जब सूरत देखूं दिलबर की / Jab Surat Dekhun Dilbar Ki l कविता l कुमार सरोज l

        जब सूरत देखूं दिलबर की 
                 ( कविता)
                               कुमार सरोज


 बिन पिए नशा छा जाता है,
             जब सूरत देखूं दिलबर की। 

कजरारे नयन उसके कटारी है, 
मिसरी बोली में उसके धोली है।
जिसे सुन मेरा रोम रोम हर्षता है, 
फिर बिन पिए नशा छा जाता है,
            जब सूरत देखूं दिलबर की।

      
उसके रेशमी जुल्फें मुख पे लटके,
जब कानों की बाली खनकती है।
ऐसे में दिल बार बार उसपे आए,
फिर बिन पिए नशा छा जाता है,
           जब सूरत देखूं दिलबर की। 

पास आ पायल जब वो खनकाती है,
स्पर्श पाकर मन पुलकित हो जाता है।
उसका आलिंगन आनंदित कर देता है,
फिर बिन पिए नशा छा जाता है,
             जब सूरत देखूं दिलबर की।

तेबर और अंदाज निराले है उसके,
पल में रूठना, पल में मान जाती है।
वो मेरे जीवन के दुख दर्द मिटाएगी,
तभी बिन पिए नशा छा जाता है,
            जब सूरत देखूं दिलबर की।


                         कुमार सरोज

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