साजन / Sajan । गज़ल । कुमार सरोज ।
साजन (गज़ल)
कुमार सरोज
साजन साजन रटते रटते,
मैं बन गई ऐसी विरहन,
बिन साजन अब नींद न आए,
क्या करूं मैं भगवन।
हप्ते गुजरे, महीने गुजरे,
अब बित गया पुरा साल,
फिर भी साजन आए नहीं,
मैं देखती रह गई राह।
कह गए थे दो चार महीने,
बाद ही मैं घर आऊंगा,
पर इतने निर्दय निष्ठुर होंगें,
मैं तो कभी समझी न।
हे भगवन मेरे साजन को,
तू बुरी नजरों से बचाना,
उन्हें सौतन न मिल जाए,
यही सोच डर लगता है।
मैं ही पागल थी जो उनके,
संग परदेस गई नहीं,
घर वापस बुलाने का अब,
जल्दी कोई यत्न करूं।
दिन- रात उनकी यादें,
मुझे चैन से जीने नहीं देती,
यही हाल रहा मेरे साजन,
तो मैं पगली बन जाउंगी।
जल्दी घर आ जाओ,
तेरे वियोग में दम घूंट रहा है,
बस जिंदा हूं मेरे साजन,
तेरी एक झलक के लिए।
साजन साजन रटते रटते,
मैं बन गई ऐसी विरहन,
बिन साजन अब नींद न आए,
क्या करूं मैं भगवन।
कुमार सरोज
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