तू मेरी गर्लफ्रेंड / Tu Meri Girlfriend । कहानी । कुमार सरोज ।

          तू मेरी गर्लफ्रेंड
                         कुमार सरोज 
                   
                           
                    नेहा, भगवान की कारीगरी का एक ऐसा नमूना थी, जिसे उसने शायद बड़ी ही फुर्सत से बनाया था। जिस्म का हर एक अंग बड़ा ही नायाब था। सुशील एवम सर्वगुण सम्पन्न भी थी वो। मगर इन सब के ऊपर भगवान ने उसे एक ऐसा दाग दिया था कि उसके सभी गुण छिप गए थे। वह काली (सांवली) रंग की थी। 
                        नेहा अपने गांव गोपालपुर में ही रहती थी। उसके माता पिता बचपन में ही गुजर गए थे। घर में नेहा के साथ उसका एक मात्र भाई उज्जवल था। वह नेहा से 15 साल बड़ा था। वही अब उसका सब कुछ था। वह नेहा को बहुत प्यार करता था। इसी कारण से उसने अभी तक शादी भी नहीं किया था। 


                                                             
                    नेहा के पिता जी एक बहुत बड़े जमींदार थे। उसका गांव में ही पुरखों का बनाया हुआ बहुत बड़ा हवेली जैसा घर था। 
               पिता के मरने के बाद अब खेती बारी का सारा काम उसका भाई उज्जवल ही देखता था। नेहा भी अपने भाई की हिसाब किताब देखने में मदद करते रहती थी।                 
                 उज्जवल अपने कारोबार की देखभाल के लिए सुधीर नाम का एक लड़का को भी नोकरी पर रखे हुए था। सुधीर एक गरीब घर का लड़का था। मगर वह था बहुत ईमानदार एवम मेहनती। वह उम्र में नेहा से 2 साल बड़ा था। 
                 सभी का समय बहुत ही खुशी पूर्वक बीत रहा था। नेहा अब 22 साल की हो गई थी।
               नेहा का भाई उसकी शादी की बात भी अपने रिश्तेदारों में करने लगा था। मगर नेहा की काली रंग के कारण कोई लड़का शादी को तैयार ही नहीं हो रहा था। कोई शादी को तैयार भी होता तो उसका खानदान बराबरी का नहीं होने के कारण नेहा का भाई उससे शादी को तैयार नहीं होता था। आखिर उनके रगों में जमींदारी खून जो था ! 
              नेहा के लिए लड़का ढूंढने में ही उज्ज्वल का समय बीतता जा रहा था। मगर कहीं शादी की बात फिक्स नहीं हो रही थी। जिसके कारण उज्ज्वल अब बहुत परेशान रहने लगा था।
              धीरे धीरे नेहा की उम्र भी बढ़ती जा रही थी। अब वह 24 साल की हो गई थी। नेहा भी अपनी रंग के कारण अब अंदर ही अंदर कुंठित हो रही थी। 
            एक दिन दिल्ली से उज्जवल की बुआ सुधा गांव आती है। वह अभी थी तो 45 साल की ही, मगर नियती ने उसे इसी उम्र में विधवा बना दिया था।
                   सुधा के पति को मरे 3 साल हो चुके थे। दिल्ली में ही उसके पति का गाड़ी का एक बहुत बड़ा शोरूम था। उनके मरने के बाद अब सुधा ही गाड़ी के उस शोरूम की देखभाल करती थी। जिसके कारण वह अपनी मायका नहीं के बराबर ही आती थी। सुधा का कोई बच्चा नहीं था। दुनिया में वह अब एकदम अकेली थी।
           सुधा भी अपनी भतीजी नेहा की शादी उसकी काली रंग के कारण नहीं होने की बात सुनकर चिंतित हो जाती है। 
                     सुधा उज्जवल को अपने एक रिश्तेदार शैलेंद्र सिंह के बेटा कमल के बारे में बताती है। वे भी अब दिल्ली में ही रहकर अपना कारोबार करते थे। 
                  शैलेंद्र सिंह के बारे में सुनकर उज्जवल अपनी बुआ के साथ तुरंत उनसे मिलने दिल्ली चल देता है।               शैलेंद्र सिंह उज्जवल का खानदान एवम उसके पिता की रुतवा को देखते हुए नेहा को बिना देखे ही शादी के लिए हां कर देते हैं।  
               उज्जवल खुशी पूर्वक अपनी बुआ सुधा के साथ शादी की तैयारी करने गांव आ जाता है। 
              उज्जवल अपनी बहन की शादी ठीक हो जाने के कारण बहुत खुश था। नेहा एवम सुधा भी बहुत खुश थी।
               उज्जवल अपनी बहन की शादी की तैयारी में सुधीर के साथ मिलकर दिन रात एक किए हुए था। वह चाहता था कि उसकी बहन की ऐसी शादी हो कि आस पास के गांवों में अभी तक ऐसी शादी नहीं हुई होगी। वह अपनी बहन की शादी को यादगार बनना चाहता था।
                   शादी का दिन भी आ जाता है। सभी बहुत खुश थे। नेहा भी मन ही मन अभी से ही अपने नए जीवन एवम पति के ख्यालों में खोकर ताना बाना बुनने लगी थी। 
                मगर नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। शादी के मंडप में वो होता है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं किया था। दुल्हा बना कमल नेहा को देखते ही उसके काले रंग के कारण शादी करने से साफ मना कर देता है। 
             उज्जवल लाख गिड़गिड़ाते रह जाता है। मगर वह किसी की एक नहीं सुनता है। सभी की बातों को अनसुना कर कमल और उसका बाप तुरंत बारात वापस लेकर चला जाता है। 
           यह सब देख नेहा और उसके भाई पर तो मानो पहाड़ ही टूटकर गिर जाता है। मगर अब वे दोनों कर भी क्या सकते थे। सभी सिर्फ नसीब को कोसते हुए मन मारकर रह जाते हैं। 
                 उज्जवल के साथ काम करने वाला लड़का सुधीर नेहा की  हालत को देखकर उससे उसी मंडप में शादी करने के लिए तैयार हो जाता है। मगर उज्जवल सुधीर का खानदान एवम उसकी गरीबी के कारण उससे नेहा की शादी करने से मना तो करता ही है, उसे जल्लिल करके नौकरी एवम घर से भी निकाल देता है। 
            सुधीर मन मारकर चुप चाप वहां से चला जाता है। 
                  नेहा शुरु से ही गांव में ही रहते आ रही थी, इसीलिए वह गांव की सीधी साधी, भोली भाली लड़की दिखती थी। ऊपर से उसका काला रंग उसके रुप यौवन को और भी फीका कर देता था। 
                  सुधा नेहा को शहरी तौर तरीके एवम आधुनिक कल्चर सिखाने के लिए अपने साथ लेकर दिल्ली आ जाती है।  
                     सुधा भले विधवा थी, मगर हाई सोसाइटी में रहने के कारण वह अभी भी अपने आप को जवान दिखाने में पीछे नहीं रहती थी।     
                   सुधा का एक बिजनेस पार्टनर था विवेक सिंह। उसका भी एक लड़का था मोहित। सुधा विवेक सिंह को अपने बेटे से नेहा की शादी के लिए किसी तरह तैयार कर लेती है।                         
                    मगर मोहित नेहा को देखते ही उसके काली रंगत के कारण शादी करने से साफ मना कर देता है।                            बेचारी नेहा एक बार फिर से भाग्य को कोसती अपने नसीब पर रोती रह जाती है। पिछले 5 साल से अभी तक यही तो होते आ रहा था उसके साथ।     
                     सुधा से नेहा का दर्द अब देखा नहीं जा रहा था। वह मन ही मन नेहा को अब मॉडर्न एवम बोल्ड लुक की मल्लिका बनवाने का मन बना लेती है।
                 सुधा नेहा को दिल्ली के सबसे बड़े ब्यूटी पार्लर में ले जाकर मेकअप द्वारा उसका लुक एवम स्टाईल दोनों चेंज करवा देती है। 
               अब वह गांव की भोली भाली शर्मीली नेहा नहीं थी। बल्कि अब वह शहर की मॉडर्न एवम कामुक अंदाज़ वाली अपनी बुआ के कहने पर नेहा से पूजा बन गई थी।       
             नेहा मॉडर्न एवम हॉट पूजा बनकर सबसे पहले कमल को अपने प्रेम जाल में फंसाती है। कमल नेहा के बदले रूप को पहचान नहीं पाता है। वह नेहा उर्फ पूजा के हुस्न का दीवाना हो जाता है। 
               कमल को अपना दीवाना बनाकर नेहा मोहित को भी अपने अंदाज से अपने जिस्म का दीवाना बना देती है। 
               दोनों नेहा के बदले हुए रुप और हुस्न के दीवाने हो जाते हैं।
                   समझ में नहीं आ रहा था कि आज के लड़कों की यह कैसी मानसिकता बनती जा रही थी। जब नेहा गांव की भोली भाली, शर्मीली, संस्कारी लड़की थी, तब लड़कों ने उसे गांव की काली कलूटी देहातन लड़की समझकर ठुकरा दिया था। और अब वही गांव की देहातन काली कलूटी लड़की मॉडर्न कपड़े पहनकर और अपने चेहरे पर क्रीम की मोटी परत पोतकर शहर की ब्लैक ब्यूटी बाबू बनकर सभी को दीवाना बना रही थी। 
                  आज बहुत से ऐसे युवक थे हमारे समाज में जो पश्चिमी सभ्यता की अंधी दौड़ में शामिल होकर अपनी भारतीय सभ्यता को भूलते हुए अपनी जिस्म की वासना रूपी आग को बुझाने के लिए किसी को भी गर्लफ्रेंड तो बना लेता है, मगर शादी के लिए वह सर्वगुण संपन्न विश्व सुंदरी पत्नी ही खोजता है। मगर गर्लफ्रेंड के लिए उसे काली भी पसंद थी। बस लड़की मॉडर्न और दिखने में हॉट होनी चाहिए थी। 
                 आखिर युवा वर्ग में यह कैसी सोच बनते जा रही थी हमारे देश में। यह सिर्फ कोई एक नेहा, कमल या मोहित की कहानी नहीं थी। बहुत सारे ऐसी कहानियां हम सब के आस पास आज घटित हो रही है।
               इधर शैलेंद्र सिंह अपने बेटे कमल की शादी दुसरी लड़की से ठीक कर देते हैं। लड़की बहुत सुंदर थी, इसीलिए कमल को भी उससेे शादी करने में कोई दिक्कत नहीं थी।
           कमल के शादी का दिन भी आ जाता है। शादी के मंडप में कमल अपनी नई नवेली दुल्हन को सिंदूर से मांग सजाने वाला ही होता है कि तभी एक आदमी दुल्हन बनी लड़की को एक लिफाफा दे जाता है। 
               आगंतुक आदमी लिफाफा देकर तुरंत चला जाता है।
                  लड़की जैसे ही लिफाफा खोलकर उसके अंदर के फोटो को देखती है तो उसके पैर तले की जमीन खिसक जाती है। लिफाफा में कमल और नेहा का बहुत सा सारा अर्धनग्न कपड़ो में एक दूसरे से लिपटे हुए फोटो था। 
                  दुल्हन बनी वह लड़की फोटो देखते ही शादी करने से तुरंत मना कर देती है। ठीक वैसे ही जैसे 2 साल पहले कमल ने बीच मंडप में सभी के सामने नेहा के काले रंग को देखकर शादी करने से इंकार कर दिया था। 
                     शैलेंद्र सिंह के लाख गिड़गिड़ाने के बावजूद भी बारात लड़की एवम उसके पिता लेकर चले जाते हैं।
            बारात में आए सभी मेहमान भी कमल के करतूत पर उसे मन ही मन कोसते हुए चले जाते हैं।
                   उधर मोहित की भी एक सुंदर लड़की से शादी ठीक हो जाती है। 
                  मगर शादी के मंडप में मोहित के साथ भी कमल के साथ घटित सारी घटना हूबहु घटता है। उसकी दुल्हन भी बीच मंडप से बारात लेकर चली जाती है। 
              मोहित और कमल जैसे न जाने हमारे देश में आज कितने युवक होंगे जो किसी भी लड़की को गर्लफ्रेंड बनाकर उसकी भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं। मगर शादी के लिए सुंदर एवम सुशील पत्नी ही खोजते हैं। 
                  कमल एवम मोहित के रासलीला के कारण बीच मंडप से दुल्हन के चले जाने से दोनों के परिवार की बहुत बदनामी होती है। उस घटना के बाद अब कोई अच्छे खानदान वाले दोनों से अपनी बेटी की शादी करने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे।             
                    उधर नेहा और सुधा अपनी योजना को सफल हुआ देख बहुत खुश होती है। क्योंकि नेहा ने सारा खेल अपनी बुआ सुधा के कहने पर ही खेली थी। यह सब उन्हीं दोनों का किया धरा था।
              नेहा कुछ ही दिन के बाद फिर वापस अपने गांव आ जाती है। 
                   इधर गांव में नेहा का भाई उज्जवल अभी भी उसकी शादी नहीं हो रही थी जिसके कारण वह बहुत परेशान था। 
                   समय बीतता रहता है। अचानक एक दिन कमल अपने पिता शैलेंद्र सिंह के साथ उज्जवल से मिलने आता है। वह अपनी पिछली गलती के लिए माफी मांगते हुए नेहा से अब शादी करना चाहता था। वैसे भी कमल से अब कोई अच्छा खानदान वाला शादी नहीं कर रहा था। इसीलिए दोनों बाप बेटे उज्जवल की बहन नेहा से शादी के लिए हां करने आए थे। दोनों के पास अब कोई और रास्ता भी नहीं था। गांव में रहने के कारण उज्जवल को कमल के रासलीला के बारे में तो मालूम था ही नहीं। यही सोचकर दोनों उसके पास आए थे, ताकि कमल की शादी हो जाए।
                कमल और उसके पिता ने जैसा सोचा था वैसा ही होता भी है।  कमल को नेहा से शादी करने के लिए तैयार हुआ देख उज्जवल बहुत खुश होता है। वह नेहा से बिना पूछे ही तुरंत हां कर देता है। 
                   मगर ठीक तभी सुधा दिल्ली से गांव उज्ज्वल से मिलने आ जाती है। इस बार सुधीर भी उसके साथ था। 
               सुधा उज्जवल को कमल की सच्चाई बता देती है। सुन उज्जवल आग बबूला हो जाता है, और तुरंत कमल एवम उसके पिता को अपने घर से भगा देता है। 
                 यह सब देख नेहा भी मन ही मन बहुत खुश थी। अपनी बुआ के साथ सुधीर को घर आया देख, पता नहीं क्यों उसे ऐसा लग रहा था कि उसकी बुआ इस बार उसके भईया को सुधीर से उसकी शादी करने के लिए राजी कर लेंगी। 
            
                      
                       कुमार सरोज

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