रिश्ता / Rishta । कविता । कुमार सरोज ।

       रिश्ता 

                  कुमार सरोज


आज ज़माने में मैने कैसे - कैसे रिश्ते देखा,

वक्त आने पे अपनों का ही खून करते देखा।




आज बाप को बेटा का, तो बेटा को बाप का, 

दौलत के खातिर एक दूसरे का खून करते देखा।


इंसान के लिए इंसानियत, आज कोई मायने नहीं,

 तभी तो हर पल उसे अपनों को  नोच खाते देखा।


आज लोगों का रिश्ता खून का नहीं पैसों से है,

तभी तो आज दौलत से बड़ा रिश्ता नहीं देखा।


प्यार पूजा नहीं जरूरत पूर्ति का साधन बन गया,

तभी तो पैसे वालों को कईयों से प्यार करते देखा।


आज ज़माने में मैने कैसे - कैसे रिश्ते देखा, 

वक्त आने पे अपनों का ही खून करते देखा।

                                

                कुमार   सरोज

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