मैं कुआं हूं / Main Kuanh Hun l कहानी । कुमार सरोज l

       मैं कुआं हूं 

                          कुमार सरोज 


                     एक तरफ जहां मेरी आलोचना में कई लेखकों एवं कवियों ने अपनी लेखनी तोड़ दी। वहीं दूसरी तरफ कई लोगों ने मेरे बारे में खूब बढ़ा चढ़ाकर लिखा।  मगर आज तक मैंने कभी कुछ नहीं कहा। लेकिन अब शायद मैं पहली और आखिरी बार अपनी बंद जुबान खोलने जा रहा हूं। क्योंकि आज हमारी बेबाक बात को सुनकर मेरे संस्थापक शायद मुझ पर नाराज ही हो जाएंगे या फिर हमारी वर्तमान दशा ही सुधर जाएगी।



                   आज मैं ऐसी परिवेश एवं हालात में पल रहा हूं कि मेरा रोम-रोम दुख दर्द से कराह उठा है।  मगर मेरे करुण क्रंदन को कोई सुन नहीं रहा है। तभी तो मुझे आज अपना शांत धीर गंभीर मुख के बंद पल्लो को खोलना पड़ रहा है। 

             मैं आप लोगों से इंसाफ की भीख या ऐसी कोई कामना तो नहीं करता। मगर क्या करूं ?  फिर भी आपको अपना दुखड़ा सुना रहा हूं। 

                   मुझे आज भी वो समय याद है, जब मानव ने सर्वप्रथम मेरा इस भूपटल पर नींव डाला था। उस समय लोग खानाबदोश जैसा जीवन बसर करते थे। गांव शहर या किसी तरह का कोई नगर का निर्माण इस पृथ्वी पर नहीं हुआ था। उस समय के लोग जहां जाते, वहां मेरा नवनिर्माण कर देते थे। मेरा स्वरूप भी अनोखा रहता। पत्थरों के नुकीले औजार एवम लकड़ियों से किसी तरह खड़ा करके लोग मुझे बना देते थे। मैं इतना कोमल ह्रदय का था कि उन्हें उस हालत में भी पानी देते रहता था। मगर उस समय मुझे बहुत दुख होता था, जब वे लोग मुझे छोड़ कर कहीं और चले जाते थे। मैं बाद में अपने बगल के मिट्टी से भर जाता था। इस प्रकार बार-बार मेरा पतन एवं नव निर्माण होते रहता था।

                     कहा जाता है समय हमेशा एक ही गति से नहीं चलती है, हमेशा बदलते रहती है। जब धरती पर नवयुग का आगमन हुआ तब जाकर मेरा भी स्वरूप बदलने लगा। अब लोग छोटे-छोटे कस्बों एवं कबीलों में रहने लगे थे। कहीं-कहीं पर मेरा बड़ा भाई तालाब एवं पोखर लोगों के जरूरतों को पूरा करता तो कहीं पर मैं। 

        अब मैं हमेशा बहुत खुश रहता, क्योंकि मैं स्थाई रूप से रहने लगा था। लोगों ने हमारी पूजा करना भी शुरू कर दिया था। अब मैं हमेशा जल से भरा रहता था।

            कभी कभी हमारे अंदर कोई बच्चा गिर जाता तो मैं उसे बचाने की भरपूर कोशिश करता था। मगर मेरा हितैषी जल उसे डुबो देता था। बेचारा नन्हा बालक मेरे धरातल पर अपना दम तोड़ देता। उस समय मुझे बहुत दुख होता था। मगर मैं क्या करता ?  भला जल को मैं कैसे समझाता। वह तो शुरु से ही चंचल एवं नटखट स्वभाव का था। 

     कभी-कभी तो जल मुझसे भी नाराज होकर मुझे छोड़ चला जाता है। मगर जब मेरे संस्थापक मेरा आकार बढ़ा देते तो पानी पुनः आ जाता था। 

           इसी तरह हमेशा हम दोनों में झड़पें होते रहती थी। फिर भी हम दोनों एक साथ ही रहते थे। हम दोनों में अटूट संबंध बन गया था। 

               जैसे-जैसे सृष्टि का स्वरूप बदलते जा रहा था, वैसे वैसे मेरा भी रूप और मान सम्मान बदलते जा रहा था। अब तो मैं बहुतों की संख्या में हो गया था। मेरा दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की होते जा रहा था। मैं खुशी पूर्वक रह रहा था। 

                    उस दिन तो खुशी के मारे मेरा ठिकाना नहीं था, जब सबसे पहले लोगों ने मुझे पत्थरों से सजाकर नया आकार दिया था। उस नए आकार में मैं जमीन से ऊंचा बना था। जिसके कारण किसी आदमी के गिरने का खतरा अब कम रहता था। पानी निकालने के लिए लोगों ने मेरे ऊपर घिरणी जैसा कोई यंत्र लगा दिया था। फलस्वरूप उन्हें अब पानी निकालने में काफी आसानी होती थी। 

               अब हमारे पूजा का स्वरूप भी बदल गया था। अब लोग मुझे ज्यादा धार्मिक दृष्टिकोण से देखने लगे थे। अब घर में नन्हें शिशु के आगमन पर लोग हमारी पूजा करने लगे थे। मेरा जल गंदा ना हो इसके लिए लोगों ने विशेष व्यवस्था भी अब कर दिया था। समय - समय पर मेरी सफाई भी होने लगी थी। अब मुझे लोग "कूप देवता" कहने लगे थे। 

      इस तरह मेरा और सृष्टि का समय बीतता जा रहा था।

            धीरे-धीरे लोगों ने विज्ञान युग में प्रवेश कर लिया। जैसे-जैसे विज्ञान ने अपना पैर फैलाना शुरू कर दिया। वैसे वैसे मेरी उपेक्षा भी होने लगी। अब मेरे जगह पर नलकूपो एवं हैंडपंपों का साम्राज्य फैलने लगा था। कहीं-कहीं तो लोग मेरे सीने पर ही चापाकल गाड़ दे रहे थे। मैं असहाय चुप चाप सभी दुखों को झेल रहा था।

                    जहां पहले लोग हमारी पूजा करते थे, आज वही कुछ लोग हमारे अंदर थूक फेंकने लगे थे। उस समय तो हमारे ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता था, जब आज के सबसे बुद्धिमान प्राणी मानव हमारे अंदर कूड़ा कचरा गिरा देते थे। मैं गमों के अथाह सागर में गोता लगा लेता था।

              धीरे-धीरे मैं अपने आप को इस बदले परिवेश में ढालने की कोशिश करने लगा था। मगर लोगों का मेरे ऊपर जुल्मों शितम और बढ़ता ही जा रहा था।

   भला मैं करता भी क्या ?  पहले जहां हमारे जल के बिना भगवान की पूजा अधूरी रहती थी। आज वही लोग चापाकल के पानी को शुद्ध एवं मेरे पानी को अशुद्ध मानने लगे थे। अब हमें इतना सताया जा रहा था कि मेरे बहुत से साथियों ने तो अपना अस्तित्व ही मिटा दिया था। जो बचे थे वो भी जीर्ण शीर्ण  हालत में जी रहे थे। कोई आधा गिरा पड़ा, अपनी बेबसी का रोना रो रहा था, तो कोई जमीन में धंसा अपनी करनी पर पश्चाताप कर रहा था।

        अब हमें कहीं कूड़ा दानी तो कहीं पर गंदे नाली का पानी जमा करने में भी उपयोग किया जाने लगा था। जिसका अभी तक काया कल्प ठीक ठाक था, वे थोड़े बहुत ठीक से जी रहे थे। 

       हमारे कुछ भाई अपने पूर्व कर्मों के कारण आज भी पूजे जा रहे थे। मगर उनका पानी भी पीने या अन्य उपयोग में नहीं लाया जा रहा था। 

           बात कुछ समय पहले की है। मैं आज भी अपने भाइयों से ज्यादा खुश था। क्योंकि मेरा पानी इतना अच्छा था कि लोग चाहकर भी मुझे त्याग नहीं कर पा रहे थे। एक भले सज्जन ने मेरे जगत का नवनिर्माण भी करा दिया था। जाने पहचान वाले लोग तो बेझिझक मेरा पानी पी लेते थे, मगर अनजान मुसाफिर बिना पूछे या सूंधे मेरा पानी नहीं पीता था।

                एक दिन सरकार की कृपा से हमारे बगल में भी एक चापाकल लग गया। फलस्वरूप अब लोग मेरे तरफ से कटने लगे।

      मैं चुपचाप सब कुछ देख रहा था।  धीरे-धीरे हमारी हालत भी मेरे अन्य साथियों के जैसा ही हो गया। हमारे अंदर भी अब आए दिन कूड़ा कचड़ा फेंका जाने लगा था। 

              एक दिन तो लोगों ने हद ही कर दिया, जब हमारे अंदर एक वृद्ध महिला ने कूद कर अपनी जान दे दी। लोगों ने हमें तुरंत मिट्टी से भर दिया। मैं सिसकते हुए सब कुछ सहता एवं देखता रह गया। 

          भला विज्ञान के इस युग में जीने वाले लोगों को मैं क्या कहता उस समय। मेरा बोलना जले पर नमक छिड़कने का काम करता, और लोग मेरा एक एक ईंट भी उखाड़कर फेंक देते। 

            आज कम से कम इतना तो है कि मैं अब भी सीधा खड़ा हूं। भले ही मेरे अंदर जल की जगह मीठी ही क्यों न भरी थी !


                      कुमार सरोज

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