समझौता / Samjhauta । कहानी । कुमार सरोज ।
समझौता
कुमार सरोज
चार कमरों का सरकारी क्वार्टर था वह। एक कमरे में एक महिला बैठी स्वेटर बुन रही थी। दूसरे कमरे से किसी की चीखने - चिल्लाने की आवाज आ रही थी।
उस कमरे में दो बहने आपस में ही झगड़ रही थी। एक 14 साल की होगी तो दूसरी 8 साल की। कभी - कभी उस महिला के डांटने की आवाज भी आ रही थी, जो उन दोनों की मां थी। फिर भी दोनों बहने अपने-अपने लय में लड़ने में लीन थी।
छोटी बहन जिसका नाम किरण था, अपने आप को बचाने का प्रयास करते हुए रोए जा रही थी। कभी - कभी वह भी बड़ी बहन को मारने लगती थी। उधर बड़ी बहन जिसका नाम सिमरन था, लगातार किरण को मारे जा रही थी।
जब बहुत देर तक दोनों बहनों का महाभारत बंद नहीं हुआ तो अन्ततः मां को बीच में आना पड़ा ।
" क्या बात है ? क्यों दोनों झगड़ रही हो ? " मां डांटते हुए बोली ।
" हमारी पेंसिल ले ली है । " सिमरन गुस्से में बोली ।
" सिमरन, तुम्हें बात - बात पर इस तरह गुस्सा करना और मारना अब शोभा नहीं देता। तुम खुद समझदार हो गई हो। इसने एक पेंसिल ले लिया तो क्या हो गया। आखिरी ये है तो तुम्हारी बहन ही, कोई दुश्मन थोड़ी है। " मां समझाते हुए बोली।
मगर मां की बातों का सिमरन के ऊपर जरा भी असर नहीं हुआ। वह गुस्से में अपना बैग और लंच बॉक्स उठाए बाहर की ओर निकल पड़ी ।
इधर किरण अभी भी जमीन पर बैठी सिसक रही थी । कुछ देर के बाद मां उसे प्यार से उठा कर दूसरे कमरे में ले आई।
कुछ ही देर के बाद किरण स्कूल जाने के लिए घर से निकाल पड़ी।
उधर सिमरन अभी अपने घर से कुछ ही दूर गई थी कि रास्ते में एक भिखारी फटे पुराने कंबल में लिपटा दिखाई दिया। वह उसे देखकर और जल भूल गई। मम्मी पापा के लाड प्यार ने उसे इतना जिद्दी बना दिया था कि वह अपने आगे किसी की एक नहीं सुनती थी।
अभी वह रास्ता काट कर निकलना ही चाह रही थी कि उस भिखारी का करुण स्वर उसे सुनाई दिया - " गरीब को कुछ खाने …………..। "
वह अपना वाक्य अभी पुरा भी नहीं किया था कि सिमरन उसे गुस्से में डांटने लगी। वह तो घर से गुस्से में थी ही - " क्या कहा खाना …. ? इतना बड़ा देह भुजा है क्या कमा कर खा नहीं सकते। "
बेचारा भिखारी चुपचाप उसके मुंह को सिर्फ देख रहा था।
" इस तरह क्या देख रहे हो ? सुबह - सुबह एक मैं ही मिली थी। " भिखारी चुप चाप सिर्फ सुन रहा था, और सिमरन अपनी गुस्सा उस पर उतारते जा रही थी।
" जवान हो , दो हाथ पैर है । फिर भी भीख मांगते शर्म नहीं आती ? निकम्मे … कामचोर… । "
पता नहीं सिमरन और क्या-क्या उपमा उस भिखारी को देती, मगर तभी पीछे से किरण भी वहां आ गई। फल स्वरुप सिमरन शांत हो गई ।
किरण अभी कम उम्र की थी, फिर भी वह बहुत समझदार थी। स्वभाव में तो एकदम सिमरन के विपरीत थी।
उसे भिखारी को देखते ही दया आ गई। वह अपने लंच बॉक्स से रोटी निकालकर अभी देना ही चाहती थी कि सिमरन उसे डांटते लगी - " बड़ी दानवीर बन रही है। चल मम्मी से डांट खिलवाते हैं । "
" तो क्या होगा। कम से कम एक गरीब भूखा तो नहीं रहेगा ना। "
" ठीक है, ठीक है। चलो, बड़ी आई समाज सेवा करने। "
बड़ी बहन सिमरन किरण को एक तरफ खींचते हुए बोल पड़ीं।
तभी हवा का एक तेज झोंका ने भिखारी के शरीर का कंबल उड़ा दिया। भिखारी के शरीर को देखकर सिमरन जैसी कठोर दिल लड़की का हृदय भी हिल गया। उसका पूरा शरीर कुष्ठ रोग से ग्रसित था। हाथ पैर का मांस कट - कट कर गिर रहा था। पुरा शरीर जख्म से भरा हुआ था। अगर कोई और समय रहता तो सिमरन ऐसे व्यक्ति को देखकर मूर्छित होकर गिर पड़ती। मगर उसका कठोर हृदय उस बात को सोचकर पिघल गया था, जो उसने थोड़ी देर पहले उस भिखारी से कही थी।
उन दोनों बहनों को अपनी ओर अपलक देखते देख वह भिखारी बोल पड़ा - " मैं भी तुम लोगों के तरह ही बड़े घर में पैदा हुआ था। मगर शराबी बाप ने सब कुछ नीलाम कर दिया। खुद तो मरा ही मुझे भी सड़कों पर भटकने के लिए छोड़ दिया। मैं अपने हाथों से कमा खा भी सकता था, मगर तभी नियति ने मेरे साथ यह क्रूर मजाक कर दिया। एक असाध्य रोग ने घेर लिया। आज हालात ऐसे हैं कि मुझे एक सूखी रोटी भी नसीब नहीं हो रहा है। आज मैं 5 दिनों से भूखा हूं।" कहते कहते भिखारी रो पड़ा ।
सिमरन उसके दुख दर्द को सुनकर शर्म के मारे गड़ी जा रही थी । उसकी अंतरात्मा उसे धिक्कारने लगी थी। शायद आज उसे सही मानवता का ज्ञान हो गया था।
वह भिखारी को रोटी देकर अपना सिर झुकाए एक तरफ चल पड़ती है।
जब सिमरन स्कूल पहुंची तो उसने क्लास टीचर पढ़ा रहे थे। जब उन्होंने देर से आने का कारण पूछा तो सिमरन सब कुछ सच - सच बताते चली गई। सुनकर सभी दंग रह गए।उसके सर भी सिमरन के व्यवहार से बहुत दुखी थे। आज जब उन्हें पता चला कि सिमरन का गुस्सा और गुरूर दोनों नष्ट हो गया है तो वे मन ही मन बहुत खुश हुए।
" सिमरन सचमुच आज से तुम अगर अपने आप से समझौता कर लेती हो तो जरूर एक न एक दिन अपनी मंजिल को पा लोगी। तुम देश में ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व में अपना नाम रोशन करोगी।" कहते - कहते सिमरन के सर भी इतने भावुक हो गए कि उनके आंखों से भी आंसू छलक उठे। शायद ये खुशी के आंसू थे।
कुमार सरोज
❤️❤️❤️🧿🧿
जवाब देंहटाएं😘👍
हटाएंअति शानदार कहानी एवं शिक्षाप्रद
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
हटाएंलाजवाब कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
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