फकीरा की मां / Fakira Ki Maa ।। कहानी ।। कुमार सरोज ।।

   फकीरा की मां 

                     कुमार सरोज


                 मैं यानी फकीरा की मां लोहे के एक खाट पर लेटी दर्द से कराह रही थी। मेरा बेटा फकीरा और कुछ लोग मुझे कस कर पकड़े हुए थे।                फिर भी मैं दर्द से छटपटा रही थी। एक आदमी खाट को धकेलते हुए ले जा रहा था। मैं कभी - कभी जोर से चिल्लाने भी लगती, और कभी उठ कर बैठने की कोशिश करने लगती थी।

  लंबी गली को पार करने के बाद मुझे एक कमरे में पहुंचा कर छोड़ दिया गया। मुझे कमरे में अकेले छोड़ कर सभी बाहर चले गए।  




                    मैं अंदर ही अंदर बहुत खुश हो रही थी। मेरा पटना घुमने का देखा हुआ सपना अब पुरा होता नजर आ रहा था।

                  इस समय कमरे में मैं अकेली अपनी आंख बंद किए लेटी थी। मैं राजधानी पटना को देखने की ललक संजोए अभी से ही मन में ख्याली पुलाव पका रही थी। कितनी मेहनत एवं लगन के बाद मैं फकीरा के पिताजी को पटना दिखाने के बहाने आने के लिए राज़ी कर पाई थी। तभी आज फकीरा के साथ पटना आ सकी थी। वह भी एक नकली रोगी का नाटक करके।

               किसी की आहट सुनकर जब मैंने आंखें खोली तो खिड़की के पास देखा कि एक लड़का सफेद शर्ट- पैंट पहने खड़ा था। पास में ही एक और आदमी खड़ा टेबुल पर कुछ खोज रहा था । 


            अचानक सामने के दृश्य को देखकर मैं दंग रह गई। अभी तक जिसे मैं लड़का समझ रही थी, वह औरत थी । वह भी हमारे उम्र की !

               " हे भगवान …. । कैसा जगह है ये। "    

               मन तो किया की उठ कर दो - तीन थप्पड़ लगा दूं ।  मगर कुछ सोचकर अभी शांत रह गई। ऐसा करने से हमारी ही पोल खुल जाती। मैं तो बस यही सोच रही थी कि कब डॉक्टर आकर मुझे देखे और बिना दवा दिए शाम तक ही छुट्टी दे दे। ताकी मैं मजे से फिर पटना घूम सकू। 

                   मेरे गांव में मेरे उम्र की कोइ महिला अभी पटना नहीं घूमने आई थी। अब मैं सभी को गांव जाकर पटना के बारे में शान से बताऊंगी। 

              अचानक वह शर्ट वाली महिला मेरे नजदीक आई, और एक लंबा पाईप जैसा कोइ सामान बैग से निकाल कर कभी मेरे पेट पर तो कभी मेरे सीने पर रखने लगी। यह देखकर मैं गुस्से से पागल होते जा रही थी। मगर चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रही थी।  वह एक अंजान पुरुष के सामने हमारे साथ ऐसी वैसी हरकतें कर रही थी। 

              जब मैं ध्यान से उसका चेहरा देखी तो दंग रह गई। वह उम्र में मुझसे कम नहीं थी, मगर चेहरे पर क्रीम पाउडर एवं होठों में लाल कोई मोटा रंग लगाकर अपने आप तो जवान दिखाने की कोशिश कर रही थी। मगर भला चमइन से भी कहीं पेट छिपता है। बाल इतने छोटे थे उस प्रोढ़ नव यौवना के कि देखने में मेरे बेटे का बाल लग रहा था । 

            जब मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने जैसे ही बोलने के लिए मुंह खोली कि वह मुझसे पहले ही बोल पड़ी -  अरे, तुम  चुप रहो। "

              उसकी बात सुनकर मेरा पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। भला मैं बोल कहां रही थी,  और अगर बोलती भी तो उसका क्या जाता। गांव में हमारी आवाज सुनने के लिए औरतों की जमघट लगी रहती थी। मैं फकीरा की मां थी, पुरे गांव की मुखिया।  खैर मैं पुनः कुछ सोचकर चुप रह गई।

                   टेबल के पास वाले मर्द को देखकर तो मैं सचमुच की ही रोगी बन गई। उसके पास तो मुछ के नाम पर एक बाल भी नहीं था। और सिर के बाल तो औरतों जैसे लंबे थे। ऐसा लग रहा था कि यही औरत है, और वह औरत मर्द।

                न चाहते हुए भी मैं पुनः पूछना चाहि कि फिर मुझे डांट कर वह औरत शांत करा दी। 

              मेरे मन में राजधानी देखने की ललक न रहती तो मैं अभी दोनों को एक दो थप्पड़ रसीद कर देती। मगर चुप चाप मन मारकर रह गई। 

                  कुछ देर के बाद दोनों आपस में बातचीत करते हुए चले गए। मैं एक बार फिर से राहत की सांस लेकर शान से खाट पर पसर गई।

             वाह !  कैसा माहौल था यहां का ?  यहां मर्द औरत और औरत मर्द बनने पर तूला था। ऐसा लग रहा था, शायद बदलाव का यही रस्म था यहां का !  होना भी चाहिए ! तभी तो हमारे गांव के शहरी बाबू मुझसे एक बार कह रहे थे कि फकीरा की मां अगर तू शहर में रहती तब अब तक बड़ा नेता बन जाती, और आरक्षण के आधार पर मंत्री भी बन जाती ।  उस दिन मैंने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया था, मगर आज मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था, कि वे मुझसे ठीक ही कह रहे थे। 

             तभी कमरे में एक लड़की ने प्रवेश किया। वह खाट के बगल वाली कुर्सी पर आकर बैठ गई । 

 मैं उससे तुरंत पूछ बैठी  - " मेरा बेटा कहां गया है ? " 

 " दवा लेने । "  वह अंगड़ाई लेते हुए बोली।

 " दवा …… दवा किसलिए ? "  मैं गुस्से में बोली । " मुझको क्या हो गया है, मैं तो ठीक हूं। " 

 " रोगी को ज्यादा नहीं बोलना चाहिए,  चुपचाप लेटी रहो । "  

उसके दो टूक जवाब सुनकर मैं तिलमिला उठी। 

  " मैं रोगी कहां हूं , मैं तो …….   । " 

          मैं आगे बोलना ही चाहती थी कि उसने अपने हाथों से मेरा मुंह बंद कर दिया।

          मैं उसके हाथों की गंध को सूंघकर अपने आप को संभाल न सकी, और उछलकर बैठ गई । 

          सिगरेट की बदबू आ रही थी उसके हाथों से । शायद अभी सिगरेट पीकर ही आ रही थी । 

 " तुम सिगरेट पीती हो ? "  मैं ताव में कड़क कर पुछी । 

         मगर जवाब देने के जगह पर मुझको ढकेल कर जबरन लिटा दिया और खुद बड़बड़ाती हुई बाहर की ओर चली गई ।

         वाह रे समय !  एक लड़की और सिगरेट ! कहां आकर मैं फंस गई थी। अब मैं अपने बेटे को कोसने लगी थी। पता नहीं उसने मुझे कैसी जगह पर लाकर भर्ती कर दिया था । अगर ऐसा ही चलता रहा तो मैं तो सचमुच की रोगी बन जाऊंगी।  गांव में तो डॉक्टर के पास ऐसा नहीं होता था । 

            कभी - कभी मैं अपने आप को भी अब कोसने लगी थी। काश, मैं राजधानी देखने की ललक दिल में नहीं संजोती और ना मैं रोगी बनने की नाटक करती तो मुझे आज ऐसा दिन देखने को नहीं मिलता। अब पता नहीं डॉक्टर कितना रुपया हड़पेगा। 

             वैसे भी यहां रहते - रहते मैं जरूर रोगी बन जाउंगी। एक महिला को पुरुष के कपड़े पहने और सिगरेट पीते देख, मैं कभी अपने आप को बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी। ऐसे माहौल में तो मैं घुट - घुटकर मर जाऊंगी। 

           कहां सोची थी कि एक - दो घंटे अस्पताल में रहने के बाद फकीरा के साथ मज़े से पटना घुमुंगी। उसके पिता ऐसे तो मुझे पटना आने नहीं दे रहे थे, तभी तो मुझे रोगी बनने का नाटक करना पड़ा  था। 

        पुरी जिंदगी का बचाकर रखा हुआ पैसा अपने बेटे फकीरा को पटना घुमाने के लिए दे दिया था। मगर यहां तो अब कुछ और ही हो रहा था। 

            मैं यहां से किसी तरह बाहर निकलने का उपाय सोचने लगी।

                 ठीक तभी एक जोर की खिलखिलाहट ने मेरी सोच पर लगाम लगा दिया। 

          जिस दिशा से ज़ोर ज़ोर से हंसने की आवाज़ आ रही थी, जब मैं उस दिशा में देखी, तो देखते ही मैं इस बार अपना आपा खो बैठी। मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। मैं अपने आप को रोक न सकी, और खाट से तेजी से कूदकर दरवाजे की और दौड़ पड़ी। 

             दरवाजे के ठीक सामने एक जवान लड़की एक लड़के के कमर में हाथ डाले एकदम चिपककर खड़ी थी। तन पर कपड़ा नाम मात्र का था। नीचे कौन कहे, ऊपर का सारा भाग भी साफ साफ दिखाई दे रहा था । 

               मैं गुस्से में दो - तीन थप्पड़ उस लड़की को लगा दिया।

             मगर यह क्या ! मैं जैसे ही उसे दो-तीन थप्पड़ रसीद किया कि मैं स्वयं ही दर्द से कराह उठी।

                  वास्तव में मैं अभी तक ये सब सपना में सबकुछ देख रही थी।

                मैं नींद से जाग कर अपने घायल हाथ को देखने लगी। वहां से अब खून निकाल रहा था। 

               मैं सपने वाली बात को याद कर हैरान हो रही थी। क्या सच में आज हमारा समाज इतना बदल गया था ?

                          

                    कुमार सरोज


टिप्पणियाँ

  1. बेनामीमई 04, 2022 12:24 pm

    शानदार कहानी

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  2. अच्छी कहानी, बदलाव की आहट का बेह्तरीन उदाहरण
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है
    Bolsakheere.blogspot.com
    lovediscoveryourself.blogspot.com

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