फेसबुकिया प्यार / Facebookiya Pyar । कविता । कुमार सरोज ।

               फेसबुकिया प्यार

                                   कुमार सरोज


आज मैंने भी ज़िंदगी की एक बड़ी जंग जीत लिया,

क्योंकि मैंने इंटरनेट वाला टच मोबाइल खरीद लिया।

दोस्त के कहने पर मैं फेसबुक चलाना शुरू कर दिया,

इसमें इतना मज़ा आया कि दिन रात उसी में रम गया।

दोस्त लड़का और लड़की, देश विदेश के बनता गया,

मस्त चेटिंग तो कुछ से कॉल पे बात भी शुरू हो गया।

एक शहरी लड़की तो तुरंत मेरे प्यार में दीवानी हो गई,

वो पहले ही दिन वॉयस नहीं वीडियो कॉल पे आ गई।

अब दिन रात एक दुसरे को ही फोन पर निहारने लगे, 

संग जीने व मरने की कसमें भी रोज़ दोनों खाने लगे।

अब मैं उसकी जरूरतों को खुशी से पुरा करने लगा,

कभी रीचार्ज, कभी कपड़े, कभी पैसा भेजने लगा।

अब हम दोनों के बीच सिर्फ़ फोन का ही दूरी था,

नहीं तो कई रातें हम दोनों प्यार करते बिताया था। 

एक दिन फेसबुक से बिना कुछ कहे गायब हो गई,

मैं समझा मेरी दिलरुबा किसी परेशानी में फंस गई।

नंबर जो दी थी व्हाट्सएप वाला वह भी बंद था, 

कैसे - किससे पता लगाऊं यही सोच में डूबा था।

मैंने अपने प्यार की कहानी एक दोस्त को बताया, 

उसका मेरे जैसा ही हाल था वह भी दुखड़ा सुनाया।

दोनों याद करते अपनी दिलरूबा की तस्वीर दिखाई,

देख होश उड़ गए दोनों के दिलरूबा एक ही थी भाई।

हे भगवान, यह कैसा फेसबुकिया प्यार था आज का, 

लज्जा न सही कम से कम, पर्दा तो करती जिस्म का।

         

                                      कुमार सरोज




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