गरीबी रेखा / Garibi Rekha
गरीबी रेखा
कुमार सरोज
आज भी हमारे देश में गरीबी रेखा से नीचे कुल आबादी के करीब 30% लोग गुजर-बसर करते हैं। दलितों के उत्थान के लिए बहुत सारी सरकारी योजनाएं चल रही है, मगर उसका लाभ गरीब परिवारों को बहुत ही कम मिलता है , सभी बिचौलिए खा जाते हैं । गलती से किसी दलित परिवार को कोई सरकारी लाभ मिल भी जाए , तो उसे भी ऊंची जाति के लोग लेने नहीं देते हैं ।
यह कहानी भी एक ऐसे ही दलित परिवार की है जिसे अपने हक के लिए पूरे परिवार सहित आग के हवाले होना पड़ता है।
बिहार के औरंगाबाद जिले में सुदूर एक पंचायत है महरोली । इसी पंचायत में गोपालपुर एक बड़ा गांव है । यह गांव आज भी सरकार की अधिकांश सुविधाओं से वंचित है । दलित परिवारों की संख्या इस गांव में ज्यादा है।
गोपालपुर गांव में धनेश्वर केवट (35 वर्ष ) अपनी पत्नी फुलवा (30 वर्ष) और 3 बच्चे रूपा (12 वर्ष) सिंटू (10 वर्ष ) एवं पिंटू (8 वर्ष ) के साथ रहता है। उसके पास मिट्टी का एक टूटा फूटा घर के अलावा कुछ नहीं है । वह कभी मनरेगा में काम करके तो कभी किसी के खेत में अपने परिवार सहित काम करके अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करता है।
धनेश्वर के घर के ठीक सामने ही एक शहीद फौजी धनंजय प्रसाद का घर है। धनंजय प्रसाद 2 साल पहले ही बॉर्डर पर शहीद हो गए थे। सरकार ने धनंजय की पत्नी निर्मला ( उम्र 50 साल ) जो कि परिवार के साथ शुरू से ही गांव में रहती थी को गांव में ही 1 बीघा जमीन और उनकी बेटी सरिता (20 वर्ष) को गांव के ही स्कूल में सरकारी शिक्षक बना दिया था। सरिता अपने घर में अपनी मां और अपने दो भाई अमर (15 वर्ष) और समर (12 वर्ष) के साथ रहती थी।
सरिता के बगल में ही उसकी चाची कोलेशरी का घर था। वह अपने घर में अकेली रहती थी। उसका बेटा उसे छोड़कर शहर में जाकर रहने लगा था।
गोपालपुर में ही एक बड़े एवं दबंग किसान उज्जवल सिंह ( 60 वर्ष) भी रहते थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी मनोरमा देवी ( 55 साल) , बेटा महेश ( 28 वर्ष ) एवं बेटी खुशबू (25 वर्ष) रहती थी।
उज्जवल सिंह के घर में उनका नौकर कपिल भी रहता था। कपिल का इस दुनिया में कोई नहीं था। खेती बारी के काम के देखभाल के लिए वराहील नगीना भी था। नगीना अपने मालिक का बहुत वफादार था। वह अपने मालिक के लिए अपनी जान देने को भी तैयार रहता था । नगीना की इकलौती बेटी थी टुनिया ( 20 साल)। दुनिया अपने घर में किराने की दुकान चलाती थी।
उज्जवल सिंह का बेटा महेश भी अपने बाप की तरह ही बदमाश और एक नंबर का अय्याश था। खुशबू भी अपने नौकर कपिल के साथ ही प्यार कर बैठी थी।
उज्जवल सिंह पहले जिस सरकारी जमीन पर खेती करता था उसे ही सरिता की मां को सरकार ने दे दिया था, एवं जिस स्कूल में उज्जवल सिंह अपनी बेटी खुशबू को मस्टरनी बनाना चाहता था उसी के जगह पर सरिता को मस्टरनी बना दिया गया था।
इसी कारण से उज्जवल सिंह एवं महेश सरिता और उसकी मां से जमीन एवं नौकरी वापस लेने के जुगाड़ में हमेशा लगा रहता था।
पहले उज्जवल सिंह ही इस पंचायत का मुखिया था। मगर आरक्षण के कारण इस बार मुखिया किसी दलित को ही बनना था, तो उज्जवल सिंह ने अपने एक विश्वासी रामखेलावन पासवान को मुखिया बना दिया था। रामखेलावन बहुत ही सीधा साधा आदमी था। वह पहले उज्जवल सिंह के यहां ही नोकर था। रामखेलावन पासवान का बेटा तपेश्वर ठीक अपने बाप के विपरीत था। वह एक नंबर का बदमाश एवं अय्याश किस्म का व्यक्ति था।
महेश और तपेश्वर की अच्छी दोस्ती थी। दोनों BDO और बैंक मैनेजर के सहयोग से पंचायत का सारा पैसा खुद ही हड़प लेता था। वहां के दारोगा, डीएसपी एवं विधायक सभी को अपने फेवर में किए हुए था। जिसके कारण कोई भी दोनों के विरुद्ध कुछ नहीं बोलता था।
दोनों सभी अधिकारियों का मुंह शराब और शबाब से बंद किया रहता था। इस काम में गांव की एक महिला हीरामणि दोनों का बहुत सहयोग करती थी। वही गांव की भोली वाली लड़कियों को बहला - फुसलाकर लाती थी।
गांव में एक दिन कोलेशरी चाची का भतीजा अमन ( 25 वर्ष) जो कि बचपन में अपनी बुआ के पास ही रहता था, आता है। कौलेश्वरी का कुछ दिनों से तबीयत ठीक नहीं था।
अमन दारोगा का परीक्षा पास कर गया था। और अब कुछ ही दिन के बाद ट्रेनिंग में जाने वाला था।
अमन और सरिता बचपन से ही एक दूसरे को पसंद करते थे। दोनों जिंदगी भर साथ रहने का ख़्वाब देखने लगे थे।
अमन धनेश्वर को इंदिरा आवास के बारे में बताता है एवं मुखिया रामखेलावन से मिलकर उसका काम भी करवा देता है। मगर कमीशन के चक्कर में तपेश्वर BDO से धनेश्वर का काम रुकवा देता है।
अपनी बुआ के ठीक होते हैं अमन अपना गांव चला जाता है।
उधर उज्जवल सिंह BDO के साथ मिलकर सरिता के ऊपर पोषाहार गबन का आरोप लगाकर उसे स्कूल से निकाल देता है, और अपनी बेटी खुशबू को उसके जगह पर स्कूल में रखवा देता है।
सरिता अपनी बेगुनाही के लिए विधायक एवं डीएम के पास भी जाती है, मगर उल्टे सभी बदले में उसके साथ सोने की मांग कर देते हैं। लाचार वह चुपचाप अपने घर में ही आकर बच्चों को पढ़ाने लगती है।
जब धनेश्वर का इंदिरा आवास बहुत दिन तक भी नहीं होता है, तो वह अंत में अपना सारा काम धंधा छोड़कर दिन-रात ब्लॉक का चक्कर लगाने लगता है। मुखिया रामखेलावन भी BDO पर दबाव बनाने लगते हैं।
जब इस बात की भनक महेश को लगता है तो वह तपेश्वर को समझाता है कि वह अपने बाप को चुप रहने के लिए बोले वरना सब काम बिगड़ जाएगा, क्योंकि तब तक महेश बहुत सारे गरीब परिवारों का आंगनबाड़ी का पैसा बैंक से निकाल चुका था।
उधर उज्जवल सिंह अपनी बेटी खुशबू और नौकर कपिल को एक दूसरे के बाहों में बाहें डाले देख लेता है, फिर क्या था वह कपिल को बहुत मारता है और अंत में कपिल को मरा समझ कर उसे नगीना के द्वारा गांव के बगल में बहने वाली नदी में फेंकवा देता है।
खुशबू को अपने पिता की यह करतूत जरा भी अच्छा नहीं लगता है। वह मन मार कर रह तो जाती है, मगर अंदर ही अंदर धुटते रहती है।
समय बीता रहता है। धनेश्वर को इस बात का पता चल जाता है कि उसका आंगनबाड़ी का पैसा निकल गया है। वह जब इस बात की जानकारी लेने मुखिया के पास जाता है तो रामखेलावन कुछ करने से साफ इंकार कर जाते हैं। उल्टे तपेश्वर उसे मार कर भगा देता है।
सरिता धनेश्वर को आंगनबाड़ी के लिए डीएम से मिलने को करती है। धनेश्वर डीएम से मिलने को अगले ही दिन तैयार भी हो जाता है। मगर अगले दिन धनेश्वर की बेटी रूपा सुबह में लापता हो जाती है। धनेश्वर के घर में कोहराम मच जाता है।
करीब दोपहर के समय हीरामणि जो कि दिखावे में तो नेता थी मगर लड़की को बहला-फुसलाकर हाकिमों के आगे परोसने का काला धंधा करती थी। हीरामणि धनेश्वर के घर आकर बताती है कि रूपा को वह ब्लॉक में कुछ देर पहले देखी थी। सुन सभी तुरंत ब्लॉक की ओर दौड़ पड़ते हैं।
यह सब उज्जवल सिंह का ही चाल था। उसी के कहने पर नगीना ही रूपा को उठाकर BDO के आवास पर ले गया था.
उधर BDO अपने आवास पर रूपा की इज्जत को तार-तार करते ही रहता है कि धनेश्वर अपनी पत्नी फुलवा के साथ वहां आ जाता है. तभी नगीना भी जो की BDO के घर के बाहर ही खड़ा था, दोनों के पास आ जाता है. ठीक तभी रूपा भी लड़खड़ाते कदमों से BDO आवास से बाहर निकलती है.
नगीना सभी को अपनी घड़ियाली आंसू बहाते हुए सहानुभूति के जाल में फंसाकर थाना में केस करने के बहाने ले आता है।
योजना के अनुसार दरोगा भी धनेश्वर की पत्नी फुलवा के साथ थाने में बलात्कार करता है।
इधर नगीना अपनी मालिक की जी हजूरी में फुलवा और रूपा के साथ या घिनौना काम करवाते रहता है और उधर गोपालपुर गांव में उसकी बेटी दुनिया की इज्जत को भी उज्जवल सिंह का बेटा महेश लूटते रहता है।
नगीना जब घर वापस आता है तो उसकी बेटी तब तक जहर खाकर अपनी जिंदगी की अंतिम सांसे गिनते रहती है। वह मरते मरते अपने बाप नगीना को सारी सच्चाई बता देती है। नगीना सुनकर दंग रह जाता है। उसके मालिक ने उसकी ईमानदारी के बदले यह अच्छा इनाम दिया था
उज्जवल सिंह ने उसकी पत्नी के साथ भी ऐसा ही कुकर्म किया था, तब वह चुप रह गया था। लेकिन इस बार वह चुप नहीं रहने वाला था।
उसी रात धनेश्वर भी अपने बच्चों और पत्नी के साथ घर में आग लगाकर मर जाता है।
पुरे गांव में हाहाकार मच जाता है। नगीना, मुखिया रामखेलावन, सरिता सहित गांव के बहुत सारे लोग लाश के साथ इंसाफ के सड़क जाम कर देते हैं।
खुशबू भी गांव वालों का ही साथ देती है।
दारोगा और डीएसपी का गुस्सा सभी पर फूट पड़ता है। भीड़ को शांत करवाने के जगह पर उल्टे दोनों सभी पर लाठियां चटकाने लगते हैं।
विधायक से एसपी तक सभी तो मिले हुए ही थे, कोई कुछ नहीं बोलता है।
पुलिस वालों का जुल्म निर्दोष लोगों पर टूटता ठीक तभी वहां अमन राज्य के एक दलित मंत्री श्यामल प्रसाद के साथ आ जाता है। कपिल भी साथ में रहता है।
मीडिया में बात आते ही ऊपर से भी बहुत सारे मंत्री और IG का दबाव आने लगता है, अंततः SP को अपने बचाव में दरोगा एवं डीएसपी को तुरंत सस्पेंड करना पड़ता है।
वैसे भी राज्य में कुछ ही महीने बाद चुनाव आने वाला था, और सभी पार्टियों को दलित वोट की चिंता थी।
मंत्री जी उज्जवल सिंह एवं उसके बेटे महेश को गिरफ्तार करने की बात कह कर सभी को शांत करते हैं। साथ ही तपेश्वर को भी गिरफ्तार करने के लिए एसपी को मंत्री जी आदेश देते हैैं।
अपनी और अपने बेटे की गिरफ्तारी की बात सुनकर उज्जवल सिंह आग बबूला हो जाता है। महेश गुस्से में आकर मुखिया रामखेलावन पासवान को मार डालता है। क्योंकि उसी के कारण गांव वालो ने उसके विरुद्ध हंगामा किया था।
मुखिया के मारे जाने से आक्रोशित गांव वाले के सहयोग से नगीना एवं सरिता महेश को भी मार डालते हैं।
बात और आगे बढ़ती उससे पहले ही पूरे गांव को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया जाता है।
पुलिस उज्जवल सिंह एवं तपेश्वर को गिरफ्तार कर लेती है।
मंत्री श्याम प्रसाद सरिता को वापस फिर से स्कूल में पढ़ाने का आदेश देते हैं।
खुशबू भी कपिल को जिंदा देखकर बहुत खुश होती है।
कुमार सरोज
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
आपके बहुमूल्य टिप्पणी एवं सुझाव का स्वागत है 🙏