मांझी रे / Manjhi Re ।। कहानी ।। कुमार सरोज ।।
मांझी रे
कुमार सरोज
बिहार के जहानाबाद जिला में अवस्थित है बराबर की पहाड़ी। बराबर पहाड़ पर ही बना हुआ है भगवान शिव का एक बहुत ही प्राचीन मन्दिर। किदवंतियों के अनुसार इस प्राचीन शिव मंदिर को मगध सम्राट जरासंध के ससुर बानासुर ने बनवाया था। बराबर पहाड़ी में ही सात गुफा भी है। इसे शायद प्राचीन काल में राक्षसों के डर से छिपने के लिए साधु संतो एवं ऋषि मुनियों ने ही बनाया था।
बराबर पहाड़ी के तलहटी में बसा है एक छोटा सा गांव चोखा बिगहा। जैसा गांव का नाम है, वैसे ही अटपटे ढंग से जीवन बसर करते हैं वहां के ग्रामीण लोग। इस गांव में अधिकांश मुसहर जाति के गरीब परिवार ही रहते थे। गांव और बराबर पहाड़ के बीच में एक छोटी सी नदी बहती है।
चोखा बिगहा गांव में ही रहता है एक हंसमुख, मिलनसार लड़का भुवन मांझी। जिसे प्यार से उसके गांव वाले उसे भुरा कहते थे। भुरा बहुत सीधा साधा लड़का था।
भुरा दिन भर खेतों में अनाज चुनने एवं खाने के लिए चूहा पकड़ने में व्यस्त रहता था। वह अपने गांव वालों का कोई भी काम सिर्फ खाने पीने पर ही कर देता था। इसीलिए गांव वाले उसे बहुत चाहते थे। वह अपने घर तो बहुत कम ही खाता था। इसीलिए गांव की कुछ भाभियां उसे प्यार से पेटुआ भी कहती थी।
भुरा के घर में उसके भईया और भाभी के अलावा 2 साल की उसकी एक भतीजी थी रानी। उसके भईया रमेश दिल्ली के एक फैक्टरी में काम करते थे। जिसके कारण वो वही रहते थे। सिर्फ पर्व त्योहार में ही घर आते थे।
भुरा को उसकी भाभी लालती जरा भी पसंद नहीं करती थी। वह हमेशा उसे घर का काम नहीं करने के कारण ताना देते रहती थी। मगर वह अपनी भाभी के सभी बात को सिर्फ मजाक में उड़ा दिया करता था। वह हमेशा अपने आप में ही मग्न रहता था।
भुरा भगवान शिव का पक्का भक्त था। वह भले नहाता प्रतिदिन नहीं था, मगर बराबर पहाड़ पर बने शिव मंदिर में नदी पार करके पूजा करने रोज जरुर जाता था। बरसात के दिनों में नदी में पानी आदमी के गर्दन तक भर जाता था। जिसके कारण वह मंदिर जाने में प्रतिदिन भींग जाता था। इसीलिए वह नदी पार करने के लिए खुद से ही एक नाव बना लिया था।
पास के शहर से चोखा बिगहा गांव के रास्ते बराबर पहाड़ जाने में दुरी तो कम थी, मगर बीच में नदी पड़ने के कारण इधर से बहुत कम ही लोग जाते थे। कभी कभार ही कोइ बाहर से आया पर्यटक गलती से इस रास्ते से दूरी कम होने के कारण आ जाता था । तब बरसात के दिनों में भुरा ही उन सभी को नदी अपने नाव से पार कराता था। वह चूंकि शिव का भक्त था इसलिए किसी से कोई नदी पार कराने का पैसा भी नहीं लेता था। अगर कोई जबरदस्ती अपने मन से पैसा दे देता था तभी वह रखता था। वैसे भी नाव की जरूरत सिर्फ बरसात के दिनों में ही होती थी। बाकी दिन नदी में पानी नहीं के बराबर ही रहती थी।
चोखा बिगहा गांव के ठीक सामने पहाड़ी के दुसरी तरफ़ शहर से पहाड़ तक आने के लिए एक पक्की सड़क भी थी। जिसके कारण लोग उसी रास्ते से ही ज्यादा आते जाते थे।
एक दिन की बात है। सुबह के 10 बज रहे थे। हमेशा की तरह भुरा उस दिन भी अपनी दुनिया में मग्न नदी के किनारे ही एक खेत में धान के गिरे हुए बाली को चुन रहा था।
तभी नदी के पास कच्ची सड़क से चलकर एक चमचमाती कार आकर रूकती है। भुरा अपने काम में ही व्यस्त रहता है।
कार नदी किनारे आकर रूक जाती है। उस समय भी नदी में कमर से ऊपर तक पानी था।
कार में से सुन्दर जवान आधुनिक वेशभूषा में दो लड़की बाहर निकलती है। मगर सामने नदी में पानी देखकर दोनों की खुशी मायूसी में बदल जाती है। दोनों को बराबर पहाड़ पर मंदिर एवं गुफा देखने जाना था।
कार में से उतरने वाली लड़की में से एक का नाम श्रेया था तो दुसरी का नाम सुरभि था। दोनों कॉलेज की दोस्त थी। श्रेया दिल्ली के एक बहुत बड़े बिजनेसमैन राजीव दीक्षित की इकलौती बेटी थी, तो सुरभि बराबर पहाड़ के पास के ही एक शहर गया में रहती थी। श्रुति पुरातत्व विभाग में रिसर्च कर रही थी। वह अपनी दोस्त सुरभि के कहने पर ही दिल्ली से बराबर पहाड़ी की सभी गुफाओं एवं प्राचीन शिव मंदिर को देखने उसके बारे में जानकारी इकट्ठा करने एवं उससे संबंधित इतिहास का अध्ययन करने आई थी।
दोनों नदी किनारे खडी अभी उस पार जाने का उपाय ही सोच रही थी कि तभी श्रुति की नजर कुछ दूरी पर नदी किनारे खड़ी नाव पर पड़ जाती है। मगर वहां कोई उसे चलाने वाला आदमी नजर नहीं आ रहा था। दोनों नाव चलाने वाले आदमी के खोज में इधर उधर देखने लगती है। तभी दोनों की नजर भुरा पर पड़ जाती है।
" सुनो...... । "
सुरभि 2 - 3 बार जोर जोर से जब भुरा को आवाज देती है तो वह सुनते ही तुरंत उस ओर दौड़ पड़ता है।
भुरा दौड़ते हुए जैसे ही दोनों के पास आता है तो नजदीक से दोनो को देखते ही उसकी आंखें फटी की फटी रह जाती है।
वह अपने 22 साल के जिदंगी में इतनी सुन्दर लड़की आज तक कभी नहीं देखा था। वह जिस गांव में रहता था वहां तो अधिकांश काले या सांवले ही थे।
श्रुति तो सुरभि से भी ज्यादा सुन्दर थी। वह एकदम स्वर्ग की अप्सरा जैसी सुन्दर दिख रही थी।
भुरा किसी तरह अपने आप को श्रुति की सुंदरता देखकर खुद को चक्कर खाकर गिरने से बचा पाता है। उसे अभी तक अपने आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। उसने तो कभी सपने में भी इतनी सुंदर लड़की नहीं देखा था। उसे श्रुति को देखकर तो अभी भी ऐसा लग रहा था कि वह स्वर्ग से आई कोइ अप्सरा ही थी, जो उसके गांव के जमीं पर नदी किनारे गलती से उतर गई थी।
" इस नाव को कौन चलता है ? हमें नदी के उस पार जाना है। "
सुरभि भुरा के पास आते ही उससे पुछ बैठी।
श्रेया अभी तक चुपचाप खड़ी थी। उसने भी भुरा जैसा लड़का आजतक कभी नहीं देखी थी। वह काले रंग का तो था ही, वह कपड़ा भी जो पहने हुए था वह बहुत पुराने, फटे हुए एवं बहुत गंदे थे। उसके लंबे बाल भी बहुत गंदे और बिखरे हुए थे। देखने से ही ऐसा लग रहा था जैसे उसने कभी अपने बाल में कंधी किया ही नहीं था। उसने शायद महीनों से नहाया भी नहीं था।
श्रुति की सोच एकदम सही थी। भुरा जिस गांव और जैसा परिवेश से ताल्लुक रखता था, वहां अधिकांश वैसे ही लोग रहते थे। उन्हें अपने पेट के भूख की जुगाड करने से फुर्सत कहां मिलती थी। शिक्षा, स्वास्थ तो उनलोगो के लिए अभी भी कोसो दूर था। बस सभी अपने ही गांव की छोटी सी दुनिया में कमाने खाने में मग्न रहते थे।
" हमही नाब चलाते हैं मेडम। चलिए। पहाड़ पर शिव मंदिर में पूजा करने जा रहे हैं का ? "
कहते हुए भुरा तुरंत नाव पर चढ़ कर उसे उस पार ले जाने के लिए तैयार हो जाता है।
सुरभि चुंकि पास के ही शहर गया की थी इसीलिए वह भुरा जैसे ग्रामीण लोगों के रहन सहन को अच्छी तरह से जानती थी। इसीलिए उसे भुरा को देखकर कोई विशेष अचरज नहीं हो रही थी। जबकि श्रेया तो भुरा को देखना भी पसंद नहीं कर रही थी। इसीलिए वह उसके तरफ़ अब देख ही नहीं रही थी।
सभी नाव में सवार होकर नदी के उस पार चल पड़ते हैं।
भुरा उस छोटे से सफर में ही अपने, अपने गांव, बराबर पहाड़ी, पहाड़ पर के अपने आराध्य देव शिव के मंदिर, एवं सातों गुफाओं के बारे में विस्तार से जल्दी जल्दी बिना रुके, थके और बिना किसी की सुने सब कुछ बताने में व्यस्त हो जाता है।
भले श्रेया को भुरा देखने में अच्छा नहीं लगा था, मगर उसकी बातें वह बड़े ही गौर से सुन रही थी। सुरभि बीच में कुछ पूछना भी चाहती थी, मगर भुरा किसी की सुनने वाला कहां था।
भुरा अपनी बातों को तभी विराम देता है जब वह नदी के दूसरे किनारे पहुंच जाता है।
नदी पार करके सुरभि भुरा को वही रुकने को बोलकर श्रेया के साथ पहाड़ पर बने गुफाओं की ओर चल पड़ती है।
भुरा फिर से आश्चर्यचकित, विस्मय एवं अपलक जाती हुई श्रेया को ही देखने लगता है। वह नाव चलाते समय भले ही बातों के प्रवाह में बह गया था, मगर चुप होते ही फिर से श्रेया जैसी अद्वितीय सुंदर लड़की की सुंदरता के भंवर में उलझकर उस पर विश्वास और अविश्वास के द्वंद में फंस जाता है।
अचानक भुरा अपने स्थान से उठकर जहां श्रुति बैठी थी वहां आकर उस जगह को पहले बड़े ध्यान से, फिर बार बार छूकर देखने लगता है। वह अभी भी विश्वास नहीं कर पा रहा था कि सच में ही वह कोई लड़की थी। शायद इसका कारण अभी तक श्रुति का नहीं बोलना भी था।
कुछ सोचकर पता नहीं क्यों भुरा उसी जगह पर चुपचाप वैसे ही बैठ जाता है जैसे श्रुति नाव पर कुछ देर पहले बैठी थी।
उधर सुरभि और श्रेया को पहाड़ पर चढ़ते चढ़ते दोपहर के 12 बज जाते हैं। दोनों सबसे पहले सातों गुफाओं को देखने की योजना बनाती है।
श्रेया अपने साथ कैमरा और लिखने के लिए नोट पैड भी लाई थी। वह चलते चलते कैमरा से फोटो खींच रही थी।
सात में से तीन गुफाओं को ही देखते एवं उसके बारे में जानकारी इकट्ठा करते करते शाम के 4 बज जाते हैं। दोनों को वापस गया भी जाना था। इसीलिए दोनों कल फिर आने की आपस में योजना बनाकर वापस नाव की ओर चल पड़ती है।
इधर भुरा दोनों के जाने के बाद से ही अभी तक बेसुध अप्सरा है या कोई सच में लड़की ही है के द्वंद में खोया ही रहता है कि सुरभि और श्रेया वापस नाव के पास आ जाती है। भुरा को नाव पर आंख बंद किए चुपचाप बैठे देख दोनों को लगता है कि वह शायद ऐसे ही सो गया है। इसीलिए सुरभि उसे जोर से आवाज लगाती है।
" चलो। अब हमें वापस जाना है। "
भुरा आवाज सुनकर हड़बड़ाते हुए खयाबों की दुनिया से वापस हकीकत में आ जाता है।
" चलिए मेडम, हम तो शुरू से ही यही के यही हैं। "
फिर वापस नदी पार करने का सिलसिला शुरू हो जाता है। वापसी में भी भुरा अपनी बची हुई बातों को फटाफट पूरा कर के ही दम लेता है।
इस बार भी श्रेया कुछ बोल तो नहीं रही थी, मगर वह बार बार अब भुरा को देख जरुर रही थी। वह लोगों को देखकर एवं सुरभि से बात करके इतना समझ गई थी कि इसमें भुरा का कोई दोष नहीं था, बल्कि उसके गांव का ऐसा ही परिवेश और माहौल ही था।
सुरभि नदी पार करने के बाद भुरा को पैसा देना चाहती है मगर वह नहीं लेता है।
अंत में दोनों भुरा से कल फिर आने को बोलकर कार में सवार होकर वापस गया की ओर चल पड़ती है।
इधर जब तक कार भुरा के आंखों से ओझल नहीं हो जाती है तब तक वह अपलक उसे ही देखते रहता है। शायद वह यह विश्वास करना चाह रहा था कि श्रेया अप्सरा नहीं इन्सान ही थी।
कार के ओझल होते ही वह भी अपना सामान लेकर गांव की ओर चल देता है। वह आज बहुत खुश था।
अगले दिन भुरा नदी किनारे के ही एक खेत में चूहा के बिल में आग जलाकर धुआं करके चूहा पकड़ने की कोशिश ही कर रहा था कि श्रेया सुरभि के साथ कार में सवार आ जाती है। दोनों कल से आज पहले ही आ गई थी। अभी तो सुबह के 8 ही बज रहे थे।
भुरा तो यही सोचकर चूहा पकड़ने लगा था कि दोनों कल के ही समय पर आएगी। मगर दोनों को पहले आते देख वह तुरंत अपना चूहा पकड़ने वाला काम बंद कर देता है, और बिना दोनों के बुलाए ही वह कार की ओर चल पड़ता है।
सभी कल की तरह ही आज भी नदी पार करके पहाड़ के पास आ जाते हैं। आज श्रेया को भुरा अजनबी जैसा नहीं लग रहा था। वह अभी तक उससे कोई बात तो नहीं की थी, मगर उसके प्रति दिल में भी अब कोई घृणा या कलेश नहीं था।
आज सुरभि भुरा को भी अपने साथ पहाड़ पर चलने को कहती है। उसके रहने से श्रेया को सातों गुफाओं एवं शिव मंदिर के बारे में और भी बहुत सारी जानकारियां मिल जाएगी।
भुरा भी मना नहीं करता है। तीनों एक साथ ही बराबर पहाड़ पर चढ़ने लगते हैं।
श्रेया 3 गुफा कल ही देख चुकी थी, बाकि के 4 गुफाओं को वह आज हर हाल में देखने के लिए उतावली हो रही थी।
भुरा दोनों को लेकर चौथी गुफा जो की बहुत ही अंधेरा गुफा था के अन्दर की ओर चल पड़ता है। वह श्रेया को पहाड़ के गुफाओं की बहुत सारी सुनी एवं प्रचलित कहानियां बताता है।
भुरा के शरीर एवं गंदे कपड़ों से नहीं नहाने के कारण आज भी बदबू तो आ रही थी, फिर भी न चाहकर भी श्रेया अपनी जिज्ञासु मस्तिष्क में उठ रहे सवालों के जवाब के लिए उसके साथ ही चलने को मजबूर थी।
अचानक अंधेरे में किसी चीज को देखकर वह डर से भुरा के हाथ को पकड़ लेती है। भुरा के शरीर में उसकी छुअन से ही पता नहीं क्यों बिजली के झटके जैसी तीव्र प्रवाह दौड़ जाती है।
भुरा के हाथ को पकड़ने के कारण उसके हाथ पर का मैल छूट कर श्रेया के हाथ में आ जाती है। उसका मन गुस्सा से उबलने लगता है, मगर कुछ सोचकर वह शांत रह जाती है। भुरा के हाथ में जहां वह पकड़ी थी, वहां भी निशान बन जाता है।
" तुम रोज नहा नहीं सकते हो। गांव में पानी नहीं है क्या ? "
पहली बार श्रेया भुरा से बोलती है, वह भी गुस्से में।
भुरा भी पहली बार उसकी मधुर आवाज सुनता है। वह श्रेया के गुस्से का कारण समझ गया था। मगर इसमें भला उसका क्या दोष था ? उसके गांव में तो सभी ऐसे ही रहते थे। आजतक किसी ने उसे नहाने के लिए भी तो नहीं कहा था।
भुरा को श्रेया के बात का जरा भी बुरा नहीं लगता है। वह पहले के जैसे ही फिर से दोनों को बाकी के गुफाओं को दिखाने लगता है।
उस दिन सभी सातों गुफा देख तो लेते हैं, मगर मंदिर देखने के लिए समय नहीं बचता है। गुफा देखते देखते ही शाम के 4 बज जाते हैं।
सुरभि के कहने पर श्रेया फिर कल आने की योजना बना कर भुरा के साथ उसके नाव की ओर चल देती है।
भुरा भी सभी को फिर कल ही आने को कहता है। क्योंकि शाम होते ही बाहर से आए हुए लोगों से आप पास के गांव के बदमाश लड़के छीना झपटी करने लगते थे।
श्रेया और सुरभि को अपने कार में सवार होकर जाते ही पहली बार भुरा अपने उस हाथ की कलाई को देखता है जिसे श्रेया ने पकडी थी। उसके नाजुक अंगुलियों के निशान भुरा के मटमैले हाथ पर अभी तक अंकित थे। वह कुछ सोचकर मुस्कुराता हुआ अपने घर की ओर चल देता है।
अगले दिन भुरा सुबह उठकर सबसे पहले अपना एक मात्र रखा हुआ इकलौता बिना फटा शर्ट जिसे वह सिर्फ बारात जाने के लिए बक्सा में बंद करके रखे हुए था एवं अपनी भाभी को बिना बताए उनका रखा हुआ साबुन लेकर नहाने के लिए नदी की ओर चल पड़ता है।
भुरा जिंदगी में उस दिन जितना अपने शरीर को रगड़ रगड़कर नहाता है उतना उसने आजतक कभी नहीं नहाया था।
नहाकर बारात में पहनकर जाने के लिए संजोग कर रखा हुआ अपना एक मात्र पुराना शर्ट जो अभी घर से साथ लाया था को पहन लेता है।
भुरा जिंदगी में पहली बार उस दिन सच में सुंदर दिख रहा था। वह काले रंग का नहीं, था तो सांबले रंग का ही, लेकिन रोज नहाता नहीं था जिसके कारण वह काला कलूटा दिखता था।
भुरा नहाकर अपने औकात से कहीं ज्यादा उस दिन सज धज कर अपने नाव के पास आकर श्रेया और सुरभि का बेसब्री से इंतज़ार करने लगता है। उस समय अभी सुबह के 7 ही बज रहे थे।
पिछले दिन के भांति ही उस दिन भी सुरभि श्रेया के साथ ठीक 8 बजे नदी किनारे आ जाती है।
दोनों की नजर जैसे ही भुरा पर पड़ती है, विस्मय से दोनों की आंखे फटी की फटी रह जाती है। वह उस दिन एकदम अलग ही रुप में दिख रहा था। सांवला, सलोना मुस्कुराता हुआ उसका चेहरा एकदम मुरली मनोहर कृष्ण के जैसा लग रहा था।
अपनी तारीफ सुनकर पहली बार भुरा उस दिन शर्माया था। शायद इसीलिए वह उस दिन नदी पार करते समय बहुत कम बोल था।
मगर श्रेया उस दिन जी भरकर भुरा से बात कर रही थी। उसके मन में जितना भी सवालों का अंबार लगा हुआ था सब उससे कुरेद कुरेदकर पुछ रही थी। भुरा भी सभी का जवाब जितना जानता था देते जा रहा था।
भुरा दोनों को उस दिन बराबर पहाड़ पर बने शिव मंदिर में लेकर जाता है। वहां सभी पहले पूजा करते हैं। भुरा भी पूजा करता है। मंदिर का पुजारी तो उसके जान पहचान का था ही उनसे वह श्रेया को भी मिलवाता है। श्रेया पुजारी से मंदिर के बारे में बहुत सारी बाते जानती है।
मंदिर देखने के बाद सभी उस दिन शाम तक आपस में बातें करते हुए सिर्फ पहाड़ पर ही इधर उधर घूमते रहते हैं। दोनों 3 दिन में ही भुरा से बहुत घुल मिल गए थे। खास करके श्रेया तो अब भुरा से जी भरकर बाते करने लगी थी।
रोज की भांति शाम के 4 बजते ही सुरभि श्रेया के साथ चली जाती है। उन दोनों का आज अंतिम दिन था। अब दोनों बराबर पहाड नहीं आने वाली थी।
भुरा को तो अभी भी सब कुछ दिवास्वपन जैसा ही लग रहा था। दोनों के जाते ही वह मन ही मन कुछ सोचता हुआ अपने गांव की ओर चल देता है। नदी से उसका गांव 2 किलोमीटर दूर था।
उधर श्रेया सुरभि के साथ वापस गया तो आ जाती है। मगर रात में जब वह सोने के लिए बेड पर आती है तो उसे भुरा का मासूम चेहरा, उसका भोलापन, उसके अंदर की मासूमियत, एवं उसके बोलने का निराला अंदाज उसे बार बार याद आ आ कर बेचैन करने लगता है। दिल्ली जैसे शहर में जहां वह रहती थी वहां तो आदमी दिखता कुछ था, और रहता कुछ और था। वह बोलता कुछ था, मगर उसके मन में रहता कुछ और था। एक ही इंसान के कई कई रंग रूप देखने को वहां मिलते थे। मगर भूरा जिसे अब वह मांझी कहने लगी थी, क्योंकि उसका पुरा नाम ही भुवन मांझी था, वहां के लोगों से एकदम विपरीत था। उसके मन में न छल, न कपट, न कोई द्वेष था। वह निस्वार्थ भाव से कोइ भी काम करता था। वह अंदर बाहर सब एक जैसा ही था।
सुबह जब श्रेया उठती है, तो वह कुछ सोचकर आज फिर अकेले ही भुरा से मिलने जाने का मन बना लेती है। वैसे भी उसे दिल्ली कल जाना था।
उधर चोखा बिगहा गांव में भुरा सुबह उठकर कल का चूहा पकड़ने का अपना अधूरा काम आज फिर से करने के लिए नदी किनारे के उस खेत की ओर चल देता है, जहां वह पिछले दिन शहरी मैडम के आ जाने के कारण छोड़ दिया था।
अभी सुबह के 9 बज रहे थे। भुरा चूहा के बिल में पुआल जलाकर धुंआ कर रहा था, ताकि चूहा अपने बिल से निकल कर बाहर आ सके।
ठीक तभी खुद कार चलाती हुई श्रेया अकेली ही नदी के पास आ जाती है। कार से उतरते ही उसकी नजर सामने के खेत में भुरा पर पड़ जाती है।
वह कार से उतरकर सीधे उस खेत की ओर ही चल देती है जहां भुरा अभी भी चूहा पकड़ने के जुगाड में लगा था।
उस दिन श्रेया भी भुरा के साथ चूहा पकड़ने लगती है। उसे भी इस काम में मन लगने लगा था।
अंत में भुरा चूहा को आग में पका कर उसमें नमक - मिर्च लगाकर उसे भी खाने को देता है। श्रेया भी बड़े मजे से खाती है। वह भी गया से ही खाने को अपने साथ कुछ लाई थी, उसे वह भुरा के साथ ही मिलकर खाती है।
उसके बाद वह भुरा को लेकर नाव पर आ जाती है। वह नाव पर बैठकर नदी में इधर उधर धूमते हुए बहुत सारी बाते उससे करना चाहती थी।
भुरा श्रेया के साथ नाव में सावर होकर नदी की पानी के शांत पटल पर विचरण करने लगता है।
उस दिन श्रेया शाम 5 बजे तक भुरा के साथ रहती है। फिर उससे विदा लेकर गया अपनी सहेली के घर कार में सवार होकर चली जाती है। वह जाते जाते पहली बार भुरा को उसके गंदे कपड़े में ही गले लगाती है।
भुरा को न जाने क्यों श्रेया का साथ अभी भी उसे जागते हुए आंखों का देखा हुआ सपना जैसा ही लग रहा था।
अगले ही दिन श्रेया गया से अपने घर दिल्ली आ जाती है। यहां वह आ तो जाती है, मगर जब भी वह अकेली होती है उसे न जाने क्यों भुरा की याद एवं उसकी बातें उसे सताने लगती है। उसका मन उससे दुबारा मिलने को आतुर हो जाता है।
समय बीतता रहता है। भुरा तो श्रेया के साथ बिताए पल को एक सपना समझकर अपने काम में व्यस्त हो जाता है।
मगर श्रेया को भुरा से मिलने की तड़प और बढ़ते ही जाती है। और ठीक एक महीने बाद वह फिर से दुबारा भुरा से मिलने के लिए गया अपनी सहेली के घर आ जाती है।
भुरा उस दिन गांव के ही एक खेत में कुदाल से मिट्टी खोदकर एक टोकरी में रख रहा था कि अचानक श्रेया वहां आ जाती है। श्रेया को सामने देख उसके आंखों को बरबस यकीन ही नहीं होता है।
श्रेया इस बार भुरा, उसकी भाभी एवं उसकी भतीजी के लिए अपने साथ दिल्ली से ही कपड़ा लेकर आई थी।
पहली बार भुरा श्रेया उर्फ " शहरी मेडम " को अपने साथ लेकर घर आता है।
पुरे गांव में जंगल के आग की तरह यह बात फैल जाती है। पुरा गांव श्रेया जैसी सुन्दर लड़की को देखने के लिए उमड़ पड़ता है।
भुरा की भाभी लालती अपने लिए नई साड़ी देखकर बहुत खुश होती है। उसने आज तक अपने जीवन में इतनी अच्छी साड़ी कभी नहीं देखी थी। भुरा की भतीजी रानी तो अपनी फैंसी ड्रेस देखकर खुशी से नाचने लगती है।
सभी से श्रेया को मिलाकर अंत में भुरा भी उसी का दिया हुआ नया शर्ट पैंट पहनकर बराबर पहाड़ की ओर चल देता है।
भुरा और श्रेया बाकि के पुरा दिन पहाड़ पर ही घूमते रहते हैं। उस दिन भुरा उसे बराबर पहाड़ पर बने पाताल गंगा को भी दिखाता है। जहां पानी कहां से गिरता था वह भी एक रहस्य ही है।
चार दिन भुरा के साथ श्रेया का कैसे बीत जाता है उसे पता ही नहीं चलता है। वह अपने डैडी से 4 दिन के लिए ही सुरभि से मिलने की झूठी बहाना बनाकर आई थी।
श्रेया भुरा से मिलकर फिर वापस दिल्ली आ जाती है।
भुरा पहले के भांति ही फिर से अपने गांव एवं अपने काम में व्यस्त हो जाता है।
उधर श्रेया को समझ में नहीं आ रही थी कि उसे भुरा से दुर होते ही उससे फिर से मिलने की ललक क्यों पैदा हो जा रही थी। भुरा से दुबारा मिलकर आए उसे अभी 10 दिन ही हुआ था कि उसका मन फिर से उससे मिलने को मचलने लगता है। और इस बार वह 20 दिन के बाद ही फिर से तीसरी बार भुरा से मिलने उसके गांव आ जाती है।
समय बिताता रहता है। श्रेया का भुरा से मिलने आने का सिलसिला जो एक बार शुरु होता है, वह अब बार बार होने लगता है। पिछले 6 महीने में वह 5 बार भुरा से मिलने उसके गांव आती है। उसे भुरा के साथ समय गुजारना बहुत अच्छा लगने लगा था।
उधर श्रेया के डैडी को उसके बार बार गया सहेली से मिलने आने को खटकने लगा था। उन्हें यह आभास तो हो जाता है कि श्रेया कुछ न कुछ छिपा रही थी। एक दिन वे सुरभि से फोन पर सच्चाई जानने के जब बात करते हैं तो पहले तो वह कुछ नहीं बताती है, मगर जोर देने पर वह श्रेया का बहाना बनाकर भुरा से बार बार मिलने आने वाली सारी बात बता देती है। उसे भी बार बार श्रेया का भुरा से मिलने आना अच्छा नहीं लगता था। आखिर वह नीच जाति का बहुत ही गरीब लड़का था।
श्रेया के डैडी जब सुरभि से सच्चाई जानते हैं तो सुनकर उनके पैर तले की जमीन खिसक जाती है। उनके अन्दर का पूंजीपति बाप गुस्सा के मारे दहल उठता है।
श्रेया के पिता उससे कुछ नहीं कहते हैं। वे अपनी बेटी के जिद्द को जानते थे। वे खुद ही इसका कुछ समाधान निकालने की मन मन उपाय सोचने लगते हैं।
इसी बीच श्रेया अपने पुरातत्व विभाग के एक प्रोजेक्ट वर्क के सिलसिले में 3 महीने के लिए नेपाल चली जाती है।
तीन महीने बाद जब श्रेया नेपाल से वापस दिल्ली लौटती है तो, उसके अगले ही दिन वह भुरा से मिलने उसके गांव आ जाती है।
भुरा के गांव में आकर उसे जो उसके बारे में जानकारी मिलती है उसे सुनकर उसके होश उड़ जाते हैं। भुरा 2 महीना पहले ही मर गया था। गांव के पास वाले नदी में ही भुरा की लाश मिली थी। वह अब इस दुनिया में नहीं था।
सुन श्रेया को गांव वालों के बातों पर जरा भी विश्वास नहीं होता है। आखिर उसके मांझी जैसा तैराक जिसे पानी की हर एक लहरों एवं धाराओं से प्यार था, वह पानी को करीब से एवं उसके बारे में विस्तार से जानता था। ऐसे में भुरा भला पानी में डूब कर कैसे मर सकता था !
श्रेया जब उसकी भाभी से मिलना चाहती है तो वह भी गांव में नहीं मिलती है। वह भुरा के मरते ही अपने पति के साथ सदा के लिए गांव छोड़कर बाहर चली गई थी।
श्रेया थके कदमों एवं बुझे मन से वापस दिल्ली जाने को अपने मांझी के गांव से लौट पड़ती है। उसके मांझी के अचानक यूं मर जाने के पीछे से उसे किसी षडयंत की बू साफ नजर आ रही थी।
बेचारा श्रेया का मांझी भुरा जिसने प्यार करने के उस गुनाह का सजा पाया था जिसके बारे में उसे पता भी नहीं था।
कुमार सरोज
लाजवाब कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत शुक्रिया
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