कपिल लौंडा बन गया / Kapil Launda Ban Gaya । कहानी । कुमार सरोज ।

       कपिल लौंडा बन गया

                           कुमार  सरोज


                 शादी के जलमासे में लगे लाउडस्पीकर पर फिल्मी गाना बज रहा था। मैं उसी गाने पर जलमासे के एक किनारे बने स्टेज के ऊपर अपनी धुन में नाच रहा था। कुछ लोग ताली, तो कुछ लोग अपने जगह पर खड़े होकर मेरे देखा देखी  नाच रहे थे। दूल्हा का मामा हाथ में नोटों का बंडल लिए उसे पंखा बनाकर हिलाते हुए मुझे दिखा रहा था। सभी बारातियों का उमंग देखते बन रहा था। 



                मैं जिंदगी में आज पहली बार स्टेज पर लौंडा बनकर नाच रहा था। इससे पहले तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं अपने बाप - दादा के जैसे ही लौंडा बनकर नाचूंगा और उसी से अपना भरण पोषण करूंगा। मगर लाचारी एवं परिस्थितियों के कारण मुझे भी आज लौंडा बनना ही पड़ा था। 

               अगले ही दिन मेरे गांव में जंगल के आग की तरह या खबर फैल गई कि कपिल लौंडा बन गया और वह भी नाचने लगा है। कुछ लोग खुश होते हुए मेरी निंदा कर रहे थे, तो कुछ लोग मेरी मजबूरी एवं बेबसी पर अफसोस भी जाहिर कर रहे थे। मगर मैं इन सब से अनभि्ञ अब राहत भरी सांस लेते हुए सुकून महसूस कर रहा था। 

            आज आप सोच रहे होंगे कि मेरे लौंडा बनकर नाचने से आखिर पूरे गांव में इतना हंगामा क्यों मचा हुआ था, तो आइए हम सुनाते हैं अपने लौंडा बनने की पूरी कहानी।

         मेरे गांव का नाम सचई है। यह जहानाबाद जिले के कुर्था प्रखंड में पड़ता है। हमारे दादा शिवपूजन अपने जमाने की बहुत ही प्रसिद्ध लौंडा थे। वे बहुत दूर-दूर तक नाचने गाने जाते थे। समाज भले ही मेरे दादा जी को अच्छी नजरों से नहीं देखता था, मगर उन्हें यह काम बहुत अच्छा लगता था। इसी कारण से वे बिना किसी की परवाह किए अपने काम को करते रहते थे। मेरे पिता यानी मुरली को लौंडा बनकर नाचना गाना जरा भी पसंद नहीं था। वे कभी इस काम को करना भी नहीं चाहते थे। मगर दादा - दादी के दबाव के कारण उन्हें यह काम करना पड़ा था। वैसे भी वे गांव के मिडिल स्कूल तक ही पढ़े थे, जिसके कारण उन्हें कोई सरकारी नौकरी भी तो नहीं मिल सकती थी। 

            गांव में घर के अलावा कोई और जमीन जायदाद हमलोगों के पास नहीं था। बस नाचने गाने से जो पैसा मिलता था, उसी से सभी का जीवन यापन हो जाता था। 

         जब मेरे पिता जी 15 साल के हुए, तभी मेरे दादा जी का देहांत हो गया था। जिसके कारण भी मजबूरी में उन्हें नाच गाकर जीवन गुजारना पड़ा था।

           हमारी एक बुआ भी थी। जो हमारे पिता से 2 साल  बड़ी थी। दादाजी के मरने के बाद मेरे पिता को बुआ की शादी की भी चिंता सताने लगी थी। दहेज देने के लिए घर में ज्यादा जमा पूंजी नहीं था। ऊपर से एक लौंडा का परिवार। बहुत से लोग तो लौंडा के नाम से ही इतना नफरत करते थे कि सुनते ही बुआ से शादी के लिए तुरंत मना कर देते थे।

             मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया कि आखि़र जब एक गरीब आदमी लौंडा बनकर अपने भारतीय संस्कृति को जीवित रखते हुए नाचता गाता है और अपना एवं अपने परिवार का भरण-पोषण करता है, तो लोगों को दिक्कत क्यों होती है, लोग लौंडा को हीन भावना से क्यों देखते हैं ? वही दुसरी तरफ फिल्मों में नाचने गाने वाले लोग सभी के लिए सेलिब्रिटी एवं आदर्श कैसे हो जाते हैं ?  उनके पास ज्यादा पैसा रहता है इसीलिए ! 

           किसी तरह मेरे पिताजी बुआ की शादी करवा पाते हैं। लेकिन समस्या अभी खत्म नहीं हुई थी। जब मेरे पिता की अपनी शादी का समय आया तो उन्हें भी बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। लौंडा का नाम सुनते ही कोई अपनी बेटी से विवाह कराने को तैयार नहीं होता था। पिताजी का कभी मन करता था कि यह काम ही छोड़ दें। मगर फिर सोचते कि लौंडा का ठप्पा लेकर कोई और दूसरा काम भी तो नहीं कर सकते थे। 

             मेरे पिता अंततः एक लाचार गरीब विधवा की बेटी झुमरी से शादी कर लेते हैं।

             शादी के 1 साल बाद ही मेरा जन्म होता है। मेरे माता पिता मेरे जन्म लेते ही ठान लिए थे कि अपने बेटे कपिल को कभी वो लौंडा बनने नहीं देंगे। इसी कारण से मेरी मां झुमरी भी अब गांव के खेतों में काम करने लगी थी। ताकि कुछ पैसा आए और मुझे ठीक से पढ़ा लिखा सके।

                मैं कुर्था के हाई स्कूल से मैट्रिक पास करने के बाद जहानाबाद पढ़ने के लिए आ गया था। यही एक कॉलेज में मेरा नामांकन करवा दिया गया था। मैं भी अपने माता-पिता के अरमानों को हर हाल में पूरा करना चाहता था। इसीलिए मन लगाकर पढ़ने लगा था। 

        समय बीतता गया। मैं इंटर पास कर गया था। अब मैं सरकारी नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षा भी देने लगा था। 

            तभी अचानक एक दिन मेरे पिता का देहांत हो गया। उसके बाद तो हम दोनों मां बेटा पर दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा। 

         मां मुझे लेकर चिंता में डूब गई, उसे यही चिंता खाए जा रही थी कि अब मेरा क्या होगा ?  मेरे पढ़ाई - लिखाई का खर्चा कहां से आयेगा।

          मैं मां को बहुत समझाने की कोशिश किया, मगर उसपर कोई असर नहीं हुआ। आखिर मां तो मां ही होती है ना।  

              मैं पिताजी के मरने के कुछ दिन बाद ही जहानाबाद फिर से आ गया। इस बार मैं छोटे- छोटे बच्चों को पढ़ाने लगा। उसी से जो पैसा आता था उससे अपने रहने खाने एवं पढ़ाई लिखाई का खर्चा पूरा करने लगा था। 

             उधर गांव में मां दूसरे के यहां अभी भी काम करती थी। उसी से मां एवं घर का खर्चा चल रहा था। 

         पिताजी के अचानक चले जाने के कारण मैं भी अंदर से टूट गया था। इस बीच मैं कुछ प्रतियोगी परीक्षा भी दिया था, मगर किसी में सफलता नहीं मिली थी। अब तो इतनी बेरोजगारी बढ़ गई थी कि एक - एक हजार पद की बहाली के लिए लाखों पढ़े-लिखे बेरोजगार फॉर्म भर रहे थे। ऊपर से नेताओ की पैरवी और घूस भी खुलेआम ही चल रहा था। पैसे वाले बहती गंगा में हाथ धोने में लगे थे। 

            इन सबों के बाबजूद भी मैं सरकारी नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षा देता रहा, मगर दुर्भाग्यवश किसी में सफलता प्राप्त नहीं हो रहा था। अब धीरे-धीरे मेरा मनोबल भी टूटता जा रहा था। अब मां भी मुझे लेकर परेशान रहने लगी थी।

             तभी अचानक एक दिन मेरी मां भी हमें छोड़कर सदा के लिए चली गई। अब मैं अकेला इस दुनिया में बचा रह गया था।

            किसी तरह हिम्मत जुटाकर अपने माता-पिता के अरमानों एवं उनके देखें ख्वाबों को पूरा करने में मैं फिर से लग गया। 

              तभी एक भयंकर बीमारी कोरोना ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। डर से सभी लोग घर में बंद हो गए। सरकार ने पुरे देश में लॉकडाउन लगा दिया था। मेरा भी पढ़ाने वाला काम बंद हो गया था। मैं अपने गांव आ गया। 

             पास में कुछ पैसे थे उसी से कुछ महीने तो गुजारा किया। मगर उसके बाद खाने - पीने पर आफत आ गया। 

            कोरोना के कारण पूरा देश लॉकडाउन से अभी गुजर रहा था। ऐसे में सभी काम धंधा भी बंद था। सच ही कहा गया है की प्रकृति के आगे किसी की एक नहीं चलती है। 

                कुछ महीने के बाद जब कोरोना का कहर कुछ कम हुआ तो लोग घर से बाहर निकलने लगे। मैं पढ़ाने के अलावा कोई और काम नहीं कर सकता था। अब तो नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षा भी बंद हो गया था। मेरे सामने बहुत ही विकट परिस्थिति उत्पन्न हो गई थी। मेरे लिए एक - दिन गुजारना अब मुश्किल हो रहा था। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अब मैं क्या करूं।

              एक दिन मैं घर के आगे बैठा अपने भविष्य के बारे में ही सोच रहा था।  तभी मेरे पास बगल के गांव के एक बड़े किसान बसंत बाबू आए। उनके बात को सुनकर मेरा पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने मुझे भी अपने बाप दादा के जैसे ही लौंडा का नाच करने का प्रस्ताव दिया था। मैं आग बबूला होते हुए उन्हें डांट कर भगा दिया। उनके बेटे की शादी था और उसी में नाचने के लिए मुझे कहने आए थे। लॉकडाउन अभी पूरी तरह से हटा नहीं था, इसीलिए बाहर की कोई नर्तकी गांव आकर नाचने को तैयार नहीं हो रही थी। बसन्त बाबु के खानदान में बिना नाच गाना के शादी का रिवाज ही नहीं था। 

                बसंत बाबू मेरी बात को अनसुना करके मुझे 5 हजार रूपया देने को बोल कर चुपचाप उस दिन चले गए थे। 

             उस रात मैं रात भर ठीक से सो नहीं सका। मन में तूफ़ान मचल रहा था। अभी तक किसी प्रकार मैं मां के इकलौते बचे जेवर को बेचकर उससे मिले पैसों से ही खाते पीते आ रहा था। मगर अब वह भी खत्म होने को था। ऊपर से बसंत बाबू का लौंडा बनकर नाचने का प्रस्ताव। मुझे बेचैन किए हुए था। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था, कि मैं क्या करूं। जिस काम को नहीं करने के लिए मेरे माता पिता ने मेरे लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी थी, क्या मैं उसी काम को करता ! तभी अगले ही पल ख्याल आता कि आखिर मैं अब जीने के लिए करूंगा क्या ! स्कूल और कोचिंग तो अभी बंद ही थे। अगर खुलते तो पढ़ा कर पैसे भी कमा लेता। मगर कोरोना के कारण अभी तो दूर-दूर तक खुलने के आसार भी नहीं दिख रहे थे। इसी उधेड़बुन में मैं पूरी रात जाता रह गया था।

           2 दिन बाद बसंत बाबू नचाने का प्रस्ताव लेकर फिर से मेरे घर आए। इस बार वे मुझे 6 हजार रूपया देने को तैयार थे।

              पता नहीं क्या सोच कर इस बार न चाहते हुए भी मैं हां में हामी भर दिया। 

           बचपन से पिताजी को नाचते देख देखकर मैं भी नाचना तो सीख ही गया था।

                अभी मैं जिस शादी के जलमासे में नाच रहा था, वह बसंत बाबू के बेटे के शादी का ही था। मुझे एक रात नाचने के लिए 6 हज़ार रुपया मिला था। इतना रुपया तो मैं पहले महीना भर  ट्यूशन पढ़ाकर भी नहीं कमाता था। आज सच में मैं अपने माता पिता के अरमानों का गला घोंटा कर भी बहुत खुश था।

            मेरे लौंडा बनकर नचाने के अगले दिन गांव में मचे बवाल को मैं नजरअंदाज करके आराम से चैन की नींद सो गया था। गांव के लोगों का काम था कहना कि कपिल लौंडा बन गया तो इसमें मैं क्या कर सकता था। शायद मेरे नसीब में तो यही लिखा था। तभी तो न चाह कर भी मैं लाचारी, मजबूरी एवं परिस्थिति बस लौंडा बन गया था। और शायद अब इस बेरोजगारी एवम् दिखावटी भरी दुनिया में यह लौंडागिरी जिंदगी भर करता ही रहूंगा।                                    

                        कुमार  सरोज

टिप्पणियाँ

  1. करुणा की वजह से बदलती हुई परिस्थितियों और सामाजिक प्रथा और बेरोजगारी और खुद की मजबूरी का मार्मिक चित्रण करती हुई कहानी... बहुत सुंदर चित्रण किया है

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    1. जी बहुत बहुत शुक्रिया एवं आभार आपके बहुमूल्य टिप्पणी के लिए

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  2. Bilkul alag hatt kr hai ye rachna, bahut prabhavit kr gae👌👌

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