दौलत / Daulat ।। कहानी ।। कुमार सरोज ।।

            दौलत 

                   कुमार सरोज


           " बाबू जी, आपके यहां कोई काम मिलेगा । "  साधारण कपड़ों में लिपटी एक महिला एक बुजुर्ग के आगे हाथ जोड़े बोल रही थी।  बगल में करीब 5 साल का एक लड़का खड़ा अपनी मां के चेहरे पर छाई दुखों के बादल को देख रहा था।  लडका कभी इधर - उधर देखने लगता। ऐसा लग रहा था मानो वह किसी चीज को खोज रहा है। शायद उसे उसे भूख लगी थी। 

 " नहीं, हमारे यहां कोई काम नहीं है। कहीं और जाकर देखो । "  बुजुर्ग व्यक्ति उसके चेहरे पर एक नजर डालते हुए बोले ।




 

                 " नहीं बाबू जी ऐसा मत कहीए। इतने बड़े मकान में हमारे लिए कोई काम नहीं है। "  बेचारी वह महिला बैठते हुए बोल पड़ी । " आज 3 दिनों से इधर उधर भटक रही हूं। कहीं ढंग का कोई काम नहीं मिल रहा है। सभी काम का लोग देकर मेरी अस्मत से खेलना चाहते हैं । " कहते-कहते वह रोने लगी । " मैं दुसरे प्रदेश से एक ईंट भट्टा पर काम करने आई थी बाबूजी। मगर भट्टा बाबू हमें काम देकर अपनी सेज की शोभा बनाना चाहते थे। इसीलिए मैंने वह काम छोड़ दिया। उसके बाद से ही मैं काम के लिए इधर-उधर भटक रही हूं। "

    अपने आंचल से आंसू पोछते हुए आगे कुछ बोलना ही चाह रही थी वह व्यक्ति बोल पड़ा - "  कौन क्या कर रहा है, इससे हमको कुछ लेना देना नहीं है। बस हमारे यहां काम नहीं है, और तुम आगे का रास्ता देखो । " 

       " नहीं बाबू जी, बड़ी आस लगाकर आपके घर आई हूं। इस दुनिया में मेरा कोई सहारा नहीं है।  एक विधवा अबला का ख्याल कीजिए बाबूजी। ज्यादा कुछ नहीं लूंगी। बस इज्जत से दो जून की रोटी चाहती हूं। ताकि मेरा और मेरे बेटे का पेट भर जाए और तन कपड़ा से ढका रहे। " 

  " मैंने कह दिया ना,  मैं कोई करोड़पति नहीं हूं कि नौकर रखूं। " बुजुर्ग व्यक्ति गुस्से में खड़ा होते हुए बोले। 

 तभी उसका बेटा विनोद घर से बाहर निकला। 

 " क्या बात है पिताजी ? "  

 " अरे पता नहीं कहां से सुबह सुबह चले आते हैं सिर खाने । "  

  विनोद सामने बैठी महिला को देखकर पिताजी के गुस्से का कारण समझ गया।

 "  क्या काम है ?  यहां क्यों आई हो । "  विनोद उसे घूरते हुए बोला ।

 उस महिला की उम्र 25 साल से ज्यादा नहीं होगी।  मगर गरीबी और लाचारी की मार ने उसे 40 की उम्र का बना दिया था। 

 "  काम के तलाश में आई  हूं बाबू जी । अगर घर में कोई काम है तो रख लीजिए । "  वह महिला खड़ी होते हुए बोली। उसका नाम जानकी था। 

  " काम तो है । क्या बच्चा का सही तरह से देखभाल कर लोगी ? " 

 "  एक मां से भी यह पूछने की बात है बाबूजी। " 

 "  तो ठीक है । आज ही से काम करना शुरू कर दो । " 

"  मगर बेटा, बहू क्या करेगी ? " 

 " पिताजी वह सुबह से शाम तक तो घर के कामों में लगी रहती है । इसीलिए वह बच्चे को ठीक से देखभाल नहीं कर पाती है। " 

 " यह सब समय का फेर है बेटा ! जो हो रहा है अच्छा ही हो रहा है। "  बुजुर्ग आदमी मन मार कर रह गया। भला वह करता भी क्या ? वैसे भी उसकी एक टांग कब्र में लटकी थी । 

 काम मिलता देख जानकी के चेहरे पर कुछ देर के लिए ज़माने भर की खुशी छा गई थी। 

"  मैं आपका एहसान कभी नहीं भूल सकती हूं बाबूजी । " 

 " इसमें एहसान कैसा। काम के बदले में तुम पैसा लोगी । " 

 "  फिर भी आपने मुझे सहारा देकर एक बड़ा पुण्य का काम किया है बाबूजी। "  जानकी चेहरे पर खुशी के भाव लाते हुए बोली ।

   उस दिन के बाद से ही जानकी विनोद के यहां काम करने लगी ।

 ढंग का खाने एवम् घर के अन्दर रहने के कारण उसके चेहरे की रौनक फिर से वापस लौटने लगी थी ।  इधर विनोद हमेशा जानकी को अपने सेज की शोभा बनाने के फिराक में लगा रहा था । वह जिस काम को बताकर जानकी को अपने घर में रखा था, वह तो मात्र एक बहाना था।  वह भी तो जमाने के रंग में रंगा हुआ ही इंसान था । वह तो पहले ही दिन से जानकी को पाने का सपना देख रहा था। 

  एक दिन की बात है । सुबह का समय था । संयोग से उस समय विनोद और जानकी के अलावा  घर में कोई और नहीं था। 

 तभी विनोद चुपके से जानकी के कमरे में घुस कर अपने मन की मुराद को पूरा करना चाहा । 

मगर वह असहाय अबला विनोद के बात को नकारते हुए अपनी अस्मत रूपी दौलत को बचाने के लिए उसके आगे गिड़गिड़ाने लगी । 

  " यह आप क्या करने जा रहे हैं बाबूजी।  एक नारी की आबरू उसकी सबसे बड़ी दौलत होती है,  और आप उसी दौलत को लूटना चाहते हैं । बाबूजी, इसी दौलत की रक्षा के लिए तो आज मैं दर-दर की ठोकरें खा रही हूं । " 

 " अरे रानी,  तुम चुपचाप मेरी बाहों में आ जाओ । फिर तो राज करोगी, राज । " 

 "  नहीं बाबू जी,  जीते जी मैं अपनी इस अनमोल दौलत को नीलाम नहीं होने दूंगी । चाहे मुझे कुछ भी क्यों न करना पड़े। " 

 "  क्या करोगी । बच्चे को छोड़कर मर जाओगी क्या ? " 

 "  हां बाबू जी, अगर जमाना जीने नहीं देगा तो मैं क्या करूंगी। मेरी जैसी कितनी औरतें रोज़ मर रही है। मेरे पास भी बच्चे के साथ मरने के अलावा कोई और रास्ता तो नहीं है। " 

 "  अरे,  क्यों मरने का नाम लेती हो।  मेरी बात मान जाओ और ऐश करो । " 

  "  नहीं बाबू जी।  मुझे जाने दीजिए।  मैं अपने पति की अमानत को नीलाम नहीं होने दूंगी। " 

 तभी बाहर से विनोद की पत्नी सुनैना एवम् उसके पिता जी के आने की आवाज आने लगती है। दोनों मंदिर गए थे। वही से लौट आए थे। 

 विनोद सुनैना एवम् अपने पिताजी के आवाज को सुनकर  मन ही मन गुस्सा करता हुआ कमरे से बाहर निकल जाता है। 

आज उसके मन की मुराद अधूरा ही रह गया था। 

 कुछ ही देर के बाद जानकी अपने बेटे को लिए सुनैना के पास आकर खड़ी हो जाती है।

   " मालकिन , अब मैं जा रही हूं । " 

 " जा रही हो ! मगर क्यों ? " 

  " मालकिन, जिस घर में किसी की इज्जत ही सलामत ना हो, वहां रहने से क्या फायदा। एक स्त्री की अस्मत ही उसकी सबसे बड़ी दौलत होती है। मालकिन अगर कोई उसकी इसी दौलत को लूटना चाहे तो भला वह वहां कैसे रह पाएगी । "। कहते कहते जानकी अपनी बची खुची दौलत को बचाने के लिए एवं दो जून की रोटी के जुगाड़ में पुनः सड़कों पर भटकने के लिए निकल पड़ती है । 

 क्या !  जानकी जैसी खुद्दार औरतों को  इज्जत के साथ समाज में जीने का हक नहीं है ?


                       कुमार सरोज

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