आम आदमी / Aam Aadami

         आम आदमी
                           कुमार सरोज

                   डाक बंगला चौराहा। पटना शहर के सबसे व्यस्त चौराहों में से एक चौराहा था यह। शाम के 4 बज रहे थे। ज्यादा भीड़ होने के कारण सड़क पर इस समय गाड़ियां धीरे धीरे रेंग रही थी। चौराहे पर सभी तरफ जाम लगा हुआ था। 
मैं भी अपनी बाइक से जैसे ही डाकबंगला चौराहे पर पहुंचा कि सामने का सिग्नल रेड हो गया। मैं तुरंत रुक गया। कुछ लोग शायद बहुत जल्दी में थे, तभी तो सिग्नल रेड होने के बावजूद भी अपनी गाड़ी बढ़ाते चले गए।
                    चौराहे के एक किनारे दो तीन पुलिस वाले खड़े आपस में गप्पे लगा रहे थे। मगर किसी ने गाड़ी वालों को जो रेड सिग्नल तोड़ कर जा रहे थे, उसे रोकने या टोकने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे थे।

                     मैं अभी चौराहे पर आकर रुका ही था कि तभी मेरे बगल में एक कार भी आकर रूक जाती है। कार के खडा होते ही एक लड़का हाथ में खिलौना लिए पास आ जाता है। वह कार वाले के आगे खिलौना लेने के लिए गिड़गिड़ाने लगता है। मगर कार वाला साफ मना कर देता है। जबकि कार के पिछली सीट पर एक बच्चा भी बैठा था।
                  उस समय चौराहे पर सामान बेचने वाले और भी बहुत से लड़के एवं बुजुर्ग महिलाएं नजर आ रही थी। चौराहे पर कुछ बच्चे एवम महिलाएं भीख भी मांग रहे थे। भीख तो बहुत कम लोग दे रहे थे, मगर अधिक लोग उसे मुफ्त का प्रवचन जरुर सुना दे रहे थे। यही तो आज सबसे सस्ता मिलता था हिंदुस्तान में ! तभी तो जिसे देखो वह मुफ्त की सलाह एवं प्रवचन रूपी ज्ञान देते रहते हैं।
               मेरे ठीक सामने चौराहे के दूसरी तरफ 30 - 32 साल की एक महिला गोद में अपने 4 साल के बच्चे को लिए एक महंगी स्पोर्ट्स बाइक वाले युवक के पास खड़ी उसी से भीख मांग रही थी। वह महिला जीर्ण शीर्ण फटी साड़ी पहने  हुए थी। गोद में जो बच्चा था उसका शर्ट भी फटा हुआ था। नीचे तो वह बच्चा कुछ पहने हुए भी नहीं था। दोनों के चेहरे देखने से साफ पता चल रहा था कि दोनों बहुत भूखे थे।
                        महंगी बाइक पर बैठा रईसजादा भीख में 5 रूपया भी तो देता नहीं है, मगर 5 हजार का प्रवचन उस भिखारिन महिला को मुफ्त में अभी तक सुना ही रहा था। वैसे भी जब पेट में खुद्दी हो तो बुद्धि तो निकलता ही है। 
                  तभी हमारे बाएं तरफ का सिग्नल ग्रीन हो जाता है। उस तरफ खड़े वाहन वाले अपने गंतव्य को जल्दी पहुंचने के चक्कर में गाड़ी को स्टार्ट करते ही फुल स्पीड में आगे बढ़ने लगते हैं।
             उधर उस भिखारिन महिला को महंगी बाइक वाला रईसजादा अभी तक प्रवचन सुना ही रहा था, कि तभी जिधर का सिग्नल ग्रीन हुआ था, उधर से एक बाइक वाला गाड़ियों को ओवरटक करता हुआ तेजी से दूसरी तरफ आगे निकलने की होड़ में उस महिला से एकदम सटकर जैसे ही निकलने लगता है कि बाइक के हैंडल से उसके उसी हाथ में ठोकर लग जाती है जिस हाथ से वह बच्चा पकड़े हुए थी। महिला के हाथ से बच्चा छूट कर सड़क पर गिर जाता है। बाइक वाला बिना बच्चे का परवाह किए सरपट भागता चला जाता है। वह तो शुक्र था उपर वाले का कि बच्चे के ऊपर एक गाड़ी चढ़ते चढ़ते रह गई थी। 
               बच्चे की मां को तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह आखिर हो क्या गया था। वह अपने जिगर के टुकड़े को सड़क पर गिरा लहूलुहान देख तड़प उठती है। वह मदद की आस लगाए चौराहे पर खड़े सभी लोगों के आगे गिड़गिड़ाने लगती है। मगर कोई मदद को आगे नहीं आता है। चौराहे पर कुछ देर के लिए अफरा तफरी का माहौल बन जाता है।
             अभी तक पुलिस वाले भी सिर्फ गाड़ियों को इधर-उधर भेजने की अपने ड्यूटी में लगे हुए थे। किसी ने उस अभागन गरीब महिला की ओर ध्यान भी नहीं दिया था। वैसे तो हमारे देश की पुलिस राजनेताओं एवम पूंजीपतियों के कुत्ते भी ढूंढने के लिए गली गली की खाक छानती है। 
यही तो आज हमारे देश का दुर्भाग्य था, कि यहां गरीबों के साथ आज भी सौतेला व्यव्हार हो रहा था।
                  सभी पुलिस वालों की कार्यशैली से लग रहा था, कि शायद इस चौराहे से किसी राजनेता का काफिला गुजरने वाला था।
               उस चौराहे पर बहुत सारे गाड़ी वाले खड़े थे। कोई भी घायल बच्चे को अस्पताल पहुंचा सकता था। मगर ऐसा किसी ने नहीं किया। हां उल्टे कुछ लोगों ने अपने पॉकेट से मोबाइल निकाल कर उस महिला की बेबसी का वीडियो बनाने लगे थे। क्या समय आ गया था ? उस महिला का मदद तो कोई नहीं कर रहा था, मगर उसकी हालत देखकर अपना मनोरंजन सभी कर रहे थे। आज का आम आदमी इतना संवेदनहीन आखिर कैसे हो गया था ? शायद मैं भी हो गया था। तभी तो मैं भी सिर्फ अभी तक तमाशा ही देख रहा था।
                    जब मदद की गुहार लगाते लगाते महिला थक जाती है, तो वह अंत में अपने घायल बेटे को गोद में उठाकर पैदल ही एक तरफ तेजी से चल पड़ती है।
               आज तक सड़क तो उस बच्चे का साथी ही था। उसी पर तो वह सोता, खेलता और हमेशा रहता भी था। मगर आज उसके उसी सड़क साथी ने दगा देकर उसे घायल कर दिया था।
             महिला के पीछे पीछे चौराहे के पास खड़े आम आदमी भी चल पड़ते हैं। वहां का नजारा देख कर ऐसा लग रहा था मानो आगे आगे कोई तमाशा दिखाने वाला चल रहा है, और पीछे से देखने वाले लोगों का हुजूम। वाह रे आज के सभ्य समाज के बुद्धिमान आम आदमी ! तुम्हें तो उस मां की पीड़ा भी तमाशा जैसा खुशी दे रहा था। तभी कोई उसकी मदद को आगे तो नहीं आ रहा था, मगर पीछे पीछे सभी उसकी बेबसी का दीदार करने के लिए चल रहे थे। यही नहीं कुछ लोग तो अभी भी  अपने मोबाइल से उस महिला का वीडियो बना रहे थे। 
                 वह महिला जिसका नाम फुलवा था, उसका अपने बेटे सोनू के अलावा इस दुनिया में और कोई नहीं था। वह चौराहे से कुछ ही दूरी पर बने एक फ्लाईओवर पुल के नीचे रहती थी। वहां पर और बहुत से भिखारी रहते थे। फुलवा के पति रिक्शा चलाते थे। मगर 2 साल पहले ही एक कार की चपेट में आने से वो मर गए थे। फुलवा के पास उसके पति ही मात्र एक जमा पूंजी थे। इसीलिए उनके मरते ही वह कंगाल हो गई थी। जब उसे कुछ समझ में नहीं आता है तो वह अपने आसपास रहने वाले भिखारीयों को देख कर ही अपना पेट और मासूम बेटे को पालने के लिए भीख मांगने लगती है।
                 उसके पति जब जिंदा थे तब भी वह इसी फ्लाईओवर पुल के नीचे रहती थी। वहां पर और बहुत से रिक्शा एवं ठेला चलाने वाले लोग रहते थे। खुले आसमान ही सबका बसेरा था।
                फुलवा अपने घायल बेटे को लेकर चौराहे से कुछ ही दूर जाती है कि उसकी नजर एक बड़े प्राइवेट हॉस्पिटल के ऊपर पड़ जाती है। वह अपने बेटे के जान बचाने के ललक में उस महंगे हॉस्पिटल की ओर चल देती है। वैसे भी सरकारी अस्पताल वहां से अभी चार-पांच किलोमीटर दूर था। आम आदमी की भीड़ भी अभी तक तमाशबीन बन पीछे पीछे चली आ रही थी। 
                    फुलवा बेटे को लेकर उस प्राइवेट हॉस्पिटल में तो आ गई थी। मगर कंपाउंडर एवं और दूसरे स्टाफ बिना पैसा जमा किए उसके बेटे के इलाज करने से साफ मना कर देते हैं। इलाज से पहले उसे 50 हजार रुपया जमा करने को कहा जाता है। सुन फुलवा तड़प उठती है। वह आज तक कभी एक हजार रुपया भी इकट्ठे नहीं देखी थी, और यहां तो पचास हजार अस्पताल वाले इलाज के पहले ही जमा करने की जीत पर अड़े थे।
 वह अपने बेटे की जान बचाने के लिए अस्पताल के कंपाउंडर,  डॉक्टर एवं अन्य दूसरे स्टाफ के आगे गिड़गिड़ाने लगती है। मगर किसी के ऊपर जूं तक नहीं रेंगता है।
                  अंत में वह अपने घायल बेहोश बेटे को अस्पताल के फर्श पर रखकर अभी तक पीछे-पीछे आ रहे आम आदमी के सामने अपनी फटी साड़ी के आंचल को फैलाकर बेटे के जिंदगी की भीख मांगने लगती है। 
उस समय हजारों की संख्या होगी वहां पर, मगर कुछेक को छोड़कर कोई मदद नहीं करता है। मैं भी अपने पॉकेट की कुल पूंजी 500 रुपया फुलवा को दे देता हूं। भला मेरे जैसे एक गरीब लेखक से इससे ज्यादा और उम्मीद ही क्या किया जा सकता था। 
            मुश्किल से बेचारी फुलवा को 4 - 5 हजार रूपए ही भीख में मिल पाता है। शायद आज के आम आदमी को फोकट में ही तमाशा देखने में ज्यादा मजा आता था।
               फुलवा हार नहीं मानती है। वह भीख में मिले पैसों को लेकर फिर से डॉक्टर के पास जाती है। उसे उम्मीद था कि शायद अब तक डॉक्टर का मन बदल गया होगा।
             मगर बिना 50 हजार रूपए जमा किए तो यहां कोई बच्चे को छूने को भी तैयार नहीं था। डॉक्टर तो भगवान के रूप होते हैं। मगर आज के इस युग में शायद यह सिर्फ एक कहावत बनकर रह गया था। तभी तो शायद फुलवा के साथ ऐसा हो रहा था। नहीं तो अभी तक डॉक्टर बच्चे के सिर से लगातार निकल रहे खून को तो कम से कम पट्टी बांधकर बंद ही कर सकते थे। 
                अंत में फुलवा को किसी से कोई मदद की उम्मीद नहीं दिखती है, तो वह थक हार कर वहां से अपने बेटे को उठाकर सरकारी अस्पताल में जाने का मन बना लेती है। 
                  बेटे को गोद में उठाते ही एक अभागन दुखियारी मां का कलेजा धक से रह जाता है। अब तक सोनू की सांसे थम चुकी थी। 
               फुलवा के ऊपर तो दुखों का पहाड़ ही टूट कर गिर जाता है। उसके शरीर का खून सूख जाता है। उसका बेटा ही तो अब उसका एक मात्र सहारा था। वह चुपचाप मूर्तिवत बन अपने मरे हुए बेटे को गोद में लिए वही जमीन पर बैठ जाती है। अब उसे किसी से कुछ को बचा ही नहीं था। 
                   फुलवा के पीछे पीछे तमाशाबीन बन चले आ रहे आज के आम आदमी के अंदर का इंसानियत फुलवा के बेटे के मरते ही जागृत होने लगती है। सबों का अंतरात्मा भी अब खून की बलि लेकर करवट बदलने लगी थी। तभी तो वहां पर उपस्थित सभी लोग फुलवा के बेटे के मरते ही उसे इंसाफ दिलाने के लिए उतावले हो जाते हैं। 
                   सभी आज के आम आदमी अपने स्वभाव अनुसार उस प्राइवेट हॉस्पिटल में तोड़फोड़ शुरू कर देते हैं। अस्पताल में भगदड़ मच जाती है।
              उधर फुलवा अभी भी वैसे ही बैठी अपने मरे हुए बेटे को अपलक देखे जा रही थी। उसके आंखों से आंसू निकलना भी अब बंद हो गया था। शायद अब आंसू सुख गए थे।
                   आज के इस कलयुगी आम आदमी के बदलते रंग रूप को देखकर फुलवा के अंदर का गुस्सा अब धीरे धीरे धधकने लगता है। जब उससे रहा नहीं जाता है तो वह अचानक अपने मृत बेटे को वही फर्श पर रख अपने सीने की धधकती आग की ज्वालामुखी को प्रज्वलित कर सभी पर अपनी भड़ास निकालने लगती है। 
                         सभी अभी जहां तोड़ फोड़ कर रहे थे, वहीं अब फुलवा के रणचंडी रूप को देख शांत हो जाते हैं। 
          फुलवा कहते जा रही थी -   "  मैं पूछती हूं तुम सबो के अंदर का इंसानियत उस समय कहां थी, जब मेरा बेटा घायल बीच सड़क पर लेटा था। उस समय किसी ने मदद की एक छोटी पहल तक नहीं किया। अब जब मेरा बेटा मर गया है तो आप लोग सहानुभूति दिखाने के लिए इस अस्पताल में तोड़फोड़ करने लगे हैं। मैं पूछती हूं यह कैसी नैतिकता है। जब मुझे मदद की दरकार थी तब आप सभी तमाशाबिन बन मेरी बेबसी पर हंसते हुए मेरा वीडियो बना रहे थे। 10 - 20 रूपए की मदद ना सही, कम से कम उस समय कोई सरकारी अस्पताल तक भी अपनी गाड़ी से पहुंचा देता तो मेरा बेटा आज जिंदा होता। हत्यारा इस अस्पताल वाले नहीं हैं, हत्यारा तो तुम सब आम आदमी हो। अस्पताल वाले तो व्यापार के लिए ही बैठे हैं, फिर मुफ्त में किसी का इलाज क्यों करेंगे। मगर तुम सब तो देश और समाज के रचयिता कहलाने वाले आम आदमी हो, फिर भी तुम लोगों ने भी तो मुफ्त में मेरी मदद नहीं की........ ।"   
                    फुलवा बोलते बोलते बीच बीच में रोने लगती थी। फिर कुछ देर के बाद वह अपनी आंसू पोंछ कर बोलने लगती थी - " वैसे भी आज यहां हम गरीबों की किसकी चिंता है। हम गरीबों के मां बाप भी ऐश मौज में हमें जन्म देकर जमीन पर लाकर छोड़ देते हैं कीड़े मकोड़ों के जैसे। तभी तो हम जिन्दगी भर कीड़े मकोड़े बनकर ही संघर्ष करते हुए जमीन पर ही रेंगते रहते हैं। हम गरीबों की चिंता न कभी हमारे मां बाप ने किया, ना ही कभी इस देश ने, ...........  "।    
              फुलवा बोलते रहती है और आम आदमी अब सभ्य दर्शक बनकर सिर्फ सिर झुकाए सुनते रहते हैं। सभी के सीने में फुलवा की तीखी बातें नुकीली तीर की तरह चुभ रही थी।
             उधर फुलवा बोलते बोलते अचानक चक्कर खाकर अपने बेटे के बगल में ही गिर जाती है। गिरते ही उसका शरीर भी निर्जीव हो जाता है। वह भी मर गई थी।
              फुलवा के मरते ही आज के आम आदमी लज्जा वश अपनी सिर झुकाए चुप चाप अपने गंतव्य की ओर चल पड़ते हैं।
                 जमाने के रंग में तो मैं भी रंगा हुआ था ही, मैं भी चुप चाप अपने निवास स्थान की ओर चल पड़ता हूं। 
                  सच में हमें भी अब यह महसूस हो रहा था कि आज के आम आदमी के अंदर से इंसानियत पुरी तरह से विलुप्त होते जा रही थी। शायद अब एक आम आदमी को अपने आप को पहचानने का वक्त आ गया था।

                         कुमार  सरोज

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