कुंवारी बेवा / Kunwari Bewa । कहानी । कुमार सरोज ।
कुंवारी बेवा
कुमार सरोज
बात सन 1998 की है। पाकिस्तान के सैनिक शासक जनरल मुशर्रफ ने नवाज शरीफ को पद से हटाकर स्वयं प्रधानमंत्री बन गया था। पद संभालते ही मुशर्रफ ने अपने नापाक इरादों को संजोए भारत - पाक सीमा पर सेना की गस्ती तेज करवा देता है। जिसके कारण आये दिन दोनों तरफ के सैनिकों में छिटपुट झड़पें होने लगी थी ।
और फिर वहीं हुआ जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं किया था। दोनों देशों में जंग, एक भयानक मौत का खेल । कारगिल जैसी बर्फीली दराओं में मौत को भी थर्रा देने वाला एक भीषण युद्ध ।
द्रास जैसे दुर्गम सेक्टरों में भी भारतीय विजय सेना सर पर कफ़न बांधे कूद पड़े थे । नसों में बहते हुए खून को जमा देने वाली ठंड के बावजूद भी हिंद फौज दुश्मनों को मौत के घाट उतारते जा रही थी । उसके अंदर के हिम्मते हौसले ने बर्फ की ठंडक को भी गर्म कर दिया था। आज जंग का पांचवा दिन था। शाम के 7 बज रहे थे । भारतीय सैनिकों के एक शिविर में इस समय थोड़ी उदासी थी । कारण नायक संतोष सिंह का अभी तक नहीं लौटना था।
नायक संतोष सिंह एक जवान दिलेर सिपाही था। देशभक्ति उसके नसों में कूट-कूट कर भरी हुई थी । उसकी आवाज में इतनी ताकत थी कि प्रस्त सैनिकों के रगों का जमता हुआ खून भी जोश से हिलोर मारने लगता था। इसी कारण से उसके सभी साथी ज्यादा चिंतित थे ।
आज सुबह ही नायक संतोष सिंह अपने कुछ जांबाज साथियों को लेकर उस पर्वत शिखर की ओर चल पड़ा था, जो अब उन लोगों का मात्र एक अंतिम लक्ष्य था।
सभी जगह पर बर्फ जमे थे। वहां का तापमान -20 डिग्री सेल्सियस के आसपास था । एक छोटी सी वस्ती को पार करने के बाद शुरू होता था एक भीषण बर्फीली रास्ता। ऐसा रास्ता जिस पर चलना आम आदमी के बस की बात नहीं थी। मगर देश प्रेम एवं मातृभूमि पर मर मिटने के बुलंद हौसलों ने नायक संतोष सिंह का जिस्म पत्थर का बना दिया था । मौत से आंख मिचौली का खेल खेलते हुए बढ़ते चले जा रहे थे हिंद के वीर रणबांकुरे सैनिक।
शाम के 4 बजते - बजते ही नायक संतोष सिंह ने अपने साथियों के बुलंद हौसले के दम पर वह असंभव काम को भी संभव कर दिया था, जो अब तब भारतीय सैनिकों के लिए एक चिंता का विषय बना हुआ था । भारतीय तिरंगा एक बार फिर से उस दुर्गम शिखर पर लहरा उठा था।
मन में विजय श्री का उमंग संजोए लौट पड़े थे नायक संतोष सिंह एवं उनकी जांबाज़ सैनिक। मगर विधी को तो शायद कुछ और ही मंजूर था।
लौटते वक्त एक बारूदी सुरंग की चपेट में फंस गए सभी वीर सैनिक। मगर जब दिलों में मौत से लड़ने का जज्बा हो तो शायद मौत भी हार जाती है। यहां भी मौत हार गई थी। लेकिन सभी लोग रास्ता भटक गए थे।
नायक संतोष सिंह इस समय एक पेड़ के डाली में फंसा था। शरीर जहां तहां विस्फोट में जल गया था। फिर भी चेहरे पर जरा सी भी सिकन नहीं था । दिलों में कुछ करने की ललक अभी भी हिलोरे मार रही थी । वह किसी तरह अपने आप को संभाले एक तरफ चल पड़ता है।
जैसे - जैसे बारूद का जहर खून में फैलता जा रहा था । वैसे वैसे दर्द और बढ़ता जा रहा था । एक आम आदमी को अगर इतना दर्द रहता तो वह कब का दर्द से बेहोश होकर गिर पड़ता। मगर वह वीर बंदा अंधेरे में ही चलता जा रहा था, एक अंजानी डगर पर।
बर्फ से ढके हुए रास्ते, रात का समय और आस - पास छिपे दुश्मन का डर भी उसे नहीं डिगा पा रहा था।वह हिम्मत करके बढ़ता चला जा रहा था, बढ़ता चला जा रहा था ।
अचानक दूर एक रोशनी की किरण को देखकर संतोष की हिम्मत बढ़ गई। वह थक गया था, मगर अपने आप को थका मान नहीं रहा था। वह दर्द से परेशान था, मगर उसके चेहरे पर जरा सी भी शिकन नहीं थी।
जब रोशनी वाले मकान के पास वह पहुंचा तो खुशी के मारे चिल्ला उठा - " जय वाहे गुरु। " क्योंकि वह बस्ती उसके शिविर के नजदीक ही था ।
अपनों के बीच में अपने आपको पाकर वह खुशी से झूम उठा। मगर तब तक उसका दर्द असहाय हो गया था। वह अपने आप को संभाल नहीं सका और उसी मकान के आगे गिरकर बेहोश हो गया।
किसी चीज के गिरने की आवाज सुनकर घर के अंदर से एक लड़की हाथ में लालटेन लिए बाहर निकलती है। घर के बाहर एक घायल सैनिक को देखकर पहले तो वह हड़बड़ा जाती है, मगर फिर हिम्मत करके आगे बढ़ती है।
तभी नायक संतोष सिंह के मुंह से आह निकलती है।
लड़की जिसका नाम रुखसार था, संतोष सिंह के जख्मों को देखकर ही सिहर उठती है। अभी तक वह बहुत सारे सैनिकों के घायल व मृत शरीर को देखी थी, मगर वह पहली बार किसी सैनिक का पूरा शरीर बारूद से झुलसा हुआ देख रही थी।
रुखसार किसी तरह संतोष सिंह को अपने घर के अंदर ले आती है। जख्मों को ठंडे पानी से धो कर उस पर मरहम लगाती है।
उसे ये सब काम अच्छी तरह से आता था। प्राथमिक उपचार का सारा सामान भी उसके घर में मौजूद था। वैसे भी यहां कब और कहां कौन मारा जाता था, किसी को पता नहीं था। यहां हमेशा आतंकवादी हमले होते रहते थे। रुखसार का पूरा परिवार भी एक आतंकवादी हमलों में शिकार हो गया था। केवल उसके अब्बा जान ही बचे रह गए थे। इस समय उसके अब्बा जान भी घर पर नहीं थे। वह घर में अकेली अपने थी । के ही आने का इंंतजार कर रही थी।
रात के 10 बज चुके थे। तब तक रुखसार संतोष के सारे जख्मों पर मरहम लगा चुकी थी। संतोष सिंह अभी भी अर्ध बेहोशी की हालत में ही था। किसी तरह रुखसार उसे एक कप चाय पिलाने में सफल हो सकी थी।
अभी तक वह भी भूखी ही थी । पता नहीं उसका भूख भी आज कहां गायब हो गया था।
सुबह रुखसार सबसे पहले कैंप में जाकर संतोष सिंह के बारे में सभी को बता आती है। कैंप के कुछ सैनिक तुरंत उसके साथ उसके घर की ओर चल पड़ते हैं। नायक संतोष को जिंदा देखकर सभी ने राहत की सांस ली थी।
वे लोग संतोष को अपने साथ ले जाना चाहते थे। मगर रुखसार के हठ ने उसे ले जाने नहीं दिया। अतः संतोष सिंह के लिए खाद्य सामग्री एवं जरूरी दवाइयां वही पहुंचा दी गई।
रुखसार सच्ची लगन और मेहनत से " नायक बाबू " की सेवा करने लगी।
" नायक बाबू " यही उपाधि मिला था रुखसार के द्वारा नायक संतोष सिंह को।
रुखसार के पाक मोहब्बत और मन को मोह लेने वाली मधुर बातों ने संतोष पर अपना रंग दिखा दिया था। वह कुछ ही दिन में ठीक हो गया ।
एक दिन वह लम्हा भी आ गया जब रुखसार को न चाहते हुए भी अपने नायक बाबू को विदा करना पडा। रूखसार के दिल में पल रहा देश प्रेम का जज्बा या फिर उसके एकांकी दिल के किसी कोने में पनपा अपने नायक बाबू के लिए प्यार उसे जाने नहीं देना चाहता था । मगर क्या करती ! समय पर किसका जोर चलता है। चले गए थे बेचारी रूखसार के नायक बाबू, अपने जख्मों को छोड़कर। बेचारी रुखसार मन मार कर रह जाती है।
समय बीतता गया। अभी भी भारत - पाकिस्तान में कारगिल युद्ध जारी था। नायक संतोष सिंह अब दुगने उत्साह से पाक घुसपैठियों पर टूट पड़ा था।
कभी कभी एकांत के क्षणों में वह रुखसार को याद कर लिया करता था। उसी के बदौलत तो आज उसकी जिंदगी थी। नहीं तो वह तो कब का खत्म हो चुका था।
उधर रुखसार हमेशा अपने नायक बाबू की यादों में खोई रहती थी। दिनभर उसी के बारे में सोचते रहती, और मिलने की फिराक में लगी रहती थी। मगर अभी तक मन की मुराद पूरी नहीं हो पा रही थी। अभी युद्ध का अंत भी दिखाई नहीं दे रहा था। पाक सैनिकों का जमावड़ा और बढ़ता ही जा रहा था।
अपने नायक बाबू से मिलन की आग में जलती रुखसार एक दिन ऐसा फैसला कर लेती जिसे शायद उसे नहीं करना चाहिए था। वह अपने नायक बाबू की एक झलक देखने के लिए उस पर्वत शिखर की ओर चल पड़ती है, जिधर नायक संतोष सिंह मोर्चा संभाले हुए था।
रूखसार जैसी कोमल नारी के लिए उस दुर्गम बर्फीली राहों पर चलना संभव नहीं था ! मगर उसके दिल में तो मिलन की चाहत और अपने नयाक बाबू की एक झलक पाने की ख़ुशी, उसके अंदर दीवानगी का ऐसा तूफान भर दे रहा था कि उसे वह बर्फीली एवम् दुर्गम रास्ता भी समतल मैदान लगने लगा था ।
मगर वह अबला क्या जानती थी, कि एक नारी आखि़र कोमल नारी ही होती है। वह पत्थर दिल वाली नहीं हो सकती, जो द्रास जैसी बर्फीली दराओं में आसानी से घूम सके।
रुखसार शाम होते - होते ही लुढ़क गई बेहोश होकर एक तरफ अपने प्रियतम नायक बाबू के दीदार की अधूरी आस में।
उधर नायक संतोष सिंह जब शाम में मोर्चा फतह करके लौट रहा था, तो रास्ते में उसे रुखसार का घायल शरीर नजर आ गया। उसका शरीर खून से सना था। संतोष रुखसार को ऐसी हालत में देख अवाक रह जाता है। वह उसे कंधे पर उठाकर दौड़ता हुआ शिविर की ओर चल पड़ता है। उस वक्त उसके लिए रुखसार का जिस्म बंदूक से भी हल्का लग रहा था।
संतोष सिंह जब इस हालत में शिविर में पहुंचता और उसके कंधे पर एक लड़की को देखता है तो देख सभी हैरान रह जाते हैं। मगर रुखसार को देखते ही कोई कुछ नहीं पूछता है। क्योंकि सभी रुखसार से पूर्व परिचित थे।
रुखसार का इलाज एक सैनिक की तरह किया जाता है। दो घंटे के अंदर ही उसे होश आ जाती है।
रूखसार अपने आपको कैंप में देखकर पहले तो वह चौंकती है, मगर उसे तुरंत सारी बातें याद आती चली जाती है।
अपने सामने अपने नायक बाबू को देखते ही रूखसार का रहा सहा दर्द भी खत्म हो जाता है। अब वह उसे ही अपलक निहारे जा रही थी।
तंबू के सैनिक रुखसार की हालत को देखकर मुस्कुराते हुए बाहर चले जाते हैं। संतोष सिंह अकेला रह जाता है।
अभी रुखसार कुछ करना ही चाह रही थी कि संतोष सिंह भी बाहर चला जाता है। रूखसार दिल पे पत्थर रखकर खामोश रह जाती है।
उस दिन रुखसार को कैंप में ही रुकना पड़ा था। सुबह संतोष सिंह उसे घर पहुंचा लाता है।
रुखसार तो उसे अपने घर रोककर बहुत बातें करना चाहती थी, मगर वह रुका नहीं। उसके सिर पर तो अभी दुश्मनों को सीमा पार भगाने का भूत सवार था।
आज युद्ध का 15 वां दिन था। अब लगभग सारे पाक घुसपैठिए या यूं कहे कि सारे पाक सैनिकों का खात्मा हो चुका था।
आज मन में अंतिम विजय लक्ष्य को लेकर नायक संतोष सिंह अपने जवांज बहादुर सैनिकों के साथ निकल पड़ा था। आज मारो या मरो का युद्ध करने को सब ने ठान ली थी । सबके मन में एक ही बात गूंज रही थी कि आज हर हाल में विजय श्री ले लेनी है। चाहे प्राण रहे या जाए।
सभी ने सिर पर कफन बांध कर उस दिन एलान-ए-जंग का आगाज किया था। मगर युद्ध इतना भीषण होगा किसी ने कल्पना भी नहीं किया था। पाकिस्तानी मिसाइल की चपेट में आ गए थे सभी वीर सैनिक। शेर के सामान गरजने वाला नायक संतोष सिंह सदा के लिए सो गया था अपनी मातृभूमि के चरणों में !
यह खबर जब शिविर में पहुंची तो वहां मातमी सन्नाटा छा गया।
एक सैनिक टुकड़ी जाकर नायक संतोष सिंह के मृत शरीर को ले आया था।
उधर जब यह खबर रुखसार को मिलती है तो वह सुनते ही पागलों की भांति शिविर की ओर दौड़ पड़ी है चिल्लाते हुए - " नायक बाबू …… नायक बाबू …..। "
रुखसार भागते चिल्लाते जब शिविर में पहुंचती है, तो उस समय नायक संतोष सिंह का मृत शरीर तिरंगा से लिपटा हुआ था। साथी सैनिक सिर झुकाए कतार में खड़े थे।
रुखसार अपने नायक बाबू के मृत जिस्म को देखते ही बिना किसी की परवाह किए उससे लिपट जाती है, और एक बार, सिर्फ एक बार इतनी जोर से चीखी है - " नायक बाबू …… " कि वहां पर उपस्थित सैनिकों के रूह तक कांप जाती है।
बेचारी रुखसार भी सदा के लिए अपने दिलों में अधूरे सपने संजोए एक कुंवारी बेवा बनकर शांत हो जाती है, जैसे उसके "नायक बाबू" भी सदा के लिए शांत लेटे थे।
कुमार सरोज
जय हिन्द
जवाब देंहटाएंभारत माता की जय
जवाब देंहटाएंजय हिन्द
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जवाब देंहटाएंNice story
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार
हटाएंवंदे मातरम
जवाब देंहटाएंवंदे मातरम्। बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार आपका
हटाएंVery nicely scripted and good title,all the best
जवाब देंहटाएंMany many thanks
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