बेटी तुम भी तो कभी मां बनोगी / Beti Tum Bhi To Kabhi Maa Banogi l कहानी l Kumar Saroj l
बेटी तुम भी तो कभी मां बनोगी
कुमार सरोज
अभी शाम के 6 बज रहे थे। गायत्री अपनी बेटी पूजा के साथ पटना रेलवे स्टेशन के बाहर एक ऑटो रिक्शा से उतरती है। उसके हाथ में एक सूटकेस था। पूजा के हाथ में भी एक बैग था। वह अभी उदास एवं जल्दबाजी में दिख रही थी।
पूजा ऑटो रिक्शा से उतरकर अपनी मां के साथ तेजी से स्टेशन की ओर चल देती है। उसे ट्रेन से दिल्ली जाना था।
पूजा दिल्ली के एक कॉलेज से मास कम्युनिकेशन में डिप्लोमा कर रही थी। अभी वह अपने घर पटना दीपावली और छठ पूजा की छुट्टी में आई थी, और आज वापस दिल्ली जाने के लिए ट्रेन पकड़ने अभी अपनी मां के साथ स्टेशन आ रही थी।
पूजा के घर में उसके मम्मी पापा के अलावा कोई और नहीं था। वह दोनों की इकलौती संतान थी। उसके पिता की एक मिठाई दुकान थी। मां घर की काम करती, एवं समय मिलने पर दुकान पर भी जाकर अपने पति की मदद करती थी।
पूजा अपने मम्मी पापा के आंखों की तारा थी। दोनों उसपे अपनी जान छिड़कते थे।
मां गायत्री तो पूजा को अभी भी 5 साल की बच्ची के जैसे ही ख्याल रखती थी। समय से सुलाना, जगाना, एवं समय पर नाश्ता, भोजन करवाना उसी का काम था। पूजा की पढ़ाई से लेकर होम वर्क करवाने तक की जिम्मेदारी भी उसकी मां की ही थी।
गायत्री के लिए तो उसकी बेटी पूजा ही उसकी दुनिया थी।
गायत्री का वश चलता तो वह दिल्ली भी अपनी बेटी के साथ ही रहती। मगर उसके पिता फिर यहां अकेले हो जाते, यही सोचकर वह दिल्ली नहीं जा पाई थी।
देश में आजकल लड़कियां हर जगह अपने आप को असुरक्षित महसूस करने लगी थी। इसीलिए शायद अब गायत्री भी अपनी बेटी को लेकर ज्यादा फिकरमंद थी।
आज भी पूजा स्टेशन अकेले ही आना चाहती थी, मगर उसकी मां समय को देखते हुए जिद्द करके उसे छोड़ने स्टेशन आ गई थी।
पूजा पिछले दो सालों से दिल्ली में रहकर पढ़ रही थी। मगर इन दो वर्षों में ही वह भी आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल होकर आज के जमाने में रंग गई थी। पहले जहां उसे अपनी मां का प्यार और दुलार बहुत अच्छा लगता था। वही अब उसे अपनी मां का सुबह शाम सिर्फ हाल चाल जानने के लिए कॉल आना भी बोरिंग लगने लगा था। पहले की प्यारी दुलारी स्पेशल मम्मा अब उसे हिटलर और जेलर मम्मा लगने लगी थी।
यह सब शायद पश्चिचमी सभ्यता एवं आधुनिकता की अंधी सरपट दौड़ का असर था। तभी तो पूजा को भी अब अपनी मम्मी पापा का वास्तबिक प्रेम बोझ एवं बंदिशों की जंजीर लगने लगी थी। और उसे अपने ब्वॉयफ्रेंड का दिखावटी एवं कपट से भरा प्रेम ही प्रगाढ़ लगने लगा था।
पिछले 15 दिन से पूजा अपने घर पटना आई हुई थी। वह भी अपनी मम्मी के बहुत कहने पर आई थी। नहीं तो बार बार पढ़ाई का बहाना बनाकर वह पिछले साल भर से घर नहीं आ रही थी।
पूजा का घर भी नहीं आने का पढ़ाई तो सिर्फ एक बहाना था, मुख्य कारण तो उसका ब्वॉयफ्रेंड नमन था। जिससे अब वह दूर रहना नहीं चाहती थी।
घर में उसे मां के सामने नमन से बात करने में नहीं बनता था। क्योंकि उसकी हिटलर मम्मा हमेशा पहले के जैसे ही साथ रहती थी। वह तो अब भी अपनी बेटी को साथ ही सुलाती भी थी।
इसीलिए पूजा को पिछले 15 दिनों से अपने ब्वॉयफ्रेंड नमन से दिल खोलकर बात करने का मौका नहीं मिला था।
अभी पूजा जल्दी से अपनी मां को घर वापस भेजकर नमन से दिल खोलकर बातें करने को ही उतावली थी।
पूजा के मोबाइल पर नमन का अब कॉल और मैसेज भी बार बार आने लगा था। मगर पूजा मां के सामने बात नहीं कर पा रही थी। इसी लिए वह अभी और उदास थी।
जबकि उसकी मां को लग रहा था कि शायद घर से बाहर जाने के कारण वह उदास थी।
पूजा ऑटो रिक्शा से उतरकर तेजी से स्टेशन की ओर चली जा रही थी। वह ट्रेन में बैठकर आराम से नमन से बात करने को बेताब थी। उसकी मां उसे ट्रेन के सीट पर बिना बैठाए वापस जाने को तैयार ही नहीं थी। और आखिर वह जाती भी कैसे, वह एक मां जो थी।
वैसे भी आज सब जगह पर एक अकेली लड़की को देखते ही मनचले उसे नोच खाने को हमेशा फिराक में लगे रहते थे। इसी डर से गायत्री भी अपनी बेटी को स्टेशन छोड़ने आई थी।
पूजा के पिता जी को अपनी मिठाई की दुकान से शाम होने के कारण फुर्सत ही नहीं मिला, नहीं तो वो भी स्टेशन पूजा को छोड़ने जरुर आते।
गायत्री और पूजा दोनों मां बेटी जैसे ही स्टेशन पहुंचती है कि माईक से ट्रेन के बारे में प्रसारित हो रही खबर को सुनकर पूजा का मन और उदास हो जाता है। वह जिस ट्रेन से जाने वाली थी, वह ट्रेन एक घंटा लेट थी।
गायत्री तो यह सोचकर और खुश हो गई कि चलो अभी उसकी लाडली बिटिया एक घंटा और साथ रहेगी। जबकि पूजा मन ही मन रेलवे को बहुत भला बुरा कहने लगी थी। उसे अपने ब्वॉयफ्रेंड से बात करने के लिए अभी एक घंटा और इंतजार करना पड़ेगा।
इधर पूजा के ब्वॉयफ्रेंड नमन का कॉल और मैसेज बार बार उसके मोबाइल पर आ रहा था, मगर मां के कारण वह बात नहीं कर पा रही थी। वह अन्त में बुझे मन स्टेशन के गेट के पास ही सीढ़ी पर बैठ गई।
पूजा की दशा को देखकर गायत्री को लगा कि शायद वह घर से जा रही है, इसीलिए उदास है, जबकि सच्चाई तो कुछ और ही था।
" पूजा बेटा, तुम इतना उदास मत हो, मुझे जरा भी तुम्हारी उदासी अच्छी नहीं लग रही है। पढ़ने के लिए सभी बच्चों को कुछ सालों के लिए अपने मां बाप से दूर तो जाना ही पड़ता है। तुम्हारा मन अगर वहां नहीं लगेगा तो तुम नए साल पर घर आ जाना। "
गायत्री अपनी बेटी को समझाती हुई बोली।
मगर बेचारी गायत्री को क्या पता था कि उसकी बेटी की उदासी घर की याद नहीं बल्कि उसके ब्वॉयफ्रेंड से बातें नहीं होना था। उसे घर की याद क्या आएगी, उसे तो घर अब काटने को दौड़ता था।
मां का दिल रखने के लिए पूजा भी झूठ मुठ उसकी सोच को और मजबूती प्रदान कर देती है।
" मम्मा, क्या करें। आखिर हूं तो मैं आपकी लाडली बेटी ही ना। मैं तो कभी बाहर पढ़ने जाना भी नहीं चाहती थी मगर तुमने ही मुझे जबर्दस्ती दिल्ली भेज दी। मुझे तो लगता है कि मैं अभी भी पढ़ाई छोड़कर तुम्हारे पास आ जाऊं। "
" ऐसा सोचना भी नहीं, अब सिर्फ एक साल की पढ़ाई और बची हुई है। "
दोनों मां बेटी अभी बैठी बाते ही करते रहती है कि पूजा जिस ट्रेन से जाने वाली थी वो ट्रेन प्लेटफार्म नंबर 1 पर आकर खड़ी हो जाती है। ट्रेन अब से ठीक एक घंटा बाद खुलने वाली थी।
पूजा ट्रेन को प्लेटफार्म पर रुकते देख मन ही मन खुशी से खिल उठती है।
" मां ट्रेन प्लेटफार्म पर आ गई है, मैं जाकर सीट पर बैठ जाती हूं, अब तुम घर जाओ। नहीं तो मेरा मन और नहीं लगेगा । "
" अरे नहीं बेटी। जमाना बहुत खराब है। जब तक ट्रेन खुल नहीं जाती, मैं तब तक घर नहीं जाऊंगी। चलो, मैं तुमको तुम्हारी सीट पर बैठा देती हूं। "
नहीं चाहते हुए भी पूजा को अपनी मां के साथ अपने आरक्षित सीट पर आकर बैठना पड़ता है।
पूजा के मोबाइल पर नमन का कॉल अब और ज्यादा आने लगा था।
गायत्री अपनी बेटी का सूटकेस और बैग सीट के नीचे रखकर वह भी उसी सीट पर बेटी के पास ही बैठ जाती है। अभी भी ट्रेन के खुलने में 30 मिनट का समय बाकी था।
उधर पूजा किसी भी तरह अब अपनी मां को वहां से घर भेजने की योजना बनाने में लगी थी।
B कुछ सोचती हुए पूजा बड़े ही प्यार से अपनी मां से बोली -
" मेरी प्यारी स्पेशल मम्मा, अब आपकी लाडली बेटी अपनी सीट पर बैठ गई है, कृपया आप घर जाइए। आपको अपने पतिदेव यानी की मेरे बेस्ट पापा के लिए खाना भी बनाना होगा। "
गायत्री अपनी बेटी के प्यार एवं स्टाईल को देखकर मुस्कुरा कर बोली -
" मेरी प्यारी दुलारी बेटी, तुम मेरी फिकर मत करो, मैं तुम्हारे पापा के लिए समय पर खाना बना दूंगी। वैसे भी ट्रेन खुलने में अब सिर्फ 30 मिनट बाकी है। "
" ठीक है तुम बैठो, मैं अब चली सोने। "
कहती हुई पूजा झट सीट पर रखा हुआ कम्बल ओढ़ कर सो जाती है।
पूजा को सोते देख गायत्री भी अब वापस घर जाने को तैयार हो जाती है।
" ठीक है तुम आराम करो, मैं अब जाती हूं। जब ट्रेन खुल जायेगी तो तुम मुझे कॉल कर देना। "
" ठीक है मम्मा। बाय .... । "
पूजा कम्बल के अन्दर से ही बोलती है।
गायत्री वहां से बाहर की ओर चल देती है।
गायत्री अपनी बेटी को छोड़कर ट्रेन के उस बोगी से बाहर तो आ जाती है, मगर उसे ट्रेन को अपनी आंखों के सामने खुलते देखे बिना जाने का मन नहीं कर रहा था। वह दरवाजे के पास अभी इसी उधेड़बुन में ही खड़ी थी।
उधर अपनी मां को जाते देख पूजा मन ही मन खुशी से फूली नहीं समा रही थी।
वह मां के ओझल होते ही झट उठकर बैठ जाती है, और मोबाईल निकालकर नमन को कॉल करने लगती है।
कॉल कनेक्ट होते ही दुसरे तरफ से नमन की आवाज सुनाई देती है -
" इतनी देर से कहां थी मेरी बाबू, मेरी सोना। मैं तुम्हारी जुदाई में पागल हुए जा रहा हूं। "
पूजा नमन की आवाज़ को सुनते ही मुस्कुराती हुई कॉल पर ही उसे चुम्मा देती है।
दुसरे तरफ़ से नमन का भी चुम्मा लेने की आवाज आती है।
" मेरा बाबू मैं क्या करती, मेरी हिटलर रूपी जेलर मम्मा चुड़ैल की तरह पीछे पड़ी थी। किसी तरह सोने का बहाना करके उसे अभी घर भेजी हूं। तुम्हें मैं भी बहुत मिस कर रही हूं बाबू। लव यू...., लव यू ..., लव यू । "
पूजा के लव यू के जवाब में नमन भी लव यू .. लव यू बहुत बार बोलता है।
" यार, तुम्हारी मां भी न एकदम खड़ूस और ओल्ड माइंडेड लेडी है। मुझे मेरी जानू से बात भी नहीं करने देती है। तुम जल्दी आकर मेरी बाहों में समा जाओ। मिस यू बाबू । "
" हां बाबू मत कहो, एकदम पागल औरत है। मैं भी तुमको बहुत मिस कर रही हूं स्वीट हार्ट। मैं तो अगली बार घर ही नहीं आउंगी। पता है मेरी हिटलर मम्मा रात में भी मेरे ही साथ सोती थी। जैसे मैं अभी भी बच्ची ही हूं। 15 दिन मुझे घर जेल से भी ज्यादा बोरिंग लगा है। "
पूजा आस पास के लोगों से अनभिज्ञ अपनी ही धुन में नमन से बातें करने में लगी हुई थी। उधर नमन भी अपने आप को दुनिया का सबसे बेस्ट आशिक सिद्ध करने में लगा हुआ था।
गायत्री जो कि अभी तक घर नहीं गई थी, उसे अपनी बेटी के प्यार ने दुबारा उसके पास खींच लाया था। मगर अपनी बेटी को मोबाईल पर किसी से बात करते देख रुक कर वह बातें सुनने लगी थी।
और गायत्री जैसे जैसे अपनी बेटी की बात सुनते जा रही थी, वैसे वैसे उसके ममतत्व को गहरा आघात लगते जा रहा था। उसकी अपनी लाडली बेटी उसके वास्तविक प्रेम को झूठ और सजा समझ रही थी, और दो दिन पहले जिदंगी में शामिल हुए लड़के के प्यार को वास्तविक। वह आज तक अपनी बेटी के जिस प्यार को बचपन के मासूमियत से लबालब भरा समझ रही थी, वह तो सिर्फ दिखावा था। उसे घर छोड़कर जाने का दुख नहीं बल्कि अपने दो दिन पहले मिले प्रेमी से दूर रहने का गम था। आज गायत्री के 20 सालों का प्यार 20 मिनट में ही चकनाचूर हो गया था। वह तो कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि उसकी अपनी लाडली बेटी उसके बारे में ऐसी घटिया ख्याल अपने मन में रखती है। उसके ममतत्त का विशाल वृक्ष पतझड़ के जैसा वीरान लगने लगा था। वह अपनी बेटी के सोच पर मन ही मन कुंठित हो रही थी।
वह निराश और गम के भंवर से निकलकर अभी अपनी बेटी से कुछ कहना ही चाह रही थी, कि तभी ट्रेन के खुलने की आवाज ने उसे उस बोगी से नहीं चाहकर भी बाहर जाने पर विवश कर देता है।
पूजा अभी भी अपनी धुन में मोबाईल पर बातें करने में मसगुल थी। उसे अपनी मां के द्वारा पास खड़े होकर सारी बात सुने जाने का जरा भी आभास नहीं हुआ था।
ट्रेन खुल गई थी। वादे के अनुसार पूजा को अभी कॉल करके अपनी मां को ट्रेन खुलने की जानकारी देनी थी, मगर उसे अब इतनी फुर्सत कहां थी ? मां के पुछने पर वह कोई न कोई बहाना बना देगी। वैसे भी वह आज के युग की बेटी थी, जिसके पास बहाने की कोई कमी नहीं थी।
उधर गायत्री ट्रेन के खुलते ही बुझे मन स्टेशन से बाहर की ओर चल पड़ती है। अभी भी उसके दिलों दिमाग में उसकी बेटी की अपने ब्वॉयफ्रेंड से कही हरेक बातें गूंज रही थी। नहीं चाहकर भी वह बार बार यह सोचकर मोबाइल को देख रही थी, कि शायद ट्रेन खुल गई है तो यह बताने के लिए उसकी बेटी का कॉल आएगा।
मगर पूजा का कोई कॉल अभी तक नहीं आया था, और ना ही शायद अभी आयेगा।
इस बात का आभास गायत्री को भी पहले से ही था, फिर भी वह तो एक मां थी ना, उसका मन नहीं मान रहा था। जिसके कारण ही बार बार उसका ध्यान मोबाईल की ओर चला जा रहा था।
इस समय गायत्री के बुझे मन में सिर्फ एक ही ख्याल आ रहा था कि आज जिस बेटी ने एक मां की लाड़ प्यार को बंदिश और बोझ समझ रही थी, वह भी तो कभी मां जरूर बनेगी। तब शायद उसे एक मां के वास्तविक प्यार का आभास होगा।
कुमार सरोज
Ek bar avashy padhe
जवाब देंहटाएंलाजवाब कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
हटाएंबहुत बढ़िया कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार
हटाएंआपने आज की औलाद से रूभरूँ कर दिया।बहुत-बहुत बेहतरीन रचना है।
जवाब देंहटाएंइस बहुमूल्य टिप्पणी के आपका बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार 🙏
जवाब देंहटाएंये कहानी पढ़कर मेरा दिल झकझोर दिया।
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
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