नारी तेरे रुप हैं कितने / Nari Tere Roop Hain Kitane । कविता । । कुमार सरोज ।

 नारी तेरे रूप हैं कितने 
                     कुमार सरोज

कभी सीता बन संग अपने पति,
           जंगल - जंगल भटकती हो,
तो कभी सुहागरात को छोड़ पति,
             गैरों संग भाग जाती हो।   
       आखिर नारी तेरे रूप हैं कितने।

कभी सावित्री बन प्राण अपने पति,
          यमराज से वापस लाती हो,
तो कभी स्वार्थ बस अपने पति,
            को जान से मार देती हो।
आखिर नारी तेरे रूप हैं कितने।

मां बनकर अपनी बेटी के लिए पति,
            चांद का टुकड़ा चाहती हो,
वही सास बनकर अपनी बहू को,
 दहेज़ के लिए ज़िंदा जला देती हो।
 आखिर नारी तेरे रूप हैं कितने।

कभी लक्ष्मीबाई बन अपनी मातृभूमि,
      खातिर दुश्मनों से लोहा लेती हो,
तो कभी दौलत अपने पति की,
       अय्याशी में तुम लूटा देती हो। 
आखिर नारी तेरे रूप हैं कितने।
 
नारी की सबसे बड़ी दुश्मन,
            आज खुद तुम नारी ही हो,
 तभी तो जुल्म तुम्हीं करती हो,
        और जुल्म तुम्हीं ही सहती हो।
आखिर नारी तेरे रूप हैं कितने।

एक मां कोख में पल रही बेटी को,
       आज खुद ही मारना चाहती हो,
कभी सोचा है ओ मां तूने, 
              तुम भी तो एक बेटी हो।
आखिर नारी तेरे रूप हैं कितने।

 आज एक नारी खुद ही दूसरे की,
         इज्जत नीलाम करवा रही हो,
चंद पैसों के खातिर खुद ही,
        नारी की इज्ज़त लुटवा रही हो।
आखिर नारी तेरे रूप हैं कितने।

अभी वक्त है तुम संभल जाओ,
                ख़ुद आत्मनिर्भर बनो,
अब नारी - नारी की दुश्मन नहीं,
               सहारा और हिम्मत बनो।
आखिर नारी तेरे हैं रूप अनेक।
 
                           कुमार सरोज



टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

आपके बहुमूल्य टिप्पणी एवं सुझाव का स्वागत है 🙏

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अधूरी यात्रा /। Adhoori Yaatra । हिमांशु कुमार शंकर ।

उसकी मां / Usaki Maa । कहानी । कुमार सरोज ।

लव डे / Love Day । गजल । कुमार सरोज ।