बिंदिया और बबलू / Bindiya Aur Babalu । कहानी । भाग - 02 । कुमार सरोज ।

         बिंदिया और बबलू 
                     
                            कुमार सरोज 


                अभी तक इस कहानी के पहले भाग में आपने पढ़ा था कि बबलू अपने पिता जी के मरने के बाद अपने गांव में ही आकर रहने की योजना बनाता है। उसकी शहरी बीबी बिंदिया भी तैयार हो जाती है। दोनो अपने गांव मंझार आने के लिए पटना से चल भी पड़ते हैं।


   अब पढ़िए आगे ....... 


                    गांव वालों को जैसे ही पता चलता है कि उनके गांव का सबसे तेज तर्रार एवं होनहार युवक बबलू अपनी शहरी पत्नी के साथ गांव आ रहा है तो सभी का खुशी का ठिकाना नहीं होता है। सभी बबलू और उसकी पत्नी के स्वागत के तैयारी में लग जाते हैं। 
                 मंझार गांव में एक झोला छाप डॉक्टर रहता था जिसका नाम था सुजीत। सुजीत घर घर जाकर सभी का ईलाज तो करता ही था गांव में ही एक छोटा सा क्लिनिक भी खोले हुए था। 
                   सुजीत के क्लिनिक के ठीक सामने ही उसके एक दोस्त योगेश का गुमटी था। योगेश लाउडस्पीकर, जनरेटर और लाईट  रखे हुए था। वह शादी ब्याह या किसी और पार्टी फंक्शन में भाड़े पर सारा सामान देता था। वह अपने गुमटी में ही बल्ब एवं बिजली का और दुसरे सामान भी बेचने के लिए रखता था। वह बिगड़ा हुआ रेडियो एवम टॉर्च भी बनाता था। 
                 सुजीत और योगेश दोनों पक्के दोस्त थे। दोनों की अभी तक शादी भी नहीं हुई थी। 
                 बबलू को अपनी पत्नी के साथ गांव आने की खबर सुनकर योगेश भी बहुत खुश था। वह आज सुबह से ही नहा धोकर नया शर्ट पैंट पहन एवं सेंट लगाकर खुशी के मारे अपने गुमटी के आगे बैठा चहक रहा था। 
                वह बार बार कभी अपने बालों में कंघी तो कभी कपड़ों पर सेंट छिड़क रहा था।







       " हे भगवान, तुम्हारा लाख लाख शुक्र है कि आज शहर वाली सुंदर, और मॉडर्न लड़की को देखने का हमारा सपना पुरा होगा। गांव के गंवार लड़की को देख देख कर मेरा आंख दुख गया था। आज हमारे गांव के सबसे हैंडसम और ब्रिलिएंट लड़का यानि की हमारे बबलू भईया अपनी शहरी मैडम के साथ आ रहे हैं। कितना अच्छा होगा जब हम अब दिन भर अपनी शहरी बिंदिया भाभी का अपने इस गुमटी पर से बैठे बैठे ही दीदार करते रहेंगे। अब शायद उन्हें देख देख कर मेरे उजड़े चमन में भी हरियाली आ जायेगा, और मुझे भी कोई मॉडर्न सुन्दर लड़की मिल जाएगी। हम बहुत पतझड़ देख लिए हैं। " 
           योगेश अपने गुमटी के बाहर बेंच पर बैठा अपने आप को संवारते एवं इठलाते हुए मन ही मन बुदबुदा रहा था। 
              तभी योगेश का झोला छाप डॉक्टर दोस्त सुजीत भी एक तरफ से अपनी खटारा साइकिल चलाता हुआ वहां आ जाता है। 
                   वह योगेश को सज धज कर गुमटी के आगे बैठा देख चौंकते हुए गौर से उसे देखने लगता है। 

   " का बात है मेरे उजड़े चमन, आज ई बिजली गिराने का कहां प्लान है। किसी लड़की के यहां शादी में लाउडस्पीकर बजाने जा रहे हो क्या ?  " 
   सुजीत अपनी साईकिल उसी के बगल में खड़ी करते हुए बोला। 

             सुजीत की बात सुनकर योगेश क्रोधित हो जाता है। 

    " तुम न एकदम झोला छाप डॉक्टर ही रहोगे। तुमको पता भी है कि आज बबलू भईया अपनी शहर वाली भाभी के साथ पहली बार गांव आ रहे हैं। " 

    " अरे हम तो भूल ही गए थे। आज हमारी बिंदिया भाभी आ रही हैं। सुन न भाई तुम अभी कहीं मत जाना, मैं भी नहा धोकर तुरंत आता हूं। " 

             सुजीत बोलते हुए पैदल ही अपने घर की ओर तेजी से जाने लगता है। मगर तभी उसे योगेश पकड़ लेता है। 

   " अरे भाई नहा लेना। मगर पहले मेरे आंख में रौशनी बढ़ाने वाला कोई आई टॉनिक डाल दो, ताकि मैं अपनी गुमटी पर बैठे बैठे ही अपनी बिंदिया भाभी का अच्छी तरह से दीदार कर संकू। "

   " अभी मेरे पास नहीं है भाई। उसके लिए क्लिनिक खोलना पड़ेगा। " 

  " तो खोल न , तुम्हारा क्लिनिक कौन बहुत दूर है। समाने ही तो है। नहीं तो लाओ चाभी, मैं खुद निकालकर लाता हूं।  " 

 " अरे यार मैं फिर तैयार कब होऊंगा। मुझे भी तो सजना संवरना है। " 

                    दोनों अभी बाते ही कर रहे थे कि तभी गांव की ही एक लड़की संजू वहां आ जाती है। उसके माथा में दर्द था, और वह दवा लेने के लिए ही सुजीत के पास आई थी।  

                 योगेश उसे आते देख धीरे से सुजीत से बोला -

   "  लो आ गई बुलेट गन अब जरा  फुटानी करके दिखाओ। " 

             संजू सुजीत के पास आकर रुक जाती है।

  " डॉक्टर साहब मेरे सिर में बहुत दर्द हो रहा है, आप कोई अच्छा सा दवा दे दीजिए की मेरा दर्द जल्दी ठीक हो जाए। "

    संजू अपने चेहरे पर मायूसी लिए सुजीत से बोलती है।

 " अभी दवा नहीं है, कल आना। " 

  सुजीत संजू को भी टरकाने के मूड में जवाब देता है।

 " डॉक्टर साहब दवा आपके झोला में नहीं है तो क्लिनिक में से दे दीजिए। सामने ही तो क्लिनिक है। " 

 " डॉक्टर साहब का आज रोगी देखने का मन नहीं है। अब जो भी होगा कल ही होगा।  "
 
   योगेश भी सुजीत के तरफ से बोल पड़ता है। 

                    दोनों के बक बक को सुनकर संजू के दिमाग का पारा चढ़ जाता है।

    " तुम ज्यादा टांय टांय मत करो। डॉक्टर साहब दवा देना है तो दीजिए नहीं तो आपके साइकिल के टायर की हवा खोल दूंगी। फिर हवा भरवाने मेरे यहां ही आयेंगे। फिर आपको समझ में आ जाएगा। "

    " जो करना है करो मैं अभी जा रहा हूं। " 
      कहते हुए सुजीत तेजी से पैदल ही अपने घर की ओर चला जाता है।

                सुजीत को बिना उसे दवा दिए जाते देख संजू गुस्से से उसे गाली देने लगती है।
               योगेश को संजू द्वारा अपने डॉक्टर दोस्त को गाली देते देख गुस्सा आ जाता है। वह भी गुस्से में उसे डांटने लगता है। 

   " तुम गाली क्यों दे रही हो। लड़की हो लड़की जैसी ही रहो। "

      " तुम ज्यादा टांय टांय मत करो, और अपने डॉक्टर दोस्त को समझा देना। वह ज्यादा डॉक्टर में नहीं फूले। सुने हैं कि हमर शादी में तुम्हीं लाउडस्पीकर और झाड़ फाटक का काम लिया है ? "

   " हां लिए हैं तो ? " 

  " तो ठीक से सब काम करना। दीदी जैसा खराब काम किया न तो समझना। हमरा से बुरा कोई नहीं होगा । " 

    कहती हुई संजू पांव पटकती हुई  वहां से चली जाती है। 

                   संजू मंझार गांव के ही सबसे बुजुर्ग और तेज तर्रार महिला तेतरी चाची की पोती थी। तेतरी गांव के सभी औरतों की मुखिया थी। 
 
              संजू के जाते ही योगेश फिर से अपने आप को संवारने में लग जाता है। 
               उधर संजू की दादी तेतरी चाची अपने घर के आगे बने चबूतरे पर अकेली बैठी कुछ सोचती हुई बार बार इधर उधर देख रही थी। उसे आज अभी तक गांव की कोई औरत नजर नहीं आई थी।

     " आज हमारी मंडली की कोई औरत अभी तक नजर क्यों नहीं आ रही है ? आज तक तो ऐसा कभी हुआ नहीं है । जरुर कोई न कोई खास बात है। नहीं तो गांव की औरतें तो हमसे गप्पे लड़ाने और गांव की चटपटी खबर सुनने के लिए हमेशा मरी रहती है। " 
 
            तेतरी धीरे धीरे अभी बुदबुदा ही रही थी कि गांव की ही एक औरत चिन्ता वहां आ जाती है।
       
              तेतरी उसे देखते ही उससे तुरंत पुछ बैठती है - 

   " चिंतवा, आज अभी तक औरत मंडली की कोई महिला नजर नहीं आ रही है। गांव में कुछ हुआ है का ? " 

  " अरे चाची तुम तो पुरे गांव की खबर रखती हो और आज खुद हमसे पुछ रही हो। तुमको तो पता था न कि आज बबलू अपनी शहरी मेहरारू के साथ गांव आ रहा है। उसे ही देखने आज सभी नदी किनारे गए हुए हैं। सुने हैं सरपंच साहब स्वागत के लिए बैंड बाजा भी ठीक किए हैं। "

 " अच्छा.... !  बबलुआ को तो ये सब हीरो ही बना दिए। ठीक है देखते हैं उसकी मेहरारू को भी। आने दो। " 

           कहती हुई तेतरी अपने घर की ओर चली जाती है। 
          
                  चिंता भी वहां से गांव के बगल से गुजरने वाली दरधा नदी की ओर चल देती है। 

               उधर गांव के सरपंच यमुना सिंह भी सज धज कर अपने घर के आगे बैठे थे। पास में ही गांव के कुछ लोग भी बैठे थे। कुछ लोग खडे भी थे। सभी बबलू को लेकर ही बातें कर रहे थे। 
                   तभी अपने घर की ओर से बबलू का चचेरा भाई महेश वहां आ जाता है। वह भी सजा धजा था और बहुत खुश दिखाई दे रहा था। 

      "  सरपंच दादा, आप अभी तक यहीं हैं। हम बैंड बाजा वाले को कब का नदी किनारे भेज दिए। अब तो बबलू भईया और बिंदिया भाभी के आने का समय भी हो गया है । " 

     महेश आते ही सरपंच साहब से बोला।

  " हां....  हां  चलो। मैं भी कब से तैयार बैठा ही हूं। " 

   कहते हुए सरपंच साहब वहां से एक तरफ चल देते हैं। उधर ही नदी थी। नदी तक ही शहर से गाड़ी आती थी। 
              वहां पर के सभी लोग भी सरपंच साहब के पीछे पीछे चल पड़ते हैं। 
                महेश भी अपने आप को संवारते हुए सबसे आगे चलने लगता है। 

              मंझार गांव में ही रंजित भी रहता था। वह गांव के सबसे बड़े किसान हरिहर सिंह का इकलौता बेटा था। कहने को तो वह गांव का सबसे रईस था। मगर एक नंबर का आवारा एवं पियक्कड़ था। बस दिन भर अपने गांव के ही लफंगे दोस्तों के साथ गंजा, ताड़ी और दारू पीने एवं ताश और जुआ खेलने में लगा रहता था। 
            
                वह आज भी अपने घर के आगे चौकी पर बैठा दोस्तों के साथ गांजा पी रहा था। उसका घर गांव के एक चौराहे पर था। गांव में सबसे बड़ा उसी का घर था। 
            आज रंजीत के साथ उसका एक मौसेरा भाई दिनेश भी था। वह कल ही रंजीत से मिलने उसके गांव आया था। दिनेश का घर पटना में ही था। 
           सभी आपस में बात करते हुए गांजा पी रहे थे। रंजीत गांजा पीते हुए बार बार अपने मोबाईल में एक फोटो देख रहा था। 

     " दिनेश भईया, आप मेरे सबसे खास भाई हैं। आप उमर में मुझसेबड़े हैं, फिर भी आप मुझे बड़ा भाई का दर्जा देते हैं। इसीलिए आज मैं आपको अपने पहले प्यार के बारे में बताएंगे। हम भी जब कॉलेज में पढ़ते थे न तो मुझे एक लड़की से प्यार हो गया था। मगर वह मुझे भाव नहीं देती थी। मैं उसको जबरदस्ती भी हासिल कर सकता था, मगर नहीं किया। जानते हैं क्यों .... ?  क्योंकि मैं भी बहुत जिद्दी इंसान हूं। मैं देखना चाहता था कि उसका पति मुझसे ज्यादा पैसा वाला और हैंडसम मिलता है की नहीं। मिला तो ठीक, अगर नहीं मिला तो उसे सबके सामने ऐसा जल्लील करूंगा कि वह खून के आंसू रोएगी।  " 
         
       रंजीत पीते हुए अपनी कहानी दिनेश को बता रहा था। 

   " रंजीत भाई, तुम मुझे आज बता रहा है। पहले बताता मैं उसे उसके घर से उठा लाता। वैसे उसका कोई फोटो है तो मुझे दिखाओ। जरा मैं भी देखूं तुम्हारी दिलरुबा को । " 

       " लीजिए भईया, आज आप भी देख लीजिए। " 

      कहते हुए रंजीत दिनेश को अपने मोबाईल में से अपनी कॉलेज वाली प्रेमिका का फोटो दिखाता है, जो वास्तव में बिंदीया ही थी।   
         सभी गांजा पीते हुए मजा ले लेकर बिंदिया की तस्वीर को देखने लगते हैं। 
      
  " लड़की तो सच में कमाल की है भाई। इसका नाम क्या था ? " 
  
   दिनेश मोबाईल में गौर से फोटो देखते हुए पुछता है। 

  " बिंदिया .... । " 
      
      रंजीत गांजा का आखिरी कश लगाते हुए बोलता है।

 " इसका अभी कुछ अता पता है ? " 

    " अभी तो नहीं है, मगर पटना जाने पर पता चल जाएगा। हम इसका घर देखे हैं। "

               तभी रंजीत के गांव का ही उसका एक और दोस्त मदन वहां एक तरफ से तेजी से चलता हुआ आता है। 

   " रंजीत भईया, आप यहां बैठकर गांजा पी रहे हैं, और वहां पुरे गांव में बबलू के आने के खुशी में बैंड बाजा बजने वाला है। 

       " ऐसा कौन सा तीर ऊ साला पागल इस बार गांव में मारने वाला है कि लोग बैंड बाजा बजाने वाले हैं ? " 
  
   रंजीत खाली चिलम को एक तरफ रखते हुए बोला। 

   " भईया उसने शादी कर लिया है, और इस बार अपनी शहरी बीबी के साथ ही गांव आ रहा है। " 

   " गांव वाला भी पगला गया है। पागल के चक्कर में सब पागल ही बना रहता है। वैसे भी पागल की बीबी पागल ही होगी। " 
  
     रंजीत की बात को सुन सभी हंसने लगते हैं। 

  " ये पागल इंसान कौन है रंजीत ? " 

     दिनेश अपने पॉकेट से ताश निकालते हुए पुछता है। 

 " है इसी गांव का। मगर पटना में  रहता है। उसकी चिंता हमें नहीं करनी है। चलो हम लोग अब दो चार हाथ ताश खेल लें। " 

            सभी वही पर बैठ कर ताश खेलने लगते हैं। मदन भी वहीं बैठ जाता है। 

         रंजीत इस बात से अंजान ताश खेलने में व्यस्त हो जाता है। उसे जरा भी यह आभास नहीं था कि उसके गांव वाले बैंड बाजे के साथ जिसकी स्वागत की तैयारी में लगे थे, वह वास्तव में उसकी दिलरुवा बिंदिया ही थी। 


     शेष आगे के भाग में  ..........

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                   अब जब रंजीत और बिंदिया का गांव में आमना सामना होगा तो क्या होगा ? 

                  क्या बबलू के अनपढ़ होने की बात गांव वालों को पता चलेगी ? 

                   जानने के लिए पढ़ते रहिए मनोरंजन से भरपूर कहानी बिंदिया और बबलू । 

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                         कुमार सरोज 

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