सिंगल पैरेंट / Single Parent । कहानी । कुमार सरोज ।

          सिंगल पैरेंट      
                      कुमार सरोज
                        
            यह कहानी एक मजदूर पिता महेश और उसकी बेटी आकृति के संघर्ष और जिद्द की है। दोनों समाज और सरकार के व्यवस्था को बता देते हैं कि अगर अकेला इंसान भी चाहे तो क्या नहीं कर सकता था। बस इंसान को कभी अपने जिंदगी से निराश नहीं होना चाहिए।
                  महेश की पत्नी कजरी जब आकृति 4 साल की थी तभी मर गई थी। कजरी को एक असाध्य बीमारी था। घर में पैसे की तंगी ने उसकी जान ले ली थी। वह अपनी बेटी को पढ़ा लिखाकर डाक्टर बनाना चाहती थी, ताकि उसके जैसे गरीब परिवार के लोगों का भी कम से कम पैसे में इलाज हो सके। उसकी यही अंतिम इच्छा भी थी। 

                  कजरी के मरने के बाद बेचारा महेश एकदम टूट सा जाता है। वह अपनी पत्नी की अंतिम इच्छा को किसी भी हालात में पुरा करने के लिए अपने गांव को छोडकर पटना आ जाता है।
                महेश पटना आकर ठेला चलाने लगता है। कुछ ही दिन के बाद वह अपनी बेटी आकृति का एडमिशन पटना के एक अच्छे प्राइवेट स्कूल में करा देता है।
            समय बीतता रहता है। अब आकृति 13 साल की हो गई थी। वह क्लास 7 में पढ़ती थी। 
           आकृति अभाव में पलने के बाबजूद भी वह बचपन से ही बहुत साहसी, निडर एवम विलक्षण प्रतिभा की धनी थी। इसीलिए वह अपने क्लास के साथ साथ पुरे स्कूल में भी हमेशा प्रथम आती थी।
             महेश भी अपनी बेटी को कभी किसी चीज की कमी नहीं होने देता था। पैसा की कमी उसे नहीं हो, इसलिए वह सामान से भरा बोरा एवम थैला भी खुद ही माथे पर उठाकर गोदाम या गाड़ी पर रखता था। इतनी मेहनत के बाबजूद भी महेश हमेशा खुश रहता था। क्योंकि उसकी बेटी अपने मां के देखे सपने की ओर तेज़ी से बढ़ रही थी। बेटी को पढ़ाई करने में आस पास के माहौल से किसी प्रकार का कोई दिक्कत नहीं हो, इसलिए वह एक अच्छे कॉलोनी में एक कमरा भाड़े पर लेकर रहता था।
                दोनों बाप बेटी अपनी जिंदगी से बहुत खुश थे।
        महेश जिस कॉलोनी में रहता था, उसी कॉलोनी में राजेश्वर भी अपने परिवार के साथ रहता था। उसकी उसी कॉलोनी में एक किराने की दुकान थी।
                 महेश्वर का एक बेटा भी था प्रवीण। वह भी आकृति के साथ ही उसी के स्कूल में पढ़ता था। वह भी पढ़ने में तेज था, मगर हमेशा वह आकृति से कम अंक ही परीक्षा में लाता था। राजेश्वर की पत्नी का नाम नीलम था। उसके घर में बस तीन लोग ही थे।
                उसी कॉलोनी में आकृति की बेस्ट फ्रेंड नेहा भी रहती थी। नेहा के पिता आर्मी में नौकरी करते थे। मगर 2 साल पहले ही वो बॉर्डर पर शहीद हो गए थे। अभी उसके साथ घर में उसकी मां रतना और उसकी बुआ प्रीति रहती थी। बाकि के सभी लोग गांव में रहते थे। नेहा की मां सिर्फ उसे पढाने के लिए ही पटना में  किराए पर घर लेकर रहती थी।                             तीनों परिवार का आपस में बहुत अच्छा संबंध था। सभी में महेश ही सबसे गरीब था। मगर किसी को इस बात का जरा भी परहेज नहीं था। इसका मुख्य वजह शायद आकृति का पढ़ाई में बहुत तेज होना ही था।
            रामेश्वर तो महेश को अभी से ही अपना समधी मान चुका था। वह अपने बेटे प्रवीण की शादी आकृति से कराना चाहता था।
               आकृति और प्रवीण भी अभी से ही एक दूसरे का बहुत ख्याल रखते थे। साथ में ही दोनों घर पर पढ़ते, खेलते एवम स्कूल भी जाते थे। दोनों में से कोई एक बीमार पड़ता था तो दूसरा उसकी ख्याल रखता था।
खाली समय में दोनों घंटों अकेले बैठकर आपस में बाते करते एवम भविष्य की योजनाओं की कल्पना अभी से ही करते रहते थे।
               सभी का परिवार मिलजुल कर ही सभी पर्व एवम त्योहार भी मानते थे। तीनों परिवार आपस में बहुत खुश थे।
             अचानक आकृति एवम नेहा के जीवन में एक भूचाल आ जाता है, और उस भूचाल से सबों को परिवार बिखर जाता है।
            एक दिन स्कूल से छुट्टी के बाद आकृति अपने क्लासरूम से निकलकर अपने बस की ओर पैदल ही जा रही थी कि रास्ते में ही स्कूल का ही एक बस ड्राइवर मोहन उसे अकेला देख उसकी इज्जत लूट लेता है। वह बेचारी अबोध बच्ची चाहकर भी कुछ नहीं कर पाती है।
        आकृति जब बेहोश हो जाती है तब वह बहसी दरिंदा उसे उसी हालत में छोड़कर भाग जाता है।
               जंगल के आग की तरह पुरे शहर में यह खबर फैल जाती है। मीडिया वाले अपने टीआरपी के चक्कर में इसी घटना को बार बार टीवी पर दिखाने लगते हैं। कुछ स्थानीय नेता भी अपनी नेतागिरी चमकाने के एवम एक गरीब ठेले वाले की बच्ची को न्याय दिलाने के लिए हंगामा एवम प्रदर्शन करने लगते हैं।
              इन सब से महेश को तो कुछ फ़ायदा नहीं होता है, मगर उलटे अब उसके आप पास रहने वाले उसे और उसकी बेटी को ही हीन भावना से देखने लगते हैं। 
                  प्रवीण और नेहा का परिवार भी महेश एवम आकृति से दूरी बना लेता है।
        8 -10 दिन के बाद ही टीवी वाले एवम नेता लोग अपना अपना टीआरपी चमका कर शांत हो जाते हैं, मानों कभी कुछ हुआ ही नहीं था।  
          उधर महेश और आकृति का जीवन उस घटना के बाद एकदम से बर्बाद हो गया था। दोनों अंदर ही अंदर अब तिल तिल कर मर रहे थे। दोनों का देखा हुआ सपना अब पुरी तरह से चकनाचूर गया था। 
          जहां पहले रामेश्वर महेश को अपना समधी बनाना चाहता था, वही अब तो वह उससे बात भी नहीं करता था। सभी उससे दूर हो गए थे। नेहा की मम्मी तो वह कॉलोनी ही छोड़ दी थी। 
                आखिर इसमें महेश या उसकी बेटी की क्या गलती थी ? जो गलती किया था, वह तो आज भी समाज में सीना चौड़ा किए जी रहा था। और जिसकी गलती नहीं थी वह जीते जी रोज तिल तिल कर मर रहा था। कमरे में बंद गुमनाम जिंदगी जीने को मजबूर था।
               एक दिन महेश कमरे में अकेले बैठा अपनी बेटी के बारे में सोचते सोचते बच्चों के जैसा जोर जोर से रोने लगता है, कि तभी वहां दूसरे कमरे से रोने की आवाज सुनकर आकृति आ जाती है। वह अपने पिता की ऐसी हालत को देख तड़प उठती है। 
                   उस घटना के बाद से आकृति पता नहीं क्यों एकदम सामान्य हो जाती है। अब वह फिर से स्कूल भी जाने लगती है।  उसके अचानक बदले व्यवहार से अब ऐसा लग रहा था मानों उसके साथ कभी कुछ हुआ ही नहीं था।
           स्कूल में भी उससे सभी बच्चे एवम शिक्षक भी कटे कटे से रहने लगे थे। मगर वह बिना किसी की प्रवाह किए बस हमेशा अपनी पढ़ाई में लगी रहती थी।
            समय बीतता रहता है। महेश भी फिर से ठेला चलाने लगता है। आकृति भी पिछली सभी बातों को भुलाकर पढ़ाई में लगी रहती है। 
          तभी अचानक आकृति के जीवन में एक और महा भूचाल आता है। वह प्रेगनेंट हो गई थी। 
                   सुनते ही महेश एवम आकृति के पैर तले की जमीन खिसक जाती है। 
          स्कूल वाले आकृति को बहाना बनाकर स्कूल से निकाल देते हैं। जिस कॉलोनी में अभी तक आकृति रहते आ रही थी, उस कॉलोनी से भी उसे जाने को मजबूर कर दिया जाता है।
          दोनों बेचारे बेकसूर बाप बेटी फिर से न चाहते हुए भी गुमनामी की ज़िंदगी जीने को विवश हो जाते हैं।
                 महेश अपनी बेटी का अबॉर्शन भी करवाना चाहता था, मगर डॉक्टर ज्यादा दिन हो जाने के कारण साफ मना कर देते हैं।
         आखिर नियति भी बेचारी उस आकृति पर क्या क्या जुल्म सितम ढा रहा था। खेलने कूदने की उम्र में ही उसे मां बना दिया था।
             समय के साथ आकृति एक बेटे को जन्म देती है। उस समय उसकी उम्र मात्र 14 साल की थी।
          आकृति के मां बनते ही महेश फिर से नए जगह पर गुमनाम की जिदंगी बिताने लगता है। वहां वह किसी को नहीं बताता है कि बच्चे की मां आकृति है। सभी यही जानते थे कि बच्चा आकृति की बड़ी बहन की है, जो बच्चे को जन्म देकर ही मर गई थी। झूठ बोलने के अलावा दोनों के पास और कोई रास्ता भी नहीं था। नहीं तो सच्चाई जानते ही आस पास के लोग तरह तरह के सवाल करने लगते।
                  आकृति फिर से पास के ही एक स्कूल में पढ़ने जाने लगती है। दोनों बाप बेटी फिर से नए सिरे से सब कुछ भुला कर जीवन गुजारने लगते हैं।
                  समय बीतता रहता है। अब आकृति का बेटा राधे 5 साल का हो गया था। आकृति भी अब स्नातक पास कर गई थी। पैसे की कमी के कारण वह डॉक्टर की पढाई नहीं पढ़ पाई थी। मगर वह इसी साल स्नातक पास करते ही यूपीएससी की परीक्षा दी थी।
             कहा जाता है कि सभी का बुरा वक्त एक न एक दिन खत्म होता ही है, और ऐसा ही कुछ महेश और आकृति के साथ भी इस बार हुआ था। आकृति पहले ही बार में यूपीएससी पास कर जाती है। वह पुरे प्रदेश में टॉप की थी।
          एक ठेला चलाने वाले की बेटी आईएएस बन गई थी।
             आईएएस बनत ही मीडिया वाले अपने स्वभाव अनुसार फिर से आकृति की पुरानी बातों खरोचने लगते हैं। मगर अब कोई चाहकर भी कुछ नहीं बोलता है। अब तो उलटे आकृति एवम महेश से नजदीकियां बनाने के लिए सभी फिर से लालायित हो जाते हैं। 
                वही समाज जो कल तक महेश एवम आकृति से दूर भागता था, आज दोनों के गुणगान करने लगे थे।                   आकृति के माथे पर लगा सारा कलंक का टीका एक झटके में ही मिट जाता है।
          जिस स्कूल वाले आकृति को बहाने से मां बनने पर निकाल दिए थे, वही अब उसको सम्मानित करने के लिए बेताब हो रहे थे।
            रामेश्वर भी अब अपनी गलती मानकर फिर से रिश्ता बनाने को मचलने लगा था। 
       इन सबों से दूर आकृति सिंगल पैरेंट बनकर अब सिर्फ अपने बेटे और गरीब पिता के लिए जीना चाहती थी। 
            वह डॉक्टर बनकर अपनी मां की आखरी इच्छा तो पुरी नहीं कर सकी थी। मगर अपने गांव में अपनी मां के नाम पर गरीबों के लिए एक अस्पताल खुलवाने की मन में दृढ़ निश्चय कर ली थी।
            आकृति एवम उसके पिता समाज को आखिरकार सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि चाहे इंसान के जीवन में कितनी भी कठिनाइयां क्यों न आए, अपना हौसला और हिम्मत कभी नहीं खोना चाहिए। आज जरूरत है इंसान को इंसान से प्यार करने की, ना कि उसकी वर्तमान परिस्थितियों से। 

                    कुमार  सरोज



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