मंगलसूत्र / Mangalsutra l कहानी l कुमार सरोज l

          मंगलसूत्र

                         कुमार सरोज


            पाली  पटना जिला का एक छोटा सा शहर है। उसी शहर में महेंद्र अपनी पत्नी सुचित्रा एवं बेटी अर्चना के साथ रहता था।  महेंद्र ठेला चलाता है और उसी से अपने परिवार का भरण पोषण करता था। 

           महेंद्र शराबी तो था ही वह एक नंबर का अय्याश भी था। वह जितना कमाता उससे ज्यादा पीने और अय्याशी करने में उड़ा देता था। जिसके कारण उसके घर की माली हालत बहुत खराब थी। पत्नी को भी काम करने के लिए दूसरे के घरों में जाना पड़ता था। 15 साल की उसकी बेटी अर्चना भी दूसरे के घरों में काम करती थी। 



                    किसी तरह सभी का जीवन गुजर रहा था। 

             सुचित्रा को अब अपनी बेटी की शादी की चिंता भी होने लगी थी। मगर वह जब कभी भी अपनी बेटी की शादी को लेकर अपने पति से बात करती तो वह टाल देता था।

                    बिहार में अभी दारु तो बंद हो गया था, फिर भी महेंद्र गांजा और ताड़ी पीकर मस्त रहता था। उसके दोस्त भी उसके इस काम में और मदद करते थे। क्योंकि उसके अधिकांश दोस्तों की गंदी निगाहें अब उनकी बेटी अर्चना पर लगी थी। सभी महेंद्र को कर्ज के दलदल में फंसा कर उसकी बेटी को हासिल करना चाहते थे।

              महेंद्र इन बातों से अनजान दिन भर सिर्फ पीने और अय्याशी में ही मग्न रहता था।

                  एक दिन की बात है, उस दिन तीज का त्यौहार था। सुचित्रा भी अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत किए हुए थी। 

                 सुचित्रा अपने छोटे से घर के आंगन में बैठी हाथ में मंगलसूत्र लिए पूजा कर रही थी। अर्चना भी पास ही बैठी हुई थी। 

                तभी बाहर  से महेंद्र भी वहां आ जाता है। अपनी पत्नी के हाथ में चांदी का मंगलसूत्र देखते ही उसके चेहरे पर चमक आ जाती है।  वह तुरंत चांदी का मंगलसूत्र लेने के लिए हाथ बढ़ा देेता है। मगर पास बैठी उसकी बेटी अर्चना देख लेती है, और अपने पिता के हाथ को पकड़ लेती है। 

              तब तक सुचित्रा भी अपनी आंखें खोलकर अपने पति को देखने लगती है। अपने हाथ से मंगलसूत्र अपने पति को ले जाते देख उसके होश उड़ जाते हैं। 

                सुचित्रा मंगलसूत्र को नहीं ले जाने के लिए अपने पति के आगे गिड़गिड़ाने लगती है। मगर महेंद्र नहीं मानता है। दोनों में छिना झपटी होने लगती है। अर्चना सिर्फ खड़ी अपने मां बाप को देख रही थी।                                          दोनों मंगलसूत्र के लिए अभी झगड़ ही रहे थे कि अचानक  महेंद्र हाँफते हुए गिरकर बेहोश हो जाता है। यह देख सुचित्रा और अर्चना के पैर तले की जमीन खिसक जाती है। 

               दोनों मां बेटी महेंद्र को किसी तरह पास के ही एक डॉक्टर के पास ले जाते हैं। लेकिन वह डॉक्टर शहर ले जाकर उसे बड़े अस्पताल में इलाज करने का सलाह देता है।  

              पास में पैसा तो था ही नहीं, दोनों मां बेटी सोच में पड़ जाते हैं कि अब करें तो क्या करें। 

                   घर में भी पूंजी के नाम पर सिर्फ इकलौता मंगलसूत्र ही था जिसे बेचकर कुछ पैसा मिल सकता था। लेकिन पति के जीते जी आखिर सुचित्रा अपने सुहाग की निशानी मंगलसूत्र कैसे बेच सकती थी। उसे कोई दूसरा उपाय भी दिख नहीं रहा था।

               महेंद्र का कोई दोस्त भी पैसा देने के लिए अब तैयार नहीं था। मगर उल्टे सभी अपने बाकी पैसे के लिए जो कि महेंद्र कर्ज के रूप में लिया था सुचित्रा से मांगने ज़रूर लगे थे।  

                 पैसों को लेकर दोनों मां बेटी बहुत परेशान थी। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करें।

                   महेंद्र का एक दोस्त था मोहन। वह पैसे वाला था। सुचित्रा के बहुत कहने पर वह पैसा देने के लिए तैयार तो हो गया, लेकिन बदले में अर्चना से शादी करने की शर्त रख दिया। सुन महेंद्र और सुचित्रा के होश उड़ गए।

                 महेंद्र के बीमारी में करीब 50 हजार से ज्यादा ख़र्च था। महेंद्र अपने दोस्तों से भी 20 हजार कर्ज लिए हुए था, जो अब सभी मांगने लगे थे। 

            सुमित्रा के पास जो मंगलसूत्र था उसे बेचने पर भी मात्र 20 हजार ही आ रहा था। जिससे वह कर्ज तो उतार सकती थी। लेकिन अपने पति का इलाज नहीं करवा सकती थी।

                थक हार कर जब सुचित्रा और महेंद्र को कुछ और पैसे का उपाय नहीं दिखता है तो दोनों मोहन के साथ अपनी बेटी की शादी कराने का निश्चय कर लेते हैं। 

                    मोहन जो की खुद भी एक शराबी ही था उसे 70 हजार रूपए देकर 15 साल की कमसिन लड़की अर्चना के साथ शादी कर लेता है। कहां 15 साल की अर्चना और कहां 55 साल का वह शराबी उसके पिता का दोस्त मोहन।

             सुचित्रा अपने पति महेंद्र को पास के एक बड़े शहर में इलाज कराने के लिए ले आती है। शहर के डॉक्टर जब उसकी बीमारी के बारे में बताते हैं तो सुनकर दोनों के पांव तले की जमीन खिसक जाती है। महेंद्र को एड्स हो गया था। उसके अय्यासी के लत ने उसे यह लाइलाज बिमारी दे दिया था। 

                      कुछ ही दिन के बाद महेंद्र एड्स की बीमारी से हार कर मर जाता है। 

             सुचित्रा अपनी मंगलसूत्र की रक्षा के लिए अपनी बेटी तक की सौदा कर देती है, फिर भी वह अपनी मंगलसूत्र को नहीं बचा पाती है । 

             सुचित्रा अपने पति के मरने के अगले ही दिन अपनी मंगलसूत्र को जल प्रवाह करने के लिए पास के ही एक नदी में जाती है। 

                सुचित्रा अपनी मंगलसूत्र को नदी में प्रवाह कर के जैसे ही घाट से ऊपर आने के लिए सीढ़ी चढ़ने लगती है कि वही नदी के किनारे खड़ी अपनी बेटी अर्चना को देखकर दंग रह जाती है।

                 अर्चना भी सफेद साड़ी में लिपटी हाथ में अपनी मंगलसूत्र लिए नदी में प्रवाह करने के लिए इधर ही आ रही थी। वह भी अब विधवा हो गई थी।

                नियति आज दोनों मां बेटी के मंगलसूत्र को एक ही दिन नदी में प्रवाह करने के लिए यहां पर ला दिया था।  

               पति के शराब और शबाब के लत ने आज दोनों मां बेटी को एक साथ ही मंगलसूत्र विहीन कर दिया था।

                     कुमार सरोज



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