पक्का भक्त / Pakka Bhakt ।। कहानी ।। कुमार सरोज ।।
पक्का भक्त
कुमार सरोज
भगवान गौतम बुद्ध की नगरी गया से कुछ ही दुरी पर बसा है एक छोटा सा गांव बथानी। इस गांव में अधिकांश गरीब परिवार ही रहते हैं।
बथानी गांव में ही रहता है हरखू। हरखू एक गरीब किसान मजदूर है। उसके परिवार में उसका इकलौता बेटा सुनील और पत्नी रामकली थी। बहुत ही छोटा परिवार था हरखू का।
हरखू बड़े किसानों से खेती बटाई में लेकर उस पर खेती करता था। किसी तरह दिन रात खेतों में काम करके अपना और अपने छोटे से परिवार का भरण पोषण कर रहा था।
हरखू अपने बेटा सुनील को अपने जैसा किसान मजदूर नहीं बनाना चाहता था। उसका बहुत अरमान था कि उसका बेटा पढ़ लिख कर नौकरी करे एवं अपने परिवार का नाम रौशन करे।
मगर बेटा एकदम अपने बाप के सोच का विपरीत था। वह पढ़ाई लिखाई कम और अपने दोस्तों के साथ सिनेमा देखने एवं ताश खेलने में ज्यादा रहता था।
पहले हरखू या उसकी पत्नी अपने बेटे के आवारागर्दी पर उसे डांटते भी थे। मगर अब जब वह बड़ा हो गया था, और बदलते समय को देखते हुए यह सोचकर की कहीं डांटने पर वह घर छोड़कर न भाग जाए दोनों मन मारकर सिर्फ उसके कारनामों को देखते हुए सब कुछ नजरंदाज कर रहे थे। दोनों अपने इकलौते बेटे से संजोए अरमानों का खून होते बस अब चुपचाप देख रहे थे।
हरखू था भले गरीब किसान मजदूर मगर वह राजनीति का प्रोफेसर था। वह देश की हर छोटी बड़ी राजनीति ख़बर का ज्ञान रखता था। राजनीति में उसकी रुचि बहुत थी। गांव के लोग भी उसकी राजनीति समझ एवं जानकारी की दाद देते थे।
हरखू देश के सबसे बड़े राष्टीय पार्टी के एक बड़े नेता महेन्द का बहुत बड़ा भक्त था। गांव के लोग उसे उसके प्रिय नेता के नाम पर ही बुलाते थे। उसे भी बहुत अच्छा लगता था।
हरखू अपने मिट्टी के घर के सभी दीवारों पर अपने प्रिय नेता का फोटो चिपकाए हुए था। वह भगवान की तरह उनको मानता एवं पूजता था। वह उनके बारे में कोई खबर या भाषण सुनने के लिए हमेशा अपनी शादी में मिला रेडियो जो अब बहुत पुराना हो गया था, मगर उसे नई नवेली दुल्हन की तरह सजाकर अपने साथ ही रखता था।
खेती और अपने प्रिय नेता का गुणगान करना एवं सुनना ही उसका सबसे प्रिय और मनपसंद काम था।
हरखू से विपरीत उसका बेटा सुनील राजनीति से कोसो दूर था। दोनों बाप बेटे का शौक एकदम अलग था। बाप को राजनीति का तो बेटा को फिल्म देखने का नशा था।
एक दिन की बात है। रोज की भांति हरखू उस रात को भी खाना खाने के बाद खाट पर लेटा रेडियो के विविध भारती चैनल पर समाचार सुन रहा था कि तभी एक समाचार सुनकर वह खुशी से पागल हो उठता है।
बिहार में विधान सभा का चुनाव कुछ ही महीने बाद होने वाला था। इसीलिए उसके प्रिय नेताजी का गया के गांधी मैदान में एक विशाल जन सभा ठीक दस दिन बाद ही होने वाला था।
हरखू अभी तक सिर्फ एक बार ही वह भी चार साल पहले सामने से अपने प्रिय नेता को देखा था, और उनकी ओजस्वी भाषण को भी सुना था। तभी से तो वह अपने प्रिय नेता का और पक्का भक्त हो गया था।
अब वह दुसरी बार अपने प्रिय नेता को देखने के लिए अभी से ही लालायित हो उठता है।
हरखू खुशी के मारे उस रात ठीक से सो नहीं पाता है। सुबह उठकर वह सबसे पहले पुरे गांव में यह समाचार सबको सुनाता है, एवं सभी को भाषण सुनने के लिए उस दिन गया के गांधी मैदान में चलने को भी कहता है।
हरखू उसी दिन दोपहर में बाजार जाकर अपने प्रिय नेता के पार्टी का झंडा बनाने के लिए कपड़ा खरीदकर दर्जी को दे देता है। अपने इकलौते कुर्ता पायजामा को भी घोबी से स्त्री करवा कर रख लेता है।
जिस दिन से वह अपने प्रिय नेता के गया में भाषण का कार्यक्रम के बारे में सुना था, उस दिन से ही उसका खुशी के मारे पैर जमीन पर नहीं पड़ रहा था। वह खेत का बचा हुआ सारा काम समय से पहले ही पुरा कर लेता है, ताकि भाषण वाले दिन पत्नी से किसी तरह का ताना नहीं सुनना पड़े।
देखते ही देखते हरखू के लिए उसका वह ऐतिहासिक दिन भी आ जाता है, जब गया के गांधी मैदान में उसके प्रिय नेता का भाषण होने वाला होता है। उस दिन वह सुबह में ही अपने गांव के 10 - 15 लोगों के साथ हाथ में पार्टी का झंडा लिए पैदल ही गया की ओर चल पड़ता है। उमंग और उत्साह उसके अंदर इतना था कि वह 45 साल के उम्र में भी 15 साल के लड़कों जैसी फुर्ती दिखा रहा था।
दोपहर के 12 बजते बजते हरखू अपने गांव वालों के साथ गया के गांधी मैदान में बने सभा स्थल के पास पहुंच जाता है। उस समय तक वहां काफी भीड़ जमा हो गई थी। लोग ढोल बजाकर एवं नाच गाकर अपने खुशी का इजहार कर रहे थे।
चुनाव नजदीक रहने के कारण स्थानीय नेता अपने आप को टिकट का प्रबल दावेदार दिखाने के लिए भाड़े पर भारी भीड़ जुटाए हुए थे।
हरखू जैसे बहुत कम ही पक्के भक्त थे, जो अपने प्रिय नेता के भाषण सुनने के लिए अपना पैसा खर्च करके खुद आया था एवं अपने गांव वालों को भी अपने खर्च पर साथ में लाया था।
हरखू गांधी मैदान पहुंचते ही अपने प्रिय नेता को नजदीक से देखने की दिल में मंशा लिए भीड़ को किसी तरह चीरता हुआ स्टेज की ओर चल देता है।
जबकि उसके साथ आए गांव वाले भाषण सुनने के लिए नहीं बल्कि गया घूमने की मन में लालसा लिए ही घर से आए थे। इसीलिए हरखू को भीड़ में घुसते देख सभी वहां से चुपके विष्णुपद मंदिर एवं गौतम बुद्ध के मंदिर को देखने के लिए चल पड़ते हैं।
इधर नियत समय पर ठीक दोपहर के 1 बजे हरखू के प्रिय नेता का सामने बने विशाल स्टेज पर आगमन होता है। पुरा आसमान नारों एवं नेताजी की जय जयकारी से गूंजने लगता है।
हरखू हाथ में पार्टी का झंडा लिए एवं माथे पर भी एक झंडा बांधे अपने प्रिय नेता को देखते ही बच्चो के जैसा नाचने लगता है। छोटे बच्चे अपना मनपंसद खिलौना पाकर जैसे खुशी से तालियां बजाते हुए नाचने लगता है, ठीक वैसे ही हरखू भी अपने प्रिय नेता को देखकर खुशी से नाच रहा था।
हरखू के प्रिय नेता जी को अभी भाषण शुरु किए कुछ ही देर होता है कि अचानक भीड़ में एक जोरदार धमाका होता है। धमाके से पुरे मैदान में अफरा तफरी मच जाती है। लोग अभी यह जानने की कोशिश ही कर रहे थे कि धमाका किधर हुआ, कि तभी एक के बाद एक लगातार 7 - 8 धमाकों से पुरा गांधी मैदान दहल उठता है। लोग जान बचाने के लिए इधर उधर भागने लगते हैं।
पुलिस प्रशासन में हड़कंप मच जाता है। आखिर इतनी पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद भी बम बलास्ट कैसे हो गया था, वह भी देश के इतने बड़े नेता के सभा में जिन्हें जनता अपना भावी प्रधानमंत्री मानती थी ?
किसी तरह पुलिस हरखू के प्रिय नेता को सुरक्षित वहां से निकालने में सफल हो जाती है।
ऊपर वाले का शुक्र था कि सभी बम कम शक्तिशाली थे। फिर भी बम ब्लास्ट एवं उससे मची भगदड़ में 7 लोग मारे गए थे, एवं 50 से अधिक लोग घायल हुए थे। घायलों में से कुछ की हालत ज्यादा गंभीर थी।
बेचारा हरखू भी बम ब्लास्ट में घायल हो गया था। उसकी हालत अभी बहुत गंभीर थी।
घायलों को गया के ही सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया जाता है। जिसके पास पैसा था वे निजी अस्पताल में भी अपना इलाज करवाने के लिए चले जाते हैं।
हरखू सरकारी अस्पताल में ही टूटे हुए लोहे के एक बेड पर पड़ा अपनी जिंदगी और मौत का जंग लड़ रहा था। सरकारी अस्पताल में मुश्किल से अभी 10 - 12 लोग ही बचे रह गए थे। ये सभी वैसे ही लोग थे जिनके पास शायद पैसा नहीं था। इन सबों में सबसे ज्यादा हरखू की ही हालत खराब थी।
उधर बथानी गांव में जिसके घर में टेलीविजन था वे लोग भी भाषण का लाइव प्रसारण देख रहे थे। तभी अचानक भाषण को बंद करके बम ब्लास्ट का समाचार दिखाया जाने लगता है।
घायलों में हरखू को भी देखते ही यह बात जंगल के आग की तरह तुरंत पुरे गांव में फैल जाती है।
हरखू का बेटा सुनील भी उस समय खलिहान में बैठा ताश खेल रहा था। उसे जैसे ही अपने पिता के बारे में पता चलता है, वह उसी अवस्था में गया शहर की ओर बदहवास दौड़ पड़ता है। सुनील को अपने पिता से भले वैचारिक मतभेद था, मगर वह अपने पिता को बहुत चाहता था।
हरखू की पत्नी रामकली जब अपने पति के घायल होने की समाचार सुनती है तो वह भी अपने बेटे के पीछे ही रोती बिलखती दौड़ पड़ती है।
बिहार में चुनाव तो नजदीक था ही इसीलिए बम ब्लास्ट के तुरंत बाद ही जनता को अपनी ओर लुभाने एवं आकर्षित करने का खेला शुरू हो जाता है। पक्ष - विपक्ष के नेता मृतक के परिवारों को एवं घायलों को मुआवजा देने का ऐलान पर ऐलान करने लगते हैं।
हरखू के प्रिय नेता जिस पार्टी के थे, उस पार्टी के नेता भी घायलों को 25 - 25 हजार रुपए एवं इलाज का पुरा खर्चा, तो मृतक के परिवार को एक - एक लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा करते हैं। सभी पार्टी के नेता इस घटना का राजनीति फायदा उठाने में लग जाते हैं।
इधर सुनील और उसकी मां जब गया के सरकारी अस्पताल में पहुंचते है तो उस समय तक हरखू को थोड़ा थोड़ा होश आ जाता है। मगर वह ठीक से बोल नहीं पा रहा था। उसके शरीर पर जख्म के निशान भरे पड़े थे। उसके शरीर का आधा से ज्यादा हिस्सा पुरी तरह से ब्लास्ट में जल गया था।
सुनील मां के साथ जैसे ही अपने घायल पिता के पास पहुंचता है, कि पास खडी नर्स उसे तुरंत बाजार से दवा लाने के लिए डॉक्टर का लिखा हुआ एक पुर्जा थमा देती है। पर्ची में लिखा हुआ दवा अस्पताल में अभी नहीं था, और हरखू के लिए वो सभी दवाईयां बहुत जरूरी थी।
दोनों में से किसी के पास पैसा तो था ही नहीं। दोनों मां बेटा तो जल्दबाजी में घर से यूं ही खाली हाथ ही दौड़े आ गए थे। वैसे भी घर में पैसा था भी कहां ? थोड़ा बहुत पैसा था भी तो उसे हरखू ही रैली में अपने प्रिय नेता के भाषण सुनने के नाम पर खर्च ही कर दिया था।
ठीक तभी वहां सत्ता पक्ष के एक नेताजी आ जाते हैं। सुनील मौका का फायदा उठाते हुए उन्हीं से दवा दिलवाने की बात करता है।
मगर नेताजी उलटे उसे ही यह सलाह दे डालते हैं -
" तुम अभी दवा बाहर से खरीद लो, और दुकानदार से पैसे का पर्ची बनवा लेना। बाद में मुआवजा के साथ सभी पैसा जोड़कर मिल जायेगा। "
सुनील चुपचाप बिना कुछ बोले वहां से हाथ में दवा का पर्ची लिए बाहर की ओर चल देता है। वह गले में चांदी का बना हनुमान जी का एक लॉकेट पहने हुए था, उसे ही बेच कर दवा खरीदने का मन बना लेता है
नेताजी हरखू और दूसरे घायल लोगों के साथ अपना फोटो खिंचवाने में व्यस्त हो जाते हैं।
रामकली अपने पति के हालत को देखकर बहुत बेचैन थी। वह बार बार सिर्फ भगवान को याद कर रही थी। और भला उसके जैसी गरीब पत्नी कर भी क्या सकती थी !
अखबार, टेलीविजन और रेडियो पर बम ब्लास्ट में घायल एवं मरे हुए लोगों के लिए पक्ष विपक्ष के नेता वादे पर वादे करते जा रहे थे। मगर ये सब सिर्फ जनता को सुनाने के लिए ही वादे हो रहे थे। नहीं तो हकीकत में हरखू जैसे गरीब आदमी को भी दवा बाजार से खरीदना पड़ रहा था।
ऐसे मौकों पर नेता सिर्फ जनता को बेवकूफ भी बनाते हैं। क्योंकि उन्हें पता रहता है कि मेरे द्वारा किए जा रहे वादा पुरा हो रहा है या नहीं, यह देखने वाला कोई नहीं होता है, और न ही कोई देखने आने वाला ही है।
अपने पिता के इलाज के लिए सुनील को अपनी आमदनी की एक मात्र माध्यम भैंस तक भी बेचनी पड़ती है। इसके अलावा उसके पास और कोई चारा भी नहीं था।
अभी तक हरखू में कोई विशेष सुधार नहीं हो रहा था। डॉक्टर सिर्फ आश्वासन दे रहे थे।
सुनील को भी अब अपने पिता का इलाज गया के ही किसी बड़े निजी अस्पताल में करवाने का मन करने लगा था, मगर उसके पास इतना पैसा नहीं था। उसके पास अपना खेत भी तो नहीं था कि उसे बेच कर अपने पिता का इलाज करवा सकता था। इसीलिए मन मारकर भगवान भरोसे वह उस सरकारी अस्पताल में अपने पिता का इलाज करवाने को मजबूर था।
रामकली का तो और बुरा हाल था। वह दिन रात अपने पति के बेड के पास ही बैठी रहती थी। खाना, पीना, सोना सब भूल गई थी वह।
भगवान भी हमेशा गरीबों की ही परीक्षा लेता है, और उसे ही ज्यादा दुःख भी देता है।
बेचारा अपने नेताजी का पक्का भक्त हरखू तीसरे ही दिन सरकारी अस्पताल के लचर व्यवस्था और नेताओं के झूठे आश्वासन का शिकार होकर मर जाता है। मरते वक्त भी उसके चेहरे पर कोई सिकन नहीं थी। शायद वह अपने प्रिय नेता के सामने उन्हीं की रैली में अपनी कुर्बानी दिया था, और उसके प्रिय नेता अभी भी जिंदा थे इसीलिए।
चीख चीख कर मुआवजा का ऐलान करने वाले नेताओं में से कोई एक नेता मरने के बाद भी हरखू को देखने नहीं आता है। आखिर हरखू जैसे गरीब पार्टी कार्यकर्ता से मिलकर किसी नेता को मिलता भी क्या ?
हद तो तब और होती है, जब हरखू के मृत शरीर को ले जाने के लिए अस्पताल प्रशासन एक एंबुलेंस तक भी मुहैया नहीं करवाती है।
किसी तरह सुनील अपनी मां के सहयोग से अपने पिता के लाश को कांधे पर रख कर घर ले आता है। उसके पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं बची थी कि वह कोई गाड़ी अपने पिता के लाश को ले जाने के लिए रिजर्व करता।
सुनील किसी प्रकार अपनी पिता का दाह संस्कार और उसके बाद श्राद्ध कर्म कर पाता है। अचानक सुनील के कंधे पर अब घर का बोझ आन पड़ा था। उसने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे अभी ही ऐसा दिन देखना पड़ जाएगा।
सुनील को गांव के ही यमुना चाचा बताते हैं कि बम ब्लास्ट में घायलों एवं मरे हुए लोगों को सरकार मुआवजा दे रही है। तो सुनील भी मुआवजा राशि के लिए अगले ही दिन ब्लॉक में जाकर बीडीओ साहब से मिलता है।
बीडीओ साहब सुनील को बताते हैं कि पैसा तो आया है, मगर उसके पिता के घायल होने का मुआवजा राशि है। जबकि अब उसके पिता मर गए हैं तो मुआवजा उसे अब घायल वाला नहीं मिलेगा।
बीडीओ साहब की बात सुनकर सुनील उदास हो जाता है। मगर फिर जब बीडीओ साहब उसे बताते हैं कि वह अपने पिता के मृत प्रमाण पत्र के साथ एक आवेदन लिख कर दे देगा कि उसके पिता जी अब मर गए हैं तो घायल से नाम हटकर मृतक की सूची में चढ़ जाएगा, और फिर मृतक वाला मुआवाजा एक लाख रुपए उसे मिल जाएगा।
बीडीओ साहब की पुरी बात सुनकर सुनील के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव खिल उठता है।
सुनील बीडीओ साहब के ऑफिस से जैसे ही बाहर निकलता है कि पीछे से बीडीओ साहब का चपरासी दीना उसके पास आ जाता है।
दीना सुनील को बताता है कि आवेदन यहां से दिल्ली जायेगा, वहीं से घायल से मृतक की सूची में नाम जुड़ेगा। इसमें बहुत समय भी लगेगा, और कोई जरूरी भी नहीं है कि उसका काम भी हो ही जायेगा। इसीलिए जल्दी और गारंटी के साथ काम करवाने के लिए उसे तीस हजार रूपए देना होगा।
सुनकर सुनील सोच में पड़ जाता है। उसके पास तीस हजार तो दूर तीस रूपया भी नहीं था। वह उदास चुपचाप घर आ जाता है।
सुनील जब अपने यमुना चाचा को बीडीओ साहब के चपरासी वाला बात बताता है तो वे पैसा देने से साफ मना कर देते हैं। उसके चाचा ही उसे सलाह देते हैं कि वह अपने पिता के जान पहचान के नेता भुवन प्रसाद जो अभी सरकार में मंत्री भी हैं से जाकर मिले, वो उसका यह काम जरुर करवा देंगे। वैसे भी हरखू मंत्री जी के पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता का पक्का भक्त था।
सुनील को भी अपने चाचा की बात सही लगती है। वह अगले ही दिन अपने एक दोस्त से पैसा उधार में लेकर मंत्री भुवन प्रसाद से मिलने पटना चल देता है।
पटना मंत्री जी के आवास पर आकार सुनील उन्हें सारी बात बताता है। सुन मंत्री जी उसे हर संभव मदद करने का आश्वासन देते हैं। वे सुनील से आवेदन भी ले लेते हैं।
सुनील खुशी पूर्वक मंत्री जी से विदा लेकर जैसे ही उनके कमरे से बाहर निकलता है कि पीछे से उनका पीए महेश उसके पास आ जाता है।
महेश सुनील को बताता है कि अगर काम पक्का और जल्दी करवाना है तो उसे कम से कम पच्चीस हजार रूपए पहले देना होगा। क्योंकि उसका आवेदन अलग से दिल्ली जायेगा, और ऑफिस में दौड़ धूप करके उसका काम करवाना होगा। तब मुआवजा राशि एक लाख उसे जल्दी से मिल जायेगा। नहीं तो डाक से उसका आवेदन भेजने पर रास्ता में ही कहीं दबकर रह जायेगा।
महेश की बात सुनते ही सुनील की खुशी तुरंत उदासी में बदल जाती है। उसके पास पैसा था कहां कि वह पच्चीस हजार रुपए देता।
सुनील वहां से भी उदास बुझे मन अपने गांव की ओर चल देता है।
सुनील घर आकर अपनी मां को मंत्री जी के यहां हुई सारी बात बताता है। अब शायद पच्चीस हजार रूपए देने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था। अब उसके सामने सिर्फ दो ही विकल्प थे, मुआवजा की राशि के लिए वह या तो पच्चीस हजार रूपए व्यवस्था करके कहीं से मंत्री जी को देता, या फिर मुआवजा की राशि को अब भूल जाने के अलावा कोई और चारा नहीं था।
रात भर दोनों मां बेटा मुआवजा राशि के उधेड़बुन में ही जगे रह जाते हैं। कोई ठीक से सो नहीं पाता है।
अपने जिस प्रिय नेता के भाषण को सुनने के चक्कर में हरखू मरा था, उसी प्रिय नेताजी के पार्टी के लोग आज उसकी बेबसी और लाचारी का सौदा करने को तत्पर थे।
सुबह रामकली अपने बेटा सुनील को बताती है कि वह अपनी चांदी के गहने को बेच कर मुआवजा के लिए उसे पैसा देगी। वैसे भी गहना का अब उसे क्या काम था। उसका सबसे खास गहना उसकी सिंदूर तो अब मिट ही गया था।
सुनील अपनी मां के चांदी के पुराने गहनों को बेच देता है। मगर उससे उसे मात्र बीस हजार रूपए ही मिलते हैं। बाकि के 5 हजार रुपए गांव के ही एक आदमी से सूद पर लेकर वह पुरे 25 हजार रूपए मंत्री भुवन प्रसाद के पीए महेश को जाकर दे देता है।
सुनील मुआवजा राशि के लिए पैसा जिस दिन देता है, उसके ठीक तीसरे ही दिन विधान सभा चुनाव के तिथि की घोषणा हो जाती है।
चुनाव के तिथि की घोषणा होते ही मंत्री जी भी अपने चुनाव में व्यस्त हो जाते हैं।
नियत समय पर चुनाव होता है। संयोग से भुवन प्रसाद और उनकी पार्टी चुनाव हार जाती है। बिहार में दुसरी पार्टी की सरकार बन जाती है।
इधर सुनील को पैसा दिए 4 महीना से भी अधिक हो जाता है। एक दिन वह कुछ सोचकर मुआवजा राशि के बारे में पता लगाने मंत्री जी के पीए महेश से मिलने पटना जाता है।
पटना पहुंचकर सुनील जब महेश से मिलता है तो उसकी बात सुनकर उसके पैर तले की जमीन खिसक जाती है। चूंकि मंत्री जी और उनकी पार्टी चुनाव हार गई थी, इसीलिए अब उनसे सुनील का काम नहीं हो सकता था।
जब सुनील अपना पैसा मांगता है तो उल्टे महेश उसी से और 25 हजार मांगने लगता है, ताकि नए मंत्रीजी से अब दुबारा नए सिरे से बात करके उसका काम करवा सके।
बेचारा सुनील अपना माथा पकड़कर चुपचाप घर आ जाता है।
सुनील इतना तो समझ गया था कि उसके जैसे गरीब लोगों की यहां अब कोई मदद करने वाला या उसकी बात सुनने वाला नहीं था। यहां सभी सिर्फ गरीबों से या गरीबों के पैसे लुटने के लिए बैठे थे। तभी तो आज गरीब दिन प्रति दिन और गरीब होता जा रहा था, और अमीर तेजी से और अमीर ही होता जा रहा था।
सुनील मन ही मन यह ठान यह ठान लेता है कि वह अपने पिता के जैसा कभी किसी पार्टी या राजनेता का पक्का भक्त नहीं बनेगा।
कुमार सरोज
आज के नेताओं की हकीकत बयां करती कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
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