बिंदिया और बबलू / Bindiya Aur Babalu । कहानी । भाग - 01 । कुमार सरोज ।
बिंदिया और बबलू
कुमार सरोज
बिंदिया और बबलू का गांव आना
बिहार के जहानाबाद जिला में एक गांव है मंझार। यह गांव शहर से करीब 12 किलोमीटर दूर दरधा नदी के किनारे बसा हुआ है। नदी में सालों भर तो पानी नहीं रहता है, मगर बरसात के दिनों में नदी पानी से भर जाता है, जिसके कारण गांव वालों को किसी काम के लिए शहर आने जाने में काफी दिक्कत होती है। उन्हें नदी पार करने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता है।
प्रकृति की गोद में बसा यह छोटा सा गांव जो अभी भी बहुत सारे सरकारी सुविधाओं से तो वंचित है, मगर इसके बाबजूद यह गांव बहुत ही सुंदर है।
मंझार गांव में सभी जाति - धर्म के लोग रहते हैं। सभी में आपसी भाईचारा अभी भी कायम है। बिना ऊंच - नीच, जात - पात का भेदभाव किए यहां सभी लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं।
अभी यह गांव शहर के बनावटी आबोहवा से कोसो दूर था।
मंझार गांव में ही इस कहानी के नायक बबलू का भी घर था। मगर वह गांव में नहीं रहता था। वह बचपन से ही अपने माता - पिता के साथ पटना में रहता था। उसके पिता पटना सचिवालय में सरकारी नौकरी करते थे। वह सिर्फ़ अपने माता - पिता के साथ पर्व त्योहार में ही गांव आता था।
गांव में अभी भी बबलू के चाचा यानी उसके पिताजी के छोटे भाई मंगल सिंह रहते थे। दोनों का परिवार अब अलग तो हो गया था, मगर फिर भी मंगल ही बबलू के गांव वाले घर की देखभाल एवं उसकी खेती बाड़ी भी करते थे।
बबलू जब 10 साल का ही था तभी उसकी मां राजमणि मर गई थी। तभी से बबलू के लिए उसके पिता ही सब कुछ थे। बबलू को उसके पिता सहदेव सिंह अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करते थे। वह अपने पिता के आंखों का तारा था।
अपनी मां के मरने के बाद से ही बबलू अपने पिता के अंधे लाड़ प्यार का खूब फायदा उठाने लगा था। वह स्कूल जाने को घर से तो निकलता था, मगर कभी स्कूल नहीं जाता था। वह कभी सिनेमा देखने तो कभी इधर - उधर घुमते हुए मटरगस्ती करने में ही पुरा दिन गुजार देता था। उसे गप्पे हांकने एवं डींगे मारने में बहुत मजा आता था। यही उसका सबसे पसंदीदा काम था।
किसी तरह बबलू अपने पिता के आंखों में धूल झोंक कर स्कूल और उसके बाद कॉलेज की भी पढ़ाई खत्म कर लिया था। मगर वह कभी पढ़ा ही नहीं था, इसीलिए उसे अभी तक पहली कक्षा का किताब भी पढ़ने नहीं आता था। मगर उसके बात करने के निराले अंदाज एवं सिनेमा देख देखकर अपने आप को डींगे हाँकने में इतना एक्सपर्ट कर लिया था कि कोई आज तक उसके वास्तविकता को पकड़ ही नहीं पाया था। उसके पिता जी तो यही समझते थे कि वह अपने स्कूल और कॉलेज का सबसे तेज विद्यार्थी है। जबकि वह ठीक इसके विपरीत था। उसके पास स्कूल और कॉलेज का जो भी सर्टिफिकेट था, वह भी सभी नकली ही था।
बबलू जब भी गांव आता था तो उसके बात करने के तरीके एवं उसकी प्रतिभा को देखकर सभी बहुत प्रभावित होते थे। गांव वाले उसे अपने गांव का सबसे होनहार लड़का समझते थे। सभी यही उम्मीद लगाए हुए थे, कि वह एक न एक दिन अपने गांव का नाम रौशन जरूर करेगा। इसी कारण शायद गांव में सभी बबलू की बहुत इज्जत करते थे। बात - बात पर लोग बबलू की ही मिशाल देते थे।
बबलू अपने बात करने के अंदाज एवं डींगे हाँकने में जो महारथ हासिल किए हुए था, उसी के कारण वह पटना की ही एक पढ़ी लिखी तेज तर्रार एवं सुन्दर लड़की बिंदिया को अपने प्यार के जाल में फंसाकर उससे शादी भी कर लेता है। बिंदिया जैसी तेज तर्रार पढ़ी लिखी लड़की भी बबलू की सच्चाई को नहीं पहचान पाती है।
बबलू के शादी के कुछ ही दिन बाद अचानक एक दिन उसके पिता का हृदय गति रुक जाने से मृत्यु हो जाती है।
बबलू के पिता जी के मरते ही बिंदिया को अपने पति बबलू के अनपढ़ होने की सच्चाई का पता चल जाता है। मगर अब वह कर भी क्या सकती थी ! उसने तो अपने घर वालों से झगड़ा करके खुद ही बबलू से शादी की थी।
बिंदिया बबलू को ही नियती मानकर उसके साथ जिंदगी गुजारने को मन ही मन तैयार हो जाती है।
पिता के मरने के बाद अब बबलू पटना में रहना नहीं चाहता था, वैसे भी वह यहां रहकर अब क्या करता। इसीलिए वह अपने गांव में ही रहने की योजना बनाता है। वह गांव से ही अब कोइ रोजगार करना चाहता था। वैसे भी गांव में उसकी सभी बहुत इज्जत करते थे। वहां उसकी असलीयत भी कोई नहीं जानता था।
बिंदिया को भी बबलू का प्रस्ताव अच्छा लगता है। शहर में रहने पर उसके घर वालों को भी आज नहीं तो कल बबलू की सच्चाई का पता चल ही जाता, और गांव में तो कभी कोई आने वाला था ही नहीं।
उधर मंझार गांव में जैसे ही बबलू को अपनी पत्नी के साथ गांव आने की खबर मिलती है, तो सुन सभी खुशी के मारे फूले नहीं समाते हैं। सभी गांव वाले ढोल बाजे के साथ बबलू और उसकी पत्नी बिंदिया के स्वागत की तैयारी करने में सुनते ही जुट जाते हैं।
गांव में बबलू के चाचा मंगल का एक बेटा था महेश। वह बबलू से एक साल छोटा था। वह भी पांचवी कक्षा तक ही पढ़ा था। उसका रंग भी काला था। जिसके कारण वह अभी तक कुंवारा ही था। जबकि वह शादी के लिए बहुत उतावला था।
बबलू फोन करके महेश को ही गांव आने की बात बताता है।
महेश भी अपने भाई बबलू का पक्का भक्त था। उसके गांव आने की बात सुनते ही वह खुशी से पागल हो उठता है। वह तो अभी से ही अपनी शहरी भाभी बिंदिया को देखने के लिए बैचेन हो उठता है।
महेश ही बबलू के चार दिन बाद आने की खबर पुरे गांव में फैला दिया था।
चार दिन गांव वालों का कैसे बीत जाता है किसी को पता ही नहीं चलता है। जिधर देखो उधर गांव में बबलू और उसकी शहरी मेहरारू बिंदिया के ही चरचे होते रहते थे।
और वो दिन भी आ ही जाता है, जब बबलू अपनी पत्नी के साथ गांव आने वाला था।
महेश उस दिन सुबह से ही अपने पिता के साथ बबलू के बंद पड़े घर की सफाई करने में लग जाता है।
महेश की मां जानकी को अपने भतीजे बबलू का घर आना जरा भी अच्छा नहीं लग रहा था। वह अभी से ही मन ही मन जल भुन रही थी। बबलू के घर आ जाने से अब उसके खेत का अनाज उसे भी देना पड़ेगा, यही सोचकर जानकी चिंतित थी। अभी तक खेत का सारा अनाज वह खुद ही रखते आ रही थी।
उधर दोनों बाप बेटा बबलू के गांव आने से बहुत खुश थे।
" पिता जी, जल्दी जल्दी घर साफ कीजिए न, आज हमें नहाना भी है। शहर वाली भाभी पहली बार गांव आ रही हैं। "
महेश बबलू के घर की सफाई करते हुए अपने पिता से बोला।
बबलू और महेश के घर के बीच में सिर्फ एक दीवार का फांसला था। एक ही घर को बंटवारा के बाद दो हिस्से में कर दिया गया था। जिसमें से आधा भाग बबलू के हिस्से में था तो दुसरा आधा भाग महेश के हिस्से में मिला था।
" मैं जल्दी जल्दी तो कर ही रहा हूं, तुम भी अपना हाथ तेजी से चलाओ। तुम्हारी मां मदद कर देती तो घर की सफाई कब की हो गई होती। मगर मुंह बनाकार पता नहीं क्यों बैठी है। "
महेश के पिता मंगल पास में ही बैठी अपनी पत्नी जानकी की ओर देखते हुए धीरे से महेश से बोले।
" पिताजी आप उसकी बहू ही नहीं ला रहे हैं तो वो बेचारी क्या करेगी। उदास तो रहेगी ही। आप जल्दी से उसकी भी बहू ला दीजिए। "
" अबे पागल, मैं तो तुम्हारे लिए लड़की खोजते खोजते थक गया हूं। कोई तुम्हारी सूरत देखकर शादी करने के लिए तैयार ही नहीं होता है तो मैं क्या करूं। तुम पढ़ा लिखा भी तो बहुत कम ही हो। "
" तो इसमें मेरा का कसूर है। हम बेटा तो आप दोनों का ही है। देखिए बबलू भईया शहरी मेडम से शादी किए हैं। "
दोनों बाप बेटे की बक बक जब जानकी से सुनी नहीं जाती है तो वह मुंह बिचकाकर बोल पड़ती है -
" ज्यादा शहरी भाभी, शहरी भाभी मत करो। शहरी लईकी कैसी होती हैं हमको सब पता है। "
जानकी की बात सुनते ही दोनों बाप बेटे चुप होकर जल्दी जल्दी घर की सफाई करने लगते हैं।
अभी सुबह के 9 बज रहे थे। बबलू अपनी पत्नी बिंदिया के साथ गांव के नदी के उस पार दोपहर 2 बजे आने वाला था। शहर से गाड़ी वही तक आती थी।
गांव वाले नदी के पास से ही दोनों को ढोल बाजे के साथ नाचते गाते हुए गांव में प्रवेश करवाने की पुरी तैयारी कर चुके थे।
क्रमशः आगे .......
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नोट - जिस बबलू को गांव वाले बहुत पढ़ा लिखा होनहार समझ रहे थे, वह वास्तव में तो पढ़ा लिखा था ही नहीं .....
अब आगे क्या होगा
क्या गांव वाले बबलू की सच्चाई को जान पाएंगे ?
भेद खुल जाने के बाद बबलू का क्या होगा ?
क्या बिंदिया अपने अलबेले पति बबलू की इज्जत को बचा पाएगी ?
बिंदिया और बबलू के हास्य और रोमांस की रोचक कहानी पढ़ते रहिए आगे के भागो में।
कुमार सरोज
लाजवाब कहानी, इंतजार रहेगा
जवाब देंहटाएंजी जरुर
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