नारी / Naree । कविता । कुमार सरोज ।

        नारी

                         कुमार सरोज


तुम कोमल हो,

मगर कमजोर नहीं।

तुम अबला हो,

मगर कभी हारी नहीं।


चाहे रण हो या राजनीति,

चाहे खेल हो या व्यापार।

तुम हर क्षेत्र में,

हरदम सबसे आगे हो,

तुम धन्य हो नारी।




कभी सीता सावित्री बन,

वन में घूमती हो।

कभी राधा रानी बन,

प्यार के नाम अमर हो जाती हो।


कभी लक्ष्मीबाई बन,

दुश्मनों को धूल चटाती हो।

कभी इंदिरा गांधी बन,

राजनीति का लोहा मनवाती हो।


 कभी पी टी उषा बन,

सड़कों की धूल उड़ाती हो।

तो कभी लता मंगेशकर बन,

सुरों की तान बिखेरती हो।


तुम कभी मां बन,

लोरी भी सुनाती हो।

तो कभी बहन बन,

भाई के हिस्से की गोली खाती हो।


 कभी सिपाही बन,

दुश्मन के छक्के छुड़ाती हो।

कभी मां मरियम बन,

स्नेह की फूल खिलाती हो।

तो कभी बिजनस वूमन बन,

दुनिया में डंका बजाती हो।


इन सब के बाबजूद,

आज लोग तुम्हें मारते पिटते,

तुम्हारी अस्मत को भी लूटते,

और जिन्दा जला देते।


अब वक्त आ गया है,

जागो उठो कमर कसो,

अपने आस पास के जालिमों के, 

जुल्मों का डटकर सामना करो।


तुम कोमल हो, 

मगर कमजोर नहीं।

तुम अबला हो,

मगर कभी हारी नहीं।

तुम धन्य हो नारी।


                     कुमार सरोज


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