प्रेम ग्रंथ / Prem Granth । कविता । कुमार सरोज ।
प्रेम - ग्रंथ
कुमार सरोज
वट वृक्ष के नीचे आलिंगनबद्ध,
एक प्रेमी युगल दुनिया से दूर,
प्रेम का प्रेमालाप करते हुए,
एक दूसरे में बेसुध खोए थे।
निश्च्छल - निस्वार्थ प्रेम पुजारी,
प्यार की नई जोत जगाने वाले,
दोनों प्रेमी युगल लग रहे थे।
उसी वट वृक्ष के ठीक ऊपर,
एक मासूम प्रेमी युगल पंछी भी,
अपने आस पास से बेखबर,
उछल कूद व कलरव करते,
प्यार से चोंच लड़ा रहे थे।
दोनों पंछी का याराना भी,
तोता मैना की प्रसिद्ध,
प्रेमी युगल जैसी लग रही थी।
मानव प्रेमी युगल पे गिर जाता है।
इंसानी प्रेम के पुजारी प्रेमी को,
अपने प्यार में पंछी का दखल,
ज़रा भी रास नहीं आता है।
नर जोड़ा गुस्से से तिलमिला,
पास से मिट्टी का बड़ा टुकड़ा उठा,
युगल प्रेमी पंछी को मार डालता है।
अपने प्यार में विचरण कर रहे,
दुनिया से दूर बेचारे निर्दोष पंछी,
वैसे ही संग दम तोड देते हैं।
यह इंसान का कैसा दिखावटी प्रेम था,
जिसे अपनी दिलरुबा से प्रेम,
और दूसरों से इतनी घृणा थी ।
सिर्फ़ अपनी महबूबा से ही नहीं,
बल्कि जगत में सबसे प्रेम करना,
यही तो हमारा प्रेम ग्रंथ का सार है।
कुमार सरोज
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