बनाना गार्डेन / Banana Garden । कहानी । कुमार सरोज ।

        बनाना गार्डेन
                    
                     कुमार सरोज

                  

            रजौली, बड़ौदा से करीब 70 किलोमीटर दूर समुंद के किनारे प्रकृति की गोद में बसा बहुत ही सुन्दर एक छोटा सा गांव था। रजौली गांव के चारों तरफ सिर्फ केले ( Banana ) के ही पेड़ थे। गांव के उत्तर दिशा जिधर समुद्र था उधर केला का एक बहुत बड़ा बगान ( Garden ) था, जिसे ही लोग प्यार से बनाना गार्डेन कहते थे। बनाना गार्डेन में बहुत खतरनाक दलदल भी था, जिसके कारण गांव वाले उधर बहुत ही कम जाते थे।  

                बनाना गार्डेन से सटे ही गांव से शहर आने जाने के लिए एक मात्र सड़क थी। बाकि का पुरा क्षेत्र तो सिर्फ केले के बगान से ही भरा हुआ था। 





                      

 

            सभी गांव वाले खुशी पूर्वक केले की खेती करके अपना जीवन यापन मजे से गुजार रहे थे। मगर अचानक गांव वालों के खुशियों को किसी की नजर लग जाती है। शायद नियती को अब कुछ और ही मंजूर था। इधर कुछ दिनों से गांव में एक भूत के कारण भय और आतंक का माहौल पैदा हो गया था। बनाना गार्डेन में अचानक कहीं से किसी भूत ने आकर अपना बसेरा बना लिया था। जिसके कारण ही गांव वालों के रातों की नींद एवं दिन का चैन गायब हो गया था। गांव वाले अब दिन में भी बनाना गार्डेन की ओर जाने से डरने लगे थे। हमेशा अब पुरे गांव पर बनाना गार्डेन के भूत का आतंक छाया रहता था। भूत कब आकर किसका शिकार कर लेता था किसी को पता ही नहीं चलता था। डर के मारे गांव से बाहर तो अब कोई अकेले निकलता ही नहीं था।

               पता नहीं इस सुन्दर एवं रमणीक गांव पर भूत ने क्यों अपना कहर बरपा रखा था ? सुख चैन से जीने वाले गांव के लोग अब हमेशा डर के साएं में जीने को विवश हो गए थे। 

               भूत ने अब तक बहुत से लोगों को अपना शिकार भी बना लिया था, जिसमें कुछ गांव के थे, तो कुछ बाहर से आए हुए मेहमान भी थे। मेहमानों में ज्यादातर लड़कियां ही थी। डर के मारे लोग अब गांव से पलायन भी करने लगे थे।

              सुबह का समय था। अभी रजौली गांव की ही एक लड़की मेधा जो की बड़ौदा में रहकर पढ़ाई करती थी, और अभी अपने गांव आई हुई थी, वापस जाने को बनाना गार्डेन के बगल वाली सड़क के पास बस के इंतजार में खड़ी थी। मेधा की सहेली नेहा और किरण उसे बस चढ़ाने आई थी। दोनों अभी मेधा के साथ ही सड़क किनारे खड़ी बातें कर रही थी। 

               मेधा को बस में चढ़ा कर जैसे ही नेहा और किरण गांव वापस जाने लगती है कि अचानक भूत तूफान की तरह तेजी से एक तरफ से आता है और नेहा को पकड़कर उसका खून पीकर तुरंत गायब हो जाता है। देखते ही देखते नेहा का जिस्म बेजान खून से सना वही जमीन पर बिखर जाता है। 

               यह सब देख किरण को तो सांप सूंघ जाता है। वह कुछ समझ पाती तब तक तो भूत अपना शिकार करके गायब हो जाता है। 

              जब किरण को कुछ समझ में नहीं आता है तो वह डर के मारे बदहवास चीखती चिल्लाती गांव की ओर गिरते परते भाग खड़ी होती है। 

                  पुरे गांव में यह खबर फैलते ही कोहराम मच जाता है। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। आखिर गांव की खुशहाली को किसकी नजर लग गई थी ? 

                 अभी गांव वाले नेहा के दर्दनाक मौत को भूला भी नहीं पाए थे कि ठीक अगले ही दिन नेहा की सहेली किरण का भी बनाना गार्डेन के किनारे खून से सना मृत शरीर मिलता है। 

                     एक के बाद एक गांव की दो मासूम लड़कियों का इस तरह से असमय काल के गाल में समाते देख गांव वालों की रूह तक कांप जाती है। आज तक जिस बनाना गार्डेन को गांव वाले प्यार करते आ रहे थे, अब सभी को उससे नफरत और घृणा होने लगी थी। 

             इस घटना के बाद गांव वाले बनाना गार्डन के भूत को भगाने के लिए तांत्रिक एवं जादू टोना का भी सहारा लेते हैं। मगर उससे भी कोई फायदा नहीं होता है। उस खून के प्यासे भूत का खूनी आतंक पहले के जैसा ही बदतर जारी रहता है।  

                 भूत को भागने के लिए जिस दिन तांत्रिक द्वारा तंत्र मंत्र का जाप करते हुए हवन किया जाता है, ठीक उसके अगले ही दिन सुबह में मेधा के पिता रामपाल का मृत शरीर बनाना गार्डेन के नजदीक मिलता है। मेधा के पिता रामपाल ही तंत्र मंत्र करवाने में सबसे ज्यादा बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिए थे। मगर उन्हें भी भूत ने अब अपने प्रकोप का शिकार बना लिया था।

              अपने पिता के भूत द्वारा मारे जाने की खबर सुनते ही मेधा तुरंत बड़ौदा से अपने गांव रजौली आ जाती है। रोते रोते उसका बुरा हाल था।

                   मेधा के साथ गांव इस बार उसके कॉलेज की ही एक सहेली प्रभा का मंगेतर अरुण भी आता है। प्रभा भी चार महीना पहले जब मेधा के साथ शहर से गांव घूमने आई थी तो उसे भी बनाना गार्डेन के भूत ने ही अपना शिकार बनाने की कोशिश किया था, मगर वह अपनी हिम्मत और दिलेरी से बच कर भाग निकली थी। मगर भगाते समय वह बनाना गार्डेन के दलदल में फंसकर मर गई थी।

               मेधा अरुण को प्रभा के बारे में पहले यही बताई थी कि वह दलदल में धंसकर मरी थी। मगर अपने पिता के भूत द्वारा मारे जाने के बाद वह अरुण को प्रभा के मरने के पीछे की पुरी सच्चाई विस्तार से बता देती है। इसीलिए अरुण अपनी प्रेमिका प्रभा जो की बड़ौदा की थी के मौत का हकीकत जानने एवं बनाना गार्डेन के भूत के बारे में और अधिक जानकारी हासिल करने के लिए ही मेधा के साथ गांव आया था। 

                 रजौली गांव में आते ही अरूण सबसे पहले बनाना गार्डेन में अंदर जाकर सच्चाई जानने की कोशिश करना चाहता है, मगर मेधा एवं गांव वाले उसे जाने नहीं देते हैं।

            अरूण मन मारकर रह तो जाता है, मगर वह अंदर ही अंदर बनाना गार्डेन के भूत और उसके पीछे के रहस्य को जानने के लिए बहुत व्याकुल हो रहा था।

                 संयोग से अरूण को भूत से मिलने का मौका मिल ही जाता है। उसे गांव आने के ठीक दो दिन बाद ही एक रात मेधा को भी भूत अपना शिकार बना लेता है। 

               गांव वाले भूत का उस रात भी डर के मारे कुछ नहीं कर पाते हैं। मगर अरुण गांव वालों के लाख मना करने के बावजूद भी भूत के पीछे तेजी से अकेले ही दौड़ पड़ता है।

           अरूण भूत के पीछे भागते भागते बनाना गार्डेन के बहुत अन्दर चला जाता है। 

                     और बनाना गार्डेन के अन्दर जाकर जब भूत के हकीकत से अरूण का सामना होता है तो उसके पैर तले की जमीन खिसक जाती है।

               भूत कोई और नहीं बल्कि अरूण की मृत प्रेमिका प्रभा ही थी, जो अभी भी जिंदा थी।

               प्रभा जब अरुण को अपने भूतनी बनने के पीछे की हकीकत बताती है तो उसे सुनकर उसके रौंगटे खड़े हो जाते हैं। 

              मेधा शहर के भोली भाली लड़कियों से दोस्ती करके उसे अपने साथ गांव घुमाने के बहाने लाती थी, और उसे बनाना गार्डेन के रास्ते समुंद्र के किनारे बने एक टापू पर ले जाकर बाहर से आए लोगों को अपनी जिस्मानी भूख शांत करने के लिए मनु को सौंप देती थी। बदले में मनु उसे मोटी रकम देता था। उस टापू पर पैसे वाले रईस लोग अपनी हवस को शांत करने के लिए ही आते थे। अमीरजादो के अय्याशी का अड्डा था वह टापू। मनु ही उस समुंद्री टापू पर होने वाले अय्याशी के खेल का संचालक और मास्टरमाइंड था। वह अपने ग्राहकों को सारी सुख सुविधा देता था। 

                   जो लड़की उन लोगों के आगे अपने आप को नहीं सौंपती थी उसे मनु या तो समुंद्र में डुबो कर मार देता था, या फिर बनाना गार्डेन के दलदल में ले जाकर फेंक देता था। फिर दलदल में फंसकर बेचारी मासूम लड़कियां खुद ही मर जाती थी। बनाना गार्डेन के खतरनाक दलदल से निकलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था।

                   इन सारे कामों को मनु अपने आदमियों के सहयोग से हैंडल करता था। वह लड़कियों को बाहर के देशों में भी बेचता था। जो लड़की एक बार उस टापू पर आ जाती थी, उसे या तो मरना पड़ता था या फिर बिकना पड़ता था। 

               मेधा के इस काम में उसके पिता रामपाल एवं उसकी सहेली किरण और नेहा भी मदद करती थी। सभी गांव में आकर यह अफ़वाह फैला देते थे कि हमारे साथ शहर से आई लड़की दलदल में फंस कर मर गई। जबकि हकीकत तो कुछ और ही रहता था। भूत के झूट मूठ का अफवाह भी मेधा, उसके पिता एवं उसकी सहेली नेहा और किरण का ही फैलाया हुआ था। जबकि शुरु से ही कोई भूत बुत नहीं था। 

               भूत के द्वारा मारे जाने के नाम पर मेधा ने ही गांव की बहुत सारी लड़कियों का सौदा मनु से कर दी थी। गांव वाले यही समझते थे कि उन्हें भूत ने अपना शिकार बना लिया है। 

             शुरु में मेधा गांव वालों को यकीन दिलाने के लिए खुद ही भूत बनती थी। वह गांव वालों को डराने के लिए उन पर हमला भी करती थी। गांव में भूत का आतंक पैदा करने के लिए मेधा कभी कभार किसी गांव वालों को जान से भी मार कर लाश गांव के बाहर छोड़ देती थी। 

                 प्रभा के साथ भी मेधा ने ऐसा ही की थी। प्रभा को अपने गांव की खूबसूरती के बारे में बढ़ा चढ़ा कर बता कर उसे घुमाने के बहाने गांव लेकर आई थी। गांव में लाने के बाद वह प्रभा को बनाना गार्डेन घुमाने के बहाने समुंद्र के टापू पर ले जाकर मनु को बेच आई थी। 

             प्रभा अपनी इज्जत तो नहीं बचा पाई थी, मगर अपनी जान बचाकर किसी तरह बनाना गार्डेन के दलदल से निकलकर भागने में सफल हो गई थी।

            प्रभा अपनी लुटी हुई इज्जत लेकर अपने मंगेतर अरूण के पास जाना नहीं चाहती थी। अब उसका सिर्फ एक ही लक्ष्य था, मेधा से बदला। उसके दिलो दिमाग में अब सिर्फ मेधा से बदला लेना ही कौंध रहा था। इसीलिए उसने मेधा एवं उसके सभी सहयोगियों को उसी के जाल में फंसा कर मारने का दृढ़ निश्चय करके भूतनी बन गई थी। 

             प्रभा ही भूतनी बनकर मेधा, उसके पिता एवं उसकी दोनों सहेली नेहा और किरण को मारी थी। उसने मनु को भी मार दी थी। और आज अंतिम गुनहगार मेधा को भी उसके अंजाम तक पहुंचा दी थी। 

            अरूण के बहुत समझाने एवं जोर देने पर प्रभा उसी के साथ फिर से नई जिंदगी जीने के लिए समुंद्र के रास्ते दूसरे शहर की ओर चल पड़ती है। वैसे भी तो अब रजौली गांव के अमन चैन को लुटने वाली मेधा और उसके झूठी भूतनी गैंग का खात्मा हो ही गया था। 

                  इधर रजौली गांव वाले अरूण के वापस नहीं आने पर अभी तक यही समझ रहे थे कि शायद उसे भी बनाना गार्डेन के भूत ने अपना शिकार बना लिया था। 

                 इस घटना को बीते अब बहुत दिन हो गया था। फिर भी रजौली गांव वालों में बनाना गार्डेन के भूत का डर अभी तक बैठा हुआ ही था। जबकि गांव वालों के अनुसार अरूण को मरे अब एक साल से भी ज्यादा हो गया था, और इन एक साल में अब कोई और दूसरा मरा भी नहीं था, और ना ही उसके बाद भूत कभी दिखा ही था। फिर भी भूत तो भूत ही होता है न, गांव वालों के मन मस्तिष्क में भूत का डर अभी भी कायम था !   

         

                कुमार सरोज

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