गुंडा / Gunda । कहानी । कुमार सरोज ।

                गुंडा

                          कुमार सरोज


           साल का सबसे छोटा फरवरी का महीना था। बिहार में चुनाव का दौर चल रहा था । सभी पार्टियों के नेता अपने साम दाम दंड भेद से वोट खरीदने के चक्कर में लगे हुए थे। लेकिन नेताओं के सामने इस बार बहुत दिक्कतें आ रही थी। इस बार चुनाव आयुक्त गांधी युग का कोई मानव बन गया था। 

           सभी नेता कुर्सी पाने के लिए आपस में ही खून खराबा करने से नहीं चूक रहे थे।  पता नहीं इस कुर्सी में क्या गुण है ? जो अपने आप को लुटाने पर तुले थे नेताजी ।



             पैसों और ताकत की अच्छी आज़माइश होती है चुनाव में । पैसा को लूटने के लिए नए -  नए युवा चेहरे प्रतिदिन चुनावी गुंडा बन रहे थे। कुर्सी के चहेते नेताजी पानी की तरह पैसा बहा रहे थे चुनाव में। 

                बिहार का सबसे ज्यादा उग्रवाद प्रभावित जिला गया था। इसी कारण अधिकांश पार्टियों ने अपना उम्मीदवार वैसे ही लोगों को बनाया था,  जो कम से कम एक बार जरूर जेल गए थे । उन्हीं सब उम्मीदवारों में एक नेता थे - शिवनारायण सिंह उर्फ़ नेता जी। नेेता जी पहली बार इस चुनावी अखाड़े में उतरे थे । जनता उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानती थी।  वे दूसरे जिले से सीधी इस जिले के चुनावी अखाड़े में एक बड़े पार्टी से कूद पड़े थे। 

              लेकिन एक शख्स था जो बहुत अच्छी तरह से उन्हें जानता था । उसका नाम सूरज था। नेताओं के चहेते गुंडों की लंबी कतार में प्रथम पायदान पर उसी का नाम था।  बाकी सब तो उसी के कुछ नए तो कुछ पुराने चमचे थे । 

               चुनाव का दिन आ गया। लेकिन सुबह होते ही एक धमाकेदार खबर चारों ओर फैल गई । किसी ने शिव नारायण सिंह उर्फ़ नेताजी का अपहरण कर लिया था। लोग हैरान थे। इतनी बड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद भी नेताजी का अपहरण हो गया था। यह एक असाधारण घटना थी। 

           गांधीवादी चुनाव आयुक्त को भी घुटने टेक देने पर मजबूर कर दिया था। निष्पक्ष चुनाव कराने का देखा हुआ सपना चकनाचूर होता नजर आ रहा था। 

             चुनाव की सारी तैयारियां हो गई थी। मगर इस घटना ने सबको अंदर तक हिला कर रख दिया था।  

            पुलिस फोर्स कुत्तों की भांति सभी जगहों को सूंघते फिर रही थी । मगर सब बेकार था ।

           इधर नेताजी एक विशेष कक्ष में बैठे पास के एक आदमी पर गुस्से से पागल हो रहे थे। वह विशेष कक्ष सूरज का ही था। 

          अचानक कमरे में सूरज प्रवेश करता है।  उसे देखते ही शिव नारायण सिंह के दिमाग का पारा सातवें आसमान पर चढ़ जाता है।  

           " सूरज तुम मुझे यहां क्यों लाए हो ? "   नेता जी की तेज स्वर कमरे में गूंज उठी ।

            सूरज आराम से खिड़की बंद करते हुए बोला - " ज्यादा चिल्लाओ नहीं मास्टर शिव नारायण सिंह उर्फ आज के नेता जी वर्ना गला फंस जाएगा। " 

" क्या बकते हो। " 

 " आज से 15 साल पुरानी बातें याद करो। जब तुम मास्टर हुआ करते थे और मैं तुम्हारे विद्यालय का सबसे तेज लड़का सुरेंद्र। प्रोफेसर महेंद्र सिंह का लड़का । 

          सूरज कहते कहते बीते दिनों की यादों में खोता चला गया । 

         प्रोफेसर महेंद्र सिंह। भागलपुर शहर के जाने-माने प्रतिष्ठित प्रोफ़ेसर।  उनका एक 10 साल का लड़का था - सुरेंद्र । सुरेंद्र पढ़ने में बहुत तेज था । पिताजी उसे डॉक्टर बनाना चाहते थे। बहुत बड़ी आशाएं बांध रखी थी प्रोफेसर साहब ने। वह जिस स्कूल में पढ़ता था उसी स्कूल में एक शिक्षक थे - शिव नारायण सिंह।  शराब के पक्के शौकीन । पढ़ने में तेज रहने के कारण सुरेंद्र को शिक्षकों से अच्छी जान पहचान थी । सभी शिक्षक उसे बहुत आदर करते थे । मगर कौन जानता था कि आज के शिक्षक अपने पद की गरिमा को इतना धूमिल कर चुके थे । जिनके कंधों पर देश के होनहार, कल के सपूतों का संवारने का काम मिला था,  वही उसे बिगाड़ने का काम कर रहे थे। 

           आज के शिक्षक और नेता भी क्या चीज हैं ? शिव नारायण सिंह भी शराब सुरेंद्र से ही मंगाते थे । शुरु शुरु में तो सुरेंद्र लाने में घबराता था, मगर एक शिक्षक के नाते वह ला देता था । 

                कहा जाता है किसी काम के लिए ना - ना करते करते भी  अंततः ना हां में बदल जाती है। ठीक यही बात सुरेंद्र के साथ भी हुआ। शराब लाते -  लाते वह खुद भी शराब में अपने आप को डुबो लिया। 

              सरकार से मुक्त का वेतन, छात्र से शराब की बोतल पाने के बाद भला क्या चाहत बची रहती होगी आज के शिक्षकों की ! शबाब की ? वह तो आए दिन शिक्षकों की करतूतें अखबारों में छपती रहती है । 

         बेचारे महेंद्र सिंह के सपनों का महल धराशाई होकर गिर गया।  जब शिवनारायण सिंह एक लड़की के साथ छेड़खानी के जुल्म में गिरफ्तार हो गए, और साथ में उनका एक बेकसूर छात्र सुरेंद्र भी ।

            कानून ने मास्टर साहब को 5 साल कि तो सुरेंद्र को 6 महीने की सजा सुनाई। 

           बेचारे प्रोफेसर महेंद्र सिंह की इज्जत खाक में मिल चुकी थी।  कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं थे। उनका जीना हराम हो गया था। आखिरकार उन्होंने शहर छोड़ दिया। 

              6 महीने के बाद जब सुरेंद्र जेल से छूटा तो अपने आप को मौत के दरवाजे पर खड़ा पाया। सभी लोग उस पर ताने कस रहे थे। उसका परिवार उसे छोड़कर कहीं और चला गया था। वह चाह कर भी अब अपने पिता से नहीं मिल सका था। 

            वह भी बदले की भावना से जलता हुआ दूसरे शहर में आकर रहने लगा था। 

            शिवनारायण सिंह कब जेल से छूटे किसी को पता नहीं चला।  आदतन समय के साथ सब लोग इस घटना को भूल गए थे। 

       " ओह... तो तुम सुरेंद्र हो। " सूरज अपनी कहानी बताकर जैसे ही चुप हुआ की नेता जी बोल पड़े। 

            सुरेंद्र ख्यालों से लौटता हुआ बोला  - " हां मैं सुरेंद्र हूं । पिताजी के सपने टूट चुके थे। उनकी इज्जत मिट्टी में मिल चुकी थी। बदले की भावना ने मुझे सुरेंद्र से सूरज बना दिया। " कहते कहते सूरज की पलकें बोझिल हो गई। वह खिड़की खोलकर बाहर निहारने लगा ।

     " उसी बदले की भावना से मैंने आज आपका अपहरण किया है । " 

 "  हो सके तो मुझे माफ कर दो।  मेरे द्वारा किए गए कुकर्म का अंजाम इतना भयानक होगा यह मैंने कभी सोचा भी नहीं था। लेकिन आज तूने मेरी आंखों पर छाई हुई शराब की नशा को दूर कर दिया। "  

      शिव नारायण सिंह सूरज के कदमों में गिर कर गिड़गिड़ाते हुए बोले । 

      " मैं तो तुझे माफ कर दूंगा।  मगर क्या एक बाप जो अपने बेटे को डॉक्टर बनाना चाहता था, वह डॉक्टर ना बन कर एक गुंडा बन गया उसे माफ कर देगा । बोलो, जवाब दो। " 

           शिव नारायण सिंह अभी कुछ बोल पाते कि तभी अचानक वातावरण में पुलिस सायरन की आवाज गूंज उठी। 

           सूरज चौंक गया।  मगर कुछ सोचकर उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान उभर गई। वह अपने आप को पुलिस के हवाले करने के लिए तैयार हो गया । 

       " इंकलाब जिंदाबाद -  जिंदाबाद, जिंदाबाद । हमारे भावी नेता जिंदाबाद। नेता जी  जिंदाबाद। सूरज को फांसी दो, फांसी दो। " इसी तरह के कई नारों से वातावरण गूंज रहा था। 

नेताजी अपने भाड़े के कार्यकर्ताओं के साथ चेहरे पर विजयी मुस्कान लिए पैदल ही चले जा रहे थे। 

        जनता काफी उतावली लग रही थी। पुलिस भीड़ पर काबू पाने की पूरी कोशिश कर रही थी । 

          अचानक एक चौराहे पर भीड़ को कलयुग के देवता स्वरूप नेताजी के भाषण को सुनने के लिए रुकना पड़ा। कुछ कार्यकर्ताओं ने अपना वर्चस्व जमाने के लिए जल्दबाजी में एक सभा का आयोजन कर दिया था। शायद फिर नेेताजी को इतनी वो भी फ्री में तमाशाइयों की भीड़ नसीब नहीं होती। 

             अचानक वहां पर उपस्थित सभी लोग सन्न रह गए, जब लाउडस्पीकर पर बेचारे नेताजी की नहीं बल्कि सूरज की आवाज उभरी।  कुछ लोगों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया। पुलिस उन्हें शांत करने की भरपूर कोशिश करने लगी। मगर कोहराम और तेज होता जा रहा था।  पुलिस फोर्स परेशान थी। 

      "  शांत होकर बैठ जाओ।"  बर्फ से भी ठंडी मगर हीरा से भी कठोर स्वर सूरज का उभरा। उपस्थित जन समूह को आवाज सुनते ही मानों सांप सूंघ गया। अभी जिसे पुलिस शांत कराने में परेशान थी, वही भीड़ अब खामोश हो गई थी। 

        " आज के भावी नेताजी एवं पूर्व के एक बलात्कारी मास्टर शिव नारायण सिंह एवं यहां पर उपस्थित आम जनता। आप लोगों को मैं आज वह सच्चाई बताने जा रहा हूं , जिसे सुनकर आप लोगों की अंतरात्मा कांप जाएगी। " 

           वहां पर उपस्थित तमाम जन समूह यह सुनकर अवाक रह गई थी। सूरज शुरू से लेकर अंत तक की सारी सच्चाईयों को बताता चला गया।  सभी लोग सुन जहां अभी अपने नेताजी की जय-जय कारी कर रहे थे, वही अब लोग उन्हें गालियां दे कर रहे थे । 

        " दोस्तों, इसी के कारण आज मैं एक डॉक्टर के रूप में नहीं बल्कि एक गुंडा के रूप में आप लोगों के सामने खड़ा हूं। यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं है, मेरे जैसे बहुत से ऐसे लोग हैं इस मुल्क में, जो शिक्षकों के घिनौनी व्यवहार एवं कृत के कारण नरक की जिंदगी जी रहे हैं। मैं इस मुल्क के कानून से पूछता हूं कि लोगों को गुंडा, आतंकवादी कौन बनाता है ? मैं जानता हूं कानून के पास इसका कोई जवाब नहीं है। भला कौन अपने मालिक की शिकायत करेगा। लेकिन मैं बताता हूं। इन सब के जिम्मेदार है यहां की सरकार, नेता और शिक्षक। कल के होनहार सपूतों को जब तक अपने कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व का सही ज्ञान नहीं मिल पाएगा तब तक वह देश की बागडोर क्या खाक संभाल पाएगा। मगर अफसोस कि आज की शिक्षा व्यापार एवम एक बदनुमा दाग बनकर रह गई है। जो लगन और मेहनत से पढ़ना भी चाहता है उसे ऐसे ही लोग नरक की दलदल में ढकेल देते हैं। आज के चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। पैसे का लोभ देकर युवाओं को बूथ लूटने के लिए बहकाया जाता है। उसे पैसा के साथ साथ गोली और बंदूक भी दिया जाता है। आज वही युवा नेताओं का सबसे बड़ा कार्यकर्ता होता है। मगर चुनाव बाद वही युवा लडके अपनी खर्च के लिए बैंक लुटेरे बन जाते हैं, तो उन्हें यही नेता और यहां की पुलिस उसे गुंडा की उपाधि दे देेते हैं। "

           सूरज थोड़ा रुक कर फिर से बोलने लगा -  " दोस्तों, गुंडा कोई बनकर पैदा नहीं होता, उसे गुंडा बनाया जाता है। पुलिस हम जैसे गुंडों को देखते ही गोली मार देती है, लेकिन मैं उन्हीं पुलिस वालों से पूछता हूं कि गुंडा बनाने वाले नेताओं को गोली क्यों नहीं मारते ? शायद उनके पास ताकत और पैसा है इसीलिए। तभी तो आज कानून नेताओं की रखैल बन कर रह गई है। जब तक नेता रूपी ये बड़े गुंडे खत्म नहीं होंगे, तब तक हम जैसे छोटे गुंडे भला कैसे खत्म होंगे। " 

           सूरज जैसे ही भाषण देकर हटता है कि वहां पर उपस्थित जन समूह अपने चहेते नेताजी पर ईंट - पत्थरों एवं चप्पलों की बौछार शुरू कर देते हैं। बेचारे नेता जी अपनी जान बचाकर भागने लगते हैं। 

                        

                           कुमार सरोज

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