भटके राही / Bhatake Rahi । कहानी । कुमार सरोज ।
भटके राही
कुमार सरोज
यह प्यार करने वाले एक ऐसे प्रेमी युगल की अनकही सच्ची कहानी है, जो हमेशा समाज एवम युवा वर्ग को प्रेरणा देता रहेगा।
झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिला में एक छोटा सा ब्लॉक है चकुलिया। प्रकृति की गोद में बसा छोटा मगर एक बहुत ही सुन्दर शहर है यह। झारखंड में नक्सलवाद के पनपते जड़ के कारण यह शहर भी मगर अब अशांत होता जा रहा था। कुछ लोग समाज के मुख्य धारा से गरीब लाचार नौजवानों को बहला फुसलाकर एवम पैसों का लोभ दिखाकर उन्हें किसी तरह भटकाकर नक्सलवाद की ओर धकेलने में लगे थे। और बेचारे गरीब युवा लोभ, अशिक्षा एवम अज्ञानता के अभाव में नक्सली बनते जा रहे थे।
यह कहानी ऐसे ही एक गरीब युवा मंगल की है। जिसे भी गुमराह करके नक्सली बनने पर मजबूर कर दिया जाता है।
मंगल का परिवार बहुत ही गरीब था। उसके पिता हरमू टुड्डू पास के ही एक बीड़ी फैक्टरी में काम करते थे। बीड़ी फैक्टरी का मालिक पुरषोत्तम मुंडा था।
मंगल के घर में उसकी मां सोनफुला एवम एक बहन भी थी ममता। मां जंगल से लकड़ी काटकर लाती और उसे बाजार में बेचकर वह भी थोड़े बहुत पैसे कमा लेती थी।
हरमू गरीब ज़रूर था, मगर उसके सोच बहुत बड़े थे। वह अपने बेटा मंगल और बेटी ममता को पढ़ा लिखा कर सरकारी नौकरी करवाना चाहता था। इसीलिए वह बीड़ी फैक्टरी में काम करने के बाद पुरुषोत्तम मुंडा के ही पत्थर फोड़ने वाली फैक्टरी ( क्रेसर मशीन ) में भी ओवर टाइम काम कर लिया करता था।
उस समय मंगल 9th क्लास में एवम ममता 8th क्लास की फाइनल परीक्षा दी थी। दोनों अब अगले क्लास में जाने वाले थे।
आज के युग में भगवान भी गरीबों को ही ज्यादा कष्ट देते हैं, और उसी के सब्र अब धैर्य का ज्यादा इंतहान भी लेते हैं। तभी तो बेचारे हरमू को अपने बेटा और बेटी के लिए नए क्लास के लिए कॉपी और किताब खरीदना था, मगर उसका मालिक पुरूषोत्तम उसे उसका कमाया हुआ मजदूरी भी नहीं दे रहा था। पिछले दो महीनों से वह अपने मालिक से पैसा मांगते मांगते थक गया था। जबकि उसे बच्चों के लिए नई किताब और कॉपी खरीदने के लिए पैसों की सक्त जरूरत थी।
दो महीने बाद भी एक दिन जब हरमू अपने मालिक पुरूषोत्तम से पैसा मांगता है, तो वह पैसा तो नहीं देता है, मगर उल्टे वह उसे ही गुस्से में आकर गालियां देते हुए बुरी तरह से पिटाई कर देता है। आज एक गरीब को अपना कमाया हुआ हक मांगने पर भी शायद यही इनाम मिलता होगा !
हम आज भी अपने अंदर यह कैसी मानसिकता पाले हुए हैं। क्या एक गरीब को अपना कमाया हुआ पैसा भी मांगने का भी हक नहीं है ?
4 - 5 दिन सरकारी अस्पताल में ईलाज होने के बाबजूद भी बेचारा हरमू अपने बेटा एवम बेटी को पढ़ा लिखाकर सरकारी नौकरी करते देखने का मन में सपना संजोए ही मर जाता है।
पिता के मरते ही मंगल और उसके परिवार पर तो दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ता है। फिर भी किसी तरह मंगल अपनी मां और बहन को संभाल पाता है। वह गरीब भले ही था, मगर था बड़ा ही हिम्मत वाला।
घर संभालने के लिए मंगल को अपनी आगे की पढ़ाई बन्द कर देनी पड़ती है। मगर वह अपनी बहन को आगे की पढ़ाई करने ही देता है।
घर चलाने के लिए अब मंगल अपनी पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करने लगता है।
मंगल एवम ममता चकुलिया के जिस सरकारी स्कूल में पढ़ते थे, वह उसके घर से करीब 5 किलोमीटर दूर था। मंगल ही अपनी बहन को भी अपनी पुरानी साइकिल से स्कूल साथ ले जाता था। अब चूंकि वह स्कूल छोड़ दिया था, फिर भी वह आज भी अपनी बहन को स्कूल साइकिल से छोड़ने जाता था।
मंगल अपनी बहन को प्रतिदिन साइकिल से स्कूल छोड़ने के बाद ही मजदूरी करने जाता था।
ममता के क्लास में ही उसकी एक सहेली सरिता भी पढ़ती थी।
सरिता का घर चकुलिया शहर में ही था। उसके घर में उसके पिता योगेंद्र मुंडा, मां तारा एवम एक छोटा भाई पवन था।
सरिता के पिता एक किराने की दुकान चलाते थे।
मंगल प्रतिदिन अपनी बहन को स्कूल छोड़ने तो जाता ही था, जिसके कारण उसकी मुलाकात भी आए दिन सरिता से होते रहती थी।
मंगल और सरिता की जान पहचान कब प्यार का रुप ले लेता है, किसी को पता भी नहीं चलता है। दो युवा दिल एक दुसरे के लिए धड़कने लगते हैं।
जब कभी भी मौका मिलता दोनों एकांत में घंटों बैठकर बाते करते रहते, और साथ जीने मरने की कसमें भी अब खाने लगे थे।
सरिता ममता से मिलने के बहाने मंगल से मिलने उसके घर भी आने लगी थी। ममता को भी अपनी सहेली और भाई के प्यार के बारे में पता चल गया था।
इसी बीच मंगल को मजदूरी करते करते पास के ही एक गांव जियान के जीतन मुंडा से जान पहचान हो जाती है, जो नक्सली के लिए मुखबिर का काम करता था।
वह मंगल के बारे में जैसे ही जानता है कि उसके पिता को पुरूषोत्तम मुंडा ने मारा है तो वह उसे बदला लेने के लिए उकसाने लगता है।
जीतन मुंडा का यही काम ही था। वह समाज के भोले भाले युवकों को किसी तरह उकसाकर या पैसे का प्रलोभन दे कर उसे नक्सली बनने पर बाध्य कर देता था। वह हमेशा नक्सलियों का ही गुणगान करते रहता था। इस काम में जीतन का साथ दयाल बैठा भी देता था। वह हमेशा जीतन के साथ ही साए की तरह रहता था।
जीतन के बार बार उकसाने एवम प्रलोभन में आकार मंगल भी आखिरकार नक्सली बनकर अपने पिता के मौत का बदला पुरूषोत्तम मुंडा से लेने को तैयार हो जाता है।
मंगल जीतन के साथ ही नक्सली बनने जंगल में चला जाता है। अब उसके सीने में भी अपने गरीब एवम निर्दोष पिता के हत्यारे से बदला लेने की आग हिलोर मारने लगा था।
उधर ममता जब अकेले ही स्कूल रोज रोज आने लगती है, तो सरिता को कुछ अजीब सा लगने लगता है। 2 - 3 दिन तो सरिता कुछ नहीं बोलती है, लेकिन आखिरकार उसके बाद वह ममता से मंगल के बारे में पुछ ही बैठती है।
मगर ममता सच्चाई नहीं बताती है। वह मंगल के किसी काम से बाहर जाने का बहाना कर देती है।
किसी तरह ममता के झूठ के सहारे सरिता एक सप्ताह उसका इंतजार करते रह जाती है। मंगल जब एक सप्ताह बाद भी नहींआता है तो, पता नहीं उसे अब क्यों ऐसा लगने लगा था, कि ममता कुछ छिपा रही है।
सरिता सच्चाई जानने मंगल की मां से मिलने उसके घर भी आ जाती है।
मंगल की मां भी सरिता को सच्चाई नहीं बताती है। वह यही कहती है कि मंगल मजदूरी करने दूसरे शहर गया है।
सरिता बुझे मन मंगल के घर से अपने घर आ तो जाती है, मगर उसे पता नहीं क्यों उसकी मां या बहन के बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था। मंगल अगर बाहर जाता तो उसे बताकर ज़रूर जाता, उसे अपने प्यार पर पुरा भरोसा था।
सरिता मन मारकर बुझी बुझी उदास अपने प्रियतम मंगल के घर वापस लौटने का इंतजार करने लगती है। उसका अब कहीं मन नहीं लग रहा था। स्कूल भी जाती मगर वहां भी मंगल के याद में ही खोई रहती थी।
इसी बीच एक दिन स्कूल से घर लौटते वक्त सरिता की मुलाकात मंगल के एक दोस्त रंजय से हो जाती है। रंजय पहले मंगल के कक्षा में ही पढ़ता था। वह उससे भी मंगल के बारे में पुछ बैठती है। रंजय उसे मंगल के नक्सली बनने जंगल जाने की बात बता देता है।
सुनते ही सरिता के पैर तले की जमीन ही खिसक जाती है। उसे मंगल से ऐसा फैसला लेने का जरा भी उम्मीद नहीं था। वे दोनों तो संग जीने मरने की कसमें खा चुके थे। फिर आखिर मंगल ने ऐसा क्यों किया था ?
रंजय से मिलने के बाद अब सरिता के मन में तरह तरह के सवाल उठने लगे थे।
कुछ दिन बाद ही मंगल अपनी मां और बहन से मिलने जंगल से घर आता है। सरिता को भी इस बात की जानकारी रंजय से मिल जाती है। फिर क्या था, वह तुरंत मंगल से मिलने उसके घर आ जाती है।
सरिता मंगल को बहुत भला बुरा कहती है, वह अपने दिल की पुरी टीस उस पर उतार देती है। वह मंगल को अब किसी भी हालत में जंगल जाने को नहीं कहती है।
मगर मंगल उसकी क्या अपनी मां या बहन की बात को भी नहीं मानता है। उसकी मां या बहन शुरू से ही नहीं चाहती थी कि वह नक्सली बनने जंगल जाए।
मंगल सभी के बातों को अनसुना करते हुए फिर से जंगल चला जाता है।
बेचारी सरिता अपने प्यार का वास्ता एवम लाख दुहाई देते रह जाती है।
उस दिन के बाद से तो सरिता का मन अब और कहीं नहीं लगता है। वह हमेशा अब मंगल को लेकर ही चिंतित रहने लगती है। सरिता के माता पिता भी अब अपनी बेटी को लेकर बहुत परेशान रहने लगते थे। दोनों सरिता को बहुत समझाते हैं, मगर उसपर कोई असर नहीं होता है।
सरिता को कुछ समझ में नहीं आ रही थी कि वह आखिर अब करे तो क्या करे। वह मंगल को भूल भी नहीं सकती थी। भूलना तो दूर वह उसके बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी।
संजोग से कुछ ही दिन के बाद फिर मंगल अपनी मां एवम बहन से मिलने अपने घर आता है।
और इस बार सरिता मंगल से मिलने के बाद ऐसा फैसला कर लेती है कि सुन कर सभी दंग रह जाते हैं। वह भी अब मंगल के साथ ही जंगल जाने की जिद्द पर अड़ जाती है।
अब तो मंगल के सामने सिर्फ दो ही रास्ता था, या तो वह अब घर पर ही रहता, या यदि जंगल जाता भी तो सरिता को साथ लेकर उसे जाना पड़ता।
और अंततः मंगल सरिता को साथ लेकर ही जंगल जाने को तैयार हो जाता है। क्योंकि मंगल को अब वापस घर आने पर उसके एवम उसके परिवार के जान को खतरा था।
दो युवा प्रेमी युगल एक दुसरे का हाथ थामे साथ जीने मरने को जंगल के कंटीले राहों पर निकल पड़ते हैं।
जीतन सरिता को भी मंगल के दस्ता में ही शामिल करवा देता है। क्योंकि वही सभी को बहला फुसलाकर जंगल में लाकर नक्सली संगठन में शामिल करवाता था। वह आम आदमी के बीच रहकर यही काम ही करता था। वह पुलिस मुखबिर भी था।
मंगल जिस नक्सली दस्ता में था, उसका कमांडर कान्हू मुंडा था। इस दस्ता में करीब 15 लोग थे। कार्तिक दस्ते के लिए बम बनाने का काम करता था। क्योंकि दस्ता में सबसे ज्यादा पढ़ा लिखा एवम समझदार वही था।
मंगल दस्ते में संतरी का काम करता था। अब तक वह बंदूक और बम चलाने के लिए भी सीख गया था।
सरिता को भी बंदूक चलाने की ट्रेनिंग दी जाती है, मगर वह डर के कारण सीख नहीं पाती है। जिसके कारण उसे दस्ता के लिए बंदूक की मैगजीन तैयार करने की ट्रेनिंग देकर यही काम करने को दिया जाता है। उसे ही सभी के लिए खाना बनाने का भी काम मिलता है।
बेचारी 15 साल की कमसिन सरिता इस बाली उमर में ही नक्सली दस्ता के लिए खाना और बंदूक के मैगजीन में गोली भरने का काम करने लगती है।
उतने लोगों का खाना और वह भी जंगल की लकड़ी को खुद ही काट कर बनाने में सरिता को बहुत दिक्कत होने लगती है। मगर वह अपने प्यार के खातिर सब कुछ करते रहती है।
कभी मंगल सरिता के काम में मदद करने की कोशिश करता भी तो साथी नक्सली उसे भद्दी भद्दी गालियां देते हुए मदद करने से मना कर देते थे। मंगल मन मारकर रह जाता था।
खाना बनाते समय बहुत बार सरिता का हाथ भी जल गया था। वह लकड़ी से खाना बनाते समय घुएं से वह हमेशा पसीना से तर बतर हो जाती थी।
रात में जब कभी मंगल का संतरी ड्यूटी रहता था तो सरिता एकांत पाकर उसके साथ बाते कर लिया करती थी। दिन में तो दोनों को कभी मौका ही नहीं मिलता था।
एक दिन की बात है। शाम का समय था। दस्ता के अधिकांश लोग किसी काम से कहीं गए हुए थे। मंगल भी सभी के साथ ही गया हुआ था।
सरिता जहां दस्ता ठहरा हुआ था, वही सभी के लिए रात का खाना बनाने की तैयारी कर रही थी। तभी बम बनाने वाला कार्तिक उसे अकेले देखकर उसकी इज्जत लूटने की कोशिश करने लगता है। किसी प्रकार सरिता अपने आप को बचाने में सफल हो जाती है। कार्तिक हमेशा सरिता को गंदी निगाहों से ही देखा करता था।
कुछ ही देर के बाद जब दस्ता के सभी लोग वहां आते हैं, तो सरिता मंगल को सारी बात बता देती है। मंगल जैसे ही सरिता से कार्तिक की करतूत सुनता है तो वह गुस्सा से पागल हो उठता है। वह कार्तिक को इसके लिए बहुत बुरा भला कहने लगता है। मगर उलटे कार्तिक ही मंगल को डांटने लगता है। दस्ता में कार्तिक से सभी डरते थे इसीलिए कोई मंगल के तरफ़ से नहीं बोलता है।
मंगल इस बात की शिकायत दस्ता के कमांडर कान्हु से करता है, मगर कोई फायदा नहीं होता है। उलटे वह सरिता को धोखे से इज्जत लूट लेता है।
जब मंगल को इस बात का पता चलता है तो वह कमांडर कान्हु को जैसे ही कुछ बोलना चाहता है कि वह उलटे उसे ही मारने लगता है। कान्हु तो मंगल को जान से ही मार डालता मगर सरिता बीच में आ जाती है तो वह उसे जिंदा छोड़ देता है।
इस घटना के बाद से तो मंगल को अपने आप पर बहुत गुस्सा आने लगता है। वह बेकार ही सरिता को जंगल ले आया था। अब तो वह चाहकर भी कुछ कर नहीं सकता था। वह घर भी अब नहीं जा सकता था। क्योंकि पुलिस को भी उसके नक्सली बनने का पता चल गया था। वह अपने पिता के हत्यारे पुरूषोत्तम मुंडा को भी अब मार नहीं सकता था। क्योंकि अब वह नक्सली को हर महीने लेवी देने लगा था। अव तो उलटे नक्सली ही उसे सुरक्षा देते थे।
मंगल को अब पुरी बात समझ में आ गया था कि कैसे नक्सली भोले भाले गरीब युवकों को बहला फुसलाकर जंगल में ले आते थे। और फिर उनका कैसे दोहन करते थे। नक्सली से गरीबों को कोई फ़ायदा नहीं होने वाला था, उलटे इन्ही के दम पर पुरूषोत्तम जैसे पैसा वाले अमीर लोग और ज्यादा गरीबों का शोषण कर रहे थे।
इसी बीच एक दिन लकड़ी काटते समय सरिता को पैर में चोट लग जाती है। जिसके कारण उसे चलने में बहुत दिक्कत होने लगती है। उससे अपना सामान का थैला भी लेकर चला नहीं जाता है।
मंगल से जब सरिता का दुख देखा नहीं जाता है तो वह उसका सामान लेकर एवम उसे सहारा देकर साथ चलने लगता है। मगर यह सब देख उसके साथ चल रहे नक्सली उसे ऐसा करने से साफ मना कर देता है। साथी नक्सली इस बात की शिकायत दस्ता कमांडर कान्हु से भी कर देता है।
दस्ता कमांडर कान्हु तो मंगल से जला हुआ था ही दोनों को मिलने पर भी पाबंदी लगा देता है।
तब मंगल सरिता से शादी करने का निश्चय कर लेता है। मगर कान्हु उसे शादी करने से भी साफ मना कर देता है।
किसी तरह मंगल और सरिता का समय बीतता रहता है। जब दोनों से जुदाई सहा नहीं जाता है तो दोनों अंततः जंगल से भागने का मन बना डालते हैं।
और एक रात मौका मिलते ही दोनों भाग भी जाते हैं। मगर दस्ता का हेड कमांडर फोगड़ा मुर्मू दोनों को पकड़ लेता है।
सजा के तौर पर कान्हु मंगल को लगातार दो दिनों तक संतरी ड्यूटी करने, एवम सरिता को अकेले ही सभी के लिए दो दिनों तक खाना बनाने का फरमान सुनाता है।
दस्ता का हेड कमांडर फोगडा मुर्मू कान्हु से भी ज्यादा रसिक था। वह सरिता को देखते ही उसे पाने की मन में लालसा संजोए दोनों को अपने साथ मुख्य दस्ता में रख लेता है।
फोगडा पहले से भी अपने दस्ता में एक औरत सनिचरी किस्कू को अपनी रखैल बना कर रखे हुए था। जिसके कारण उसे सरिता की इज्जत लूटने का मौका नहीं मिल रहा था।
आखिरकार एक दिन फोगडा को सरिता की इज्ज़त लूटने का मौका मिल ही जाता है। उस समय दस्ता का कोई भी आदमी वहां नहीं रहता है। सनिचरी भी कहीं चली गई थी।
अच्छा मौका देख सो रही सरिता की इज्जत फोगड़ा लूटने ही वाला होता है कि उसकी नींद खुल जाती है। सरिता वहां से अपने आप को बचाते हुए एक तरफ भाग खड़ी होती है।
फोगड़ा पीछा भी करता है मगर पकड़ में सरिता नहीं आती है। अंत में वह सरिता के उपर गोली चला देता है, मगर तभी सनिचरी आकर सरिता को बचा लेती है।
फोगड़ा उस दिन मन मारकर रह जाता है।
मंगल के लगातार दो दिनों तक संतरी ड्यूटी करने से उसकी तबीयत खराब हो जाती है। सरिता जब मंगल की सेवा करना चाहती है तो फोगड़ा उसे उसके पास जाने से भी मना कर देता है।
सरिता चाहकर भी कुछ नहीं कर पाती है। वह सिर्फ़ भगवान से अपने मंगल को जल्दी ठीक होने की दुआ करते रह जाती है।
उधर सरिता के माता पिता उसे लेकर काफ़ी चिंतित थे।
मंगल की मां एवम बहन भी हमेशा दोनों को लेकर परेशान रहती थी। मंगल तो अब घर भी नहीं बंद कर दिया था।
मंगल का दोस्त रंजय इस बीच पुलीस में भर्ती हो जाता है। वह मंगल एवम सरिता को हमेशा याद करते रहता था। वह भी कभी नहीं चाहता था कि मंगल नक्सली बने।
झारखंड सरकार एवम प्रशासन भी अब समाज के मुख्य धारा से भटककर जो गरीब युवक नक्सली बन गए थे, उन्हें वापस समाज में लाने के लिए बहुत सारे कार्यक्रम चलाने लगी थी। जिसका कुछ फायदा भी दिखने लगा था।
इधर अब मंगल और सरिता भी जीतन के बहकावे में आकर नक्सलियों के मकड़ जाल में फंसकर अब बहुत पछता रहे थे। दोनों के लिए यह नक्सली का जिंदगी किसी नर्क से भी बदतर था। दोनों बस किसी तरह यहां से भागने के फिराक में हमेशा लगे रहते थे।
इसी बीच नक्सलियो का मुखबिर जीतन एवम दयाल पुलिस मुठभेड़ में मारा जाता है।
यह समाचार जब कान्हु एवम फोगड़ा को मिलता है तो दोनों के होश उड़ जाते हैं। वही दोनों तो आम लोगों के बीच में रहकर युवाओं को प्रलोभन देकर एवम बहला फुसलाकर नक्सली बनवाते थे।
मंगल जब यह समाचार सुनता है तो मन ही मन बहुत खुश होता है। सरिता तो उसे मरने के बाद भी बददुआ देने लगती है।
जीतन एवम दयाल के मारे जाने के बाद फोगड़ा मगंल के मन में भी पुलिस का डर बैठाने की कोशिश करने लगता है। उसे बताता है कि यदि यहां से भागा तो जीतन और दयाल की तरह वह भी पुलिस की गोली से ही मारा जायेगा।
मंगल कुछ बोलता नहीं है, सिर्फ फोगडा के बातों में हां में हां मिलाते रहता है। जबकि वह तो मन ही मन कब से यहां से भागने के ताक में लगा था। उसे पुलिस की गोली से मरना कबूल था, मगर अपने आप को गरीबों के रहनुमा कहने वाले इन दोगले नक्सलियों के चंगुल में अब नहीं रहना था। वैसे भी तो दोनों जिंदा लाश की तरह ही यहां रह रहे थे।
इसी बीच एक दिन जब मंगल अकेले रात में संतरी ड्यूटी करते रहता है तो चुपके से सरिता दोनों के लिए सिविल ड्रेस लेकर वहां से भागने के लिए मौका पाकर आ जाती है।
फिर क्या था, दोनों सिविल ड्रेस पहन कर आम आदमी बन उस अंधेरी काली रात में ही घने जंगल में एक तरह अपनी जान की परवाह किए बिना भाग खड़े होते हैं।
दोनों के भागने की खबर कान्हु एवम फोगडा को कुछ ही देर बाद मिल जाती है। दोनों अपनी पुरी दस्ता के साथ मंगल एवम सरिता को पकड़ने के लिए दोनों के पीछे निकल पड़ते हैं।
उधर जंगल के पास के थाना श्यामसुंदर पुर के थानेदार रमेश को भी अपने मुखबिर से मंगल एवम सरिता के जंगल से भागने की खबर मिल जाती है। वह भी तुरंत पुलिस बल के साथ उसी ओर चल देता है। मंगल का दोस्त रंजय भी उसी पुलिस टुकड़ी में रहता है।
कान्हु एवम फोगडा किसी भी हालत में मंगल एवम सरिता को पुलिस के पास जाने नहीं देना चाहता था। क्योंकि मंगल अब तक नक्सली का बहुत सारा गुप्त राज जान चुका था।
सुबह होने से पहले ही मंगल एवम सरिता बचकर भागते हुए जंगल के किनारे पहुंच जाते हैं। मगर जंगल के उसी किनारे पहले से ही थानेदार रमेश पुलिस बल के साथ खड़ा नजर आ जाता है।
मंगल और सरिता अभी आगे क्या करना है यह सोच पाते कि तभी पीछे से कान्हु और फोगड़ा भी वहां अपने दस्ता के साथ आ जाता है।
नक्सली और पुलिस के बीच गोलीबारी शुरू हो जाती है।
मंगल और सरिता डर के मारे चुप चाप एक पेड़ के पीछे छिप जाते हैं।
पुलिस और नक्सलियों के बीच बहुत देर तक गोली बारी होते रहती है। तब तक जिले के एसपी अरुण मैथ्यू भी भारी पुलिस बल के साथ वहां आ जाते हैं।
मंगल और सरिता अभी भी डरे सहमे पेड़ के पीछे छिपे रहते हैं।
गोलीबारी में कान्हु मारा जाता है। उसके साथ और बहुत से नकसली भी मारे जाते हैं। मगर फोगड़ा डर के मारे जंगल में भाग जाता है।
इधर पेड़ के पीछे छिपे मंगल और सरिता को भी पुलिस के हाथों मरने का डर सताने लगता है। क्योंकि अब पुलिस उन दोनों को भी चारों तरफ से घेर कर तेज़ी से उसी ओर बढ़ रही थी।
थानेदार रमेश मंगल या सरिता को नहीं पहचानता था। वह पास पहुंचकर दोनों का इनकाउंटर करता तभी मंगल का दोस्त रंजय हिम्मत करके सामने आ जाता है। वह अपने थाने के थानेदार रमेश को मंगल एवम सरिता के बारे में सारी बात बता देता है।
एसपी अरुण के कहने पर मंगल एवम सरिता को गिरफ्तार कर लिया जाता है।
मंगल एवम सरिता खुशी पूर्वक पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं।
रंजय भी दोनों के घर वापसी के कारण आज बहुत खुश था।
एक बार फिर से दो भटके राही पुलिस के सहयोग से जंगल से वापस शहर की ओर समाज के मुख्य धारा में जुड़ने के लिए चल पड़ते हैं।
दो भटके युवा दिल एक बार फ़िर से अब नए सिरे से साथ जीने मरने का ख्वाब देखने लगते हैं।
कुमार सरोज
शानदार कहानी
जवाब देंहटाएंजी धन्यवाद
हटाएंसमाज का आईना
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
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