मैं और मेरी कलम / Main Aur Meri Kalam ।। कविता ।। कुमार सरोज ।।
मैं और मेरी कलम
कुमार सरोज
मैं और मेरी कलम,
अकसर बातें करते रहते,
कभी शब्दों को लेकर लड़ते,
तो कभी यूहीं प्रसन्नचित्त हो जाते,
तो कभी आपस में ही रूठ जाते।
कभी मैं जो भी शब्द लिखता,
उसे वह गलत समझ काट देता,
मेरे मन को गुस्से से भर देता,
दिल करता उसे अपने से दूर फेंक दूं,
मगर कभी हिम्मत नहीं जुटा पाता।
मेरे सुख दुख और हर मौसम का,
कलम ही तो एक सच्चा साथी है,
जब मन मेरा उदास रहता फिर भी,
शब्दों का ताना बाना खुद से बुनकर,
वह कोई न कोई गीत बना ही देता।
प्यार के बोल, विरह के शब्द,
कलम ही तो हरदम गढ़ता है,
मैं हंसू या रोयू उसे कोई फर्क नहीं,
वह लिखना जानता है बस लिखता है,
कभी मेरे सोच से भी अधिक तीव्र।
दिमाग़ मेरा कभी थक भी जाता,
मगर कलम है कि कभी थकता नहीं,
कलम के दम पर ही तो आज मैं हूं,
हर बुरे व अच्छे वक्त का साथी है वो,
नहीं तो मैं गली में ही गुमनाम होता।
मैं और मेरी कलम,
अकसर बातें करते रहते।
कभी शब्दों को लेकर लड़ते,
तो कभी प्रसन्नचित्त हो जाते,
तो कभी आपस में ही रूठ जाते।
मैं और मेरी कलम,
अकसर बातें करते रहते।
कुमार सरोज
शानदार
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
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