वह बूढ़ा आदमी / Vah Buddha Aadami । कहानी । कुमार सरोज ।

      वह बूढ़ा आदमी

                   कुमार सरोज


                     भारत में हजारों लाखों गांव हैं जितने गरीब भारतीयों के बच्चे, जिसमें से कुछ का नाम बड़ा ही असाधारण होता है। जो अपने पीछे गरीब कृषक के ही घिसे पीटे कपड़ों जैसे कुछ न कुछ कहानी छुपाए रहते हैं। कुछ का नाम तो बड़ा ही अटपटा सा सुनने में लगता है।  वैसे ही अटपटे ढंग से जीवन बसर करते हैं, वहां के ग्रामीण लोग। गरीबी की हालत में भी उनका जीवन कितना सुखमय एवं शालीन होता है। न छल न कपट। केवल निस्वार्थ होता है, उनके मन में। 

                         


                         वैसे ही एक गांव सिकरिया में मैं आज जा रहा था। जिसके पीछे भी सिकंदर महान की मटमैली दास्तान जुड़ी थी।  पहले मैं भी इसी गांव में रहता था। लेकिन शहर के चकाचौंध में पडकर अब हम लोग भी शहर में बस गए थे। 

                 मगर मेरा लगाओ बचपन से ग्रामीण परिवेश की ओर ज्यादा था। इसी लगाव के कारण मैं हर साल फसल के दिनों में गांव जाता था।  गांव के निराले खेल कबड्डी, गुली डंडा, मछली मारना, मटर छिमियों की चोरी करके भागने में बड़ा मजा आता था। अभी भी जब वो दिन याद आते हैं तो मन बरबस बचपन में पहुंच जाने की कोशिश करने लगते हैं। 

                    मैं पैदल ही बस स्टैंड से चलते चलते कब गांव आ गया मुझे पता ही नहीं चला। 

            एक - दो दिन तो गांव के लोगों से मिलने जुलने में ही गुजर गया।  कहां शहर में भागदौड़ के कारण दिन-रात की चैन हराम हो जाती है, और यहां तो हमेशा चैन ही चैन था।  किस तरह 2 दिन गुजर गए इसका कुछ पता ही नहीं चला। मैं दिन भर बच्चों के साथ बच्चा बनकर आवारा लड़कों के तरह घूमा करता था।  

              आज बंसी से मछली मारने का प्रोग्राम बना था। मैं भी 5 बंसी बनाकर लड़कों के साथ मछली फंसाने निकल पड़ा। आज मुझे ऐसा लग रहा था मानो फ़िर से मेरी बचपना लौट आई है।

                चलते चलते सभी बच्चे एक छोटी सी तालाब के पास रूक गए। मगर मेरा पास वाली बड़ी तालाब में जाने का मन कर रहा था, इसलिए मैंने सभी को वहां चलने को कहा। मगर कोई भी वहां जाने को तैयार नहीं हुआ। लाख पुछने पर जब एक लड़के ने बताया कि रास्ते वाले पीपल के पेड़ पर एक भूत रहता है तो मैं उन बच्चों की अंधविश्वास भरी भावना पर भरपूर हंसा। 

               अंततः मैंने अकेले ही बड़े तालाब के पास जाने का निश्चय कर लिया। 

           मगर रास्ते में मेरा मन भी भूत के डर से घबराने लगा। लड़कों के सामने तो मैं शहरिया शेखी झाड़ गया।  मगर अब मैं भी मन ही मन डर रहा था। 

            मगर मैं शहरिया भाला पीछे कैसे हटता, अपनी आन, वान और शान बचाने के लिए चलता रहा। मगर जैसे-जैसे पीपल का पेड़ नजदीक आ रहा था,  वैसे वैसे डर के मारे मेरे शरीर से पसीना निकलने लगा। आस पास भी कोई आदमी नजर नहीं आ रहा था। मैं इतना डरा हुआ था कि क्या बताऊं !  अगर मेरी जगह पर कोई दूसरा इस दास्तान को लिखता तो पूरा लिख देता। मगर भला मैं अपनी कमजोरी को कैसे लिखता। 

               शुक्र है भूत देवता का कि मैं हिम्मत करके सही सलामत पीपल के पेड़ को पार कर गया।  मगर जैसे ही हमारी नजर बड़ी तालाब के किनारे गई, हमारी पतलून ढील्ली हो गई। वहां पर लंबी दाढ़ी वाला तथा  जीर्ण शीर्ण लंबा लवादा पहने, एक बूढ़ा आदमी बैठा बीड़ी पी रहा था। मै भूत से तो पहले से ही डरा हुआ था, उसे देखते ही मेरे प्राण पखेडू उड़ गए। मैं डर के मारे भाग खड़ा हुआ।

               भागते समय भी मैंने बंसी को नहीं छोड़ा।  एक दो बार मैं गिर भी गया। जिसके कारण मेरी बंसी भी टूट गई।  मगर मैं बिना किसी की परवाह किए भूत के डर से भागता जा रहा था। 

                  जब मैं छोटी तालाब के पास पहुंचा तो मुझे देखकर सभी लड़के जोर जोर से हंसने लगे। उन लोगों के हंसी को सुनकर मैं मन ही मन झेप गया। मुझे उन लड़कों पर बहुत गुस्सा आ रहा था। वास्तव में वहां पर कोई भूत नहीं था। उन लड़कों ने मुझे बुद्धू बनाया था। 

                  वह बूढ़ा आदमी तो गांव का ही था। लड़कों से ही पता चला कि वह पिछले साल से ही इस गांव में आकर रह रहा है।  गांव वालों को वह बहुत चाहता है। गांव वाले भी उसे बहुत प्यार देते हैं। वह दिन भर मछली मारता और शाम को अपनी छोटे से मकान में लौट आता। 

                शर्मिंदगी से बचने के लिए एक बार फिर मैं बड़ी तालाब की ओर अकेले नहीं चल पड़ा। आज गांव के लड़कों ने मुझ जैसे शहरी को यह बता दिया था कि गांव के बच्चे भी कितने तेज दिमाग के होते हैं। मैं मन ही मन अपने आप को कोसते हुए चलता रहा। 

                रास्ते में मैंने इस बार देखा कि कुछ बच्चे गड्ढे में झोला बस्ता लेकर स्कूल जाने के डर से छुपे हुए थे।

                  तालाब के पास पहुंचकर जब देखा तो इस बार वह बूढ़ा आदमी वहां पर नहीं था।

             मैं बची हुईं अपनी 3 बंसी में मछली के लिए चारे डाल कर बंसी को पानी में डाल दिया। 

     अभी मैं काफी नर्वस था।  गांव के लड़कों ने मेरे जैसे नौजवान लेखक को आज मूर्ख बना दिया था। ईधर मछली भी हमें परेशान किए हुए थी। जब तक मैं एक बंसी को बाहर की ओर खींचता, तब तक दूसरे बंसी को मछली खींचने लगती। जब मैं दूसरे को खींचने की कोशिश करता, तो मछली तीसरी बंसी को खिचने लगती। उसी में मैं सिर्फ इधर से उधर हाथ मार रहा था।  धीरे-धीरे मेरे सारे मछली के चारे भी खत्म हो गए।

            " नौजवान एक बार में सिर्फ एक बंसी लगाओ। वैसे भी तुम शहरी लगते हो। भला तुम क्या जानो बंसी का हाल। "       पीछे से जब उस बूढ़े आदमी की आवाज मेरे कानों में पड़ी तो मैंने पीछे मुड़ कर देखा। पता नहीं कब से वह मुझे देख रहा था। 

                    मैं खड़ा होते हुए बंसी निकाल कर रख दिया, और उसी के पास आ गया। वह बूढ़ा आदमी वहीं पर बैठकर फिर से बीड़ी पीने लगा ।  पता नहीं क्यों वह आदमी मुझे बड़ा अजीब लग रहा था। उसके पहने कपड़े से पता चल रहा था कि या तो वह खुद कभी सेना में ऑफिसर रहा होगा या उसे किसी ने यह कोट दान में दिया होगा।  उस पर के सभी बैज गायब थे। 

                 हम दोनों वहीं पर बैठकर बातें करते लगे। मैं उसके बारे में जानने की कोशिश कर रहा था, मगर उसके बारे में मुझे कुछ विशेष जानकारी हाथ नहीं लगी।  

       धीरे-धीरे शाम हो गई। हम दोनों वापस लौट पड़े। 

                     रास्ते भर मै उसी ओवरकोट वाले बूढ़े आदमी के बारे में सोचता रहा। मगर मैं जितना सोच रहा था उतना ही ज्यादा सवालों के भंवर में फंसता जा रहा था। 

                   उस दिन के बाद मेरा अधिकांश समय उसी आदमी के साथ गुजरने लगा । अब हम दोनों काफी घुलमिल गए थे। उन्हीं के बातों से पता चला था कि पहले वो सेना में अच्छे पद पर कार्यरत थे। मगर किसी कारणवश उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा था। 

          आज मैं कारण जाने की इच्छा संजोए उनके बगल में ही मछली  फसा रहा था। 

            " बाबा, आपकी बातों से मुझे ऐसा लगता है कि आपकी जिंदगी के साथ जरूर कोई बहुत बड़ी नाइंसाफी हुई है। "     मैं थोड़ा रुक कर बोला।       

" बाबा, आप मुझे बता कर अपने दिल के बोझ को थोड़ा हल्का कर ले। " 

" बेटा, हमारे मन का बोझ इतना भारी है कि वह हल्का हो ही नहीं सकता।" 

  " फिर भी कुछ तो होगा। "

  " तुम बहुत हठठी हो। "   वो मुस्कुराते हुए बोले।  

                  उसके बाद वे चेहरे पर निराशाजनक भाव लाते हुए बोले - " आज मैं तुम्हें अपनी गुजरी हुई जिंदगी की दास्तान पहली और आखरी बार सुनाने जा रहा हूं ……….    । " 

     वे कहते गए और मैं सुनता गया। 

 आज से करीब 20 साल पहले की बात है।  मैं उस समय सेना में अच्छे पद पर कार्यरत था। मुझमें देशभक्ति कूट-कूट कर भरी हुई थी। मैं फर्ज की खातिर सब कुछ करने को तैयार था। इसीलिए मैंने शादी भी नहीं की।  दूसरी तरफ कुछ लोग फर्ज के नाम पर देश को लूटने में लगे हुए थे। 

               अचानक मैंने देखा कि उनकी आंखों से आंसू की बूंदे उनके गोद में टपकने लगे।  मैंने उन्हें रोकना सही नहीं समझा।

         " बेटे मेरे चलते ही एक लड़की अर्चना  की जिंदगी बर्बाद हो गई। वह मुझे इतना चाहती थी कि मैं उसका बखान नहीं कर सकता।  मैं फ़र्ज़ के जुनून में इतना अंधा हो गया था, कि मैंने अर्चना के प्यार को नकार दिया।  फिर भी उसने अपने दिल में टिमटिमाती हुए रोशनी की एक लो जलाए 5 सालों तक मेरा इंतजार करती रही। लेकिन फिर भी मैंने कोई ध्यान उधर नहीं दिया। अंत में उसके घर वालों ने जबरदस्ती दूसरी जगह शादी कर दिया।  प्रेम कि वह प्रतिमूर्ति न चाहते होगी भी अपनी ससुराल चली गई। " 

      "  इधर मैं तन मन से अपनी मातृभूमि की सेवा करने में लगा था। बहुत से लोग मेरे दुश्मन भी बन गए थे।  शायद उन्हें खुलेआम गैरकानूनी काम करने में दिक्कत हो रही थी। मैं अपने कामों से बहुत खुश था। सभी लोग मुझे बहुत चाहते थे। मगर मेरी यह खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकी। शायद कलयुग में किसी इंसान को ईमानदारी की राह पर चलना उसके बस की बात नहीं है।  तभी तो मुझे अपने ही कुछ लोगों ने झूठ मुठ के बदनामी के दलदल में इतना डूब कर रख दिया, कि मैं मुंह दिखाने के लायक भी नहीं रहा। जहां पहले लोग हमारी ईमानदारी की मिसाल देते थे, वहीं अब मुझ पर लोग थूक रहे थे। इस युग में ईमानदारी से कोई इंसान अपनी जिंदगी को शायद सही ढंग से टिका नहीं सकता है।  एक न एक दिन उसे भी भ्रष्टाचार के दलदल में फंसा ही दिया जाता है । "     

                       बाबा ने लंबी सांस लेकर फिर से आगे करना शुरू किया  -     " मुझे अपने पद से हटा दिया गया। लोगों के तानों से अजीज होकर मैंने वह शहर छोड़ दिया।  मगर मैं जहां भी जाता लोग मुझ पर ताने कसते। मेरी ख्याति ही अब मेरा दुश्मन बना हुआ था। मैं जहां भी जाता लोग देखते ही मुझे पहचान लेते और मुझसे नफरत करने लगते।  उस समय मेरी दशा धोबी के गधे जैसा बना हुआ था। कोई भी हमारी मदद नहीं कर रहा था। वैसे भी जहां सभी लोग इमानदार हो वहां हम जैसे बेईमानों को कौन पूछता ! " 

           " दिन भर इधर-उधर भटकते हुए किसी तरह मेरी जिंदगी कट रही थी। रात धर्मशाला में या तो फ़िर कभी खुले आसमान के नीचे ही।  धीरे-धीरे जाड़े का मौसम भी आ गया। उस समय रात गुजारना मुझ जैसे आदमी के लिए काफी मुश्किल हो रहा था। उस समय भी मेरे शरीर पर यही ओवरकोट था। चेहरे पर दाढ़ी निकल आए थे। बाल भी लंबे हो गए थे। एक रात मैं एक पेड़ के नीचे बैठा, अपने कर्मों का लेखा जोखा कर रहा था। उस रात ठंड भी काफी थी। ठंड के कारण मेरा बुरा हाल था। कभी सपने में भी मैंने नहीं सोचा था मेरी ऐसी हालत भी हो सकती है।  मैं कभी सोचता कि सामने वाले मकान में चला जाऊं। पर हिम्मत नहीं कर रहा था। आखिर मरता भला क्या न करता।  ठंड से थक हार कर मैं साहस करके सामने वाले मकान की ओर चल पड़ा। 

 एक कमरे से प्रकाश आ रही थी। बाकी सब के सब सुना लग रहा था। मैंने दरवाजे पर धीरे से दस्तक दिया। मगर जवाब में कुछ नहीं हुआ। शायद ठंड के कारण लोग रजाई में दुबके हुए थे। फिर मैंने जोर से दस्तक दिया। तदुपरांत कुछ देर के बाद एक महिला ने दरवाजा खोला। वह सफेद साड़ी में लिपटी थी। बदन पर कश्मीरी सवाल था। 

" क्या बात है बाबा….. ? "  मुझे देखते ही वह महिला बोली। 

 मगर मैं आवाज सुनकर सन्न रह गया। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि अर्चना से भेंट होगी भी तो इस हाल में।  मैंने उसकी आवाज को सुनते ही पहचान लिया था। मगर उस समय मेरे हालात ऐसे थे, कि अर्चना क्या कोई भी मुझे पहचान नहीं सकता था।  ठंड अधिक रहने के कारण सर्दी से आवाज बदली हुई थी। मैंने अपने आप को एक मुसाफिर बता कर आने का कारण भी बता दिया। 

 उसने मुझे बड़ी इज्जत से कमरे में बैठा कर खाने का प्रबंध करने चली गई। 

              रात भर मुझे ठीक से नींद नहीं आई। मैं अर्चना के बारे में ही सोच सोच कर परेशान हो रहा था। सुबह जब उठा, तो टेबल पर चाय रखी हुई थी। बहुत दिनों के बाद चाय नसीब हो रहा था। इसीलिए मैं तुरंत गटागट पीने लगा। 

 " बाबा, बाथरूम में कपड़ा रखा हुआ है।  आप नहा धो लीजिए। " 

           अर्चना की जुबान से बाबा शब्द सुनकर मुझे बड़ा ही अचरज हो रहा था। मगर मैं क्या करता। नसीब में शायद यही लिखा था। 

             बहुत दिनों से मैंने स्नान भी नहीं किया था,  मैं स्नान करने चल पड़ा। 

            स्नान करके लौटा तो नास्ता तैयार था। पेट में चूहे तो कूद ही रहे थे, मैं तुरंत नाश्ता करने लगा। 

            नाश्ता के बाद मैं नहीं चाहते हुए भी जाने को तैयार हो गया। मगर अर्चना मुझे जाने नहीं दी। अब मुझे ऐसा लग रहा था, शायद उसने भी मुझे पहचान तो नहीं लिया था।  

            एक लंबी सांस लेकर बाबा ने फिर कहना प्रारंभ किया -      " बेटे, उसके यहां दो-तीन दिन कैसे कट गए पता ही नहीं चला। मगर यहां भी युग के अनुरूप आसपास के लोगों मैं मेरे बारे में कानाफूसी होने लगी थी।

             एक दिन की बात है। अर्चना बाजार गई थी। मैं अकेला अर्चना के बारे में ही सोच रहा था। शादी के कुछ दिन बाद ही उसके पति मर गए थे। तभी से वह भी अब अकेले ही इस घर में रहती थी। शायद अब मैं भी उसे अंदर ही अंदर चाहने लगा था। 

              अचानक बाहर से लोगों के शोर गुल की आवाज सुनाई दी। मगर मैने उस ओर ध्यान नहीं दिया।  मैं अपनी नई जिंदगी के बारे में ही सोचने में लीन रहा। 

           बेटा मुझसे यही सबसे बड़ी भूल हो गई।  बाहर लोग अर्चना पर ही ताने कश रहे थे। एक पवित्र देवी पर लोग लांछन लगा रहे थे । 

        अचानक भाग दौड़ की आवाज सुनकर मैं भी बाहर आ गया। लेकिन तब तक वहां कोई नहीं था। मैं घर के अंदर आ कर अर्चना को खोजने लगा।  मगर वह कहीं नहीं मिली। इत्तेफाक से मुझे अर्चना का लिखा एक ख़त मिला। 

               पढ़ने के बाद मेरे होश उड़ गए। वह मुझे पहले ही दिन पहचान गई थी। भला एक सच्ची प्रेमिका मुझ जैसे अभागे को कैसे नहीं पहचानती । वह मुझसे अभी तक छुपाए हुए थी।  मगर आज लोगों के ताने को सुनकर अपनी मोहब्बत को सही सलामत रखने के लिए उसने अपनी मोहब्बत को बदनाम नहीं होने दिया। मगर शायद वह नहीं जानती थी, कि अब मैं भी उसे कितना चाहने लगा था। 

                     मैं तुरंत रात में ही उसे खोजने के लिए निकल पड़ा। मगर उसका कहीं पता नहीं चला। शायद शहर के बगल में बहने वाली नदी में कलयुग के इस घिनौने समाज के डर से समा गई थी। 

            मैं अभागा इतनी हिम्मत भी नहीं जुटा सका कि उस  पवित्र नारी के पास जा सकूं। उसके बाद मैं इस गांव में आकर रहने लगा ……….. " । 

                 बहुत ही लंबी सांस लेकर उस बूढ़े आदमी ने अपनी जिंदगी की दास्तान को खत्म किया। 

            शाम हो चली थी। आज हम दोनों में से किसी ने एक भी मछली नहीं फसाया था।  दोनों यूं ही गांव की ओर खाली हाथ लौट पड़े।

              सुबह जब मैं उठा तो सबसे पहले बाबा की झोपड़ी की ओर चल पड़ा। 

            मगर मेरे पहुंचने के पहले ही बाबा कहीं जा चुके थे।  मैं देख कर हैरान रह गया। आज एक इंसान अपनी ईमानदारी के कारण कितना कष्ट झेल रहा था।  

            क्या यही कलयुग की रीत है। गलती कौन करता है, और सजा कौन भुगगता है।  काश आज के लोग इतने स्वार्थी नहीं होते।

                    

                  कुमार सरोज

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