घूस / Ghoos । कविता । कुमार सरोज ।
घूस
कुमार सरोज
घूस ……
एक सुहानी तूफाॅ ,
जिसमें मैं भी
तुम भी,
हर कोई है फंसा ।
सुबह का भूला
शाम को
मैं तो वापस आ गया ।
मगर तुम
और वे सब लोग
फंसते ही जा रहे ।
साहिल पे खड़ा
मैं यही सोच रहा,
शायद
तुम सबों को
बचाने का कोई नुस्खा
मेरे हाथ लग जाए ।
कुमार सरोज
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