बिंदिया और बबलू / Bindiya Aur Babalu । भाग - 3 । कहानी । कुमार सरोज ।
बिंदिया और बबलू
( भाग - 3 )
कुमार सरोज
( अभी तक आपने पढ़ा था कि बबलू अपनी पत्नी बिंदिया के साथ सदा के लिए अब शहर से अपने गांव मंझार में रहने की योजना बना लेता है। गांव वाले ढोल बाजे के साथ उसकी आगमन की तैयारी करने में लग जाते हैं। गांव वाले दोनों के गांव आने से बहुत खुश हैं। )
अब पढ़िए आगे ......
बिंदिया का पूर्व आशिक निकला उसके ससुराल का
मंझार गांव में नदी के किनारे बबलू और उसकी शहरी पत्नी बिंदिया के स्वागत में बहुत से स्त्री पुरुष खड़े हैं। बबलू का भाई महेश गांव के सरपंच यमुना चाचा के बगल में हाथ में फूल का दो माला लिए खड़ा है। महेश के पिता मंगल भी पास में ही खड़े हैं। योगेश और सुजीत भी अपने हाथ में माला लिए सबसे आगे खड़ा है। सभी बहुत खुश दिखाई दे रहे हैं।
सभी नदी के उस पार बेशब्री से देख रहे हैं। बबलू नदी के उस पार शहर से आने वाली जीप से आने वाला है। शहर से गाड़ी नदी के उस पार तक ही आती थी। शहर से जो जीप आने वाली थी उसी में बबलू अपनी पत्नी बिंदिया के साथ आने वाला था। नदी में एक नाव भी उस किनारे खड़ी थी। शहर आने जाने वाले लोग उसी नाव से नदी पार करते थे।
बैंड बाजे वाला अभी रुक रुककर बाजा बजा रहा था।
ठीक तभी नदी के दूसरे किनारे पर शहर की ओर से एक जीप आकर रूकती है। जीप को देखते ही नदी के दूसरे किनारे खड़े सभी लोगों के चेहरे पर खुशी की लहर खिल उठती हैं। महेश, योगेश, सुजीत एवं गांव के कुछ और युवक खुशी के मारे नाचने लगते हैं। बैंड बाजे वाला भी जोर जोर से अब बाजा बजाने लगता है।
बबलू और बिंदिया जीप से उतरकर जैसे ही नदी किनारे आते हैं कि नाव वाला झट दोनों को नाव में बैठाकर दूसरे किनारे की ओर जिधर गांव वाले खड़े थे चल देता है। बबलू के हाथ में एक बड़ा सा सूटकेस था।
बिंदिया सुर्ख लाल रंग की साड़ी पहनी हुई थी, जिसमें वह और बहुत सुन्दर दिख रही थी। वह शहर की पढ़ी लिखी मॉडर्न लड़की थी, फिर भी अच्छी तरह से अपनी साड़ी के पल्लू से अपने सिर को ढके हुए थी।
महेश अपना मनपसंद का गाना बैंड वाले से बजवाकर अब मदमस्त होकर खुशी से नाचने लगा था। योगेश और सुजीत भी देखा देखी में उसके साथ नाचने लगा था। एकदम उत्सवी माहौल नदी के तट पर लग रहा था।
बबलू और बिंदिया जैसे ही नदी पार करके नाव से उतरते हैं कि गांव वाले बिंदिया को देखने के लिए उतावले हो जाते हैं। सभी देखने के लिए एक दूसरे से धक्का मुक्की करने लगते हैं।
सरपंच साहब पहले से ही दोनों को नदी किनारे से घर ले जाने के लिए एक रिक्शा वाले को बुलाये हुए थे।
आगे आगे बैंड बाजे वाला और उसके पीछे बबलू और बिंदिया रिक्शा पर बैठकर गांव की ओर चल पड़ते हैं। रिक्शा के पीछे गांव वाले आपस में बातें करते चलने लगते हैं। गांव के बच्चे अभी भी खुशी से रिक्शा के आगे नाच रहे थे। महेश, योगेश और सुजीत तो सबसे आगे नाचते हुए चल रहा था।
इधर गांव में रंजीत अभी भी अपने घर के आगे बैठा दोस्तों के साथ ताश खेल ही रहा था कि नदी की ओर से गांव वाले के साथ बबलू और बिंदिया आते हुए सभी को दिख जाते हैं।
गांव के लोगों द्वारा बबलू और उसकी पत्नी का इस तरह स्वागत करते देख रंजीत अन्दर ही अन्दर जल भुन उठता है। वह मन ही मन बबलू को कोसने लगता है।
जैसे ही बबलू और बिंदिया के साथ गांव के लोगों का हुजूम रंजीत के घर के सामने से गुजरने लगता है कि बिंदिया को देखकर रंजीत और उसके दोस्तों की आंखे फटी की फटी रह जाती है। अभी कुछ देर पहले रंजीत अपने कॉलेज वाली जिस दिलरुबा की फोटो दिखाया था, वह कोई दुसरी बिंदिया नहीं बल्कि बबलू की पत्नी बिंदिया ही थी।
रंजीत बबलू की पत्नी के रुप में अपनी दिलरुबा बिंदिया को देख कर चौंक जाता है। उसे तो अपने आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था।
" रंजीत भाई, आपकी कॉलेज वाली माशूका तो आपके सबसे बड़े दुश्मन की ही बीबी निकली। "
दिनेश बिंदिया को देखते ही रंजीत के कान में धीरे से कहा।
" यही तो समझ में नहीं आ रहा है कि बिंदिया की शादी बबलू से कैसे हो गई ! "
रंजीत बिंदिया की ओर देखते हुए धीरे से बोला।
" भाई, तुम्हारे लिए एक खुशखबरी है। तुम या पुरे गांव वाले जिस बबलू को बहुत पढ़ा लिखा और होनहार समझ रहे हैं वह जरा भी पढ़ा लिखा नहीं है। अनपढ़ है वह। "
" दिनेश यह तुम क्या कह रहे हो ? गांव में तो सभी यही जानते हैं कि बबलू बहुत पढ़ा लिखा है। मैं भी उससे बहुत बार बात किया हूं, मगर बात चीत करने से तो ऐसा कुछ नहीं लगा कभी। "
" रंजीत, यही तो उसमें खास कला है। जब उसके पिता उसके जालसाजी को नहीं पकड़ पाए तो हम तुम उसे क्या पकड़ पाओगे। "
" अगर ऐसा है तो मैं कल ही सच्चाई का पता लगा लूंगा। देखना दोनों मियां बीबी को कैसे पुरे गांव के सामने मैं जल्लिल करता हूं। "
कहते हुए रंजीत वहां से उठकर गांव की ओर ही चल पड़ता है। पीछे से उसके सभी दोस्त भी चल पड़ते हैं।
इधर तब तक बबलू अपनी पत्नी के साथ अपने घर के पास आ जाता है।
बबलू की चाची जानकी घर के आगे पहले से ही आरती की थाली सजाए खड़ी थी। बबलू जैसे ही रिक्शा से बिंदिया के साथ उतरता है जानकी बिंदिया की आरती उतारने लगती है। पास खड़ी कुछ औरते स्वागत गीत भी गाने लगती है। बैंड बाजे वाला भी शादी विवाह में बजने वाले गीत का धुन बजाने लगता है।
अपनी मां जानकी के आरती उतारने के बाद महेश अपने भईया भाभी को लेकर घर के अन्दर चला जाता है।
गांव वालों की भीड़ भी धीरे धीरे आपस में कानाफुंसी करते हुए वहां से अपने अपने घर की ओर जाने लगती है।
योगेश और सुजीत भी अपने दुकान पर जो बबलू के घर के ठीक सामने ही था आकर बैठ जाता है।
अगले दिन सुबह से ही गांव की औरतों का नई नवेली दुल्हन बिंदिया को देखने के लिए उसके घर तांता लग जाता है।
जानकी के कहने पर बिंदिया अपने घर के आंगन में ही एक चौकी पर बैठ जाती है। महेश अपनी बिंदिया भाभी के बगल में ही खड़ा रहता है।
जानकी गांव की औरतों को बारी बारी से बिंदिया को दिखाने के लिए बुलाने लगती है।
बिंदिया सभी की पैर छूकर आशीर्वाद लेते जा रही थी। गांव की औरते जिसे जितना बन पड़ रहा था उतना मुंह दिखाई बिंदिया को दे रही थी। मुंह दिखाई में मिल रहे पैसों को महेश ही अपने पास रख रहा था।
घर में उस समय बबलू नहीं था। वह सुबह उठकर ही गांव के लोगों से मिलने चला गया था।
तेतरी चाची भी बिंदिया को देखने आती है। वह मुंह दिखाई में बिंदिया को एक सौ रुपए देती है।
" महेश अब तू हमेशा अपनी भाभी के साथ ही रहना। इसका कुछ गुण तुमको भी मिल जाएगा। "
तेतरी चाची महेश को बिंदिया के बगल में खड़े देखकर बोली।
" चाची, हम अबही से ही भाभी के बॉडीगार्ड बन गए हैं। "
तेतरी चाची बिंदिया के मुंह दिखाई का रश्म पुरा करके जानकी के पास आकर खड़ी हो जाती है।
गांव की औरतों और बच्चों का बिंदिया को देखने आने का तांता अभी भी लगा हुआ ही रहता है।
उधर गांव में बबलू अभी सरपंच साहब के घर के आगे बैठा उन्हीं से बातें कर रहा है। आस पास गांव के लिए कुछ और लोग भी बैठे हैं।
" बबलू तुमको क्या बताएं। पिछले साल की तरह ही इस साल भी गांव के बहुत सारे लड़के मैट्रिक परीक्षा में फेल कर गए हैं। समझ में कुछ नहीं आ रहा है कि क्या करें। इससे गांव की बहुत बदनामी हो रही है। अब पढ़ने लिखने में कोई जरा भी ध्यान ही नहीं देता है। स्कूल में मास्टर साहब भी अब ठीक से नहीं पढ़ाते हैं। हमने गांव में बच्चों को पढ़ने के लिए ही पुस्तकालय बनवाया था। फिर भी वहां कोई पढ़ना ही नहीं चाहता है। "
" चाचा हम आ गए हैं न अब सब ठीक हो जाएगा। "
" तुम दो चार दिन ही न रहोगे फिर चले जाओगे। उससे क्या होगा। "
" चाचा, हम अब सदा के लिए गांव में ही रहने आए हैं। हम अपनी काबिलियत दूसरे के विकास के लिए नहीं लगाने वाले हैं। इसीलिए मैंने अब यही निश्चय किया है कि मैं अब जो भी काम करूंगा सिर्फ अपने गांव जेबार के लिए ही करूंगा। "
" तुम्हारा सोच तो बहुत अच्छा है बबलू। तुमको हमसे किसी भी चीज की जरुरत हो या कोई भी मदद चाहिए तो तुम बेझिझक मांग लेना। "
" चाचा, हम कल से ही गांव के बच्चों के लिए पुस्तकालय में निःशुल्क पढ़ाने की व्यवस्था करते हैं। आप आज ही शाम को गांव के लोगों की एक बैठक पुस्तकालय में बुलाइए। ताकि सभी बच्चों के अभिभावक को इसके लिए राजी किया जा सके। "
" तुम्हारा विचार एकदम दुरुस्त है। बच्चा से ज्यादा सबके मां बाप को ही समझाने की जरुरत है। वही सबको पढ़ाई लिखाई छोडाकर फालतू के काम में लगाये रहता है। "
उसके बाद बबलू सरपंच साहब से विदा लेकर अपने घर की ओर चल पड़ता है।
योगेश आज सुबह से ही नहा धोकर नया शर्ट पैंट पहनकर अपने गुमटी के आगे उदास बैठा हुआ था। वह बिंदिया भाभी को देखने के लिए बार बार बबलू के घर के दरवाजे के पास जाकर वही से से वापस आ जा रहा था। घर के अन्दर अभी भी गांव के औरतों की भीड़ लगी हुई थी। जिसके कारण ही योगेश को मौका नहीं मिल रहा था।
तभी योगेश का झोला छाप डॉक्टर दोस्त सुजीत अपनी साइकिल चलाता हुआ वहां आ जाता है।
" का हुआ इतना उदास काहे हो ? "
आते ही सुजीत पुछ बैठता है।
" अरे यार सुबह से ही सज धज कर बिंदिया भाभी को देखने के लिए बैठे हैं, मगर गांव की औरतों की भीड़ खत्म ही नहीं हो रही है। जिसके कारण मुझे मौका ही नहीं मिल रहा है। "
" तू चिंता मत करो हम आ गए हैं तो अब सब ठीक हो जाएगा। "
" तुमसे कुछ नहीं होगा। पहले मेरे आंख में पॉवर बढ़ाने वाला दवा डालो। नहीं तो मुझसे बुरा आज कोई नहीं होगा। "
" अरे भाई, मैं बाजार से तुम्हारे लिए स्पेशल आई टॉनिक लाया हूं। अभी आंख में डाल देता हूं । "
कहते हुए सुजीत अपने झोला में से एक आई ड्रॉप निकालकर योगेश के आंख में डाल देता है।
योगेश अपने आंख में दवा डलवाकर फिर बबलू के घर की ओर चल देता है। इस बार पीछे से सुजीत भी अपने आप को संवारते हुए चल पड़ता है।
दोनों जैसे ही बबलू के घर के पास पहुंचता है कि ठीक तभी बिंदिया को देखकर तेतरी चाची उसके घर से बाहर निकलती है। उसे देखते ही सुजीत झट बबलू के घर के बगल वाली देवी मंदिर के ओट में छिप जाता है।
कल सुजीत तेतरी चाची के पोती संजू को दवा नहीं दिया था तो ' वह जरुर जाकर अपनी दादी को बोल दी होगी ' यही सोचकर उसके डर से छिपा था।
मगर तेतरी चाची के बूढ़ी नजरों से भी भला कोई बच सका है क्या ? वह सुजीत को छिपते हुए देख लेती है। वह भी उसी के पास आकर खड़ी हो जाती है।
" का रे, तू डाक्टर मे फुला हुआ है। मेरी पोती को दवा काहे नहीं दिया था कल ? "
तेतरी चाची सुजीत को डांटते हुए बोलती है।
तेतरी चाची को पास देखकर सुजीत की बोलती बंद हो जाती है। फिर भी वह धीरे से बोलता है।
" चाची, हम तो दवा दे ही रहे थे, ई योगेश्बा जवरदश्ती हमको लेकर बबलू भईया और बिंदिया भाभी को देखने के लिए लेकर चला गया। "
योगेश भी पास ही खड़ा था। सुजीत द्वारा अपने ऊपर झूट का आरोप लगाते देख वह झट बोल पड़ता है।
" चाची ई स्साला झोला छाप डॉक्टर एकदम झूट बोल रहा है। हमको भी कल ई दवा नहीं दिया था। "
" तू दोनों गांव के हो इसीलिए छोड़ दे रहे हैं, अगली बार ऐसा किया न तो पैर हाथ मार के तोड़ देंगे। "
कहती हुई तेतरी चाची अपने घर की ओर चली जाती है।
उसके जाते ही योगेश सुजीत को उसके झूट बोलने के कारण गुस्से से मारने लगता है। सुजीत माफी मांगने लगता है। वह सिर्फ़ तेतरी चाची से बचने के लिए झूठ बोला था।
कुछ देर बाद दोनों फिर से अपने आप को संवारते हुए बिंदिया भाभी को देखने के लिए बबलू के घर की ओर चल देता है।
दोनों बबलू के घर के दरवाजे के पास जैसे ही पहुंचता हैं कि घर के अंदर से महेश बाहर निकलता है। सामने योगेश एवं सुजीत को देखते ही उसके दिमाग का पारा चढ़ जाता है।
" तू दोनों इधर का करने आया है ? "
" महेश भईया हम बिंदिया भाभी को देखने आए हैं। "
योगेश महेश से बहुत ही प्यार से बोला।
" आज हम बड़का तू दोनों के लिए महेशवा से महेश भईया हो गए। ई पोलिश हमरे पास नहीं चलेगा। याद है न उस दिन नया के नाम पर फ्यूज बॉल ( बल्ब ) दे दिया था, और कहने पर उसको बदला भी नहीं। "
" भईया उस दिन गलती हो गया था। अभी चलिए दुकान पर एक बॉल ( बल्ब ) के बदले में दुगो दे देते हैं। "
" हमको अब नहीं चाहिए। तू दोनों चुपचाप यहां से चल जाओ। और दुबारा इधर आया न तो हमसे बुरा कोई नहीं होगा। "
योगेश और सुजीत बिंदिया को बिना देखे जाना तो नहीं चाहता था, मगर महेश दोनों को जबरदस्ती वहां से भगा देता है।
दोनों बिंदिया भाभी को देखने की मन में अधुरी इच्छा लिए वहां से अपनी दुकान की ओर मन ही मन महेश को गली देता हुआ चल पड़ता है।
रोज की भांति रंजीत उस दिन भी नदी किनारे बैठ कर सुबह सुबह ही अपने दोस्तों के साथ गांजा पी रहा था। अपने कॉलेज की दिलरुबा बिंदिया को बबलू की बीबी के रुप में देखकर कल से ही उसका मन उखड़ा हुआ था। उसका दिमाग अभी भी बबलू को कैसे अनपढ़ साबित करें यही उपाय सोचने में लगा हुआ था। दिनेश भी पास में ही बैठा था।
" दिनेश भाई, आप ही कोई उपाय बताइए। मैं अपनी बिंदिया को बबलू के घर में नहीं देख सकता हूं। हम तो कभी सोचे भी नहीं थे कि हमारी बिंदिया मेरे आंखों के सामने ही मेरे दुश्मन के बाहों में रहेगी। "
" तुम चिंता मत करो। हम कल ही पटना जाकर सारी सच्चाई का पता लगाते हैं। बिंदिया तुम्हारी होकर रहेगी। "
सभी आपस में बातें करते हुए गांजा पी रहे थे।
तभी गांव के तरफ से मदन वहां आ जाता है। वही तो रंजित का नारद मुनि था। सारे गांव की खबर वह रखता था।
" रंजित भईया आपके लिए एक खुशखबरी है। "
मदन आते ही रंजित के हाथ से चिलम लेकर गांजा का एक लंबा कश लगाते हुए बोला।
" का हुआ, बबलू का भेद खुलने का उपाय मिल गया क्या ? "
" ऐसा ही समझिए। आज शाम में बबलू पुस्तकालय में गांव के लोगों को बुलाया है। वह गांव के सभी लड़कों को पुस्तकालय में ही निशुल्क पढ़ाने की व्यवस्था करने वाला है। "
" अरे यार तो इससे क्या होगा ? "
" होगा रंजित। तुम पढ़ाने वाले शिक्षक के रुप में बबलू का ही नाम सबसे पहले सभी के सामने मीटिंग में रख देना। नहीं तो वह किसी और को पढ़ाने के लिए कह देगा, और खुद बच जायेगा । "
" आप एकदम सही बोल रहे हैं दिनेश भाई। तब तो बबलू खुद ही अपने जाल में फंस जायेगा। "
सभी बबलू के पोल खुलने के अभी से ही सपना देखते हुए खुशियां मनाते फिर से नए जोश के साथ गांजा पीने लगता है।
क्रमशः आगे
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अगले भाग में पढ़िए
क्या सच में बबलू की पोल खुल जायेगी ?
बिंदिया और रंजीत का जब सामना होगा तो क्या होगा ?
रंजीत के कारण बबलू और बिंदिया के रिश्तों में दरार आ जायेगी ?
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कुमार सरोज
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