गलतफहमी / Galatfahami । कहानी । कुमार सरोज ।

              गलतफहमी  

                               कुमार सरोज

                      

                     उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा शहर है - करीमगंज। जनवरी का महीना और वक्त सुबह का था। फिजाओं में कोहरे अभी भी फैले हुए थे।  सड़कों पर इक्का - दुक्का वाहन आ - जा रहे थे। वैसे भी इस शहर में हमेशा मौत सा सन्नाटा ही छाया रहता था । यहां हिंदू मुसलमानों में मंदिर मस्जिद के नाम पर हमेशा  खून खराबा होते रहता था। लोग अंधविश्वासों में फंसकर अपने ही बंधु बांधव के खून बहाते जा रहे थे। धर्मपरायण लोग कत्ल पे कत्ल किए जा रहे थे। कितने अंधे हो गए थे यहां के लोग ?  और यह कैसा अंधापन था ! जो आंख रहते हुए भी किसी को इंसानियत नजर नहीं आ रही थी। कुछ लोग तो बिना आंख के अंधे होते हैं, लेकिन यहां के लोग तो आंख वाले अंधे थे। 

   इस शहर में हिंदू और मुसलमानों की तादाद लगभग बराबर थी।  इसीलिए दोनों तरफ के लोग समान तादाद में मारे जा रहे थे। 



               पुलिस महकमे के लोग पुरी शक्ति से इस दंगा फसाद को रोकने का काम कर रहे थे। फिर भी कोई विशेष फायदा नहीं हो रहा था। 

 पुलिस की एक जीप इस समय शहर के एक सम्मानित एवं प्रतिष्ठित व्यक्ति अशरफ आलम के बंगले के सामने आकर रुकती है। अशरफ अलाम की उम्र अभी करीब 65 साल होगी। 

उस आलीशान बंगले में अभी सन्नाटा पसरा हुआ था।  ऐसा लग रहा था मानो कब से खाली हो। 

इंस्पेक्टर का नाम भी अशरफ ही था। वह जीप से उतर कर बंगले की ओर चल पडा ।

बंगले के ड्राइंग रूम के अंगीठी में आग जल रही थी। आग की लपटे कभी तीव्र तो कभी मंद हो रही थी। बंगले का मालिक अशरफ आग के पास बैठा कुछ सोचने में लीन था। पुरा बंगला उसी के जैसा एकदम खामोश, एवं वीरान लग रहा था। 

  इंस्पेक्टर अशरफ ड्रॉइंग रूम में प्रवेश करते ही चौक गया।  कमरे के अंदर बैठा बुज़ुर्ग अशरफ के चादर का एक कोना आग के लपटों से गिरा हुआ था।  आग तेजी से चादर को जला रही थी। इंस्पेक्टर दौड़कर चादर के आग को बुझा दिया।

अशरफ की तंद्रा भंग हो गई। वह अपने सामने पुलिस वर्दी में एक आदमी को खडा देख चौंक गया। वह चादर समेटते हुए आहिस्ते से उठा और पास पड़े लकड़ी के कुछ टुकड़े को उठा कर अंगीठी में डाल दिया। आग धू - धू कर फिर से जलने लगी। 

" बैठो इंस्पेक्टर । " अशरफ इंस्पेक्टर से कुर्सी की ओर इशारा करते हुआ धीरे से बोले।

इंस्पेक्टर पास के एक कुर्सी पर बैठ गया।

 " बोलो इंस्पेक्टर, क्यों आए हो ?" 

अशरफ भी पास के ही एक कुर्सी पर बैठता हुआ बोला -   " मैं इस शहर का नया इंस्पेक्टर अशरफ हूं । आपकी………. । "  पता नहीं क्यों पुरी बात कहते कहते इंस्पेक्टर रूक गया।   " क्या बात है इंस्पेक्टर, बोलो ? "  इंस्पेक्टर का का नाम अशरफ सुनकर भी उसके चेहरे के भाव नहीं बदले। पता नहीं उसके दिलों दिमाग में अभी क्या चल रहा था।

 " आपकी पत्नी दंगे में मारी गई है । "  इंस्पेक्टर किसी तरह पुरी बात बोल पाया।

" ओह…..। " इंस्पेक्टर की पुरी बात सुनकर वे धीरे से बोले । 

     

                  उसके बाद वह कुर्सी से उठकर खिड़की के पास आकर उसे खोलते हुए धीरे से बोले  - " इंस्पेक्टर, खुदा जो भी करता है, शायद अच्छा ही करता है। " 

 " मतलब ? " इंस्पेक्टर को उनसे ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं था। इसलिए वह उनसे पूछा। 

 खिड़की खुलते ही ठंडी हवा कमरे में प्रवेश करने लगी थी, जिसके कारण कमरे का ठंडक और  बढ़ गया। हवा के तेज झोंके से आग भी और तेज होते जा रही थी ।

शायद वुजूर्ग अशरफ के दिलों दिमाग में भी इसी तरह आग की लपेटे उठ रही थी। जिसे ही शांत करने की कोशिश में वे खिड़की के पास आकर खड़ा हो गए थे। 

 उधर इंस्पेक्टर का ठंड के कारण बुरा हाल था। वह आग की लपटों से चिपकता जा रहा था। 

 " इंस्पेक्टर,  बहुत लंबी दास्तान है इसकी। " बुजुर्ग अशरफ खिड़की से बाहर देखते हुए बोले । इतनी ठंड के बावजूद भी उसे ठंड महसूस नहीं हो रही थी l

 " वह एक मनहूस शाम थी इंस्पेक्टर। मैं घर में अकेला बैठा था। मेरी बीवी अपनी एक सहेली के यहां गई हुई थी।  मैं उसी के आने का इंतजार कर रहा था। मगर मैं क्या जानता था कि यूं ही मैं जिंदगी भर उसका इंतजार करता रह जाऊंगा।" 

 इंस्पेक्टर भी बुज़ुर्ग अशरफ के अजीबोगरीब लग रहे दस्तान को सुनने के लिए खिड़की के पास आ गया। 

बुजुर्ग अशरफ बाहर के हसीन वादियों को निहारते हुए कहे जा रहे थे - "  इंस्पेक्टर, मेरी बीवी की एक मुंह बोली बहन थी - रजिया । वह देखने में मेरी बीवी से ज्यादा सुंदर थी।  मगर एक तरफ मेरी बीवी के चेहरे पर माता मरियम सी प्रेम और त्याग की आभा चमकती थी, तो वहीं दूसरी तरफ रजिया ठीक इसके विपरित थी।   उसके स्वभाव में शौख- चंचलता थी। इसी के कारण शायद मैं रजिया की ओर बढ़ता चला गया। मेरे तालुकात अनजाने में बहुत आगे बढ़ गए। पता नहीं यह सब जवानी का जोश था या खुदा का लिखा हुआ फरमान। " 

तभी हवा का एक तेज झोंका कमरे में प्रवेश की,  और न चाहते हुए भी इंस्पेक्टर के जुबान से "उफ्फ " शब्द निकल गया। 

" ओह… । मैं तो भूल ही गया था। आओ आग के पास बैठते हैं।  बुज़ुर्ग अशरफ आग की ओर बढ़ते हुए बोले। आग अभी भी अंगीठी में धीरे-धीरे जल रही थी। 

"  यह दास्तान आज से करीब 21 साल पहले की है, जब जिंदगी में वह मनहूस शाम आई थी। रजिया जब मुझसे मिलने आई थी,  वह बहुत खुश थी, फिर भी सहमी सहमी लग रही थी। उस दिन उसने जो खबर सुनाइ थी, उसे सुनकर मेरे पांव तले की जमीन खिसक गई थी। वह मां बनने वाली थी। सुन अपनी गलती का एहसास मुझे होने लगा था।  मगर अब क्या होता। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मैं यह सोचकर कि जल्द ही कोई रास्ता निकाल लूंगा, चुप हो गया। मगर मैं क्या जानता था कि उसका यह मजाक मेरे जिंदगी में एक भयंकर भूचाल ला देगा। " 

 " मजाक…. ! "  इंस्पेक्टर मजाक  शब्द सुनते ही चौंक कर बोला।

 " हां इंस्पेक्टर,  रजिया ने मेरे साथ मजाक ही की था। " 

 " मगर, अशरफ़ साहब, इस दास्तान का आपकी पत्नी के हत्या से क्या ताल्लुकाता है। " इंस्पेक्टर कुछ सोचता हुआ बोला

 " इंस्पेक्टर जिस समय रजिया से हमारी बातचीत हो रही थी, उसी दरमियान मेरी बीवी सोफिया भी बाहर से घर आ गई थी, और वह हम दोनों की सारी  बातें सुन ली थी। उसे क्या पता की रजिया मजाक कर रही थी, वह झूठ बोली थी कि वह मेरे बच्चे की मां बनने वाली है। सोफिया ने उसके झूठ को सच मान लिया था। वह अपनी बहन को बहुत चाहती थी,  इसी लिए वह उसी समय हमें और इस घर को छोड़कर सदा के लिए हम से दूर चली गई, ताकि उसकी बहन खुश रहे ।" 

बुजूर्ग अशरफ फिर से खिड़की के पास आ गये। सूरज की लाल रश्मि किरणें अब आसमान में धीरे-धीरे फैलने लगी थी। अशरफ सूरज के उस किरण को अपलक देखने लगा। पता नहीं क्यों, उसे ऐसा लग रहा था मानो उसकी पहली बीवी सोफिया उस लाल रश्मि किरण पर सवार जन्नत से उतर कर उसके करीब आ रही है। 

 " तो क्या आपकी दो पत्नी थी ? " इंस्पेक्टर को उस बुजुर्ग अशरफ़ की बातें पता नहीं क्यों बहुत बैचैन कर रही थी।

बुज़ुर्ग अशरफ अतीत से लौटते हुए धीरे से बोला - "  हां इंस्पेक्टर। हमारी पहली बीबी सोफिया तो हमें उसी दिन  छोड़ कर कहां चली गई थी। मैंने सभी जगह पता लगाया, मगर कहीं उसका कोई अता -  पता नहीं चला। उस समय भी हिंदू - मुसलमानों में दंगा फसाद हो रहा था। लोगों ने तसल्ली दी कि शायद लौटते वक्त दंगे में मारी गई होगी।  मगर मुझे यकीन नहीं हो रहा था। उसकी खोजबीन में 3 महीने गुजर गए। मगर उसका कहीं पता नहीं चला। अंत में रिश्तेदारों ने दबाव देकर रजिया के साथ हमारी दुसरी शादी करवा दिया। समय के साथ-साथ मैंने अपनी पहली पत्नी सोफिया को भूला कर रजिया के साथ ख़ुशी पूर्वक रहने लगा। मगर रजिया कभी औलाद नहीं दे सकी, जो घर छोड़ते वक्त सोफिया देने वाली थी। रजिया बांझ थी इंस्पेक्टर………. ।" कहते कहते बुजुर्ग अशरफ़ रोने लगे।

  " तो क्या आप निसंतान है ? "  बुजुर्ग अशरफ़ की बातें सुनकर इंस्पेक्टर का बुरा हाल होता जा रहा था। पता नही क्यों उसकी मां और बुजुर्ग अशरफ़ की पहली बीबी सोफिया की दास्तान एक जैसी लग रही थी।

   "  हां इंस्पेक्टर । "  बुजुर्ग अशरफ खिड़की के पास से आकर फिर से कुर्सी पर बैठ गए ।

 "  रजिया से शादी के 2 महीने बाद ही एक दिन घर का नौकर एक लिफाफा लाकर हमें दिया था। वह लिफाफा नौकर को घर का नेमप्लेट बदलते वक्त उसके अंदर से मिला था।  लिफाफा के अंदर कागज पर लिखे हलफनामे को पढ़कर मैं हैरान रह गया, वह घर छोड़ते वक्त सोफिया ने ही लिखी थी। घर छोड़ने की वजह रजिया ही थी। तभी हमें पता चला की वह हम दोनों की सारी बाते6 सुनकर ही घर छोड़कर गई थी। उसके बाद पता नहीं क्यों रजिया और हमारे बीच की दूरी बढ़ने लगी। धीरे धीरे हम दोनों में तनाव बढ़ता गया। अब तो आए दिन बात - बात पर झगड़ा भी होने लगा था। कल रात भी झगड़ा हुआ था,  और वह घर छोड़कर मायके जाने के लिए घर से बाहर निकली थी।" कहते कहते बुजुर्ग अशरफ़ के आंखों में फिर से आंसू आ गए।

  " आपकी पहली पत्नी सोफिया का अभी तक कुछ पता चला नहीं। " इंस्पेक्टर उतावले होकर पुछ6। उसके दिलों दिमाग में अभी तूफान उठा हुआ था। क्योंकि उसकी मां का नाम भी सोफिया ही था। 

 "नहीं इंस्पेक्टर।  अब वो बस ख़ुदा से यही मन्नत मांगता हूं कि "वो औरत" जहां भी हो हमेशा खुश रहें।  उसे हमारी भी उम्र लग जाए। " कहते कहते वह बुजुर्ग अशरफ़ के आंखों से फिर आंसू निकल पड़े। 

" आपके पास उनकी कोइ तस्वीर है ? " इंस्पेक्टर अपने अन्दर के उठ रहे तूफान को रोकते हुए बोला। 

 " हां है। अभी दिखाता हूं। " वो कहते हुए धीरे से उठे और अलमारी में से एक फोटो फ्रेम निकाल कर वापस कुर्सी पर आकर बैठ गया। 

  " इंस्पेक्टर देखो। यही है त्याग की प्रतिमू्ति उस वेबा की तस्वीर है, जिसकी गलतफहमी के कारण आज पता नहीं वह कहां और कैसे होगी। "  वो इंस्पेक्टर को तस्वीर दिखाते हुए बोले। 

  इंस्पेक्टर अशरफ़ फ्रेम में जड़ी तस्वीर को देखते ही चौक गया,  क्योंकि "वो औरत" कोई और नहीं बल्कि उसकी अपनी मां थी। 

इंस्पेक्टर अशरफ़ उस बुजुर्ग अशरफ़ का ही बेटा था। 

अभी तक सभी एक गलतफहमी का ही दंभ झेल रहे थे, जो अब जाकर दूर हुआ था।

                              कुमार सरोज


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