दो फूल / Do Phool । कहानी । कुमार सरोज ।

       दो  फूल

                  कुमार सरोज


                 सुबह का समय, मौसम बसंत का , और स्थान बगीचा।  भला ऐसे में मन खिला न रहे, कभी हो सकते हैं ! चारों तरफ फैली थी हरियाली । मैं अपने घर के आगे खड़ा प्रकृति की छटा को  निहार रहा था। बहुत दिनों के बाद मेरा मन इतना प्रसंचित था । कारण किसी की यादें थी।  

अचानक मेरा मन खुशी के मारे और झूम उठा। जब हमारी नजर पड़ी गुलाब के उन दो फूलों पर जिसे स्वयं मैंने अपने हाथों से लगाया था। वही गुलाब का फूल आज बड़ा होकर उस उपवन के सबसे सुंदर फूल के रूप में खिला था।  आकर्षक इतना कि यदि कोई देखे तो देखता ही रह जाए।  

इतना ही तो सुंदर एवं मनमोहक थे  वे दोनों भी फूल ! 

 पता नहीं क्यों इन दोनों फूलों को देख कर मैं फिर पुराने यादों के भंवर में फंसता चला गया। 


                  वे दोनों भी तो दो फूल ही थे, इतना ही  सुन्दर एवं मोहक, इतना ही प्यारा । कोई देखता तो देखता ही रह जाता था। ऐसा ही रूप लावण्य था उन दोनों का। 

 आज से करीब 15 साल पहले की बात है । सुबह का समय था।  मैं गांव से बाहर बने एक पुल पर बैठा था। मैं यहां कुछ देर के लिए प्रतिदिन बैठा करता था।  कुछ वर्तमान एवं कुछ भविष्य के बारे में सोचा करता था बैठकर। 

मैं अभी उठकर गांव की ओर जाने ही वाला था कि एक जीप मेरे गांव की ओर आने वाली सड़क के तरफ मुड़ी। मैं कुछ सोच कर पुनः वहीं बैठ गया ।

 मेरे नजदीक आकर जीप रुक गई । उसमें कुल 5 लोग बैठे थे।  जिसमें से एक को मैं पहचानता था। वे कुछ ही दिन पहले मेरे गांव में ही अपना  घर बनाए थे। उनका एक रिश्तेदार था मेरे ही गांव में। सभी पहले शहर में रहते थे। और अब नौकरी से रिटायर्ड होकर मेरे ही गांव में हमेशा के लिए रहने आ गए थे।  

जीप में एक महिला थी, जो शायद उनकी पत्नी थी। दो लड़कियां और एक लड़का भी था साथ में। शायद तीनों उनके बच्चे थे। लड़कियों का रंग रूप कयामत ढाने वाली थी। हुस्न की मलिक्का जैसी थी दोनों।

शिष्टाचार की औपचारिकता के बाद मैं भी उन्हीं लोगों के साथ जीप में सवार गांव की ओर चल पड़ा। 

 जीप से सारे सामानों को उनके घर में रखकर मैं अपने घर से उन लोगों के लिए  जलपान ले आया। मैं बार बार उन शहरी लड़कियों को ही नज़र बचाकर देख रहा था।

 उस दिन के बाद उस घर में मेरा आना जाना शुरू हो गया।  बड़ी बहन का नाम श्वेता था एवं छोटी बहन का नाम रश्मि । बड़ी बहन मेरे ही क्लास में पढ़ती थी । जबकि छोटी हमदोनो से एक क्लास नीचे । देखने में दोनों एक जैसे ही लगती थी । दोनों का रूप यौवन स्वर्ग की अप्सरा जैसी थी। जो दिन प्रतिदिन और खिलता ही जा रहा था।

 समय बीतता गया। हमारी जान पहचान बढ़ती गई। और यही जान पहचान कब प्यार का रूप ले लिया किसी को पता ही नहीं चला। 

 पता तो तब चला, जब हम दोनों बिछड़ गए। 

 मैं हाई स्कूल के बाद आगे की पढ़ाई पढ़ने शहर आ गया।  यहां मेरा मन नहीं लगता था। हमेशा बड़ी बहन श्वेता की यादें सताती रहती थी । पता नहीं कब वो मेरी धड़कन में, मेरी हर सांस में बस गई थी। मैं हमेशा उसी के ख्यालों में खोया रहता था।  जुदाई और दिन प्रतिदिन प्यार के जख्मों को हरा किए जा रहा था। मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा था। बस दिन-रात गमों को बुलाने का बहाना ढूंढने में लगा रहता था।

 अचानक एक दिन मुझे एक खत मिला ।  पड़ा तो खुशी के मारे मैं नाचने लगा। ख़त  श्वेता का ही था। वह भी मेरे प्यार के गिरफ्त में गिरफ्तार थी। उसका भी मन घर पर नहीं लग रहा था।  गांव बुलाई थी मुझे मिलने के लिए । 

मैं घर आने का बहाना सोचकर गांव आ गया । और फिर शुरू हो गया गांव के हसीन वादियों में लुक छिप कर प्यार का अफसाना। 

 मैं घर आने के कुछ दिन के बाद ही परिवार वालों के दवाब के कारण फिर शहर आ गया। मैं भला क्या करता।  आ गया शहर अपनी पढ़ाई करने । परिवार वालों से झगड़ा भी तो नहीं कर सकता था ना। 

  एक सुबह फिर एक खत मिला । देखकर मुझे खुशी का ठिकाना न रहा । मगर जैसे ही मैंने खत को पढ़ा, तो मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई। यह ख़त स्वेता का नहीं बल्कि उसकी छोटी बहन रश्मि का था।  वह भी मुझसे प्यार करती थी । 

कैसा इत्तेफाक था यह। मैं तो उसकी बड़ी बहन श्वेता के रुप लावण्य में कब से गिरफ्तार था । भला मैं रश्मि की चाहत पूरी कैसे कर पाता। 

मैंने तुरंत श्वेता और अपने प्यार का खुलासा करते हुए एक खत लिखा रश्मि के नाम।  उसे मैं एक सपना समझ कर भूल जाने की हिदायत दिया था। 

समय फिर मेरी यादों के सहारे गुजरने लगा। मगर कुछ ही दिन के बाद मुझे एक फिर ख़त स्वेता का मिला। उसने मुझे बुलाया था।  उसके परिवार वालों ने उसकी शादी ठीक कर दी थी । शादी दोनों बहनों का एक ही साथ ठीक हो गया था। मैं ख़त पढ़ते ही गमों के अथाह सागर में डूब गया। 

 मैं तुरंत गांव की ओर चल पड़ा। 

 मैं गांव आकर श्वेता से मिला। हम दोनों मिलकर कोई रास्ता खोजने लगे। रश्मि सामने नहीं आ रही थी। वह हमेशा उदास रहती थी । 

इधर हम या श्वेता अभी तक कोई निर्णय नहीं ले पाए थे, कि हमे क्या करना है। अपने प्यार के बारे में सभी को बता दे, या फिर बिना बताये घर छोड़कर कहीं भाग जाएं। हम दोनों कोइ निर्णय नहीं कर पा रहे थे। शायद हम दोनों के पास जमाने से लड़ने का साहस नहीं था।  तभी तो हम दोनों घुट घुट कर प्यार में तड़पते हुए अपने आप को हालात के ऊपर छोड़ दिए थे। 

आखिरकार शादी का दिन भी आ गया । उसी दिन मुझे श्वेता का लिखा खत मिला।  लिखा था - 

  " आशीष

     तुम मुझे गलत मत समझना। यह कभी मत सोचना कि मैं तुम्हें नहीं चाहती थी। मैं तो इतना चाहती हूं की दुनिया में कभी किसी को इतना नहीं चाहूंगी । आशीष हमारा प्यार बदनाम न हो, लोग हमारे प्यार पर थूकें नहीं,  इसीलिए मैंने यह फैसला किया है कि हमें हालात से समझौता कर लेना चाहिए । आशीष, तुम तो जानते ही हो कि प्यार पूजा होती है। इस जन्म में शायद हम दोनों को इसे पूजने का ही अधिकार मिला है । ताकि अगले जन्म में हमें मिलने से कोई रोक न सके।  अतः आशीष हो सके तो तुम मुझे अब भुला देना।" 

"  मैं तो एक भूली सी नाम हूं, 

       मुझे मुस्कुरा कर विदा करो ।

मैं तो एक डूबती सी शाम हूं, 

    मुझे हंस कर विदा करो।

 ना रखना पास कोई भी, 

   मोहब्बत की निशानी को । 

अगर पूछे कोई तुमसे, 

 था एक राहगीर कह देना ।" 

               तुम्हारी श्वेता ।


                मैं पत्र को पढ़कर दंग रह गया।  उसने अपने प्यार की बदनामी के डर से इतनी बड़ी कुर्बानी दे दी थी।  मगर पगली वह क्या जानती थी कि मैंने उसे कितना चाहा है। भूलना तो दूर, भुलाने का ख्वाब भी नहीं देख सकता था । अब तो जिस्म के हर कण-कण में वो रची बसी थी।  मगर मैं अब क्या करता। मैंने भी उसके निर्णय के आगे घुटने टेक दिए थे। 

  दोनों बहने अपने अपने ससुराल चली गई । एक बार फिर मैं गमों को बुलाने का उपाय ढूंढने लगा। तभी मैंने गुलाब का एक नन्हा सा पौधा अपने घर के आगे लगाया था।

कुछ ही दिन के बाद मैं फिर पढ़ने शहर आ गया था। 

  आज मेरे द्वारा लगाए हुए उसी गुलाब के पोधे में दो फूल, उसी तरह खिले थे, जैसे हमारे जीवन में भी कभी स्वेता और रश्मि जैसी दो फूल खिले थे।

 अचानक में किसी की आहट को सुनकर ख्वाबों की दुनिया से हकीकत में लौट गया।  तभी सामने के दृश्य को देखकर मैं एक बार फिर गमों के अथाह सागर में गोता लगा लिया। क्योंकि उन दो फूलों को भी एक लड़का तोड़कर लिए जा रहा था । 

शायद गुलाब के इन दो फूलों की खुशबू भी, उन दो फूलों की खुशबू के जैसे ही मेरे नसीब में नहीं थी।

                              

                     कुमार  सरोज

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