ब्लाइंड स्टैचू / Blind Statue । कहानी । कुमार सरोज ।
ब्लाइंड स्टैचू
कुमार सरोज
कभी - कभी भगवान भी हम इंसानों के साथ भी बड़ा ही भद्दा मजाक हैं। उसे सब कुछ देता है, सुंदर शरीर एवं सभी तरह के गुण। लेकिन इन सबके बावजूद कुछ ना कुछ ऐसा कमी छोड़ देता है कि सब गुण और सुंदर काया धरा का धरा रह जाता है।
इस कहानी की नायिका किरण के साथ भी कुछ ऐसा ही है। वह सुशील, सुंदर एवं सर्वगुण संपन्न लड़की हैै। मगर विधाता उसकी आंखों की रोशनी बचपन में ही छीन लेते हैं। जिसके कारण ना चाह कर भी वह अपने आप को हमेशा असहाय महसूस करती थी।
किरण दिल्ली के एक रियायसी मोहल्ले लक्ष्मी नगर में रहती थी। वह अपने माता पिता की एकलौती संतान थी। उसके पिता एक प्राईवेट कम्पनी में काम करते थे। घर में उन तीनों के अलावा और कोई नहीं था।
किरण बचपन से ही अपने पड़ोस के एक लड़के मोहित के साथ ही कहीं आती जाती थी। वही किरण के सहारा और विश्वास का एकमात्र साथी था।
किरण और मोहित बचपन से ही बहुत अच्छे दोस्त थे। मोहित कभी उसे उसके अंधापन का अहसास नहीं होने देता था।
देखते ही देखते किरण 18 साल की हो जाती है। वह दिखने में बहुत ही खूबसूरत थी। इतना सुंदर काया था कि सभी को उसे बार बार देखने का दिल करता था। मगर उसकी अंधापन ही उसके लिए नासूर बना हुआ था।
किरण के लिए सबसे खुशी की बात यह थी कि उसके बचपन का साथी मोहित अब उसके मन मंदिर का देवता बन गया था। वह उसे बहुत चाहती थी। उसी के साथ पुरी जिंदगी बिताने का ख्वाब देखते रहती थी। शायद मोहित भी उसे प्यार करता था।
अब मोहित भी 24 साल का एक सुंदर एवम आकर्षक नौजवान हो गया था। उसने बहुत बड़े बड़े सपने पाल रखे थे। वह एक महत्वाकांक्षी लड़का था। वह दुनिया का सभी ऐशो आराम पाना चाहता था। इसके लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार था।
किरण उसे कभी कभी समझाती थी, कि इतने बड़े बड़े सपने देखना वो बंद कर दे। ये सब उन जैसे मध्यम वर्ग के लोगों के लिए संभव नहीं था। मगर मोहित तो उसे हर हाल में पाना चाहता था। अब वह दिन रात करोड़पति बनन का ही सपना देखता था।
समय बीतता जा रहा था। एक दिन मोहित किरण को किसी काम से चांदनी चौक चलने को कहता है। वह तुरंत साथ चलने को तैयार हो जाती है।
किरण बिना आंख के भी किसी चीज का अंदाजा सिर्फ छूकर या उसकी खुशबू से ही लगा लेती थी। वह आदमी को तो उसके महक से ही पहचान लेती थी। सभी लोग उसके इस गुण से बहुत प्रभावित होते थे।
मोहित किरण को तो चांदनी चौक चलने को घर से लाता है, मगर वह उसे लेकर धोखे से दूसरे जगह लेकर आ जाता है। किरण को मोहित पर बहुत विश्वास था, इसीलिए वह कुछ नहीं बोलती है।
उधर मोहित अपने सपनों और महत्वकांक्षाओ को पूरा करने के लिए एक बड़े नेता से किरण की इज्जत का सौदा किए हुए था। वह नेता मोहित को एक बहुत बड़ा कांटेक्ट दिलवाने वाला था। ऐसी लालच में आकर वह उस बेचारी अंधी लडकी किरण का सौदा कर दिया था।
किरण जैसे ही नेता के घर पहुंचती है, तो उसे अहसास हो जाता है कि वह कोई नई जगह पर आई हुई है। पूछने पर मोहित झूठ बोल देता है। उसे बताता है कि वह अपने चाचा के यहां आया हुआ है, और कुछ ही देर बाद दोनों चांदनी चौक चलेंगे।
नेता जी उस समय घर पर बैठे शराब पी रहे थे। किरण जैसी बला की खूबसूरत एवम कमसिन जवान लड़की को देख उनके अंदर के वासना रूपी कीड़ा उछलने लगता है। वे झट किरण को पकड़कर एक कमरे में लेकर चले जाते हैं।
वह अपने आप को उस दरिंदे नेता से बचाने की लाख कोशिश करती है, मगर कोई फ़ायदा नहीं होता है। आखिर वो थी तो अंधी लडकी ही, एक अंधी मूर्ति के जैसी।
किरण सब कुछ समझ जाती है, कि उसके विश्वास ने ही आज उसके साथ विश्वासघात किया था।
उधर मोहित अपनी जीत पर मन ही मन मुस्कुराते रहता है।
इस घटना के बाद किरण के अंधेरे जीवन में और अंधेरा छा जाता है। वह चुलबुली लड़की अब खामोशी की चादर ओढ़ लेती है।
मोहित का अब उसके घर में भी आना बंद हो गया था।
किरण के माता पिता उससे उसकी उदासी एवम चुप्पी की वजह जानने की बहुत कोशिश करते हैं, मगर किरण किसी को कुछ नहीं बताती है। सभी सोचते हैं कि मोहित के कहीं चले के कारण ही शायद वह उदास है।
समय बीतता रहता है। धीरे धीरे किरण अपने साथ घटी घटना को भुलाने की कोशिश करने लगती है।
किरण के माता पिता उसकी शादी की बात भी अब करने लगते हैं। मगर किरण शादी से साफ मना कर देती है। वह हमेशा उन लोगों के साथ ही रहना चाहती थी। आखिरकार किरण की जिद्द के आगे उसके माता पिता हार मान लेते हैं।
अचानक एक दिन मोहित किरण के घर आता है। उस समय किरण घर में नहीं थी। वह किरण की शादी लक्ष्मी नगर के ही एक बहुत बड़े बिजनेस मैन राजमणि मेहता के बेटे प्रमोद मेहता से करवाने का प्रस्ताव लेकर आता था। सुन किरण के माता पिता तुरंत हां कर देते हैं।
मोहित अपने बारे में किरण को कुछ भी बताने से मना कर देता है।
किरण पहले तो शादी के लिए मना करती हैं। मगर माता पिता के जिद्द के कारण अंत में हां कर देती है।
बहुत ही धूम धाम से किरण की प्रमोद मेहता के साथ शादी हो जाती है।
पुराने सभी बातों को भूल वह अपने ससुराल आ जाती है।
किरण को एक अनजाने घर में अपने अंधेपन के कारण शुरू शुरू तो थोड़ी दिक्कत होती है, मगर घर की नौकरानी मोनी के सहयोग से वह जल्दी ही पूरे घर से भी जान पहचान कर लेती है।
मोनी एक सुंदर जवान एवम अच्छे स्वभाव की लड़की थी। उसकी मां ही पहले राजमणि मेहता के यहां काम करती थी। मगर अब उसकी तबियत खराब रहने लगी थी। जिसके कारण ही अब अपनी मां के जगह पर वह इस घर में काम करती थी। उसके घर का ही कोई न कोई सदस्य शुरू से ही इस घर की नौकरानी रहते आ रही थी।
मोनी और किरण में कुछ ही दिनों में अच्छी दोस्ती हो जाती है। किरण कभी भी मोनी को नौकरानी नहीं समझती थी। वह हमेशा उसे अपनी बड़ी बहन ही मानती थी।
समय बीतता रहता है। समय के अनुसार देखते ही देखते किरण भी मां बन जाती है। मां बनकर उसे खुशी का ठिकाना नहीं रहता है। वैसे तो वह मोहित के विश्वासघात के कारण टूट सी गई थी। मगर मां बनने की खुशी में उसे फिर से मुस्कुराने का एक वजह मिल जाती है।
एक दिन की बात है। किरण अपने ससुर जी के साथ अपने होने वाले बच्चे का चेकअप करवाने पास के ही एक हॉस्पिटल में जाती है। उसका पति प्रमोद को कोई जरूरी काम था, इसीलिए वह साथ नहीं जाता है।
वह हॉस्पिटल में लेडीज डॉक्टर के केविन के आगे बैठी ही रहती है कि उसके बगल में एक महिला आकर बैठ जाती है, और उससे बातें करने लगती है। उस समय उसके ससुर दवा लाने हॉस्पिटल से बाहर गए हुए थे।
वह महिला जिसका नाम सुमन था, किरण के बगल में बैठते ही पूछ बैठती है -
" तुम्हारे साथ जो आदमी आए हैं वो कौन हैं ?
" क्यों..... ? वो मेरे ससुर जी हैं। "
" तुम्हारे ससुर जी का क्या नाम है ? "
" राजमणि मेहता। मगर तुम ये सब क्यों पूछ रही हो ? "
" तुम्हारे साथ धोखा हुआ है। "
" धोखा..... ! कैसे ... ?
" तुम्हारे साथ जो आदमी आया है वह तुम्हारा पति प्रमोद है। तुम्हारा ससुर राजमणि मेहता नहीं। "
" यह तुम क्या बक रही हो। वो मेरे ससुर राजमणि मेहता हैं। मैं अंधी हूं तो क्या हुआ, किसी भी आदमी को मैं उसके महक से पहचान लेती हूं। "
" किरण, तुम सच्चाई सुनोगी तो तुम्हें अपने कान पर यकीन ही नहीं होगा। जिसे तुम अपना पति समझ रही हो दरअसल वे तुम्हारे ससुर हैं, और जिसे तुम अपना ससुर समझ रही वो तुम्हारे पति। "
" तुम इतने दावे से कैसे कह सकती हो। आखिर तुम हो कौन ? "
" मैं प्रमोद की पहली पत्नी सुमन हूं। "
सुमन की बातें सुनते ही किरण सन्न रह जाती है। उसे यह तो पता था कि उसके पति की पहली पत्नी उसे छोड़ सुहागरात के अगले दिन ही किसी के साथ भाग गई थी। लेकिन अब सुमन की बातें सुनकर उसे बड़ा ही अजीब लगने लगा था। क्योंकि आज तक कभी उसका पति उसके साथ घर से कहीं बाहर नहीं गया था। हमेशा काम का बहाना बनाकर ससुर जी को ही साथ भेज देते थे। आज भी उसके साथ ससुर ही आए थे। जबकि सुमन बोल रही थी कि उसके साथ उसका पति प्रमोद मेहता आया है। किरण के मन में बहुत सारे सवालों का बवंडर उठने लगता है।
मगर वह सुमन से कुछ और पूछती कि तभी वह यह कहकर कि ~ " उसका पति दवा लेकर आ रहा है " चली जाती है।
किरण के दिलों दिमाग में सुमन के बातों से उथल पुथल मच जाती है। सुमन के कहे अनुसार उसका पति दवा लेकर आ रहा था, जबकि किरण जानती थी कि उसके साथ तो उसके ससुर आए हैं। किरण अपने आसपास की खुशबू और सामने वाले के शरीर की महक से जगह या आदमी को आसानी से पहचान लेती थी, और इसमें वह कभी धोखा नहीं खा सकती थी। मगर सुमन के बातों से भी लग रहा था कि वह भी झूठ नहीं बोल रही थी। आखिर सच्चाई क्या था ?
किरण जितना सोच रही थी, उतना ही और सवालों के भंवर में फंसती ही जा रही थी।
तभी प्रमोद किरण का ब्याहता पति जिसे भले वह अभी तक अपना ससुर समझ रही थी, और अभी भी वह उसे अपना ससुर ही मान रही थी, वहां आ जाता है।
दोनों फिर आपस मैं बातें करते हुए बाहर की ओर चल देते हैं।
किरण के मन में अभी भी सावालों का तूफान उबाल मार रहा था। वह अभी किसी से कुछ पूछ भी नहीं सकती थी।
किरण अपने ससुर मगर वास्तव में वह उसका पति प्रमोद मेहता ही था के साथ जैसे ही अपने घर आती है, तो वह ऑफिस जाने को बोलकर वहां से चला जाता है।
किरण अपने कमरे में आते ही धड़ाम से बिस्तर पर लेट जाती है। उसे समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि वह आखिर सच्चाई का पता कैसे लगाए।
किरण सच्चाई जानने की उधेड़बुन में बिस्तर पर लेटी अभी करवटें बदल ही रही थी कि तभी मोनी कमरे में आ जाती है।
मोनी किरण को बिस्तर पर उदास लेटी देख झट उसके बगल में आकर बैठ जाती है।
मोनी के लाख पूछने पर किरण पहले तो कुछ नहीं बताती है, मगर अंत में उसके जिद्द के आगे उसे अपनी उदासी का कारण बताना ही पड़ता है।
किरण हॉस्पिटल में सुमन के मिलने से लेकर उसके साथ हुई सारी बात को पुरे विस्तार से बताती चली जाती है।
सुनते ही मोनी चुपके से चुपचाप उस कमरे से जाने लगती है। मगर किरण उसकी चुप्पी और बिना कुछ कहे और पूछे यूहीं जाने की आहट से समझ जाती है कि उसे जरूर इसकी सच्चाई का पता है।
वह अपनी कसम देकर मोनी को कमरे से बाहर जाने से रोक देती है। मोनी न चाहकर भी रुक जाने को मजबूर हो जाती है।
उस समय घर में उन दोनों के अलावा कोई और नहीं था।
मोनी किरण को तो पहले कुछ नहीं बताती है। मगर जब वह भावुक होकर सच्चाई जानने के लिए बच्चों के जैसे रोने लगती है तो उसकी दशा और अपने लिए उसके दिल में प्यार देखकर सब कुछ बताते चली जाती है।
मोनी के मुंह से सारी सच्चाई जान कर किरण के पैर तले की जमीन ही खिसक जाती है। जहां उसके ससुर राजमणि मेहता एक नम्बर का अय्याश और कामुक इंसान था, वही उसका पति प्रमोद मेहता एक नपुंसक इंसान था। उसके अंदर मर्दानी जोश ही नहीं था। उसकी इसी कमजोरी के कारण सुमन सुहागरात के अगले ही दिन घर छोड़कर चली गई थी। मगर इनलोगों ने उसे घर छोड़कर अपने प्रेमी के साथ भगाने का इल्जाम लगाकर अपने पैसे और रुतबा के दम पर समाज में इस बात को फैला दिया था कि प्रामोद की बीबी चरित्रहीन थी।
राजमणि पहले मोनी की मां को और अब मोनी को भी अपने गंदी हवस का शिकार बनाता था। राजमणि के दबंगई और अपने आप को गरीबी के बोझ तले दबे होने के कारण मोनी या उसकी मां अभी तक सब कुछ सहते आ रही थी। और शायद आगे भी सहने को मजबूर थी।
प्रमोद के नपुंसकता वाली बात किसी को पता नहीं चले इसीलिए राजमणि ने मोहित के साथ मिलकर ही किरण जैसी अंधी लडकी से प्रमोद की शादी करवाया था। ताकि रात को राजमणि अपने बेटे के जगह पर खुद बहू के साथ सोकर उसे मां बना दे। प्रमोद की पत्नी के मां बनते ही उसके ऊपर लगा नपुंसकता का दाग सदा के लिए दूर हो जाता।
इस पूरे कहानी का सूत्रधार यहां भी किरण के पुराने विश्वासघाती दोस्त मोहित ही था। वह राजमणि के कंपनी में ही अब शेयर होल्डर था, और उसके सभी गुनाहों में बराबर का भागीदार भी था।
मोहित यह सभी काम भी अभी तक पर्दे के पीछे ही रहकर कर रहा था।
किरण को अब समझ में आ रहा था कि आखिर उसके मां बनने के कारण उसके ससुर इतने खुश क्यों थे। तभी तो अभी से ही बच्चे के जन्म की खुशी में पार्टी मानने का सारा कार्यक्रम तय हो गया था। होटल तक बुक हो गया था।
किरण को जब मोनी से पुरी वास्तविकता का पता चला तो वह फुट फुट कर रोने लगी लगती है। उसके अपनों ने ही उसके साथ फिर से एक बार उसके अंधेपन का फायदा उठाते हुए विस्वासधात किया था। इस बार तो वह पुरी तरह से टूट ही चुकी थी।
मोनी उसे समझाने की बहुत कोशिश करती है। आज समाज में किसी भी औरत के मजबूरी का फायदा उठाने के लिए तो लोग तत्पर खड़े थे।
किरण के मन में बार बार अपने आप को खत्म करने का विचार आते रहता है। वह इस बेशर्म और जालिम समाज से अब पुरी तरह से ऊब चुकी थी। मगर अपने पेट में पल रहे बच्चे का ख्याल आते ही, जो अगले ही महीने इस धरा पर आने वाला था, के कारण सोचने पर विवश हो जा रही थी।
काफी सोच विचार एवम मोनी के बहुत समझाने के कारण अंत में किरण अपने सारे हालातों से पत्थर की मूर्ति बनकर समझौता करने का निश्चय कर लेती है।
वैसे भी तो वह अब एक अंधी मूर्ति या यूं कहें ब्लाइंड स्टैचू की तरह ही तो सिर्फ जिंदा लाश बची थी।
कुमार सरोज
Nice
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंलाज़वाब कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
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