गांव की गोरी
गांव की गोरी
कुमार सरोज
गया शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर एक छोटा सा मगर सुंदर गांव है फतेहपुर इस गांव में अधिकांश लोग खेती ही करते है ।
सरजू भी फतेहपुर गांव में ही रहता है वह भी एक किसान है । उसके घर में सिर्फ उसकी दो बेटियां अंजू और मंजू रहती है। दोनों जुड़वा बहने हैं ।
सरजू की पत्नी रधिया बच्चे के जन्म के एक माह बाद ही मर गई थी । तभी से सरजू अपनी बेटी को मां-बाप दोनों का प्यार देकर पालते रहता है ।
अपनी दोनों बेटी को पढ़ा लिखा कर हाकिम बनाना चाहता था, इसीलिए अपने खेतों में दिन रात मेहनत करते रहता है, ताकि दोनों के पढ़ाई लिखाई एवं लालन-पालन में किसी प्रकार का कोई दिक्कत नहीं हो।
अभी अंजू और मंजू एक अच्छे प्राइवेट स्कूल में पंचम कक्षा में पढ़ती है। जहां अंजू शांत एवं सरल स्वभाव की है वहीं मंजू गुस्सैल एवं खुले विचार की लड़की है। अंजू पढ़ने में भी तेज है, मगर मंजू का मन पढ़ाई लिखाई में भी नहीं लगता है । वह लड़कों के साथ सिर्फ खेलने में लगी रहती है । उसके पिता उसे डांटते तो मंजू अपनी बहन की तरफ से ही बोल कर अपने पिता को शांत कर देती है।
अंजू अपनी बहन मंजू से बहुत प्यार करती है वह भी अकेले में अपनी बहन को बहुत समझाती है। उसे पढ़ाई पर ध्यान देने और लड़कों जैसी बदमाशी ना करने की सलाह देते रहती है, मगर मंजू हंसकर उसके बात को अनसुना कर देती है। उल्टे वह अपनी सभी काम अंजू से ही करवाती है।
समय बीता रहता है। अचानक एक दिन सरजू को खेत में काम करते समय बिजली का झटका लगता है और वह खेत में ही मर जाता है । दोनों बहनों पर तो मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है।
किसी प्रकार अंजू और मंजू को उसके घर के बगल में रहने वाली उसकी चाची फुलवा एवं मंगल चाचा संभाल पाते हैं । अंजू का एक चचेरा भाई भी रहता है रघु । रघु भी दोनों को बहुत मदद करता है। वह मंजू के साथ ही पड़ता है। वह भी पढ़ने में कमजोर है।
सरजू के मरने की खबर सुनकर अंजू की मौसी तेतरी और मौसा फकीरा वहां आ जाते हैं । तेतरी दोनों बहनों को अपने साथ लेकर अपने गांव आ जाती है ।
तेतरी का कोई संतान नहीं था । अंजू के पड़ोसी भी सोचते हैं कि दोनों बहने अपनी मौसी के साथ अच्छे से रहेगी ।
तेतरी एक नंबर की लोभी और धूर्त औरत रहती है, वह दोनों बहनों से घर का सारा काम तो करवाती ही हैं , दोनों को पढ़ने के लिए भी गांव के ही सरकारी स्कूल में भेज देती है। अंजू तो कुछ बोलती नहीं है मगर मंजू अपनी मौसी से बात बात पर झगड़ पड़ती है।
मंजू के मौसा - मौसी धीरे-धीरे उसके गांव वाली जमीन को कोई न कोई बहाना बनाकर चुपके से बेचने लगते हैं । जब मंजू को इस बात की भनक लगती है तो वह अपनी मौसी से पूछ बैठी है । मगर उसकी मौसी उसे जान से मार डालने की धमकी देकर चुप रह जाने को विवश कर देती है।
समय बीता रहता है। मंजू की मौसी पैसे के लोभ में पड कर, मंजू को एक बुड्ढे आदमी के साथ विवाह करवाने की योजना बना डालती है । मगर ऐन वक़्त पर दोनों बहनों को इस बात का पता चल जाता है । दोनों बहने चुपके से आधी रात को वहां से भाग जाती है।
दोनों बहने अपनी मौसी के घर से भागकर पास के ही शहर टिकारी चली जाती है । दोनों वहां एक चर्च में छुप जाती है । दोनों को डर सताते रहता है कि उसके मौसा और मौसी गुंडे लेकर उसे पकड़ने जरूर आएंगे ।
चर्च की देखभाल सिस्टर मारिया करती थी। वह दोनों बहनो की पूरी बात सुनकर अपने घर में रख लेती है
फिर से दोनों बहने स्कूल पढ़ने जाने लगती है। दोनों का जीवन एक बार फिर खुशी से भर उठता है । मंजू की हरकते यहां भी पहले जैसी ही रहती है ।
सिस्टर भी उससे बहुत समझाती है मगर कोई असर उस पर नहीं होता है।
अब दोनों बहने मैट्रिक की परीक्षा देने वाली रहती है कि अचानक एक दिन सिस्टर मारिया चर्च के सीढ़ियों से गिरकर मर जाती है । दोनों बहनों पर मानो एक बार फिर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है ।
दोनों के नसीब में शायद दुख ही दुख लिखा था । तभी तो सिस्टर मारिया का भतीजा दानिश चर्च में रहने आ जाता है और दोनों बहनों को वहां से भगा देता है।
दोनों बहनों को समझ में नहीं आता है कि वे दोनों अब जाए तो जाऐ कहां । अंत में दोनों बहने अपने गांव फतेहपुर में ही जा कर रहने का मन बना लेती है।
अंजू और मंजू गांव में आकर जैसे ही सभी को सारी बातें बताती है तो सुनकर सभी दंग रह जाते हैं। किसी ने सोचा भी नहीं था कि उसकी मौसी और मौसा इतने गिरे हुए इंसान होंगे ।
दोनों ने मिलकर अंजू के करीब आधे से अधिक जमीन कभी पढ़ाई तो कभी बीमारी का बहाना बनाकर बेच दिए थे ।
अंजू और मंजू अपनी नसीब को कोसते हुए नए सिरे से जीवन यापन करने लगती है ।
अंजू अपने बचे हुए खेत में मंगल चाचा एवं रघु के सहयोग से खेती करने लगती है । साथ ही साथ पढ़ाई भी करते रहती है । दोनों बहने मैट्रिक की परीक्षा 1 साल बाद देती हैं , और अच्छे अंक से पास भी कर जाती है ।
अंजू मंजू को आगे की पढ़ाई के लिए शहर भेज देती है । मंजू जाना तो नहीं चाहती है मगर अंजू के जिद के आगे उसे जाना ही पड़ता है । वह अपने पिता के हाकिम बनाने का सपना पूरा करना चाहती थी।
अंजू घर पर ही रहकर अपनी भी पढ़ाई जारी रखती है ।
गांव का ही एक दबंग नरेश सिंह का बेटा विवेक अंजू की इज्जत लूटने की फिराक में हमेशा लगा रहता है । मगर वह विवेक के मनसा को कभी पूरा नहीं होने देती है ।
अंजू अपने खेतों में काम करके एवं सिलाई कढ़ाई करके पैसा कमाते रहती है , ताकि मंजू की पढ़ाई में दिक्कत नहीं हो ।
वह बचे समय में चलाने के लिए एक ऑटो भी किराए पर ले लेती है। उससे भी उसे अच्छी कमाई हो जाती है। समय बिता रहता है । अचानक एक दिन उसकी मौसी रोती हुई उसके घर आ जाती है । उसके मौसा का भी देहांत हो गया था ।
गांव वालों के मना करने के बावजूद भी अंजू अपनी मौसी को अपने यहां रख लेती है।
अंजू की पढ़ाई इंटर के बाद छूट जाती है । वह अपनी बहन मंजू को किसी चीज की कमी नहीं होने देना चाहती है । इसीलिए वह दिन रात सिर्फ पैसा कमाने के उपाय में लगी रहती है ।
तभी मंजू के जीवन में नवीन नाम की एक लड़की का प्रवेश होता है, एवं अंजू के जीवन में मयंक नाम के एक लड़के का प्रवेश होता है।
अंजू के त्याग एवं परिश्रम के बाद अंततह मंजू को सिपाही में नौकरी लग जाती है।
मौसी अपनी स्वभाव अनुसार दोनों बहनों को अब आपस में लड़ाने की योजना बनाने लगती है । और अंततः सफल भी हो जाती है।
दोनों बहने एक दूसरे से अलग हो जाती है । मयंक और नवीन चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता है ।
रघु एवं मयंक के कहने पर अंजू फिर से पढ़ाई शुरू करती है ।
कड़ी मेहनत और लगन से अंजू यूपीएससी की परीक्षा पास कर जाती है ।
अंजू की कामयाबी को देखकर मंजू को अपनी करनी पर पश्चाताप होने लगता है। उसे सच्चाई का भी पता चल जाता है । वह अपनी बहन के पास आ जाती है। अंजू मंजू को अपने पास रख लेती है।
मंजू भी मन लगाकर फिर से पढ़ाई करती है , और दारोगा की परीक्षा पास कर जाती है।
दोनों बहने अपनी मौसी को वृद्धा आश्रम में भेजकर साथ रहने लगती है।
अंजू मयंक से और मंजू नवीन से विवाह कर लेती है ।
दोनों बहने दुख और अभाव में रहने के बावजूद भी सफलता की ऊंची कहानी लिख देती है, जिसे विरले ही कर पाते हैं।
Kumar Saroj
साहस को सलाम
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