मेरी मंज़िल / Meri Manjil । गजल । कुमार सरोज ।

           मेरी मंजिल 

                     कुमार  सरोज


अंजान शहर में, अंजान मुसाफिर था मैं,

ना मिल रही थी मंजिल, बेसहारा था मैं।


मिली जब मंजिल मुझे, देख कर हर्षाया था मैं,

पर उससे बात हुई नहीं, क्योंकि भीड़ में था मैं।



आंखों से आंखें मिली, बात हुई सिर्फ इशारों में,

जीने मरने के ख़्वाब देखे, अगले ही मुलाकात में।


मेरा भी जीवन अब रंगीन हो जायेगा यही सोचा था,

पर ऐसा नसीब कहां, उसे तो कुछ और ही मंज़ूर था।


वो छोड़कर मुझे चली गई, फिर डूब गया गमों में मैं,

कल भी था अकेला और आज भी अकेला हूं मैं। 


                       कुमार  सरोज


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