इंसान / Insan । कविता । कुमार सरोज ।
इंसान
कुमार सरोज
इंसान तुम इंसान का, क्यों खून करते हो,
क्यों जिंदगी किसी का बर्बाद करते हो।
जो तुम दे नहीं सकते, वो तुम क्यों लेते हो,
क्यों दूसरों के काम में दखलंदाज करते हो।
माना की अब तुम्हारे लिए दुनिया में सब पराया है,
फिर दूसरों की दौलत को क्यों अपनाना चाहते हो।
आज हर कोई एक दूसरे से क्यों इतनी घृणा करते हो,
मानव मानव तो एक समान है फिर क्यों इतनी बैर रखते हो।
आज इंसान, इंसान का ही क्यों सबसे बड़ा दुश्मन हो,
क्यों अपनी इंसानियत का बार - बार गला घोंटते हो।
धरती पर सबसे बड़ा बुद्धिमान तो आज तुम ही हो,
फिर क्यों अपनी क्रूरता का ऐसा रूप दिखाते हो।
प्रेम, शांति और सौहार्द का तुम अपना रुप अपनाओ,
अभी वक्त है संभल जाओ, ज्यादा नहीं बिगड़े हो।
इंसान तुम इंसान का, क्यों खून करते हो,
क्यों जिंदगी किसी का बर्बाद करते हो।
कुमार सरोज
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