
            बबलू भी अपने घर की ओर चल देता है। 
 
           दोपहर का समय था। जानकी अपने घर के आगे बैठी तेतरी चाची से बिंदिया और बबलू के बारे में ही बाते कर रही थी। जानकी बबलू के गांव आ जाने से होने वाले नुकसान के बारे में तेतरी को बता रही है। तेतरी भी बहुत मजे ले लेकर जानकी को और नमक मिर्च लगाकर भड़का रही है। तेतरी चाची का यही तो काम था। आज हर गांव में तेतरी चाची जैसी कोई न कोई महिला मिल ही जाती थी। एक तो जानकी पहले से ही बबलू को लेकर चिंतित थी, ऊपर से तेतरी चाची की आग लगाऊं बात आग में घी का काम करता है। जानकी मन ही मन अब और परेशान हो उठती है।  

                  उसी दिन शाम में ही योगेश भी पारस पंडित जी से जाकर मिलता है। पंडित जी उसे जल्दी विवाह होने एवं सुंदर पत्नी मिलने के लिए सात दिन लगातार देवी मां का पूजा करने की सलाह देते हैं। 
              योगेश पंडित जी से अपनी कामयाबी का उपाय सुनकर मन ही मन खुश होता हुआ अपने गांव की ओर वापस चल देता है। वह अभी से ही मन में ख्याली पुलाव पकाने लगा था। 
                   योगेश पाई बिगहा से चलकर जैसे ही नदी के तट पर पहुंचता है कि उसकी नजर नदी किनारे ही खड़ी एक सुन्दर लड़की पर पड़ जाती है।
                 लड़की को देखते ही उसे पंडित जी का कहा एक एक शब्द कानों में गुंजने लगता है। उसका ख्वाब उसे सच होता दिखने लगता है।
                    योगेश झट लड़की के पास जाकर उससे बातें करने एवं जान पहचान बढ़ाने की कोशिश करने लगता है। 
                    लड़की भी बहुत खुले विचार की थी। वह भी योगेश से खुलकर बाते करने लगती है।
                   दोनों वही बैठकर आपस में बाते करने लगते हैं। दोनों को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे दोनों पुराने परिचित थे। 
                 कुछ देर के बाद योगेश उस लड़की के साथ ही बगल के गांव कोरमाथु की ओर चल देता है। शायद वह लड़की कोरमाथू की ही थी।  लड़की ने योगेश को अपना नाम पुष्पा और घर कोरमाथू बताई थी। उस समय तक कुछ कुछ अंधेरा भी हो चला था। 

            योगेश कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि इतनी आसानी से इतनी सुंदर लड़की पट जायेगी। वह मन ही मन खुशी से फूले नहीं समा रहा था। 
           नदी के तट से कोरमाथू जाने के रास्ते में एक बहुत बड़ा बगीचा था। शाम होने के कारण बगीचा को पार करने में लड़की को डर लग रहा था। इसीलिए पुष्पा को गांव तक छोड़ने योगेश उसके साथ जा रहा था। 
              योगेश बगीचा में अभी कुछ ही दूर गया था कि लड़की उससे लिपट कर जोर जोर से  बचाओ..... बचाओ ....  चिल्लाने लगती है। योगेश डर जाता है। वह अपने आप को लड़की के पकड़ से छुड़ाने की कोशिश करने लगता है। मगर सफल नहीं होता है। 
              योगेश के बहुत गिड़गिड़ाने पर पुष्पा उसके पास का सभी पैसा लेकर उसे छोड़ देती है।
                   योगेश आजाद होते ही तेजी से गिरते पड़ते बदहवास अपने गांव जाने के लिए नदी की ओर भाग खड़ा होता है। 
 
               उसी दिन शाम में बबलू के कहने पर सरपंच साहब पुस्तकालय में गांव के लोगों का एक सभा बुलाते हैं। उसमें बहुत से लोग आए हुए थे। रंजीत भी सबसे पहले आकर बबलू के बगल में ही बैठा था। सरपंच साहब के पास गांव के कुछ और बुजुर्ग बैठे हुए थे।
 
  "  हम लोगों के लिए यह बहुत खुशी की बात है कि हमारे गांव का सबसे ज्यादा पढा लिखा एवं होनहार युवक बबलू अब हमेशा के लिए अपने गांव में ही रहेगा। यह हम सब के लिए बहुत ही गर्व की बात है। इसकी सोच की हम दाद देते हैं, यह सिर्फ अपने गांव की भलाई के लिए ही यहां रहना चाहता है। नहीं तो इसके लिए शहर में भी कोई काम की कमी नहीं थी। "

           सरपंच साहब बोलते जा रहे थे, और गांव के लोग उनकी बातों को सुनकर बीच बीच में ताली बजा रहे थे। सभी बहुत खुश थे। 

   " बबलू के पास गांव के बच्चों एवं बुजुर्गों को भी पढ़ाने के लिए एक योजना है। इसीलिए सभी को यहां बुलाया गया है। अपनी योजना बबलू अब आपको बताएगा। " 

        सरपंच साहब जैसे ही बबलू को बोलने के लिए आमंत्रित करते हैं कि गांव के युवा खुशी से तालियां बजाने लगते हैं। 

 " मैं चाहता हूं कि गांव के पढ़े लिखे वैसे लड़के जो अभी किसी कारण से गांव में ही रह रहे हैं, वे यहां के बच्चों को पढ़ाने के लिए थोड़ा समय दें। ताकि गांव के बच्चे अच्छे नंबर से मैट्रिक परीक्षा पास कर सके। तभी हमारे गांव का नाम भी रौशन होगा। " 

               बबलू के बात सुनकर गांव के दो तीन लड़के पढ़ाने के लिए तुरंत तैयार हो जाते हैं। 
                
   मगर तभी रंजीत बोल पड़ता है - 

 " सरपंच साहब बबलू भईया से ज्यादा इस गांव में कोई पढ़ा लिखा तो है ही नहीं इसीलिए बच्चों को बबलू भईया ही खुद पहले दो तीन महीना क्यों नहीं पढ़ाते हैं, फिर गांव के लड़के पढ़ाएंगे। "

              रंजीत बबलू के बैठते ही बोल पड़ता है। उसे तो बबलू को उसी के जाल में फंसाना था।

                   रंजीत की बात सुनते ही बबलू उसके मन की बात समझ जाता है। वह तो पहले से ही इसके लिए भी  उपाय सोच रखा था। 

 " रंजीत भाई का विचार एकदम ठीक है। मगर मेरे मन में इससे भी अच्छी योजना है। आज नारी शक्ति का युग है। हमें नारी को अपने बराबरी का हक देना चाहिए। हम अपने गांव के बच्चों को ही नहीं बल्कि सभी स्त्री पुरुष को भी साक्षर बनाना चाहते हैं। इसी लिए सभी को मैं नहीं बल्कि मेरी पत्नी बिंदिया पढ़ाएंगी। बिंदिया से गांव की औरते भी आसानी से पढ़ लेंगी। गांव के जो लड़के पढ़ाने को इच्छुक थे वो सिर्फ़ बिंदिया को मदद करेंगे। "

       बबलू की बात सुनते ही गांव के सभी लोग खुशी से उछल पड़ते हैं।
                 महेश भी पढ़ा लिखा तो था नहीं। इसीलिए बबलू की बात सुनते वह खुशी से नाचने लगा था।  देखा देखी गांव के कुछ और लड़के नाचने लगते हैं। सभी के मन में एक ही बात नाच रहा था कि उन्हें बिंदिया भाभी पढ़ाएंगी। 

                 रंजीत अपनी पहली चाल में ही नाकामयाब हो गया था। वह अब चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता था। वह तुरंत वहां से चुप चाप अपने घर की ओर चल देता है। पीछे से उसके सभी दोस्त भी चल पड़ते हैं। 
   
            रंजीत घर आकर अपनी हारे हुए चाल से परेशान होकर बबलू को मन ही मन कोसने लगता है।

 " रंजीत बबलू तो सारा खेल ही उल्टा कर दिया। हमको भी लगा था कि आज वह फंस जाएगा। मगर उलटे कितने चालाकी से खुद वाहवाही बटोर कर गांव का हीरो बन गया। "
   
     रंजीत का मोसेरा भाई दिनेश एक कुर्सी पर बैठते हुए बोला। 

" मगर वह कब तक बचेगा। अभी तो शुरुआत हुई है। देखना हम एक न एक दिन उसका पोल खोलकर ही रहेंगे। बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी।  " 

 " हम भी कल सुबह में ही पटना जाकर बबलू और बिंदिया का पुरा कहानी पता करते हैं। " 

" कल हमको बबलू अपने घर चाय पीने के लिए भी बुलाया है। देखते हैं कल बिंदिया क्या करती है। " 

               तब तक मदन गांजा का चिलम तैयार कर चुका था। वह चिलम सुलगाकर रंजीत को दे देता है। 
              सभी गांजा पीते हुए आपस में फिर से नए सिरे से बबलू के पोल खोलने की योजना बनाने में लग जाते हैं। 


              क्रमशः आगे ...... 

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आगे के भाग में पढ़िए 


क्या रंजीत बबलू के अनपढ़ होने का पोल खोल पाएगा ? 

 क्या बिंदिया अपने पति की इज्जत बचा पाएगी ?

क्या योगेश और सुजीत की शादी हो पाएगी ? 

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                     कुमार सरोज

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