मेरा बचपन / Mera Vachapan । संस्मरण । कुमार सरोज ।

             मेरा बचपन
                          कुमार सरोज

             बात सन 1982 की है। उस समय मैं अपने पैतृक गांव सिकरिया में ही रहता था। उस समय मैं बगल के गांव निजामपुर के प्राथमिक विद्यालय में कक्षा दो में पढ़ता था। पढ़ता क्या था, बस घर से विद्यालय और विद्यालय से घर आने जाने की खानापूर्ति करता था। 

               हमारी एक टोली थी 5 लड़कों की। मछली मारना, कंचे खेलना,  मटर छीमियों की चोरी करना, आम के दिनों में आम तोड़ना, हम लोगों का मनपसंद पेशा था। और पढ़ना, ना बाबा ना ! किताब देखते ही नींद आ जाती थी। बस, दिन भर आवारा लड़कों संग आवारागर्दी करते रहता था। स्कूल तो कभी कबार ही जाता था। हमेशा रास्ते में ही स्कूल जाने का बहाना करके छिप जाया करता था। स्कूल में मार भी पड़ती थी। मगर हम पर कोई असर नहीं होता था। मार खाने के दो - तीन दिन के बाद फिर वही अपनी पुरानी दुनिया में लौट कर सैर सपाटा करने लगते थे। 
               जिस दिन की यह घटना है, वो दिन आज भी जब याद आते हैं तो मन बरबस एक नए जोश से भर जाता है। 
               एक दिन की बात है। हम पांचों मित्र मंडली गन्ने के एक खेत में घुसकर मजे से बैठ गन्ना चूस रहे थे। यह हम लोगों का रोज का काम था। खेत के बीच में कोई देख भी नहीं सकता था। हम लोग मजे से जी भर गन्ना चूसकर आराम से घर आ जाते थे। 
            मगर उस दिन शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था। अचानक खेत का मालिक जमुना चाचा एक लंबा लाठी लेकर हम लोगों की सेवा में हाजिर हो गए। हम पांचों की नजर जैसे ही जमुना चाचा पर पड़ी, तो देखते ही हमारे होश उड़ गए। हम लोग सिर पर पैर रख कर भाग खड़े हुए । 
            ईख के पत्तों से हमारे शरीर में जहां - तहां जख्म भी बन गया था। फिर भी हम लोग बिना किसी की परवाह किए भागते जा रहे थे। 
              पीछे से लाठी लिए हुए खेत के मालिक यानी की जमुना चाचा भी हम लोगों को खदेड़ रहे थे।
               भागते भागते हम लोग एक आम के पेड़ पर चढ़ गए। यमुना चाचा भी वहीं पर आकर रुक गए। शायद उन्हें पेड़ पर चढ़ना नहीं आता था। तभी तो वे हम लोगों का पेड़ से उतरने का इंतजार करने लगे। 
             पांचों मित्र अपनी सांसो पर काबू पाने की कोशिश करते हुए आगे की रणनीति पर विचार करने लगे।  
         एक घंटा…  दो घंटा ….  3 घंटा से भी ऊपर समय बीत गया। मगर यमुना चाचा वहां से नहीं हटे। लग रहा था कि आज वो हाथ धो कर हम लोग के पीछे पड़ गए थे।
               अब हम लोगों की हालत खराब होते जा रही थी। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। अब भूख भी जोरों की लग गई थी। पेट में चूहे ज़ोर ज़ोर से उछलने लगे थे। 
         अचानक हम लोगों को एक उपाय सूझा। पेड़ तो आम से लदे थे ही। हम लोगों ने आम खा -  खा कर यमुना चाचा को गुठली से मारना शुरू कर दिए। 
                  बेचारे यमुना चाचा चोट लगने के डर से सिर्फ गुठली से बचते रहे। मगर जाने का नाम नहीं लिए।  वो चाहते तो हमें भी मिट्टी का ढेला उठाकर मार सकते थे, मगर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। ऐसा लग रहा था, मानों वो हमें मारने के लिए सिर्फ लाठी को तेल पिलाकर रखे हुए थे। अंत में हम लोग ही थक कर शांत हो गए।
            शरीर पर ईख के पत्तों से जो जख्म बन गया था, वह अब पीड़ा देने लगा था। गुठली फेंकने में हम लोगों ने जो बहादुरी दिखाई थी, इसी के कारण अब शरीर से पसीना निकलने लगा था। वही पसीना कटे जख्मों पर जाकर अब नमक मिर्च जैसा लग रहा था। 
               उस भोले - भाले चाचा ने तो हम लोगों को कुछ नहीं किया, मगर हम लोग स्वयं ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार लिए थे। अब हम लोग दर्द से निजात पाने के लिए अपने अपने भगवान को याद करने लगे। 
                    आखिर मरता भला क्या न करता। अंत में हम लोगों ने पेड़ से कूदकर भागने का निश्चय कर लिया। अब हमें यह भी डर सताने लगा था कि अगर कहीं गांव का कोई आदमी इधर आ गया तो हम लोग जरूर पकड़ में आ जाएंगे। और तब हमारी क्या दुर्दशा होती, ये तो भगवान ही जान रहे थे।
                हम पांचों ने पांच अलग - अलग टहनी से लटकना शुरू कर  दिया। जमुना चाचा जब तक हमारे पास आते, तब तक बाकी के हमारे चारों मित्र कूदकर भाग खड़े हुए। मगर मैं ऊपर ही रह गया। 
                मंडली का हेड मैं ही था, इसलिए जमुना चाचा उन चारों का पीछा करने के बजाय हम पर ही लाठी चला दिए। मैं लाठी से तो बच गया। मगर अपने आप को गिरने से नहीं बचा सका। 
                चोट तो कम लगी, मगर पांव में मोच आ गई थी। मैं मार खाने से बचने के लिए जोर जोर से चीखने - चिल्लाने का नाटक करने लगा। 
                   मुझे जोर से चीखते - चिल्लाते देख जमुना चाचा डर गए। वे समझे कि मुझे बहुत जोर से चोट लगी है। मगर उन्हें क्या पता कि मैं तो मार खाने के डर से नखरा कर रहा था।
                     गांव के सीधे - साधे, भोले - भाले हमारे यमुना चाचा हमारी झूठ मूठ के नखरा को सच समझकर सोच में पड़ गए। अचानक वो कुछ सोचते हुए मुझे अपने कंधों पर उठाकर मेरे घर की ओर चल पड़े। उनके चेहरे पर दुख के भाव साफ दिख रहा था। 
                   मैं मन ही मन उनकी उदारता पर मुस्कुराने लगा था। आज मैं मार खाते - खाते अपनी चालाकी से बच गया था ।
          40 साल बाद आज भी जब वो दिन याद आते हैं, तो मन पहले के लोगों के भोलेपन पर ख़ुशी से झूम उठता है। पहले गांव के लोग कितने भोले एवं सरल स्वभाव के होते थे। आज के लोगों का स्वभाव कितना बदल गया था। बहुत अंतर आ गया है तब और अब के लोगों के स्वभाव और व्यवहार में।
                 आज भी कभी कभी मुझे लगता है कि काश कोई व्यक्ति मेरी गलती के बावजूद भी मुझे ही कंधों पर उठाकर मेरे घर लाता, और मेरा ख्याल रखता। पता नही कहां गए वो तब के दिन और वे लोग।

                         कुमार सरोज

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

आपके बहुमूल्य टिप्पणी एवं सुझाव का स्वागत है 🙏

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अधूरी यात्रा /। Adhoori Yaatra । हिमांशु कुमार शंकर ।

उसकी मां / Usaki Maa । कहानी । कुमार सरोज ।

लव डे / Love Day । गजल । कुमार सरोज ।