विधवा / Vidhwa । कविता । कुमार सरोज ।

विधवा 
       कुमार सरोज


सफेद साड़ी में लिपटी, 

वो जब निकलती सड़कों पे,

 लोग ताने मारते।

 कुलटा, कुल्क्षणी उपमाओं से,

औरतें उसे सुशोभित करती,

 बच्चे भी अपना मुंह मोड़ लेते।



कोई तन से, कोइ धन से,

सभी उसकी बेवसी का,

फ़ायदा उठाना चाहते।

अपने हो या पराये,

सभी उसे हमेशा,

गंदी निगाहों से देखते।

वो इस जालिम समाज को,

छोड़ मरना भी चाहती,

मगर मर नहीं पाती।

बस रोज मर मर के जिंदा है,

सिर्फ़ अपने बेटा के,

बड़ा होने के आस में।


                      कुमार सरोज

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