मजहबी राजनीति / Majahabi Rajneeti ।। कहानी ।। कुमार सरोज ।।
मजहबी राजनीति
कुमार सरोज
सर्वप्रथम यह भूपटल बंजर वीरान तथा लाल तप्त गोला ही था । लेकिन धीरे-धीरे बहुत से जीवों का इस धरती पर अलौकिक आगमन हुआ। उन्हीं में से एक जीव बहुत शक्तिशाली एवं बुद्धिमान था। सभी ने उसे मानव जाति से संबोधित किया। इस मानव जीवो की तादाद निरंतर बढ़ती गई।
मानव विभिन्न जगहों पर जाकर रहने लगे। तब लोगों ने अपने रहन - सहन के अनुरूप क्षेत्र का नामकरण कर दिया। कहीं भारत, कहीं चीन तो कहीं अमेरिका नाम पड़ा। जब इन जगहों पर लोगों की संख्या काफी बढ़ गई तो वे लोग बहुत से धर्मों में बंट गए। उसके बाद धर्म जातियां और उपजातियों में। तब जाकर बनी ये आज की सृष्टि।
इस प्रकार हम देखते हैं कि हम सब एक दूसरे के पूरक हैं, और सबों में अन्योनाश्रय संबंध है। फिर भी आज ये बुद्धिजीवी मानव आपस में जाति धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं। क्या उनके बुद्धिजीवी होने का यह प्रमाण है। आज अधिकांश कस्बों एवं शहरों का यही हाल है। लोग बिना सोचे समझे खून - खराबा करते जा रहे हैं ।
क्या मानव से बड़ा धर्म है ? आखिर कब खत्म होगी मानव के नरसंहार का यह नंगा नृत्य ? आज तमाम आवाम की जुबान पर यही सवाल अटका हुआ है। मगर इसका हल निकल नहीं रहा है।
इन्हीं सब सवालों में उलझकर पिछले कुछ सालों से आए दिन कत्ल पे कत्ल होते जा रहे थे निजामपुर गांव में भी। बेकसूर लोग बेवजह मारे जा रहे थे। बच्चे अनाथ और औरत विधवा होती जा रही थी। कत्लेआम का खुलेआम तांडव हो रहा था। फिर भी लोग तमाशाबिन बनकर तमाशा देख रहे थे। कोई ताली तो कोई आंसू बहा रहा था इस तमाशे पर।
निजामपुर गांव में मुसलमानों की तादाद ज्यादा थी। इसी कारण वहां हिंदुओं की एक नहीं चलती थी। मूर्ति पूजा, मूर्ति विसर्जन, रामनवमी का जुलूस निकालना, वहां के लोगों के लिए एक सपना बनकर रह गया था।
शुरु - शुरु तो सारे जुल्मों सितम को हिंदू लोग सहते जा रहे थे। मगर समय हमेशा एक गति से नहीं चलती। समय बदला।और अब आए दिन हिंदू नवयुवकों ने मुसलमानों का विरोध करना शुरू कर दिया था। फलस्वरूप छोटे-छोटे दंगे भड़क उठे। मौके का फायदा उठाकर कुछ नेता के इशारे पर उनके चमचे दोनों तरफ के लोगों को भड़काने में भी लगे थे।
मगर खुदा के द्वारा भेजा गया एक मसीहा हाफिज दंगा भड़काने वाले को समझने एवं रोकने का भरपूर कोशिश करता रहता था। मगर कोई फायदा नही होता।
अब नेताओं के बहकावे में आकर आए दिन मुसलमान के लड़के मंदिरों में गाय के मांस तो हिंदुओं के लड़के मस्जिदों में सूअर के मांस फेंक दे रहे थे। बड़ा ही विचित्र माहौल बनता जा रहा था निजामपुर गांव का।
ये सब कुछ स्थानीय नेता अपनी राजनीति की रोटियां सेंकने के लिए सिर्फ ऐसा कर रहे थे।
उस दिन मुहर्रम था। मंदिर का पुजारी सुबह जैसे ही दरवाजा खोला तो वह हैरान रह गया। वहां गाय का कटा हुआ सिर पड़ा था। यह समाचार जंगल के आग की तरह चारों ओर फ़ैल गई। फिर क्या था, हिंदुओं ने मस्जिदों पर धावा बोल दिया।
यह देख मुसलमानो का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। वे लोग भी मरने मारने को उतावले हो गए।
मगर उस दिन खुदा का नेक बंदा हाफिज की हिम्मत और दिलेरी के आगे किसी की एक न चली। दोनों पक्षों को समझने के चक्कर में उसे अपना एक हाथ गंवाना भी पड़ा था। फिर भी उसने अपनी जान की परवाह न करते हुए किसी तरह उस दिन दंगे को शांत करा दिया था।
उस दिन के बाद मुसलमानों की हालत बड़ी नाजुक हो गई थी। कुछ लोग तो खून का घूंट पीकर रह गए थे।
मगर भला आज के नेता कहां मानने वाले थे, वे दोनों धर्मों को आपस में लड़ा कर अपनी राजनीति फ़ायदा उठाने के लोभ में फिर से दुश्मनी कराने के लिए कुछ मनचले लड़कों को बहकाने लगे। जिसका नतीजा यह हुआ कि मनचले लड़कों ने एक हिंदू लड़की का अपहरण करके उसकी इज़्ज़त लुट लिया। फलस्वरुप हिंदुओं और मुसलमानों में मौत का भयावह खेल दंगा फिर से शुरू हो गया ।
अभी पहले दंगे की आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि एक और मौत के भयानक घाटी से लोगों को गुजारना पड़ा।
अहिंसा के पुजारियों के मां का संपूर्ण जिस्म फिर से खून से लाल हो गया। भारत मां के ही कुछ बेटे उसकी बेदाग पाक दामन को नेस्तनाबूद करने में लगे थे। धरती मां के सबसे बुद्धिमान कहलाने वाले उसके अपने ही सपूत आज जाति और धर्म के नाम पर अपनों का ही खून बहाए जा रहे थे। अंधविश्वासों एवं स्वार्थों के कारण कुछ लोग बेगुनाहों को मौत के घाट उतारते जा रहे थे।
अचानक जंग अंतिम छोर पर जाकर थम गई। शायद दोनों तरफ के नायक मारे जा चुके थे।
बेचारा हाफिज भी घायल सभी को अपना अंतिम संदेश सुना रहा था - " हे खुदा के बंदों, बता तुमको क्या हासिल हुआ इस दंगा - फसाद से। दोनों तरफ के मनचले दिलेर तो चले गए। फिर भी जिस काम को लेकर यह दंगा फसाद कर रहे थे वह काम तो नहीं हुआ ना। अरे मूर्खो, कोई काम दंगा - फसाद से नहीं, बल्कि शांति और सुलह से होती है। कितने लोग मारे गए, मैं भी मरने वाला हूं, लेकिन तुम लोगों को क्या मिला ? तुमने अपने ही परिजनों की बलि चढ़ा दी। अब तुम ही लोग यह फैसला कर लो कि किसी के बहकावे में आकर आखिर कब तक यह दंगा - फसाद करते रहोगे। " हाफिज जिंदगी की अंतिम घड़ियां गिनता हुआ बोलते जा रहा था। सभी शांत सिर झुकाए सुन रहे थे।
" मैं जानता हूं तुम लोगों के पास कोई जवाब नहीं है, तुम लोग तो चंद पैसों के खातिर नेताओ के बहकावे में आकर यह दंगा फिर करोगे। क्योंकि तुम लोग अहिंसा के नहीं हिंसा के पुजारी हो। जरा सोचो जिस काम के लिए तुम सब ने यह दंगा - फसाद कर दिया, अगर वही काम शांति से मिल बैठकर सुलह कर लेते तो जन्नत नसीब होती। मगर दंगा फसाद से तुम्हें क्या मिला ? अभी भी समय है, संभल जाओ। वरना सब खत्म हो जाओगे। " हाफिज अपना बचा एक हाथ को सीने पर रखे हुए कठिनाई से बोला - " मनुष्य से बड़ा धर्म नहीं है। तुम सब धर्म रूपी इस चोले में मत फंसों….. । या अल्लाह …. अल्लाह …. "।
कहते कहते हाफिज का शरीर एक तरफ लुढ़क गया। एक मसीहा सदा के लिए इस समाज के चंद लोगों के अंधविश्वासों एवं स्वार्थ के चक्कर में फंसकर हमसे रूठ कर सदा के लिए चला गया था। वहां पर उपस्थित लोगों के आंखों से आंसू निकल पड़े थे।
ऐसी करुण एवम हृदय विदारक मंज़र को देखकर भास्कर भी बादलों में छिपने लगा था। पृथ्वी के सबसे बुद्धिमान जीव के बेजान जिस्म को खाने के लिए चील और कौओं की टोली आकाश से नीचे उतरने लगी थी।
औरतों के रोने की करुण क्रंदन अभी भी वातावरण में गूंज रही थी। जहां - तहां अभी भी आग की लपटे उठ रही थी। पुरा निजामपुर गांव आज श्मशान सा दीख रहा था।
कुछ लोगों की गंदी राजनीति एवम बहकावे के कारण आए दिन हो रहे यह दंगा - फसाद कब बंद होगा ?
कुमार सरोज
Nice story
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
हटाएंलाजवाब कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
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