पगला कहीं का / Pagala Kahin Ka ।। कहानी ।। कुमार सरोज ।।
पगला कहीं का
कुमार सरोज
विनय एक पढ़ा लिखा बेरोजगार युवक था। वह स्वभाव से तो बहुत शांत था, मगर खुद्दारी एवं स्वाभिमान उसमें कूट कूट कर भरा हुआ था। उसके गरीब किसान माता पिता ने किसी तरह खुद आधा पेट खाना खाकर उसे कॉलेज तक अपनी हैसियत से कहीं ज्यादा पढ़ाया लिखाया था, ताकि उसे कोई सरकारी नौकरी मिल जाए, और उसकी जिन्दगी अच्छे से कट जाए।
मगर सरकार की उदासीनता एवं बेरुखी के कारण उसे ना ही सरकारी नौकरी मिलती है, और ना ही कोई ढंग का रोजगार ही मिल पाता है।
थक हार कर विनय घर चलाने के लिए अपने जिला शहर अरवल में ही एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने लगता है। साथ ही साथ वह घर जा - जाकर बच्चों को टयूशन भी पढ़ाने लगता है।
किसी तरह उसका एवं उसके परिवार का गुजर बसर होने लगता है।
विनय अपने मां बाप का इकलौता बेटा था। इसीलिए स्नातक पास करते ही उसके माता पिता ने उसकी शादी अपने दूर के ही एक रिश्तेदार की बेटी लालती से करवा दिए थे।
विनय और उसकी पत्नी लालती का विचार एक जैसे थे, जिसके कारण दोनों में खूब जमती थी। गरीबी के बाबजूद भी दोनों को किसी से कोई शिकवा शिकायत नहीं था।
नौकरी नहीं मिलने के बाद विनय स्कूल और टयूशन पढ़ाकर किसी तरह अपने परिवार का गुजारा कर ही रहा था कि तभी कोरोना के कहर ने सब कुछ तबाह कर दिया। पुरे देश में कोरोना के कारण लॉकडाउन लग गया था। विनय का स्कूल एवं ट्यूशन भी बंद हो गया। आय का एक मात्र स्रोत विनय का यही था।
सारा काम बंद हो जाने के कारण विनय और उसके परिवार को खाने तक की आफत आन पड़ी।
किसी तरह आधा पेट खाकर लॉकडाउन के बुरे दिन विनय ने काटा।
लॉकडाउन खत्म होने के बाद भी सरकार ने स्कूल एवं कोचिंग को बंद ही रखने का आदेश दिया था। इसीलिए विनय दूसरे काम की तलाश में पटना आ जाता है।
विनय पटना तो आ जाता है, मगर यहां भी उसे कोई ढंग का काम नहीं मिल रहा था।
मजबूरी और पेट की भूख इंसान से क्या नहीं करवा देता है। जब विनय को कोई काम नहीं मिलता है तो वह थक हार कर अपने सीने पर पत्थर रखकर भाड़े पर एक ठेला लेकर सड़क किनारे फल बेचने लगता है।
स्नातक प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण बेचारा विनय जिंदा रहने के लिए ठेला पर फल बेचने के अलावा अब और कर भी क्या सकता था ! उसके पास जिंदा रहने के लिए इसके अलावा कोई और चारा भी तो नहीं था।
बिहार में इसी साल विधान सभा का चुनाव भी होने वाला था। सभी पार्टी के नेता अपना वोट बैंक बनाने में अभी से जी जान से लगे हुए थे।
एक दिन की बात है। विनय रोज की तरह उस दिन भी पटना के बेली रोड के किनारे चिड़िया खाना के पास अपने ठेला पर फल बेच ही रहा था कि तभी राज्य के एक कद्दावर नेता भुवन प्रसाद जो की अभी सरकार में मंत्री भी थे के गाड़ियों का काफिला वहां से गुजरने लगता है।
अचानक विनय के ठेला के पास नेता जी की गाड़ी रुक जाती है। नेता जी की गाड़ी रुकते ही पुरा काफिला भी रुक जाता है।
आज नेता जी को एक गरीब ठेला वाले युवक से फल खरीदने का मन हुआ था।
वाहवाही एवं झूठी लोकप्रियता हासिल करने के लिए भुवन प्रसाद जैसा रईस नेता विनय के ठेला के पास अपनी गाड़ी से उतरकर फल खरीदने के लिए आ जाते हैं। साथ में नेता जी के कुछ खास लोग भी ठेला के पास आ जाते हैं।
आस पास के लोग एवं आते जाते राहगीर भी नेता जी के इस दयालू एवं उदार चरित्र को देखने के लिए जमा हो जाते हैं।
" सेब मीठा है न ? "
नेता जी आस पास खड़े लोगों की ओर मुंह करके हाथ जोड़े मुस्कुराकर विनय से बोले।
" मंत्री जी आप बेफिक्र होकर सेब ले जाइए। सेब बहुत मीठा है। "
विनय सेब दिखाते हुए धीरे से बोला।
" मीठा नहीं होगा तो हमारा आदमी तुम्हारा सारा सेब नाली में फेंक देगा। "
" मंत्री जी आप खाकर यही देख लीजिए। "
कहते हुए विनय एक सेब काट कर चखने के लिए भुवन प्रसाद को देने लगता है।
मगर नेता जी को एक गरीब ठेला वाले को अपने गंदे हाथ से सेब काटकर खाने को देना नागवार लगता है। खुद तो हाई स्कूल भी पास नहीं थे फिर भी विनय को आसपास खड़े लोगों को देखते हुए धीरे से अंग्रजी
के प्रचलित गाली देने लगते हैं। जब अंग्रेजी में गाली से जी नहीं भरता है तो वे विनय को उसकी मां बहन लगा कर भी गाली दे डालते हैं।
गाली सुनकर बेचारा गरीब विनय का स्वाभिमान जाग उठता है। वह बेरोजगार और गरीब भले था, मगर जाहिल या निक्कमा नहीं था। वह बिना कुछ सोचे समझे मंत्री जी को अंग्रजी में ही जी भर कर खरी खोटी सुना देता है।
एक ठेला वाला सड़क छाप गरीब जाहिल आदमी ऐसा अंग्रजी बोलेगा मंत्री जी तो कभी सपने में भी नहीं सोचे थे।
उन्हें विनय का कहा एक भी शब्द समझ में तो नहीं आ रहा था, मगर उन्हें इतना तो पता चल गया था कि यह कुछ ठीक नहीं बोल रहा है। इसीलिए वे झट वहां से गुस्से में बिना सेब लिए ही अपने सरकारी आवास की ओर चल देते हैं।
भले नेता जी को विनय की कही बात समझ में नहीं आई थी, मगर नेता जी के साथ चल रहा उनका खास आदमी दयाल पुरी बात समझ गया था। वह भी जाते जाते गुस्से में विनय को ही धुर रहा था।
नेता जी के जाते ही वहां पर खड़े लोग विनय की खूब तारीफ करने लगते हैं।
यह देश का कैसा दुर्भाग्य था, जहां पढ़े लिखे लोग आज ठेला पर फल और सब्जी तो कोई चाय की दुकान खोलकर चाय बेचने को मजबूर था, तो वही भुवन प्रसाद जैसा कम पढ़ा लिखा या मैट्रिक फेल आदमी भी नेता बनकर ऐशो आराम और विलासिता संबंधी सारे सुख सुविधाओं का लाख उठाते हुए आलीशान गाड़ियों में जनता के पैसों से मौज कर रहा था।
अगले दिन विनय रोज की भांति उसी जगह पर अपने ठेला पर फल बेचते ही रहता है कि पुलिस की एक जीप वहां आकर रूकती है।
जीप से स्थानीय थाना का दारोगा एवं कुछ सिपाही उतरकर विनय के पास आते हैं। दारोगा विनय को मंत्री भुवन प्रसाद को गाली गलौज करने एवं जान से मारने की धमकी देने के जुर्म में पकड़कर अपने साथ ले कर थाना चला जाता है। एक पुलिस वाला उसके ठेला को फल सहित पास के ही नाला में गिरा देता है।
यह खबर जंगल के आग की तरह तुरंत पुरे राज्य में फैल जाती है। सभी टीवी चैनल इसी खबर को प्रमुखता से दिखाने लगते हैं -
" गरीबों के हितैषी मंत्री भुवन प्रसाद एक ठेला वाले से फल खरीदने स्वयं सड़क किनारे उसके पास जाते हैं तो उन्हें वह सनकी ठेला वाला उल्टे गाली गलौज करते हुए जान से मारने की धमकी देने लगता है। "
उधर मंत्री भुवन प्रसाद मौके का फायदा उठाते हुए विनय को विपक्षी पार्टी का मोहरा बताते हुए विपक्ष पर हमलावर हो जाते हैं। जबकि यह हंगामा किया धरा खुद उन्हीं का था।
बेचारे बेगुनाह गरीब विनय को 3 महीने की सजा हो जाती है। वह मन मारकर सिर्फ अंदर ही अंदर खून का घूंट पीकर रह जाता है।
विनय की पत्नी एवं उसके माता पिता को जब इस बात की जानकारी प्राप्त होती है तो सुनकर सभी दंग रह जाते हैं। किसी को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि विनय ऐसा कर सकता है। मगर अब किया भी क्या जा सकता था।
विनय के माता पिता एवं उसकी पत्नी लालती सिर्फ अपने नसीब को कोसती हुई उसे जेल से बाहर आने का दिन गिनने लगती हैं। ललिता को कुछ समझ में नहीं आ रहा था, कि वह अब अपने पति के जेल जाने के बाद घर को कैसे चला पाएगी। वही तो एक मात्र कमाने वाले घर में थे। उसके सास ससुर तो अब बूढ़े हो गए थे। उन दोनों के देखभाल की जिम्मेदारी भी अब ललिता के ऊपर ही आन पड़ी थी।
किसी तरह ललिता अपने पति के बगैर 3 महीने तक घर को संभाल पाती थी। उसके बाद विनय जेल से बाहर आ जाता है।
विनय 2 - 3 दिन अपने घर पर रहने के बाद फिर से रोजी रोटी के जुगाड में पटना आ जाता है।
विनय फिर से पटना कमाने तो आ जाता है, मगर उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह अब करे तो क्या करे। उसे अब कोई भाड़े पर ठेला भी नहीं दे रहा था। उसके पास इतना पैसा भी नहीं था कि वह खुद का अपना ठेला बनवा ले। अभी तो उसके पास रहने का भी कोई ठिकाना नहीं था। जब से घर से आया था, तब से अभी तक वह फूटपाथ पर ही रहते आ रहा था। उसके पास सिर्फ 8 - 10 दिन तक खाने का ही पैसा भी था।
विनय दिन भर काम के तलाश में सिर्फ इधर उधर चक्कर लगा रहा था, मगर कोई ढंग का काम नहीं मिल रहा था।
काम के तलाश में विनय का 2 - 3 दिन यूं ही बीत गया। एक दिन वह जहां फुटपाथ पर रहता था, वही बैठा अपने बारे में सोचने में लीन था कि तभी उसके कॉलेज का एक दोस्त किशोर वहां आ जाता है।
किशोर सड़क किनारे ही मॉर्निंग वॉक कर रहा था तो अचानक उसकी नजर विनय पर पड़ गई थी, तो वह उससे मिलने उसके पास आ गया था।
किशोर का पटना में ही अपना घर था। वह अभी दिल्ली में एक बड़े प्राइवेट कंपनी में कंप्यूटर इंजीनियर था। वह विनय के जेल जाने वाली बात भी जानता था।
किशोर किसी तरह विनय को जबरदस्ती अपने साथ घर लेकर आ जाता है।
किशोर जब विनय से पुरी बात सुनता है तो वह भी नेताओं की करतूत पर मन ही मन क्रोधित हो जाता है। आखिर आजकल के नेता इतनी मनमानी कैसे कर सकते थे ?
किशोर के कहने पर ही विनय नेता जी को सबक सिखाने को ठान लेता है। वह अपनी बेइज्जती का बदला हर हाल में नेता जी से लेना चाहता था। किशोर उसे हर तरह से मदद करने को भी तैयार था। विनय को किशोर सबसे पहले एक स्मार्टफोन खरीद कर देता है।
इधर तब तक बिहार में विधान सभा चुनाव के तिथि की भी घोषणा हो जाती है।
फिर क्या था सभी पार्टी के नेता अपने घोषणा पत्र में वादों की झड़ी लगाने लगते हैं।
सच में अगर घोषणा पत्र में जितना वादा कोई पार्टी करती है, अगर उतना काम आम जनता के लिए कोई कर देता तो आज देश में कोई भूखा नहीं सोता। जबकि आज भी कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा रात में भूखे पेट सोने को मजबूर था।
चुनाव की घोषणा होते ही विधायक के उम्मीदवार और पार्टी के बड़े नेताओं का तूफानी दौरा शुरु हो जाता है।
मंत्री भुवन प्रसाद को भी दुबारा फिर से उनके पुराने विधान सभा क्षेत्र से ही विधायक का टिकट मिलता है।
भुवन प्रसाद भी अपने क्षेत्र में नए किए जाने वाले कामों के लिए वादों एवं संकल्पों की झड़ी लगाए जा रहे थे। भले ही वो पिछले 10 साल से उस क्षेत्र से विधायक चुने जा रहे थे, मगर आज तक पक्की सड़क तो दूर, किसी गांव में कच्ची सड़क भी ढंग का नहीं बना हुआ था।
उधर विनय भुवन प्रसाद के द्वारा भाषणों में किए जा रहे वादों एवं संकल्पों का अपने मोबाइल से वीडियो बनाते जा रहा था।
चुनाव के बाद नतीजे का दिन भी आता है। संजोग से भुवन प्रसाद फिर से चुनाव जीत जाते हैं, और वो दुबारा मंत्री भी बन जाते हैं।
नई सरकार का गठन हुए हप्ता से महीना, और महीने से साल भी हो जाता है। मगर चुनाव के समय किए गए वादों में से एक भी वादा अभी तक पुरा नहीं होता है।
वैसे भी आजकल के नेताओं द्वारा चुनाव में किया गया वादा सिर्फ जनता को मुर्ख बनाने एवं उन्हें शब्जबाग दिखाने का एक मात्र चलन बनकर रह गया था।
भुवन प्रसाद के द्वारा किए गए वादों एवं संकल्पों का भी यही हाल था। उनके द्वारा संविधान, देश की मिट्टी और ना जाने किन किन धर्मों के कसम खाकर कुछ वादा शपथ ग्रहण के दिन, तो कुछ वादा एक सप्ताह में, तो कुछ वादा एक महीना में, तो कुछ वादा तीन महीने में, और कुछ वादा 6 महीने में पुरा करने को किया गया था। मगर अब एक साल पुरा होने को आ गया था, और अभी तक किए गए वादों में से कोइ एक काम भी पुरा नहीं हुआ था।
सरकार गठन के एक साल बाद एक खबर प्रदेश के राजनीति गलियारों में भूचाल ला देता है। सुनकर सभी नेताओं का दिमाग हिल जाता है।
विनय ने मंत्री भुवन प्रसाद पर चुनाव में झूठे वादा करने एवं लोगों को मूर्ख बनाकर चुनाव जीतने के एवज में उन पर कोर्ट में केस किया था। सबूत के तौर पर विनय ने खुद के द्वारा बनाया हुआ सभी वीडियो कार्ट को दिया था।
कोर्ट ने भी मंत्री भुवन प्रसाद के उपर लगाए गए वादा खिलाफी के केस को स्वीकार कर लिया था। आखिर चुनाव के नाम पर नेता लोग जनता को कब तक झूठे वादों एवं गगनचुंबी घोषणा पत्र से बेवकूफ बनाते रहेंगे।
विनय फिर से चर्चा में आ जाता है। अखबार, टेलीविजन, और सोशल मीडिया में उसी के बारे में बाते होने लगती है। आखिर उसने ऐसा अजूबा केस ही किया था।
कोर्ट भी मंत्री जी को तुरंत हाजिर होने का फरमान सुना देती है।
कोर्ट में पहले ही दिन मंत्री जी की बोलती बंद हो जाती है। उनके द्वारा कसम खा - खा कर किया हुआ वादा और लिया गया संकल्प चीख - चीख कर उनसे सवाल कर रहे थे, मगर नेता जी से कोई जवाब नहीं बन पा रहा था।
पुरे देश का ध्यान इसी केस की ओर केंद्रित हो जाता है। भुवन प्रसाद जैसे दुसरे नेताओं की भी नींद डर के मारे उड़ जाती है।
किसी तरह नेताजी का वकील सुनवाई की अगली तारीख लेने में सफल हो जाता है। मगर नेता जी को अपनी विधायकी और मंत्री पद जाने का डर सताने लगता है।
भुवन प्रसाद किसी भी कीमत पर केस को खत्म करवाने के जुगाड में अपने आदमियों के साथ विचार विमर्श में लग जाते हैं।
उसी दिन शाम में भुवन प्रसाद एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाते हैं।
भुवन प्रसाद प्रेस कांफ्रेंस में उल्टे विनय पर ही दोष मढ़ देते हैं -
" विनय पागल आदमी है। वह मुझे पहले भी गाली गलौज एवं जान से मारने की धमकी दे चुका है। उसके पागलपन के कारण ही आज कोर्ट में भी ये सब हंगामा हुआ, और हमारी साफ छवि को धूमिल किया गया। मैं कोर्ट की इज्जत करता हूं। मगर कोर्ट ने भी एक पागल इंसान के बातों में आकर केस दाखिल कर लिया। जबकि उसे पहले ही दिन केस खारिज कर देना चाहिए था। वैसे भी ऐसा थोड़े ना होता है कि कोई आदमी विधायक या मंत्री पर उसके चुनाव के समय दिए गए भाषण के आधार पर केस कर देगा। आखिर भाषण तो भाषण ही होता है, उसमें सच्चाई सौ प्रतिशत थोड़े ना होता है। "
मंत्री भुवन प्रसाद प्रेस के सामने सिर्फ यही सिद्ध करने में लगे रहते हैं कि विनय पागल आदमी है, और उसने पागलपन में आकर ही ऐसा किया था।
और ठीक अगले ही दिन इस केस में एक और धमाकेदार विस्फोट होता है, जब विनय की पत्नी लालती मीडिया के सामने आकर सभी को सच्चाई बताती है -
" मेरे पति का दिमाग सच में खराब रहता है। वो पढ़ने में बहुत तेज थे। फिर भी उनको कोई सरकारी नौकरी नहीं मिली थी। जिसके कारण ही वो हमेशा तनाव में रहने लगे थे। तनाव की वजह से ही धीरे धीरे उनका मानसिक संतुलन खराब हो गया है। वो घर पर भी कभी कभार पागलों जैसी हरकत करने लगते हैं। मगर गरीबी के कारण उनका मानसिक इलाज नहीं हो पा रहा था। "
विनय की पत्नी लालती मीडिया के सामने आकर जैसे ही अपने पति को पागल करार करती है, वैसे ही पुलिस उसे तुरंत पकड़कर पागल खाने में ईलाज के लिए भर्ती करा देती है।
कोर्ट भी तुरंत इस केस को खारिज कर देती है।
उधर बेचारा निर्दोष विनय पागल खाने में नेताओं के चक्रव्यूह में फंसकर बेवजह बंद हो जाता है।
विनय को आज के नेताओं से ऐसी ही उम्मीद थी। मगर उसे सिर्फ इस बात का मलाल था कि उसकी पत्नी ने भी उसे पागल करार कर दिया था।
मगर लालती ने ऐसा क्यों किया था ? वह तो उसे बहुत प्यार करती थी। इतनी लाचारी और गरीबी में भी वह कंधे से कंधा मिलाकर अभी तक चल रही थी। मगर अब ऐसा क्या हुआ था कि वह अचानक बदल गई थी। विनय पागल खाने में एक किनारे बैठा अपनी पत्नी के बारे में ही सोचने में लगा था। मगर वह जितना सोचता उतना ही और उलझता चला जा रहा था। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
विनय का दोस्त किशोर भी अभी दिल्ली गया हुआ था। इसीलिए वह अपने आप को और अकेला महसूस कर रहा था।
विनय के पागल खाने आने के ठीक अगले ही दिन उसकी पत्नी लालती उससे मिलने आ जाती है।
अपने पति के पुछने पर जब लालती पागल करार देने के पीछे की वजह बताती है तो उसे सुनकर विनय दंग रह जाता है।
मंत्री भुवन प्रसाद लालती को ऐसा कहने के लिए पचास लाख रूपया दिया था। जितना शायद विनय जैसा पढ़ा लिखा बेरोजगार आदमी जिदंगी भर में भी नहीं कमा पाता।
विनय को अब समझ में आ गया था कि आज पैसा ही सब कुछ था। पैसा से कुछ भी खरीदा जा सकता था। यहां तक की पैसा से किसी को पागल भी बनाया जा सकता था।
तभी तो आज उसकी पत्नी ही उसे बोल रही थी - पगला कहीं का।
कुमार सरोज
Superb
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
हटाएंबहुत सुंदर अभिव्यक्ति है
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
हटाएंबहुत हीं सुंदर और बहुत खूब👏👏👏
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार
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