वो सात दिन / Vo Sat Din । कहानी । कुमार सरोज ।

    वो सात दिन / Vo Sat Din

                               कुमार सरोज

              

                   सुबह का समय था। मंद - मंद ठंडी हवाएं अपने मद मस्त चाल में बह रही थी। फिजाओं में मंत्रोच्चारण की आवाज गूंज रही थी। वातावरण  स्वच्छ एवम् भक्तिमय लग रहा था।

 मैं इस समय झारखंड के बड़काकाना के एक मैदान में 9 कुण्डलीय यज्ञ में बने अग्नि कुंडों का परिक्रमा कर रहा था।

 मेरे साथ बहुत सारे लोग परिक्रमा कर रहे थे। कुछ लोग अग्नि कुंड के पास बैठे हवन कर रहे थे तो कुछ पंडाल में बने स्टेज पर बैठे मंत्रोच्चारण कर रहे थे। यह सब कार्यक्रम नौ दिवसीय मां लक्ष्मी के नौ कुंडलीय महायज्ञ में हो रहा था। 

मैं भी आज पहली बार यज्ञ में बने 9 कुण्डलीय हवन कुंडों का परिक्रमा करने आया था। जबकि यज्ञ का आज दूसरा दिन था।

 मैं मन ही मन मां लक्ष्मी से अपने भविष्य के लिए ढेर सारी आशीष एवं दुआएं मांगता हुआ परिक्रमा कर रहा था। मेरे आगे पीछे बहुत सारे लोग जिसमें सभी उम्र के स्त्री पुरुष थे, परिक्रमा कर रहे थे। मैं भी घर से 125 बार परिक्रमा करने का मन बना कर आया था।

 अभी मैं मुश्किल से 20-25 परिक्रमा ही किया था कि अचानक इस भक्तिमय वातावरण को बेढ़ती हुई किसी लड़की के हंसने की आवाज सुनाई देने लगती है। मैं ध्यान की दुनिया से वर्तमान में आकर जब आवाज की ओर देखा जो ठीक मेरे पीछे से ही आ रही थी, तो हंसने वाली लड़की को देखा तो देखता ही रह गया। मेरा मन हंसी वाली उस खूबसूरत लड़की को देखते ही भक्तिमय से प्रेममय हो गया। कुदरत ने क्या फुर्सत से बनाया था उसे! सिर से पांव तक खूबसूरती की मिसाल थी वह। बलखाती कमर, शरबती आंखें, गुलाब की पंखुड़ियों जैसे कोमल होठ थे उसके। जहां मन अभी मंत्रोच्चारण में लीन था, वही अब प्यार का गीत गुनगुनाने लगा था।


                अभी तक उसके हंसी का मुझे कारण समझ में नहीं आ रहा था। क्योंकि यह समय अभी इस तरह हंसने का नहीं था। कोई भी उसे भला-बुरा कह सकता था। 

 उस लड़की के साथ ही एक और लड़की थी। वह उसे इशारे में चुप रहने को बोल रही थी। मगर वह थी कि मेरी ओर देखकर हंसे जा रही थी। वह भी हंसना तो नहीं चाह रही थी, मगर लाख कोशिशों के बावजूद भी वह हंसी को रोक नहीं पा रही थी।

 मैं भी अब धीरे धीरे परिक्रमा करता हुआ उसे ही मुड़ मूड कर देख रहा था। 

हमारे आगे पीछे चल रहे लोग भी अब उस लड़की की ओर ही देखने लगे थे।

उसके साथ चल रही लड़की उसे पकड़कर एक किनारे खड़ी कर दी थी। उस समय तक उसका हंसना कुछ कम हो गया था।

 मैं अभी भी उसी लड़की और उसकी खूबसूरती के बारे में सोचता हुआ धीरे-धीरे परिक्रमा कर रहा था। तभी एक बुजुर्ग महिला जो लड़की के ठीक पीछे चल रही थी, अब मेरे पास आकर मेरे साथ ही चलने लगी थी।

 चलते चलते उस महिला ने जो बातें मुझे बताई उसी सुन मैं शर्म से पानी पानी हो गया। अब मुझे उस लड़की के हंसने के कारण का पता चल गया था। मेरा फुल पैंट पीछे फटा हुआ था, और मैं शर्ट को भी अंदर करके पहने हुए था। जिसके कारण वह फटा हुआ भाग साफ दिख रहा था। तीन दिन पहले ही साइकिल चलाते हुए फट गया था, और उसे अभी तक सिलबाया नहीं था। वैसे यह फुलपैंट मेरा सबसे पसंदीदा था।

मैं बड़काकाना अपने एक रिश्तेदार शिवलाल चाचा के यहां कल ही आया था। मेरा 2 दिन बाद रांची में पॉलिटेक्निक का परीक्षा था। परीक्षा देने के लिए ही मैं यहां आया था। तभी जल्दबाजी में पैंट नहीं ठीक करबा पाया था। 

आज सुबह भी मैं देर से उठा था और मुझे यज्ञ का परिक्रमा करने आना था, इसीलिए जल्दबाजी में मैं अपना पसंदीदा फुल पैंट को पहन कर आ गया था। मुझसे गलती यही हुई थी कि मैंने शर्ट को पेंट के अंदर कर लिया था। नहीं तो वह फटा हुआ भाग नहीं दिखता। मैं शर्म से झेंपता हुआ तुरंत शर्ट को बाहर कर लिया। 

अपने शर्ट को बाहर करने के बाद मैं एक शर्मिंदगी भरी मुस्कान बिखेरते हुए उस लड़की की ओर देखने लगा। 

वह फिर से परिक्रमा शुरू कर दी थी। हम दोनों की नजरें पहली बार मिली। उसकी नजर में जीत कि तो मेरे नजर में शर्मिंदगी की झलक दिख रही थी। मगर मुस्कान दोनों के चेहरे पर थे। उसकी मुस्कान मेरे सीने को चीरती हुई दिल पर कयामत ढा रही थी। 

तभी शिवलाल चाचा के लड़के विवेक भईया को अपनी ओर आते देख मैं फिर से अपने आप को भक्तिमय बनाता हुआ परिक्रमा करन लगा था। 

 विवेक भईया मुझसे उम्र में 10 साल बड़े थे। उनके पिता शिवलाल चाचा बड़काकाना में ही सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड (CCL) में नौकरी करते थे। वे हमारे चचेरी भाभी के पिताजी थे। यानी कि अभी मैं अपने चचेरे भैया के ससुराल में आया हुआ था।

 मैं विवेक भैया के साथ ही परिक्रमा पूरा करके वापस घर की ओर चल पड़ा था। अभी भी मेरे मन मंदिर में उस हंसी वाली लड़की का खूबसूरत चेहरा नाच रहा था।

 मैं जैसे ही विवेक भईया के साथ उनके सरकारी क्वार्टर में पहुंचा तो उस समय सुबह के 8  बज रहे थे। विवेक भईया की पत्नी यानी की किरण भाभी घर के होम थिएटर पर एक फिल्मी गाना बजा रही थी - " जबसे तुमको देखा है सनम, क्या कहें कितने हैं बेचैन…….. "। भाभी गाना बहुत सुनती थी। उनका संगीत में तो जान बसता था। भाभी मां बनाने वाली थी। 

गाना सुनकर मुझे ऐसा लगा मानो भाभी मेरे लिए ही गाना बजा रही थीं।

नहा धोकर एवं नाश्ता करके मैं पढ़ने के लिए बैठ गया।

 शाम में मैं और विवेक भईया पास के ही सब्जी मंडी में सब्जी खरीदने के लिए चल पड़े। 

मैं घर से जैसे ही बाहर निकला मेरी तरसती निगाहें उस हंसी वाली लड़की को ही इधर-उधर ढूंढने लगी थी। एक झलक मिल जाती उसकी, मन में यही खुदा से दुआ कर रहा था।

 हम और विवेक भईया बातें करते हुए सब्जी मंडी में आ गए थे। 

सब्जी लेकर हम दोनों एक दुकान से जैसे ही पलते कि ठीक सामने वही हंसी वाली लड़की खड़ी नजर आ जाती है। हमें तो विश्वास ही नहीं हो रहा था। 

टॉप स्कर्ट में तो वह और कयामत ढा रही थी। साथ भईया थे इसीलिए मैं चुपचाप खड़ा रहा।

 वह भैया को जानती थी। उसके पिता भी वही CCL में ही नौकरी करते थे। वह भी हमारे गया जिला के ही रहने वाली थी।

 घर आते समय भईया ने ही बताया, कि वह बहुत अच्छा डांस करती थी। वह हम लोगों के सरकारी क्वार्टर के ठीक पीछे वाले क्वार्टर में ही रहती थी। उसका नाम गरिमा था। 

उस रात जब सोने के लिए बेड पर आया तो गरिमा की खूबसूरत चेहरा फिर से देखने के लिए दिल में ऐसी कसक कसमसा रही थी कि मैं बार-बार रात को कोश रहा था कि आज वह इतनी लंबी क्यों थी। उसे दोबारा देखने की आस में मैं रात भर सो न सका था।

 सुबह में जल्दी से तैयार होकर यज्ञ स्थल की ओर भगवान से यही प्रार्थना करते हुए चला जा रहा था कि - " हे भगवान आज फिर उसे मेरे पीछे ही परिक्रमा में रखना। 

और शायद माता लक्ष्मी ने हमारी विनती सुन ली थी। मैं जैसे ही वहां पहुंचा गरिमा भी अपनी सहेली जिसका नाम सुमन था के साथ पहले से ही खड़ी थी।

 दोनों की आंखें चार हुई, होठों पर प्यारी मुस्कान उभरी। मगर उस दिन कोई कुछ बोला नहीं।

 मैं मन ही मन खुशी से झूमता हुआ मां लक्ष्मी को लाख-लाख बधाइयां देता परिक्रमा करने लगा। मेरे ही पीछे आज फिर गरिमा अपनी सहेली सुमन के साथ परिक्रमा करने लगी थी।

दोनों की आंखें बार-बार टकरा रही थी। मगर लब अभी तक खामोश ही थे। भले ही हम दोनों परिक्रमा मां लक्ष्मी के यज्ञ का कर रहे थे, मगर ध्यान दोनों का बस एक दूसरे के ऊपर ही था। कभी गरिमा आगे हो जाती तो कभी मैं। यही करते एवम् एक दूसरे को निहारते परिक्रमा उस दिन पूरा हो गया था। 

परिक्रमा पूरा करके हम दोनों चल पड़े थे अपने सरकारी क्वार्टर की ओर। अभी तक दोनों के लव तो खामोश ही थे, मगर दोनों के नयन बहुत कुछ कह रहे थे।

 वह भी मेरे पीछे ही आ रही थी। हम दोनों अभी भी बस चुपके-चुपके एक दूसरे को देख रहे थे।

अगले दिन मेरा परीक्षा था। इसीलिए मैं और विवेक भईया सुबह ही रांची चल गए। परीक्षा देकर उस दिन हम दोनों देर रात वापस लौटे थे। 

उस दिन मैं परिक्रमा करने नहीं गया जिसके कारण गरिमा से मुलाकात नहीं हुई थी। मगर उसकी याद बार बार आ रही थी।

 परीक्षा के अगले दिन में जल्दी से उठ कर परिक्रमा करने चल पड़ा था। आज यज का पांचवा दिन, और हम दोनों के मिलन का तीसरा दिन था। 

मैं जा तो रहा था भक्तिमय वातावरण में मां लक्ष्मी के 9 कुंडलीय अग्नि कुंड का परिक्रमा करने, मगर मैं गरिमा के रूप लावणय का इतना दीवाना हो गया था, कि मैं सब कुछ भूल कर अभी उससे मिलन की ख़ुशी में फिल्मी गाना गुनगुनाते चला जा रहा था। 

 मैं यज्ञ स्थल के पास पहुंचा तो उस समय वहां अभी बहुत कम ही लोग आए हुए थे। गरिमा भी कहीं नजर नहीं आ रही थी।

 मैं बुझे मन उसके आगमन पथ को निहारने लगा।

 कुछ ही मिनटों के बाद मेरे बुझे मन में खुशी के हिचकोले हीलोर मारने लगे। गरिमा अपनी सहेली सुमन के साथ मेरे तरफ ही आती नज़र आने लगी थी। आज समीज सलवार में वह साक्षात हुस्न की मल्लिका लग रही थी। 

उस दिन पहली बार उसने मुझसे बात की थी - " आपका एग्जाम कैसा गया ? " 

यह उसका पहला बोला हुआ वाक्य था। और संयोग से यह मेरा पहला एग्जाम भी था।

 " अच्छा गया। " मैं मुसकुराते हुए बोला था।

और एक बार बात क्या शुरू हुई कि उस दिन हम दोनों बातें करते हुए ही परिक्रमा पूरा कर लिए थे।

 जब सुमन बताई कि हम दोनों ने 125 बार परिक्रमा कर लिया है, तब जाकर हम दोनों को एहसास हुआ।

 हम दोनों ने तो पूरी परिक्रमा आज सिर्फ बातें करते हुए ही पुरे कर लिए थे।

 परिक्रमा पुरा होने के बाद भी हम दोनों एक दूसरे को निहारते हुए ही सरकारी क्वार्टर की ओर चल दिए थे।

           उस दिन के बाद हम दोनों एक दूसरे के बहुत करीब आ गए थे। 

बाकी के बचे यज्ञ के 4 दिन भी हम दोनों ने बातें करते, साथ जीने मरने का ख्वाब देखते परिक्रमा पुरा करते रहे। हम दोनों को कभी पता ही नहीं चलता था कि कब 125 बार परिक्रमा पूरा हो गया मगर परिक्रमा पूरा हो जाता था।

 इस बीच शाम में भी हम दोनों पास के ही एक पार्क में मिलने लगे थे। वह उस पार्क में डांस का अभ्यास करती थी। सुबह परिक्रमा करने आ जाती थी इसीलिए उसे डांस करने का समय नहीं मिलता था। जिसके कारण ही वह शाम में पार्क में आकर डांस का अभ्यास करती थी। नहीं तो वह प्रतिदिन सुबह में ही पार्क में डांस का अभ्यास करती थी।

 यज्ञ परिक्रमा के बहाने हम दोनों ने सिर्फ़ सात दिन ही साथ बिताए थे, मगर वो सात दिन ही सात जन्मों के बंधन में बंधने का अटूट वचन दे गया था।

 यज्ञ खत्म होने के अगले ही दिन गरिमा के साथ बिताए वो सात दिनों की सुनहरी याद को सीने में संजोए मैं अपने गांव वापस आ गया था।

 गांव तो आ गया था, मगर मेरा मन अब जरा भी यहां नहीं लग रहा था। बस हमेशा गरिमा की याद सताते रहती थी।

 मैं दोबारा बरकाकाना जाने का बहाना ढूंढने लगा। मगर कोइ बहाना मिल नहीं रहा था।

 गरिमा के साथ बिताए सात दिनों की मधुर मुलाकात को याद करते और उसके विरह में तड़पते सात महीना बीत गया था। 

तभी एक दिन भाभी ने मुझे एक ऐसी बात बताई कि मैं ख़ुशी से फुला न समाया। भाभी को मायके यानी की बड़काकाना आने का संदेशा आया था। विवेक भैया पापा बन गए थे। किरण भाभी ने प्यारी सी एक बच्ची को जन्म दिया था। उसी खुशी में घर में छटिहार का कार्यक्रम था। भाभी को उसी के लिए बुलावा आया था। सबसे खुशी की बात तो यह थी कि भाभी मुझे अपने साथ चलने को बोली थी।

 मैं तो कब से वहां जाने का कोई बहाना ढूंढ रहा था, जाने को तुरंत तैयार हो गया।

 गया से बड़काकाना बस जाती थी। मैं और भाभी अगले ही दिन बस में सवार होकर चल पड़े थे।

 बस की खिड़की वाली सीट पर बैठा, गरिमा से मिलने की खुशी में प्रफुल्लित होता उसी के यादों में खोया मैं बाहर के नजारों को निहारता चला जा रहा था। अचानक रास्ते में दूर से साइकिल चलाती हुई एक लड़की को अपनी ओर आते देखा तो वह मुझे गरिमा ही लगी। मैं ख़ुशी से नाच उठा। 

मगर जब वह लड़की पास आई तो देखा वह तो कोई और ही थी। मैं गरिमा के ख्यालों में इतना खोया हुआ था कि मुझे सभी लड़की आज गरिमा ही दिखाई दे रही थी। आज मन में बार-बार एक ही गाना गूंज रहा था -  " पंख होती तो उड़ आती रे, रसिया ओ बालमा………. ।" 

 बड़काकाना पहुंचते-पहुंचते शाम हो गई थी। उस समय मेरा खुशी का ठिकाना नहीं था, जब बस बड़काकाना के बस स्टैंड में आकर रुकी थी। मैं सात महीने बाद गरिमा से मिलने वाला था।

 रात किसी तरह गरिमा के साथ बिताए वो सात दिनों को याद करते करते बीत गया। बीता क्या रात भर सिर्फ करवटें बदलते रहे थे। बार बार रात को कोस रहा था कि वो आज कब खत्म होगी।

   मैं सुबह उठते ही पार्क में टहलने के बहाने चल पड़ा।

 उस दिन गरिमा पार्क में नहीं आई थी। मैं पार्क में उसी के इंतजार मैं बैठ गया। 

एक से दो, दो से तीन, तीन से चार घंटा हो गया, मगर वह उस दिन पार्क में नहीं आई थी। मुझे लगा कि शायद अब वह पार्क में डांस का अभ्यास करने नहीं आती होगी।

 मन को यही दिलासा देते हुए मैं पुनः विवेक भैया के सरकारी क्वार्टर की ओर चल पड़ा था।

 घर में आया तो रोज की भांति उस दिन भी भाभी फिल्मी गाना बजा रही थी- " वह जब याद आए, बहुत याद आए………… ।" 

 मैं गाना सुनकर मन ही मन मुस्कुरा उठा। सच में आज मुझे भी गरिमा की बहुत याद आ रही थी। 

उसकी एक झलक पाने के लिए मैं उतावला होता जा रहा था। मगर उसका कुछ अता पता नहीं चल पा रहा था। जिसके कारण मैं बहुत परेशान था। उसके बारे में मैं घर में किसी से पूछ भी नहीं सकता था, क्योंकि मेरे और गरिमा के प्यार के बारे में किसी को पता नहीं था।

दिन भर उदास गरिमा के बारे में ही सोचता रहा। शाम में मैं फिर गरिमा से मिलने के बहाने पार्क की ओर चल पड़ा था। 

मगर वह पार्क में शाम में भी नहीं आई। कुछ सोचकर उसी की यादों में डूबा मैं वहीं बैठ कर उसका इंतजार करने लगा। मगर वह शाम में भी नहीं आईं।

  अंत में न चाहते हुए भी मैं उदास उसके सरकारी क्वार्टर की ओर चल पड़ा। 

मगर उसके सरकारी क्वार्टर में ताला लगा हुआ था। घर में ताला लगा देख मैं और परेशान हो गया। आखिर वह गई तो कहां गई ? कहीं उसके पिताजी ने अपना सरकारी क्वार्टर तो नहीं बदल लिया था ?

 गरिमा को लेकर मन में उठ रहे सवालों के भबर में मैं इतना उलझा हुआ था कि उस रात मैं ठीक से सो भी न सका।

अगली सुबह मैं फिर से गरिमा से मिलने की उम्मीद लिए पार्क की ओर चल पड़ा था। 

मगर वहां आज फिर गरिमा नहीं आई थी।

 मैं उदास उसके साथ बिताए सात दिनों को याद करता हुआ पार्क में ही बैठ गया था। 

तभी वहां गरिमा की सहेली सुमन को अपनी ओर आता देख मैं खुशी से फूला नहीं समाया। उसे गरिमा के बारे में जरूर पता होगा। 

सुमन मेरे पास आई मैं खुशी से चहकता हुआ उसके पास जाकर खड़ा हो गया। मगर मुझे देखकर उसे ख़ुशी नहीं हुई। पता नहीं क्यों उसके चेहरे पर जमाने भर का गम साफ दिख रहा था।

  मेरे पूछने पर उसने जो बात बताई, उसे सुनकर मेरे पांव तले की जमीन खिसक गई। मैं गमों के अथाह सागर में डूब गया।

 गरिमा अब इस दुनिया में नहीं थी। एक शाम वह पार्क में डांस का अभ्यास करके जैसे ही वापस घर जाने को निकली कि तभी कुछ मनचले वहां आकर उसकी इज्जत लूटने की कोशिश करने लगे। वह उन्हीं दरिंदों से बचकर भागने के चक्कर में एक बस के नीचे आ गई थी। 

समाज के कुछ दरिंदों ने मेरी गरिमा को सदा के लिए मुझसे दूर कर उसे मौत के मुंह में धकेल दिया था।

 सुमन ने मुझे यह बात भी बताई कि गरिमा भी मुझे बहुत चाहती थी। वह मरते वक्त सुमन से बोली थी कि - " यदि कभी किशोर तुम्हें मिले तो कहना हम दोनों के साथ बिताए वो सात दिन, सात जन्मों के बंधन का एक अटूट वादा था। हम दोनों इस जन्म में नहीं मिले तो क्या हुआ, बाकी के छ: जन्म तो वह तुम्हारी बनकर ही रहेगी।"  

  सुमन की पूरी बात सुनकर मैं वहीं जमीन पर बैठ गया। आज मुझसे भगवान ने मेरी सारी खुशियां छीन ली थी।

 सच में मेरे, गरिमा के साथ बिताए वो सात दिन, साथ जन्मों तक अटूट बंधन में बंधने का एक संकल्प - एक वादा ही तो दे गया था।                                

                         कुमार सरोज

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