काश ऐसी रात न हो / Kash Aisi Raat Na Ho । कहानी । कुमार सरोज ।

काश ऐसी रात न हो

                        कुमार सरोज

              

                        जेठ का महीना। चिलचिलाती धूप l दोपहर का समय।  जिस्म को पिघला देने वाली गर्मी । ऊपर से लू का प्रकोप।  ऐसे में भला कोई बाहर निकल सकता है ? बाहर निकलना तो दूर, कोई इसके बारे में सोच भी नहीं सकता। लेकिन मैं कभी बरगद की छांव में,  कभी ताड़ के प्रतिबिंब के नीचे, तो कभी यूं ही किसी मिट्टी के बड़े टिल्लहे की ओट में बैठता सुस्ताता चलता जा रहा था। मंजिल का अभी तक कोई पता नहीं था। लेकिन पास का पानी खत्म हो गया था। आसपास कहीं कोई गांव भी नजर नहीं आ रहा था। पता नहीं आज मैं किस वीरान इलाक़े में आकर फंस गया था। अब मुझे अपने आप पर गुस्सा आ रहा था। एक तो उग्रवाद प्रभावित इलाका और वह भी मेरे लिए अनजान। आख़िर, अब करता क्या मैं ? अब तो बस एक ही आश बाकी थी । किसी तरह पहुंच जाऊ बैद बिगहा और मिलू अपने दोस्त - अरविंद पाठक से। 



                  सुबह से दोपहर, दोपहर से अब शाम हो चली थी। सूरज भी अब डूबने ही वाला था। रास्ते में एक आदमी ने बताया कि बैद बिगहा गांव थोड़ी ही दूर है। 

                  धूप में चलते चलते भूख प्यास के कारण मेरा बुरा हाल था। मगर क्या करता, मैं फिर भी हिम्मत करके थके पांव बढ़ता चला जा रहा था। अब एक कदम बढ़ाना भी मेरे लिए पहाड़ पर चढ़ने के समान लग रहा था। मगर दोस्त से मिलने  की चाह और ग्रामीण परिवेश को जानने की ललक मेरे अंदर एक नया जोश भर दे रहा था। शायद तभी मैं थक कर चूर होते हुए भी बढ़ता चला जा रहा था, बढ़ता चला जा रहा था।

             "  आह…… । ये क्या… ?  " अचानक मेरे पैर में जोर से कुछ चूभा। पैर उठाकर देखा। एक लंबा कांटा, जूते को पार करता हुआ तलबे में चुभ गया था। एक तो पहले से ही जोरों की भूख प्यास लगी थी, और वैसे में यह कांटे की चुभन। मैं दर्द से कराते हुए जमीन पर बैठ गया। 

        जूता खोला। पैर देखा। खून से तलवा रंगीन था। " हे भगवान ! यह तूने क्या कर दिया। एक बेसहारा मुसाफिर को यह कैसा दर्द दे डाला। " अपनी पुस्तक " ग्रामीण परिवेश " की पांडुलिपि तैयार करने के लिए मैं गांव का भ्रमण क्या कर रहा था, कि आज मैं स्वयं इस नर - हंता प्रदेश में आकर फंस गया था।

          सूरज डूब गया था। अंधेरा चारों ओर छाने लगा था। कुछ दूर रोशनी की कुछ मधीम किरणें दिख रही थी। शायद वहां पर कोई गांव था।           मगर मुझसे अब चला नहीं जा रहा था। पांच - दस कदम हिम्मत करके चलता, लेकिन दर्द बढ़ जाने के कारण चला नहीं जाता। कभी सोचता की पास वाले गांव में किसी तरह रेंगते हुए पहुंच जाऊं। मगर यह सोच कर डर जाता कि कहीं गांव वाले मुझे उग्रवादी समझ कर मारने न लग जाए। वैसे भी उस गांव के बारे में मैं कुछ जानता नहीं था। यही सोचते - सोचते मैं एक बरगद के पेड़ के पास पहुंच गया। यह बरगद का एक विशाल पेड़ था। पेड़ के बगल में एक कुआं भी था। कुआं को देखते ही मेरा सारा दुख दर्द दूर हो गया। 

               सबसे पहले मैं अपने कुछ कपड़ों को जोड़कर एक रस्सी का आकार दे दिया। फिर उसी को भींगा - भींगा मुंह हाथ धोकर, पानी भी पी लिया। पेट में पानी जाते ही जान में जान आ गई। दिमाग भी अब ठीक से सोचने समझने लगा। लेकिन मैं जितना सोचता अपने आपको उतना ही डरपोक बनाते जा रहा था। 

            अंततः मैंने उसी बरगद के पेड़ पर रात बिताने की ठान ली। बचपन में दादी मां से किस्सा एवं कहानियों में ऐसा आदमी को करते सुना था। मगर आज मुझे स्वयं ऐसा करना पड़ा था। 

        किसी तरह पेड़ पर चढ़ा। जहां पर चौडी जगह थी, मैं वहीं पर मैं लेट गया। लेटते ही मुझे नींद ने अपने आगोश में ले लिया। अभी मैं पूरी तरह से नींद के आगोश में समा भी नहीं पाया था कि एक नारी की चीख ने मेरी निद्रा भंग कर दी। मैं डर के मारे सहम गया। सिर उठाकर चारों तरफ सावधानीपूर्वक देखने लगा। सामने के दृश्य को देखकर मेरे होश उड़ गए। कुछ लोग एक लड़की को जमीन पर पटक कर उसके साथ जोर जबरदस्ती कर रहे थे। बेचारी लड़की तड़प रही थी, छटपटा रही थी, जोर-जोर से चिल्ला रही थी। लेकिन कौन सुनने वाला था उसकी चीख-पुकार को ? मैं तो ख़ुद बहुत डर गया था।  

           " हे भगवान ! एक दुर्बल अबला के साथ ऐसा बर्ताव ? एक अबला का बेटा ही, एक अबला की इज्जत को नोच नोच कर कुत्तों की तरह खा रहा था। "   

         बेचारी लड़की उन बदमाशों के चंगुल से आजाद होने की जी तोड़ कोशिश कर रही थी। मगर सफलता नसीब न हुई। 

        अंततः उसने अपना दम तोड़ दिया। लेकिन उन दरिंदों ने मरते दम तक भी उसे नहीं छोड़ा। मृत लड़की को बगल के कुएं में डालकर, सभी एक तरफ चले गए।  

             मैं तो ऐसे ही दिन भर के थकान से बहुत परेशान था। ऊपर से यह दूसरी नई परेशानी। थका होने के बावजूद भी मैं डर के मारे रात भर सो न सका। 

          सुबह मैं अंधेरे में ही एक गांव की ओर चल पड़ा। पलकें अभी भी बोझिल थे। इसलिए मैं चलते चलते लड़खड़ा जा रहा था। 

        शराबी की तरह नींद से मदहोश लड़खड़ाता हुआ मैं किसी तरह गांव में पहुंचा। संयोग से वह गांव बैद बिगहा ही था। पुछने पर पाठक जी का घर तो मिला, मगर पाठक जी घर पर नहीं थे। मैं उनके आने के इंतजार में रुक गया।  

          खाना खाने के बाद मैं दिन भर सोया। शाम हुई। मगर शाम होते ही गांव में श्मशान सा सन्नाटा छा गया। एक भी आदमी गांव में दिखाई नहीं दे रहा था। 

      मैं अभी पाठक जी के घर के आगे वाले एक कमरा में खाट पर लेटा गांव के बारे में ही सोचते हुए सोने  की कोशिश कर रहा था। आख़िर ऐसा क्या था इस गांव में, कि शाम होते ही कोई आदमी नज़र नहीं आ रहा था।  

            गांव के बारे में ही सोचते-सोचते मैं न जाने कब सो गया। 

              अभी रात के 10 बजे होंगे। अचानक रात की खामोशी को चीरती हुई गोलियों के चलने की आवाज़ वातावरण में गूंजने लगी। मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। दरवाजा खोला।  सामने देखा। बाहर का दृश्य देख मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई। सामने लाशों का ढेर लगा था। किसी का एक भुजा, तो किसी का दोनों। किसी का एक पैर, तो किसी का दोनों। किसी का सिर धड़ से अलग, तो किसी का पुरा शरीर दो भाग में बांटा था। कसाई के बकरे की तरह सभी हलाल मृत पड़े थे। किसी का संपूर्ण जिस्म गोलियों से छलनी था, तो कोइ घायल बिन जल मछली की तरह छटपटा रहा था। 

            मैं लुकते छिपते किसी तरह आगे बढ़ा। सभी जगह पर लाशों का जमघट लगा हुआ था। तीन माह  से लेकर सतर साल तक के स्त्री- पुरुष, बच्चे - बूढ़े का मृत शरीर पड़ा था। 

            एक घर के पास मैं कुछ देख ठिठक कर रूक गया। देखा, वहां भी कुछ लोग एक औरत के साथ वही घिनौना खेल खेल रहे थे। बेचारी वह औरत जैसे ही चीखना चाही, एक ने उसके मुंह में गोली मार दिया। 

           " या खुदा….  ऐसा घोर अन्याय ...... ऐसी दरिंदगी ….  कहां गई इन्सानियत .....  ? " 

         जाते जाते लोगों ने घर में आग लगा दिया। उसी कमरे के एक कोने में दुबके दो बच्चों को भी आग ने अपनी आगोश में ले लिया।  

              बेचारे चिल्लाते, छटपटाते, तड़पते, बिलखते यूं शांत हो गए, जैसे मैं दूर अंधेरे में बैठा सब कुछ देखते हुए भी डर के मारे एकदम खामोश था। 

             किसी तरह अंधेरे में अपने आप को रख कर उग्रवादियों से बचाते हुए मैं एक जगह पर खड़ा होकर आसपास फिर देखने लगा। 

              अब तक शायद पुरे गांव में खून की होली खेलकर उग्रवादी लोग जा चुके थे। 

              आग की लपेटे अभी भी तेजी से उठ रही थी । लोगों की चीख पुकार आकाश में गूंज रही थी। कहीं - कहीं पर अभी भी कुछ लोग घायल जिंदा ही आग में मछली की तरह पक रहे थे। कोई सहायता करने वाला नहीं था।

           संपूर्ण वातावरण में लाशों के जलने की दुर्गंध फैल रही थी। आज ऐसा लग रहा था मानो स्वयं मानव विधाता बन गया हो ! तभी तो यहां एक मानव के जान की कीमत एक तिनके के सामान भी नहीं था।

      अब मैं इस गांव में आकर पछता रहा था। अपने आप को बहुत कोस रहा था। 

            " हे भगवान….। फिर कभी जिन्दगी में मुझे ऐसी रात मत दिखाना। मगर मेरी ही क्यों, काश किसी की जिन्दगी में भी ऐसी रात न हो।                        

                           कुमार  सरोज

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